“मनुष्य एक बीमारी है।” – ओशो

मनुष्य एक बीमारी है। बीमारियां तो मनुष्य पर आती हैं, लेकिन मनुष्य खुद भी एक बीमारी है। मैन इज़ ए डिस-ईज़। यही उसकी तकलीफ है, यही उसकी खूबी भी। यही उसका सौभाग्य है, यही उसका दुर्भाग्य भी। जिस अर्थों में मनुष्य एक परेशानी, एक चिंता, एक तनाव, एक बीमारी, एक रोग है, उस अर्थों में पृथ्वी पर कोई दूसरा पशु नहीं है। वही रोग मनुष्य को सारा विकास दिया है। क्योंकि रोग का मतलब यह है कि हम जहां हैं, वहीं राजी नहीं हो सकते। हम जो हैं, वही होने से राजी नहीं हो सकते। वह रोग ही मनुष्य की गति बना, रेस्टलेसनेस बना।

लेकिन वही उसका दुर्भाग्य भी है, क्योंकि वह बेचैन है, परेशान है, अशांत है, दुखी है, पीड़ित है। मनुष्य को छोड़ कर और कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है। जब तक कि मनुष्य किसी पशु को पागल न करना चाहे, तब तक कोई पशु अपने से पागल नहीं होता, न्यूरोटिक नहीं होता। जंगल में पशु पागल नहीं होते, सर्कस में पागल हो जाते हैं। जंगल में पशु विक्षिप्त नहीं होते, अजायबघर में, “जू’ में विक्षिप्त हो जाते हैं! कोई पशु आत्महत्या नहीं करता, स्युसाइड नहीं करता, सिर्फ आदमी अकेला आत्महत्या कर सकता है।

यह जो मनुष्य नाम का रोग है, इस रोग को सोचने, समझने, हल करने के दो उपाय किए गए हैं। एक मेडिसिन है उपाय – औषधि। और दूसरा ध्यान है उपाय – मेडिटेशन। ये दोनों एक ही रोग का इलाज हैं। इसे थोड़ा ऐसा समझना अच्छा होगा कि औषधिशास्त्र, मेडिसिन मनुष्य के रोग को एटामिक, आणविक दृष्टि से देखता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के एक-एक रोग को अलग-अलग व्यवहार करता है। औषधिशास्त्र एक- एक रोग को आणविक मानता है। ध्यान मनुष्य को “ऐज़ ए होल’ बीमार मानता है, एक-एक रोग को नहीं।

ध्यान मनुष्य के व्यक्तित्व को बीमार मानता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के ऊपर बीमारियां आती हैं , विजातीय हैं, फॉरेन हैं, ऐसा मानता है। लेकिन धीरे-धीरे यह दूरी कम हुई है और धीरे-धीरे मेडिसिन ने भी कहना शुरू किया है – डोंट ट्रीट दि डिज़ीज़, ट्रीट दि पेशेंट। मत करो इलाज बीमारी का; बीमार का इलाज करो। यह बड़ी कीमती बात है। क्योंकि इसका मतलब यह है कि बीमारी भी बीमार के जीने का एक ढंग है, ए वे ऑफ लाइफ। हर आदमी एक सा बीमार नहीं हो सकता। बीमारियां भी हमारी इंडिविजुअलिटी रखती हैं, व्यक्तित्व रखती हैं। ऐसा नहीं है कि मैं क्षय रोग से, टी.बी. से बीमार पडूं और आप भी पड़ें, तो हम दोनों एक ही तरह के बीमार होंगे। हमारी टी.बी. भी दो तरह की होंगी, क्योंकि हम दो व्यक्ति हैं। और हो सकता है कि जो इलाज मेरी टी.बी. को ठीक कर सके वह आपकी टी.बी. को ठीक न कर सके। इसलिए बहुत गहरे में बीमारी नहीं है, बहुत गहरे में बीमार है।

औषधिशास्त्र, मेडिसिन– आदमी की ऊपर से बीमारियों को पकड़ता है। मेडिटेशन, ध्यान का शास्त्र– आदमी को गहराई से पकड़ता है। इसे ऐसा कह सकते हैं कि औषधि मनुष्य को ऊपर से स्वस्थ करने की चेष्टा करती है। ध्यान मनुष्य को भीतर से स्वस्थ करने की चेष्टा करता है। न तो ध्यान पूर्ण हो सकता है औषधिशास्त्र के बिना और न औषधिशास्त्र पूर्ण हो सकता है ध्यान के बिना। असल में आदमी चूंकि दोनों है –भाषा ठीक नहीं है यह कहना कि आदमी दोनों है, क्योंकि इसमें कुछ बुनियादी भूल हो जाती है। मनुष्य हजारों वर्षों से इस तरह सोचता रहा है कि आदमी का शरीर अलग है और आदमी की आत्मा अलग है।

