“How to Attain Maturity?” – OSHO

Maturity means the understanding to decide for oneself, the understanding to be decisive on your own. To stand on your own feet — that’s what maturity is. But it rarely happens, because parents spoil almost every child, more or less. And then there is the school and the college and the university — they are all ready to spoil you. It is very rare that somebody becomes mature.
If you want to become mature, you have to become a very very skillful murderer. Unless you kill a few persons you will never become mature. You have to kill your parents, you have to kill your teachers, you have to kill your leaders. They are all clamouring inside you, and they don’t allow you to become a grown-up person — they go on keeping you childish. they make you a dependant, they don’t allow you independence.

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“सुनने की कला-The Art Of Listening” – OSHO

कृपया आपको सुनने की कला के विषय में हमारा मार्गदर्शन कीजिए । क्योंकि यह आपके श्रेष्ट ध्यानों में से एक है।
Please give a guide to the art of listening to you, as it is one of the your Best Meditation.
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शब्दों और उनके अर्थों की बहुत फिक्र मत लेना। यदि तुम शब्दों और उनके अर्थों पर ज्यादा ध्यान लगाते हो तो यह एक बौद्धिक चीज है। निस्संदेह कई बार तुम स्पष्टता प्राप्त कर लोगे। अचानक बादल छंट जाते हैं और सूर्य होता है वहां, लेकिन ये केवल क्षणिक बातें होंगी और यह स्पष्टता ज्यादा मदद न देगी। अगले पल यह जा चुकी होती है। बौद्धिक स्पष्टता ज्यादा काम की नहीं होती।
Don’t be much bothered by words and the meaning. If you pay much attention to the words and the meaning, it becomes an intellectual thing. Of course, sometimes you will attain to clarity. Suddenly the clouds disappear and the sun is there, but these will be only momentary things and this clarity will not help much; next moment it is gone. Intellectual clarity is not of much use.

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“मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई क्या है?” – ओशो

पुरानी सारी कठिनाइयां तो मौजूद हैं ही, कुछ नई कठिनाइयां भी मौजूद हो गई हैं। पुरानी कठिनाइयां कटी नहीं हैं। बुद्ध के समय में या कृष्ण के समय में आदमी के लिए जो समस्याएं थीं वे आज भी हैं। उतनी ही हैं। उनमें से एक भी समस्या विदा नहीं हुई। क्योंकि हमने समस्याओं के जो समाधान किए वे समाधान नहीं सिद्ध हुए। हमारे समाधान थोथे थे, ऊपरी थे। समस्याओं की जड़ को उन्होंने नहीं काटा। हम केवल ऊपर ही लीपापोती करते रहे।
वे सारी समस्याएं वैसी की वैसी खड़ी हैं। और वे सारी समस्याएं समाधान मांगती हैं। नई समस्याएं भी खड़ी हो गई हैं; जिनका अतीत के मनुष्य को कुछ भी पता न था। जैसे एक नई समस्या खड़ी हो गई है कि..

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“Conscious & Unconscious Evolution !” – OSHO

Unconscious evolution ends with man and conscious evolution — revolution — begins. But conscious evolution does not necessarily begin in any particular man. It begins only if you choose it to begin. If you do not choose it — as most people do not — you will be in a very tense condition.
Unconscious evolution is mechanical and natural. It happens by itself. Through this type of evolution, consciousness evolves. But the moment consciousness comes into being, unconscious evolution stops because its purpose has been fulfilled. Unconscious evolution is needed only up to the point where the conscious comes into being. Man has become conscious. In a way, he has transcended nature. Now nature cannot do anything; the last product that was possible through natural evolution has come into being. Now man becomes free to decide whether to evolve or not to evolve.

