“मानो मत, जानो” –  ओशो

मानो मत, जानो”

मानो मत ! अगर जानना है तो। जानने का पहला कदम है– मानने से मुक्त हो जाना।  अगर तुम मुझसे पूछो, मेरा गणित पूछो, थोड़ा उलटा लगेगा, थोड़ा बेबूझ लगेगा, मगर मेरी भी मजबूरी है। मैं सत्य को वैसा ही कहने को मजबूर हूं जैसा है। अगर तुम सच में नास्तिक हो जाओ तो शायद कभी तुम आस्तिक भी हो सकते हो। नास्तिकता और आस्तिकता में विरोध नहीं है। नास्तिकता सीढ़ी है– प्राथमिक सीढ़ी है–आस्तिक होने के लिए। अगर मेरा वश चले तो मैं हर बच्चे को नास्तिक बनाऊं। हर बच्चे को जिज्ञासा दूं, प्रश्न दूं, खोज की आकांक्षा दूं। हर बच्चे के जीवन में एक तीव्र प्रेरणा भरूं कि तू जानना, मानना मत; और जब तक तू न जान ले, ठहरना मत।

बुद्ध ने जाना होगा तो बुद्ध पहुंचेंगे, और नानक ने जाना होगा तो नानक पहुंचेंगे, और कबीर ने जाना होगा तो कबीर पहुंचेंगे। उनके पहुंचने से तेरा पहुंचना नहीं हो सकता। तू जानेगा तो ही तू पहुंचेगा। और पहले चाहिए कि चित्त की स्लेट खाली हो जाए। पोंछ डालो जो भी दूसरों ने लिख दिया है। धो लो स्लेट, साफ कर लो। कोरी कर लो तुम्हारी किताब। और मजा यह है कि कोरी किताब तुमने क्या की कि जैसे राम को आमंत्रण मिल जाता है। कोरी किताबों पर उतरता है वह फूल। कोरी किताबों पर आती है वह किरण। कोरी किताबों पर होता है वह विस्फोट। कोरी किताब यानी निर्दोष चित्त– मान्यताओं से, विश्वासों से मुक्त।

– ओशो 

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