“गुरु का आशीर्वाद” – ओशो

प्रश्नकर्ता:- भगवान श्री, आशीर्वाद क्या है? और गुरु जब शिष्य के सिर पर हाथ धरता है, तब क्या प्रेषित करता है? और क्या आशीर्वाद लेने की भी क्षमता होती है?

आशीर्वाद गुरु तो अकारण देता है, बेशर्त देता है; लेकिन तुम ले पाओगे या न ले पाओगे, यह तुम पर निर्भर है। इतना ही काफी नहीं है कि कोई दे और तुम ले लो; तुम्हें उसमें कुछ दिखाई भी पड़ना चाहिए, तभी तुम लोगे। वर्षा हो और तुम छाते की ओट में छिपकर खड़े हो जाओ, तो तुम न भीगोगे। आशीर्वाद बरसे, और तुम अहंकार की ओट में, अहंकार के छाते में छिप जाओ, तो तुम न भीगोगे। वर्षा हो जाएगी, मेघ आएंगे, और चले जाएंगे तुम सूखे रह जाओगे।

तो, तुम्हारी तैयारी चाहिए। तुम्हारा स्वीकार का भाव चाहिए। ग्रहण करने की क्षमता चाहिए। चातक की भांति मुंह खोलकर आकाश की तरफ, प्रार्थना से भरा हुआ हृदय चाहिए। स्वाति की बूंद तुम्हारे बंद मुंह में न गिरेगी- मुंह खुला होना चाहिए, आकाश की तरफ उठा होना चाहिए, प्रतीक्षातुर होना चाहिए, तो ही। तो, जब तुम गुरु के पास झुको, तब वस्तुतः झुकना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि सिर ही झुके और हृदय बिना झुका रह जाए, तो आशीर्वाद बरस जाएगा । समझने की बात यह है कि गुरु यह नहीं कह रहा है कि तुम्हारी कोई पात्रता होगी तो आशीर्वाद दूंगा; लेकिन तुम्हारी पात्रता न होगी तो दिया आशीर्वाद तुम तक न पहुंच पाएगा, व्यर्थ चला जाएगा।

गुरु आशीर्वाद देता है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं; गुरु से आशीर्वाद बरसता है, ऐसा ही कहना ठीक है। जैसे दीए से रोशनी झरती है, फूल से गंध बहती है, ऐसा गुरु कुछ करता है, प्रेषित करता है, ऐसा नहीं; तुम्हें कुछ देता है विशेष रूप से, ऐसा नहीं- झर ही रहा है। वह उसके होने का ढंग है। उसने कोई ऊंचाई पाई है, जिस ऊंचाई से झरने नीचे की तरफ बहते ही रहते हैं। अगर तुम तैयार हो तो तुम नहा लोगे। तुम अगर तैयार हो तो जन्मों-जन्मों की धूल बह जाएगी उस स्नान में। तुम अगर तैयार हो तो तुम्हारे मार्ग के कांटे हट जाएंगे और फूलों से भर जाएगा मार्ग।

लेकिन आशीर्वाद लेने की कला, झुकने की कला है। वह अहंकार को हटाने की कला है। वह स्वीकार-भाव है! आस्तिकता है! श्रद्धा है! आस्था है! प्रेम है! तो पहली तो बात यह है कि गुरु देता है, ऐसा नहीं; गुरु आशीर्वाद का दान है, देता नहीं है। गुरु के होने में ही समाया है…! ऐसा भी मत समझना कि वह तुम्हारे लिए कुछ विशेष रूप से कर रहा है। कोई भी न हो, एकांत में भी दीया जले, तो भी रोशनी जलती रहती है, तो भी प्रकाश पड़ता रहता है।

वीरान में, निर्जन में फूल खिले, कोई राह से न निकले, कोई नासापुट पास न आए, किसी को कभी कानों कान खबर ही न होगी शायद, निर्जन में खिले फूल की किसको खबर होगी; लेकिन सुगंध तो झरती ही रहेगी; सुगंध तो भरती ही रहेगी हवाओं में; हवाओं पर पंख फैलाती रहेगी; सुगंध तो दूर-दूर की यात्रा पर निकलती ही रहेगी। फूल तो अपने को लुटा देगा। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई था या नहीं! किसी का होना न होना संयोग है। फूल खिल गया है तो सुगंध का बिखरना नियति है।

गुरु वही है जिससे आशीर्वाद ऐसे ही बिखरता है, जैसे खिल गए फूल से गंध बिखरती है। संयोग की बात है कि कोई ले ले, झेल ले। संयोग की बात है कि कोई अपने नासापुटों को भर ले। संयोग की बात है कि इन किरणों को कोई संभाल ले अपने हाथों में और अपने अंधेरे रास्ते पर चिराग जला ले। यह संयोग की बात है। आशीर्वाद दिया नहीं जााता; गुरु के होने का ढंग आशीर्वाद है; वह प्रसादरूप है।