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“मृत्यु और धर्म” – ओशो

मृत्यु केवल मनुष्य के लिए है। इसे थोड़ा समझ लें। पशु भी मरते है, पौधे भी मरते है, लेकिन मृत्यु मानवीय घटना है। पौधे मरते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मृत्यु का कोई बोध नहीं है। पशु भी मरते हैं, लेकिन अपनी मृत्यु के संबंध में चिंतन करने में असमर्थ है।
तो मृत्यु केवल मनुष्य की ही होती है, क्योंकि मनुष्य जानकर मरता है जानते हुए मरता है। मृत्यु निश्‍चित है, ऐसा बोध मनुष्य को है। चाहे मनुष्य कितना ही भुलाने की कोशिश करे, चाहे कितना ही अपने को छिपाये, पलायन करे, चाहे कितने ही आयोजन करे सुरक्षा के, भुलावे के; लेकिन हृदय की गहराई में मनुष्य जानता है कि मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है।
मृत्यु के संबंध में पहली बात तो यह खयाल में ले लेनी चाहिए कि मनुष्य अकेला प्राणी है जो मरता है। मरते तो पौधे और पशु भी है, लेकिन उनके मरने का भी बोध मनुष्य को होता है, उन्हें नहीं होता। उनके लिए मृत्यु एक अचेतन घटना है। और इसलिए पौधे और पशु धर्म को जन्म देने में असमर्थ हैं।

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“Why Is There So Much Frustration !” – OSHO

Frustration is just a shadow which follows expectation. If you don’t expect even for a single moment, if you are in a state of mind where there is no expectation, then it is simple. You ask a question and the answer comes; there is a fulfillment. But if you ask with any expectations you will be frustrated by the answer.
Everything we do, we do with expectations. If I love someone, an expectation enters without my even knowing it. I begin to expect love in return. I have not yet loved, I have not grown into love yet, but the expectation has come and now it will destroy the whole thing. Love creates more frustration than anything else in the world because, with love, you are in a utopia of expectation. You have not even been on the journey yet and already you have begun to think of the return home.

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“आनंद की दिशा” – ओशो

मैं आप से ही पूछना चाहता हूं कि क्या आप वस्तुओं के संग्रह से ही संतुष्ट होना चाहते हैं, या कि चेतना के विकास की भी प्यास आप के भीतर है जो मात्र वस्तुओं में ही संतुष्टि सोचता है वह अंततः असंतोष के और कुछ भी नहीं पाता है, क्योंकि वस्तुएं तो केवल सुविधा ही दे सकती हैं, और निश्चय ही सुविधा और संतोष में बहुत भेद है। सुविधा कष्ट का अभाव है, संतोष आनंद की उपलिंध है।
आपका हृदय क्या चाहता है आपके प्राणों की प्यास क्या है आपके श्वासों की तलाश क्या है क्या कभी आपने अपने आपसे ये प्रश्न पूछे हैं यदि नहीं, तो मुझे पूछने दें। यदि आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा- ‘उसे पाना चाहता हूं जिसे पाकर फिर कुछ और पाने को नहीं रह जाता।’ क्या मेरा ही उत्तर आपकी अंतरात्माओं में भी नहीं उठता है
यह मैं आपसे ही नहीं पूछ रहा हूं, और भी हजारों लोगों से पूछता हूं और पाता हूं कि सभी मानव-हृदय समान हैं और उनकी आत्यंतिक चाह भी समान ही है। आत्मा आनंद चाहती है- पूर्ण आनंद, क्योंकि तभी सभी चाहों का विश्राम आ सकता है। जहां चाह है, वहां दुःख है क्योंकि वहां अभाव है।

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“शिक्षा का लक्ष्य !” – ओशो

जीवन शिक्षा का लक्ष्य है, मात्र आजीविका नहीं। जीवन के ही लिए आजीविका का मूल्य है। आजीविका अपने आप में तो कोई अर्थ नहीं रखती है। पर साधन ही अज्ञानवश अनेक बार साध्य बन जाते हैं। ऐसा ही शिक्षा में भी हुआ है। आजीविका लक्ष्य बन गई है। जैसे मनुष्य जीने के लिए न खाता हो, वरन खाने के लिए ही जीता हो। आज की शिक्षा पर यदि कोई विचार करेगा तो यह निष्कर्ष अपरिहार्य है।
क्या मैं कहूं कि आज की शिक्षा की इस भूल के अतिरिक्त और कोई भूल नहीं है लेकिन यह भूल बहुत बड़ी है। यह भूल वैसी ही है, जैसे कोई किसी मृत व्यक्ति के संबंध में कहे कि इस देह में और तो सब ठीक है, केवल प्राण नहीं है।
हमारी शिक्षा अभी ऐसा ही शरीर है, जिसमें प्राण नहीं है, क्योंकि आजीविका जीवन की देह-मात्र ही है। शिक्षा तब सप्रमाण होगी, जब वह आजीविका ही नहीं, जीवन को भी सिखाएगी। जीवन सिखाने का अर्थ है, आत्मा को सिखाना।