इस चिंतन के दो खतरनाक परिणाम हुए। एक परिणाम तो यह हुआ कि कुछ लोगों ने आत्मा को ही मनुष्य मान लिया, शरीर की उपेक्षा कर दी। जिन कौमों ने ऐसा किया उन्होंने ध्यान का तो विकास किया, लेकिन औषधि का विकास नहीं किया। वे औषधि का विज्ञान न बना सके। शरीर की उपेक्षा कर दी गई। ठीक इसके विपरीत कुछ कौमों ने आदमी को शरीर ही मान लिया और उसकी आत्मा को इनकार कर दिया। उन्होंने मेडिसिन और औषधि का तो बहुत विकास किया, लेकिन ध्यान के संबंध में उनकी कोई गति न हो पाई। जब कि आदमी दोनों है एक साथ। कह रहा हूं कि भाषा में थोड़ी भूल हो रही है, जब हम कहते हैं–दोनों है एक साथ, तो ऐसा भ”म पैदा होता है कि दो चीजें हैं जुड़ी हुई। नहीं, असल में आदमी का शरीर और आदमी की आत्मा एक ही चीज के दो छोर हैं। अगर ठीक से कहें तो हम यह नहीं कह सकते कि बॉडी+सोल, ऐसा आदमी है। ऐसा नहीं है। आदमी साइकोसोमेटिक है, या सोमेटोसाइकिक है। आदमी मनस- शरीर है, या शरीर-मनस है। मेरी दृष्टि में, आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है और आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है उसका नाम आत्मा है। अदृश्य शरीर का नाम आत्मा है, दृश्य आत्मा का नाम शरीर है। ये दो चीजें नहीं हैं, ये दो अस्तित्व नहीं हैं, ये एक ही अस्तित्व की दो विभिन्न तरंग-अवस्थाएं हैं।

असल में दो, द्वैत, डुआलिटी की धारणा ने मनुष्य- जाति को बड़ी हानि पहुंचाई। सदा हम दो की भाषा में सोचते रहे और मुसीबत हुई। पहले हम सोचते थे: मैटर और एनर्जी। अब हम ऐसा नहीं सोचते। अब हम यह नहीं कहते कि पदार्थ अलग और शक्ति अलग। अब हम कहते हैं, मैटर इज़ एनर्जी। अब हम कहते हैं, पदार्थ ही शक्ति है। सच तो यह है कि यह पुरानी भाषा हमें दिक्कत दे रही है। पदार्थ ही शक्ति है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। कुछ है, एक्स, जो एक छोर पर पदार्थ दिखाई पड़ता है और दूसरे छोर पर एनर्जी, शक्ति दिखाई पड़ता है। ये दो नहीं हैं। ये एक ही ऊर्जा, एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। ठीक वैसे ही आदमी का शरीर और उसकी आत्मा एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। बीमारी दोनों छोरों में किसी भी छोर से शुरू हो सकती है।

शरीर के छोर से शुरू हो सकती है और आत्मा के छोर तक पहुंच सकती है। असल में जो भी शरीर पर घटित होता है, उसके वाइबशंस, उसकी तरंगें आत्मा तक सुनी जाती हैं। इसलिए कई बार यह होता है कि शरीर से बीमारी ठीक हो जाती है और आदमी फिर भी बीमार बना रह जाता है। शरीर से बीमारी विदा हो जाती है और डाक्टर कहता है कि कोई बीमारी नहीं है और आदमी फिर भी बीमार रह जाता है और बीमार मानने को राजी नहीं होता कि मैं बीमार नहीं हूं। चिकित्सक के जांच के सारे उपाय कह देते हैं कि अब सब ठीक है, लेकिन बीमार कहे चला जाता है कि सब ठीक नहीं है। इस तरह के बीमारों से डाक्टर बहुत परेशान रहते हैं, क्योंकि उनके पास जो भी जांच के साधन हैं वे कह देते हैं कि कोई बीमारी नहीं है। लेकिन कोई बीमारी न होने का मतलब स्वस्थ होना नहीं है। स्वास्थ्य की अपनी पाजिटिविटी है। कोई बीमारी का न होना सिर्फ निगेटिव है। हम कह सकते हैं कि कोई कांटा नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि फूल है। कांटा नहीं है, इससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि कांटा नहीं है। लेकिन फूल का होना कुछ बात और है।

– ओशो

[हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान, #1]

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