आशीर्वाद जैसे मैंने कहा, फूल जब खिलता है तो गंध बिखरती है। गंध क्या है? बीज में छिपी थी, फूल में प्रकट हुई; बीज में बंद थी, फूल में खिली। लंबी यात्रा करनी पड़ी, बीज अंकुर बना; कितनी कठिनाइयां थीं; कितने पत्थर-रोड़े थे राह में बीज के, जमीन को फोड़कर ऊपर आया; कितना कोमल था और कितना संघर्ष था; हजार उपद्रवों को झेलकर बचा- वृक्ष बना, फूल खिले, गंध बिखरी! तुम्हारे भीतर जो कल होने वाला है, तुम्हारा जो भविष्य है, वह गुरु का वर्तमान है। तुम अगर बीज हो तो वह गंध हो गया है। तुम अगर बंद झरने हो, राह नहीं खोज पा रहे हो, तो वह सागर से मिल गया है। वह तुम्हारा भविष्य है। गुरु में तुम अपने होने की आखिरी संभावना का दर्शन पाते हो।

आशीर्वाद का अर्थ है- गुरु के सान्निध्य में तुम्हारे वर्तमान और तुम्हारे भविष्य का मिलन होता है; तुम्हारा भविष्य तुम्हारे वर्तमान पर झरता है। गुरु माध्यम है- तुम जो नहीं हो अभी और हो सकते हो- उसकी खबर है। अगर तुम ठीक से झुक जाओ तो उसका आशीर्वाद तुम्हारे लिए एक ऊध्र्वयात्रा बन जाएगी। वह तुम्हारे ऊपर उतरेगा, बरसेगा। जैसे आकाश से वर्षा होती है, जमीन में छिपे बीज तक पहुंचती है, ऐसा वह तुम तक पहुंचेगा। आकाश से वर्षा होती है, जमीन में छिपे बीज तक पहुंचती है और तत्क्षण बीज का अंकुरण फूट जाता है और बीज आकाश की तरफ उठने लगता है।

आशीर्वाद में गुरु तुम तक पहुंचेगा; उतरेगा; उसका अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व को छुएगा; तुम्हारी भूमि में, अंधेरे में दबे हुए बीज पर उसकी वर्षा होगी और तत्क्षण तुम ऊपर की यात्रा पर निकल जाओगे। आशीर्वाद का अर्थ है- गुरु ने तुम्हारे शून्य में, तुम्हारी रिक्तता में अपने को भरा, ताकि तुम्हारे भीतर जो दबा पड़ा है, उसे पुकार मिल जाए, उसे आर्ािन मिल जाए, चुनौती मिल जाए, सुगबुगाहट पैदा हो; तुम्हारे भीतर जो बीज है वह भी अंकुरित होने लगे, उसे खबर मिल जाए कि मैं क्या हो सकता हूं! इसलिए भक्ति-शास्त्र सत्संग की महिमा गाता है।

तुम करीब आओ, तुम झुको, तो गुरु तुम्हारे करीब आ पाता है। तुम झुको तो वह तुम में उतर पाता है… अवतरण! हर आशीर्वाद में परमात्मा अवतरित होता है। हर आशीर्वाद अवतार है। हमने उन्हीं व्यक्तियों को अवतार कहा है जिनके कारण बहुत से व्यक्तियों के भीतर, अनेकों के भीतर सोई हुई संभावनाएं सजग हो गईं, वास्तविक बनीं। हमने उन्हीं व्यक्तियों को अवतार कहा है जो हमारे भीतर उस गहराई तक उतर सके जहां तक हम भी नहीं पहुंच पाए और जिन्होंने हमारी गहराइयों को छू दिया, तिलमिला दिया, जगा दिया, जिन्होंने हमारी नींद तोड़ दी।

तो आशीर्वाद अवतरण है- ऊंचाइयों का, तुम्हारी गहराइयों में; भविष्य का, तुम्हारे वर्तमान में; संभावना का, तुम्हारी वास्तविकता में; तुम्हारे तथ्यों के जीवन में सत्य की पुकार है। और आशीर्वाद अनूठी बात है, क्योंकि गुरु दिए जा रहा है। उसे कुछ करना नहीं पड़ रहा है। कोई श्रम नहीं है जो उसे करना पड़ रहा है। तुम न भी लोगे तो भी यह गंध हवाओं में लुटानी ही पड़ेगी। मेघ जब भर जाएंगे, तो बरसेंगे ही। बीज अंकुरित हों या न हों; मेघ जब भर जाएंगे तो बरसेंगे ही- बरसना ही पड़ेगा। तो गुरु मेघ है, बरस रहा है। बुद्ध ने तो उस अवस्था को मेघ-समाधि कहा है- जब समाधि बरसती है। वही गुरु की दशा है। जब समाधि बरसने लगती है- तब आशीर्वाद, तब प्रसाद! पर तुम ले सको तो ही ले पाओगे। झुकने की कला सीखो, मिटने की कला सीखो, तो तुम्हारे होने का सूत्रपात होता है।

– ओशो

[भक्ति सूत्र-10]

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