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“दुःख और कष्ट !” – ओशो

गरीब आदमी कष्ट में होता है, दुख में नहीं होता। अमीर आदमी कष्ट में नहीं होता, दुख में होता है। कष्ट का मतलब है अभाव और दुख का मतलब है, भाव। कष्ट हम उस चीज से उठाते हैं, जो हमें नहीं मिली है और जिसमें हमें आशा है कि मिल जाये तो सुख मिलेगा। इसलिए गरीब आदमी हमेशा आशा में होता है, सुख मिलेगा, आज नहीं कल, कल नहीं परसों; इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में, मगर सुख मिलेगा। यह आशा उसके भीतर एक थिरकन बनी रहती है। कितना ही कष्ट हो, अभाव हो, वह झेल लेता है, इस आशा के सहारे कि आज है कष्ट, कल होगा सुख। आज को गुजार देना है। कल की आशा उसे खींचे लिए चली जाती है। फिर एक दिन यही आदमी अमीर हो जाता है।
अमीर का मतलब, जो—जो इसने सोचा था आशा में, वह सब हाथ में आ जाता है। इस जगत में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं है, जब आशा आपके हाथ में आ जाती है। तब तत्सण सब फ्रस्ट्रेशन हो जाता है, सब विषाद हो जाता है। क्योंकि इतनी आशाएं बांधी थीं, इतने लंबे—लंबे सपने देखे थे, वे सब तिरोहित हो जाते हैं। हाथ में कोहिनूर आ जाता है, सिर्फ पत्थर का एक टुकड़ा मालूम पड़ता है। सब आशाएं खो गयीं। अब क्या होगा? अमीर आदमी इस दुख में पड़ जाता है कि अब क्या होगा? अब क्या करना है? कोई आशा नहीं दिखायी पड़ती आगे।

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“सत्य की खोज की दिशाएं: विचार और दर्शन” – ओशो

सत्य की खोज की दो दिशाएं हैं- एक विचार की, एक दर्शन की। विचार-मार्ग चक्रीय है। उसमें गति तो बहुत होती है, पर गंतव्य कभी भी नहीं आता। वह दिशा भ्रामक और मिथ्या है। जो उसमें पड़ते हैं, वे मतों में ही उलझकर रह जाते हैं। मत और सत्य भिन्न बातें हैं। मत बौद्धिक धारणा है, जबकि सत्य समग्र प्राणों की अनुभूति में बदल जाते हैं। तार्किक हवाओं के रुख पर उनकी स्थिति निर्भर करती है, उनमें कोई थिरता नहीं होती। सत्य परिवर्तित नहीं होता है। उसकी उपलिंध शाश्वत और सनातन में प्रतिष्ठा देती है।
विचार का मार्ग उधार है। दूसरों के विचारों को ही उसमें निज की संपत्ति मानकर चलना होता है। उनके ही ऊहापोह और नए-नए संयोगों को मिलाकर मौलिकता की आत्मवंचना पैदा की जाती है, जबकि विचार कभी भी मौलिक नहीं हो सकते हैं। दर्शन ही मौलिक होता है, क्योंकि उसका जन्म स्वयं की अंतर्दृष्टि से होता है।

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“अहिंसा क्या है?” – ओशो

अहिंसा शब्द की नकारात्मकता ने बहुत भ्रांति को जन्म दिया है। वह शब्द तो नकारात्मक है, पर अनुभूति नकारात्मक नहीं है। वह अनुभूति शुद्ध प्रेम की है। प्रेम राग हो तो अशुद्ध है, प्रेम राग न हो तो शुद्ध है। राग-युक्त प्रेम किसी के प्रति होता है, राग-मुक्त प्रेम सबके प्रति होता है। सच यह है कि वह किसी के प्रति नहीं होता है। बस, केवल होता है। प्रेम के दो रूप हैं। प्रेम संबंध हो तो राग होता है। प्रेम स्वभाव हो, स्थिति हो तो, वीतराग होता है। यह वीतराग प्रेम ही अहिंसा है।
प्रेम के संबंध से स्वभाव में परिवर्तन अहिंसा की साधना है। वह हिंसा का त्याग नहीं, प्रेम का स्फुरण है। इस स्फुरण में हिंसा तो अपने आप छूट जाती है, उसे छोड़ने के लिए अलग से कोई आयोजन नहीं करना पड़ता है। जिस साधना में हिंसा को भी छोड़ने की चेष्टा करनी पड़े वह साधना सत्य नहीं है।

