“अंतर्यात्रा में गुरु की जरूरत” – ओशो शैलेन्द्र

पहला प्रश्न, पूछते हैं कि “गुरु बिन होय न प्रभु का ज्ञान”, मुझे समझ में नही आता कि बीच में गुरु की क्या जरूरत है? सर्वशक्तिमान प्रभु सीधे ही हमें ज्ञान क्यों नही दे देता?

जयेश मुखर्जी, अगर प्रभु तुम्हें सीधा ज्ञान दे सकता होता तो दे ही चुका होता। नही दिया है इससे स्पष्ट है कि नही दे सकता। संत कबीर साहब ने कहा है-

“तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय,
कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय। “

वह सर्वशक्तिमान नही है, ओमनीपोटेंट नही है, एक काम वह नही कर सकता, परमात्मा स्वयं परमात्मा का ज्ञान हमें नही दे सकता, गुरु ही वह कार्य कर सकता है। इसलिए जयेश मुखर्जी, इस भ्रम में नही रहना कि तुम्हें सीधा ज्ञान मिल जाएगा, बिना गुरु के हरि का ज्ञान नही हो सकता। यह कहावत ठीक ही है कि गुरु बिन होय न ज्ञान।

मुझे याद आता है बचपन में जब हम पढ़ते थे तो कुछ मित्र होली का चंदा मांगने के लिए निकले थे। सभी प्राइमरी स्कूल के बच्चे थे, एक मुखर्जी बाबू हमारे मोहल्ले में रहते थे। उनके यहां जब चंदा मांगने गए तो उन्होंने खुशी-खुशी पचास रुपए दिए। लेकिन जिस बच्चे ने उन्हें पचास रुपए की रसीद काटकर दी उसने स्पेलिंग मिस्टेक कर दी। मुखर्जी की जगह उसने मूरख जी लिख दिया। मुखर्जी बाबू बहुत नाराज हुए और पचास रुपए वापस ले लिए। जयेश मुखर्जी, मैं संकोचवश कह नही रहा हूं लेकिन हो तुम भी वही। परमात्मा सर्वशक्तिमान नही है, एक काम वह नही कर सकता, मूरख जी को मुखर्जी नही बना सकता। परमात्मा बड़ा शरीफ है, बड़ा सज्जन है, गुरु थोड़ा दुष्ट किस्म का होता है। वह लोगों को परिवर्तित करता है, बदलता है, सिखाता है। परमात्मा नही सिखाता।

मैं पढ़ रहा था शरीफ आदमी की परिभाषा, शरीफ आदमी वह है जो हारमोनियम बजाना जानता है किंतु बजाता नही। श्रेष्ठ कवि वह है जो कविता तो लिखता है मगर सुनाता नही, अच्छा गायक वह है जो गा सकता है मगर चुप रहता है और अच्छा वक्ता वह है जो घंटों बोल सकता है मगर मौन साधे रहता है और सज्जन पुरुष वह है जो सलाह तो दे सकता है किन्तु देता नही, असली धनवान वही है जो अपने धन को उछालता नही फिरता और वास्तविक पहलवान वही है जो अपनी ताकत का प्रदर्शन नही करता। वह सर्वशक्तिमान प्रभु अपनी ताकत का प्रदर्शन नही करेगा। वह बहुत शरीफ है, सदगुरु इतना शरीफ नही होता। इसलिए सदगुरु वह गुह ज्ञान देता है और परमात्मा के ओंकार स्वरूप से लोगों का परिचय कराता है। इसलिए गुरु की जरूरत है, थी और रहेगी।

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दूसरा प्रश्न है, धर्म के नाम पर इतनी दुकानें चल रही हैं। टेलीविजन चैनलों पर गुरुओं की भरमार है। सब अपने-अपने माल को श्रेष्ठ बताते हैं। पिछले पन्द्रह वर्षों से इंटरनेट पर परमात्मा की तलाश में संलग्न हूं। ऐसी मुशिकल भरी जिंदगी में मेरे जैसा भोला-भाला इंसान किस गुरु का शिष्य बने समझ में नही आता। सच्चे गुरु के लक्षण बताएं। पूछा है मिथिलेश चौधरी ने हिसार, हरियाणा से।

