“संतुलन ध्‍यान – बैलेंसिंग” – ओशो

तिब्‍बत में एक बहुत छोटी सी विधि है—बैलेंसिंग, संतुलन उस विधि का नाम है।

कभी घर में खड़े हो जाएं सुबह स्‍नान करके, दोनों पैर फैला लें और खयाल करें कि आपके बाएं पैर पर ज्‍यादा जोर पड़ रहा है। अगर बाएं पर पड़ रहा है तो फिर आहिस्‍ते से जार को दाएं पर ले जाएं। दो क्षण दांए पर जोर को रखे, फिर बाएं पर ले जाएं।

एक पंद्रह दिन, सिर्फ शरीर का भार बांए पर है कि दाएं पर, इसको बदलते रहें। और वह तिब्‍बती प्रयोग कहता है कि फिर इस बात का प्रयोग करें कि दोनों पर भार न रह जाएं, आप दोनों पैर के बीच में रह जाएं।

और एक तीन सप्‍ताह का प्रयोग और आप बिलकुल बीच में होंगे—भार न बाएं पर होगा, न दाएं पर होगा—जब आप बिलकुल बीच में होंगे—तब आप ध्‍यान में प्रवेश कर जाएंगे। ठीक उसी क्षण में आपके आस पास गहन शांति होगी, आप आनंद से लबरेज होगें।

ऊपर से देखने पर लगेगा, इतनी सी आसान बात, करेंगे तो आसान भी मालूम पड़ेगी और कठिन भी मालूम पड़ेगी। बहुत सरल मालूम पड़ती है, दो पंक्तियों में कहीं जा सकती ह।, लेकिन लोगों ने इस छोटे से प्रयोग के द्वार परम आनंद को उपलब्‍ध किया है। जैसे ही आप बैलेंस होते है—न बाएं पर रह जाते, न दाएं पर रह जाते, जैसे ही दोनें के बीच में रह जाते हैं। वैसे ही आप पाते है कि वह बैलेंसिग, वह संतुलन आपकी कांशसनेस का, चेतना का भी बैलेंसिग हो गया। चेतना भी बैलेंस्‍ड हो गई, चेतना भी संतुलित हो गई। तत्‍काल तीर की तरह भीतर गति हो जाती है।

– ओशो

[हसिबा खेलिबा धरिबा ध्‍यानम्‍’’]

1878 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!