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“विचार के जन्म के लिए विचारों से मुक्ति !” – ओशो

विचार-शक्ति के संबंध में आप जानना चाहते हैं निश्चय ही विचार से बड़ी और कोई शक्ति नहीं। विचार व्यक्तित्व का प्राण है। उसके केंद्र पर ही जीवन का प्रवाह घूमता है। मनुष्य में वही सब प्रकट होता है, जिसके बीज वह विचार की भूमि में बोता है। विचार की सचेतना ही मनुष्य को अन्य पशुओं से पृथक भी करती है। लेकिन यह स्मरण रहे कि विचारों से घिरे होने और विचार की शक्ति में बड़ा भेद है;भेद ही नहीं, विरोध भी है।
विचारों से जो जितना घिरा होता है, वह विचार करने से उतना ही असमर्थ और अशक्त हो जाता है। विचारों की भीड़ चित्त को अंततः विक्षिप्त करती है। विक्षिप्तता विचारों की अराजक भीड़ ही तो है! शायद इसीलिए जगत में जितने विचार बढ़ते जाते हैं, उतनी ही विक्षिप्तता भी अपनी जड़ें जमाती जाती है। विचारों का आच्छादन विचार-शक्ति को ढांक लेता है और निष्प्राण कर देता है। विचारों का सहज स्फुरण विचारों के बोझ से निःसत्व हो जाता है। विचारों के बादल विचार-शक्ति के निर्मल आकाश को धूमिल कर देते हैं। जैसे वर्षा में आकाश में घिर आए बादलों को ही कोई आकाश समझ ले, ऐसी ही भूल विचारों को ही विचार शक्ति समझने में हो जाती है।

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ओशो सिद्धार्थ जी का साक्षात्कार (Interview) !

ओशो से बिल्कुल अलग नहीं है। ओशोधारा ओशो की ही परंपरा में है। जब भी कोई युगपुरुष आता है तो उसके बाद एक स्कूल तैयार हो जाता है जो कहता है कि आखिरी गुरु हो गया और अब आगे किसी गुरु की जरूरत नहीं है। जैसे बुद्ध आए, तो कहा गया कि वह आखिरी बुद्ध हैं। लेकिन बुद्ध के बाद मंजूश्री ने कहा कि परंपरा को अगर आगे ले जाना है तो आगे भी गुरु की जरूरत होगी। इसलिए मंजूश्री के साथ जो लोग चले, उन्हें महायानी कहा गया यानी गुरु एक जहाज की तरह होता है जिसमें अनेक लोग सवार होकर भवसागर को पार करते हैं। लेकिन बाकी शिष्यों ने कहा कि बुद्ध ने जो कहा, उसी को समझना काफी है। उन लोगों को हीनयान कहा गया। करीब-करीब सभी गुरुओं के साथ यही हुआ। हजरत मुहम्मद के साथ भी यही हुआ। लेकिन उनके बाद मौला अली से सूफियों की जीवंत परंपरा चली। सूफी भी गुरु परंपरा में विश्वास करते हैं। ओशो भी विदा हुए तो लोग ऐसी ही बात करने लगे लेकिन हम लोगों ने महसूस किया कि शास्त्र के आधार पर परंपरा जीवित नहीं रह सकती, शास्ता (बुद्ध पुरुष) के आधार पर जीवित रह सकती है। यही सोचकर मैंने ओशोधारा की शुरुआत की। फिर इसमें ओशो शैलेंद्र जी और मां प्रिया जुड़ीं।

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“विज्ञान: विश्वास से विवेक की ओर” – ओशो