मिथिलेश तुम सवाल ही गलत पूछ रहे हो। सच्चे गुरु के लक्षण नही, सच्चे शिष्य के लक्षण पूछो। तुम कैसे सदशिष्य बनो, यह सोचो! अभी तो तुम सदशिष्य ही नही हो, तुम केवल एक विद्यार्थी हो। स्टूडेंट और डिसाइपल का फर्क समझना, डिसाइपल का अर्थ है जो डिसीप्लीन्ड होने को तैयार है। जो एक खास अनुशासन से, साधना से गुजरने को राजी है और विद्यार्थी का अर्थ है जो केवल सूचनाएं ग्रहण कर रहा है।

तुम टेलीविजन का चैनल बदल-बदलकर दो-दो मिनट सब कुछ देखते हो। कुछ वचन इस गुरु के सुने, कुछ उसके सुने। इससे परमात्मा नही मिलेगा, शायद तुम पागल जरूर हो जाओगे। कह रहे हो कि पन्द्रह साल से इंटरनेट पर परमात्मा की तलाश में हूं। तुमने भी गजब कर दिया मिथिलेश! पुराने जमाने में लोग शास्त्रों में, और ग्रंथों में खोजते थे, इंटरनेट आजकल का नया शास्त्र है, ये और भी कठिन है। शास्त्र तो दो-चार घर में होते थे, एक छोटी सी लाइब्रेरी तुम बना सकते थे वह भी काफी थी पागल करने के लिए। इंटरनेट पर तो सारी दुनिया की जानकारी उपलब्ध है, दुनिया के सारे शास्त्र उपलब्ध हैं, पन्द्रह साल क्या, तुम पन्द्रह जन्म भी लगे रहो तो सारी किताबें न पढ़ पाओगे। रोज इतनी किताबें छप जाती हैं कि एक जिंदगी कम है उनको पढ़ने के लिए… केवल एक दिन की छपी हुई किताबें पढ़ने के लिए। परमात्मा न मिलेगा और तुम अपनी सामान्य बुद्धि भी खो दोगे और विक्षिप्त हो जाओगे। नही तुम शिष्य नही हो, मत पूछो सदगुरु के लक्षण, सदशिष्य के लक्षण समझो।

सदशिष्य साधना करने को तैयार होता है जानकारी में उत्सुक नही होता। आंतरिक ज्ञान की तलाश होती है, वह स्वयं जानना चाहता है, जानकारी हासिल करना नही चाहता। वह परमात्मा का स्वाद लेना चाहता है, परमात्मा के विषय में सूचनाएं नही इकट्ठी करना चाहता।

चैतन्यता का विकास करना होगा, इंटरनेट और टेलीविजन तो यंत्र हैं। उनमें स्वयं ही कोई चेतना नही होती तो वे तुम्हारी चेतना को कैसे जगाएंगे। सदगुरु की तलाश करनी होगी और किसी जीवित व्यक्ति किो खोजना होगा। जिन खोजा तिन पाइयां, जो खोजते हैं उन्हें मिल जाता है। लेकिन याद रखना, ठीक दिशा में खोजोगे तभी। कबीरदास जी ने शर्त लगाई है,

जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ,
मैं बौरी डूबन डरी रही किनारे बैठ।

तुम अपना टेलीविजन और इंटरनेट लेकर किनारे पर बैठे हो और समुद्र की गहराई के बारे में पता लगाना चाह रहे हो, यह संभव नही है। खोजबीन करनी होगी, साधु-सत्संग करना होगा। माना कि उसमें भी भटकाव है लेकिन सत्संग करते-करते, साधुओं की तलाश में, वे जो बता रहे हैं उस विधि को प्रयोग करते हुए, उसके परिणाम को देखते हुए धीरे-धीरे सदगुरु से मिलन हो पाएगा। ‘एस धम्मो सनंतनो‘ प्रवचनमाला में बुद्ध की साधना के संबंध में, उनके गुरु के संबंध में बोलते हुए परमगुरु ओशो ने कहा है-