हमारी चेतना में हो रही इस सारी उथल-पुथल, अराजकता, क्रांति और नए के जन्म की संभावना का केंद्र और आधार विज्ञान है। विज्ञान के आलोक ने हमारी आंखें खोल दी हैं और हमारी नींद तोड़ दी है। उसने ही हमसे हमारे बहुत-से दीर्घ पोषित स्वप्न छीन लिए हैं और बहुत से वस्त्र भी और हमारे स्वयं के समक्ष ही नग्न खड़ा कर दिया है, जैसे किसी ने हमें झकझोर कर अर्धरात्रि में जगा दिया हो। ऐसे ही विज्ञान ने हमें जगा दिया है।
विज्ञान ने मनुष्य का बचपन छीन लिया है और उसे प्रौढ़ता दे दी है। उसकी ही खोजों और निष्पत्तियों ने हमें हमारी परंपरागत और रूढ़िबद्ध चिंतना से मुक्त कर दिया है, जो वस्तुतः चिंतना नहीं, मात्र चिंतन का मिथ्या आभास ही थी; क्योंकि जो विचार स्वतंत्र न हो वह विचार ही नहीं होता है। सदियों-सदियों से जो अंधविश्वास मकड़ी के जालों की भांति हमें घेरे हुए थे, उसने उन्हें तोड़ दिया है, और यह संभव हो सका है कि मनुष्य का मन विश्वास की कारा से मुक्त होकर विवेक की ओर अग्रसर हो सके।
कल तक के इतिहास को हम विश्वास-काल कह सकते हैं। आनेवाला समय विवेक का होगा।

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“कार्यकर्ताओं के लिए सुझाव !” – ओशो

जब भी कोई संदेश पहुंचाने के किसी काम में संलग्न होता है तो संदेश पहुंचाना अनिवार्य रूप से एक आत्मक्रांति बननी शुरू हो जाती है। तब उसका व्यवहार, उसका उठना-बैठना, उसका बोलना, उसके संबंध, सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। और वे उसी अर्थ में महत्वपूर्ण हो जाते हैं जितनी बड़ी बात वह पहुंचाने के लिए उत्सुक हुआ है। वह वाहक बन रहा है, वह वाहन बन रहा है किसी बड़े विचार का। तो उस बड़े विचार के अनुकूल उसे अपने व्यक्तित्व को जमाने की भी जरूरत होती है। नहीं तो अक्सर यह होता है कि विचार के प्रभाव में हम उसे पहुंचाना शुरू कर देते हैं और हम यह भूल ही जाते हैं कि हम उसे पहुंचाने की पात्रता स्वयं के भीतर खड़ी नहीं कर रहे हैं। इस पात्रता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
साधक का काम उतना बड़ा नहीं है जितना कार्यकर्त्ता का बड़ा है। साधक अकेला है, अपने में जीता है, अपने लिए कुछ कर रहा है। कार्यकर्त्ता ने और भी बड़ी जिम्मेवारी ली है। वह साधक भी है और जो उसे प्रीतिकर लगा है उसे पहुंचाने के लिए वह माध्यम भी बन रहा है।

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“What is Inner Voice?” – OSHO

The first thing: the inner voice is not a voice, it is silence. It says nothing. It shows something, but it says nothing. It gestures towards something, but it says nothing. The inner voice is not a voice. If you are still hearing some voice, it is not inner. ‘Inner voice’ is a misnomer, it is not the right word. Only silence is inner. All voices are from the outside.

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“आतंकवादः कारण और निवारण” – ओशो सिद्धार्थ ‘औलिया’

गुरु से जुड़ोगे तो सिद्धि होगी, अनुभव होगा, अपने अनुभव से जिन्दगी को जियोगे। लेकिन अगर गुरु से नहीं जुड़े, सद्गुरु से नहीं जुडे़ और सिद्धांत से जुड़ गये हो, तो तुम्हारे जीवन में क्या होगा? जो सद्गुरु से नहीं जुड़े हैं, उनके जीवन में क्या हो रहा है? वे किसी न किसी वाद से जुड़ेंगे। वाद का मतलब- सिद्धांत। माओवाद, गांधावाद, लैनिनवाद और बड़े सारे वाद हैं। वहाबी वाद सबसे खतरनाक है। सलाफी वाद और भी खतरनाक है। क्योंकि जब वाद होगा तो विवाद भी होगा। यह हो ही नहीं सकता कि वाद हो और विवाद न हो। वाद, विवाद तक रूक जाए तो कोई दिक्कत नहीं, विवाद हो रहा है, बहस हो रही है। लेकिन जब विवाद होगा तो फसाद भी होगा। फसाद यानि हिंसा।

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