“बुद्ध बड़े शुद्ध खोजी हैं। उनकी खोज बड़ी निर्दोष है। घर छोड़ा तो जितने गुरु उपलब्ध थे, सबके पास गए। गुरु उनसे थक गए; क्योंकि असली शिष्य आ जाए तभी पता चलता है कि गुरु, गुरु है या नही। झूठें शिष्य हों साथ, तो पता ही नही चलता।
मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि असली गुरु का कैसे पता चले? मैं उनको कहता हूँ कि तुम फिक्र न करो। अगर तुम असली शिष्य हो, तो असली गुरु का पता चल जाएगा। नकली गुरु तुमसे बचेगा, भागेगा, कि यह चला आ रहा है असली शिष्य, यह झंझट खड़ी करेगा। तुम गुरु की फिक्र ही छोड़ दो। असली शिष्य अगर तुम हो, तो नकली गुरु तुम्हारे पास टिकेगा ही नही। तुम टिके रहना, वही भाग जाएगा। दुनिया में नकली गुरु हैं क्योंकि नकली शिष्यों की बड़ी संख्या है। नकली गुरु तो बाइप्रोडक्ट हैं। वे सीधे पैदा नही होते। नकली शिष्य उन्हें पैदा कर लेता है। बुद्ध सभी गुरुओं के पास गए। गुरु घबड़ा गए। क्योंकि यह व्यक्ति निशिचत प्रामाणिक था। जो उन्होंने कहा, वह इसने इतनी पूर्णता से किया कि उनको भी दया आने लगी कि यह तो हमने भी नही किया है! कोई करता ही नही था, तब तक बात ठीक थी। इस पर दया आने लगी। इससे यह भी न कह सकते थे कि तुमने पूरा नही किया, इसलिए उपलब्ध नही हो रहे हो। इसने पूरा-पूरा किया। उसमें तो रत्ती भर कमी नही रखी। गुरुओं ने हाथ जोड़कर कहा कि बस, हम यहां तक तुम्हें बता सकते थे, इसके आगे हमें खुद भी पता नही है।
सारे गुरुओं को बुद्ध ने चुका डाला। एक भी गुरु साबित न हुआ। तब सिवाय इसके कोई रास्ता न रहा कि खुद खोजें। और इसलिए बुद्ध की बातों में बड़ी ताजगी है, क्योंकि उन्होंने खुद खोजा। किसी गुरु से नही पाया था। किसी से सुनकर नही दोहराया था। फिर खुद खोज पर निकले- नितांत अकेले, बिना किसी सहारे के। शास्त्र धोखा दे गए, सब पीछे हट गए, अकेला रह गया खोजी। ऐसा ही होता है। जब तुम्हारी खोज असली होगी, तुम पाओगे शास्त्र काम नही देते। शास्त्र तभी तक काम देते हैं जब तक तुम उनका भजन-पाठ करते हो। बस तभी तक। अगर तुमने यात्रा शुरू की, तुम तत्क्षण पाओगे शास्त्र में हजार गलतियां हैं। होनी ही चाहिए। क्योंकि हजारों साल तक हजारों लोग उसे दोहराते रहे हैं, बनाते रहे हैं। उसमें बहुत कुछ छूट गया है, बहुत कुछ जुड़ गया है। लेकिन यह तो तुम्हें तभी पता चलेगा जब तुम यात्रा करोगे।
तुम एक नक्शा लिए घर में बैठे हो, उसकी तुम पूजा करते हो- तो कैसे पता चलेगा? यात्रा पर निकलो तब तुम्हें पता चलेगा। अरे, इस नक़्शे में नदी बतायी है, यहां कोई नदी नही है! इस नक़्शे में पहाड़ बताया है, यहां कोई पहाड़ नही है! इस नक़्शे में कहा है बाएं मुड़ना, बाएं मुड़ो तो गड्ढा है। यात्रा होती नही। दाएं मुड़ो तभी हो सकती है।
जब तुम यात्रा पर निकलोगे तभी परीक्षा होती है तुम्हारे नक्शों की। उसके बिना कोई परीक्षा नही होती। जो भी यात्रा पर गए, उन्होंने शास्त्र को सदा कम पाया। जो भी यात्रा पर गए, उन्होंने गुरुओं को कम पाया। जो भी यात्रा पर गए, उन्हें एक बात अनिवार्यरूपेण पता चली कि प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही खोजना पड़ता है। दूसरे से सहारा मिल जाए, बहुत। पर कोई दूसरा तुम्हें मार्ग नही दे सकता। क्योंकि दूसरा जिस मार्ग पर चला था। वह उसके स्वभाव में अनुकूल बैठता था।
और प्रत्येक व्यक्ति अिद्वितीय है।
बुद्ध ने यह घोषणा की कि प्रत्येक व्यक्ति अिद्वितीय है। इसलिए एक ही राजपथ पर सभी नही जा सकते, सबकी अपनी पगडंडी होगी। इसलिए सदगुरु तुम्हें रास्ता नही देता, केवल रास्ते को समझने की परख देता है। सदगुरु तुम्हें विस्तार से नक़्शे नही देता, केवल रोशनी देता है, ताकि तुम खुद विस्तार देख सको, नक़्शे तय कर सको। क्योंकि नक़्शे रोज बदल रहे हैं। जिंदगी कोई थिर बात नही है, जड़ नही है। जिंदगी प्रवाह है। जो कल था वह आज नही है, जो आज है वह कल नही होगा।
सदगुरु तुम्हें प्रकाश देता है, रोशनी देता है, दीया देता है हाथ में कि यह दीया ले लो, अब तुम खुद खोजो और निकल जाओ। और ध्यान रखना, खुद खोजने से जो मिलता है, वही मिलता है। जो दूसरा दे दे, वह मिला हुआ है ही नही। दूसरे का दिया छीना जा सकता है। खुद का खोजा भर नही छीना जा सकता।”

छोड़ो शास्त्रों और किताबों को मिथिलेश, छोड़ो इंटरनेट और टेलीविजन, जीवित व्यक्ति में तलाशो। आज तक जिसने भी पाया है गुरु के माध्यम से ही पाया है। गुरु के लक्षण नही बताए जा सकते, हर गुरु अपने आप में अनूठा और अद्वितीय होता है। गुरुओं का कोई मास प्रोडक्शन नही होता कि सब एक से चले आ रहे हैं। महावीर बस एक बार ही हुए, वैसा आदमी फिर दोबारा न हुआ। कृषण बस एक बार हुए, दोबारा फिर वैसा इंसान नही हुआ। अगर तुम गुरु की परिभाषा बनाओगे तो अतीत के लोगों से ही तो बनाओगे। तुम सोचोगे कि जो बुद्ध जैसा होना चाहिए, कि जो राम जैसा होना चाहिए, कि जीसस जैसा होना चाहिए, वैसा व्यक्ति अब दोबारा नही होगा। और अगर कोई मिल जाए तो जानना कि वह रामलीला का राम है, वह कोई नाटककार है, कोई अभिनेता है। वास्तविक राम दोबारा नही होंगे। हर सदगुरु बस एक बार होता है इसलिए उसके कोई लक्षण नही बताए जा सकते और उसकी कोई जरूरत भी नही है। तुम तो शिष्यत्व के लक्षण पूछो, तुम सीखने वाले बनो।

– ओशो शैलेन्द्र

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One thought on ““अंतर्यात्रा में गुरु की जरूरत” – ओशो शैलेन्द्र

  • June 24, 2015 at 2:34 AM
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    I want a Pravchan by Osho on Parashuram. I remember I heard it during 1980. Now I am not getting anywhere.
    Please guide.

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