“नक्सलवाद – प्रतिक्रिया या क्रांति ?” – ओशो

“नक्सलवाद विचारहीन प्रतिक्रिया”

नहीं, मैं यह नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानूँगा कि नक्सलाइड सिर्फ एक प्रतिक्रिया, रिएक्शन है – क्रांति, रिवोल्यूशन नहीं। रिवोल्यूशन और रिएक्शन में बड़ा फर्क है। नक्सलाइड पुराने ढाँचे के प्रति एक क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया है। वह क्रोध उस सीमा पर पहुँच गया है, जहाँ वह यह नहीं देखता है कि क्या करना है, क्या छोड़ देना है। वह अंधा हो गया है। अंधा क्रोध भी खतरनाक साबित हो सकता है।

जितना अंधा कन्फर्मिस्ट खतरनाक होता है, उतना ही अंधा रिवोल्यूशनरी भी। और नक्सलाइड की घटना जो है, वह कोई रिवोल्यूशन नहीं है और कोई फिलासफी, दर्शन नहीं है। वह एक तीव्र रिएक्शन है, जो बिलकुल जरूरी था। इसलिए जितने हम जिम्मेवार हैं, नक्सलाइड पैदा करने के लिए, उतने वे बेचारे जिम्मेवार नहीं हैं। वे तो बिलकुल निरीह हैं। उनको मैं जरा भी जिम्मा नहीं देता। मैं निंदा के लिए भी उनको पात्र नहीं मानता, क्योंकि निंदा उनकी करनी चाहिए जिनको जिम्मेवार मानूँ हम जिम्मेवार हैं।

हमने पाँच हजार वर्ष से जरा भी क्रांति नहीं की है, जरा भी नहीं बदले हैं, एकदम मर गए हैं। तो इस मरे हुए मुल्क के साथ कुछ ऐसा होना अनिवार्य है। लेकिन वह शुभ नहीं है। और उसको अगर हमने क्रांति समझा तो खतरा है। रिएक्शनरी हमेशा उलटा होता है और आप जो कर रहे हैं, उससे उलटा करता है। रिएक्शनरी वही होता है, जहाँ हमारा समाज होता है। सिर्फ उलटा होता है। वह शीर्षासन करता है। हम जो यहाँ कर रहे हैं, वह उसका उलटा करने लगता है। जिस जगह आप हैं, उससे गहरा वह कभी नहीं जा सकता है, क्योंकि आपका वह रिएक्शन है।

अगर आपने मुझे गाली दी और मैं भी तुरंत गाली देता हूँ, तो आपकी और मेरी गाली एक ही तल पर होने वाली है, क्योंकि उसी तरह मैं भी गाली दे रहा हूँ तो मैं भी गहरा नहीं हो सकता, गहरा हुआ नहीं जा सकता। गहरे होने के लिए भारत में नक्सलाइड कुछ नहीं कर पाएगा।

नक्सलाइड सिर्फ सिम्पटमैटिक हैं – सिम्पटम, बीमारी के लक्षण हैं। बीमारी पूरी हो गई है और अब नहीं बदलते हो तो यह होगा। यानी यह भी बहुत है, यह भी बहुत है मेरी दृष्टि में। लेकिन अगर तुम नहीं बदलते हो और इसके सिवा तुम कोई रास्ता नहीं छोड़ते हो, अगर क्रांति नहीं आती तो यह प्रतिक्रिया ही आएगी।

अब दो विकल्प खड़े होते हैं मुल्क के सामने – या तो क्रांति के लिए तुम एक फिलोसाफिक रूट, वैचारिक आयाम की बात करो और क्रांति को एक व्यवस्था दो और क्रांति को एक सिस्टम दो और क्रांति को एक क्रिएटेड पोस्ट बनाओ। अगर नहीं बनते हो तो अब यह होगा यानी नक्सलाइट जो हैं वे हमारी वर्तमान समाज – व्यवस्था के दूसरे हिस्से हैं। ये दोनों जाने चाहिए।

सोसायटी भी जानी चाहिए और उसका रिएक्शन भी जाना चाहिए, क्योंकि वह बेवकूफी ही थी सोसायटी का साथ देना। ये जो एक्टिविटीज, घटनाएँ हैं, ये इसी के ‘पार्ट  एंड पार्सल’ सहज परिणाम है।आमतौर पर ऐसा लगता है कि नक्सलाइड दुश्मन है। मैं नहीं मानता कि वे दुश्मन हैं। वे इसी सोसायटी के हिस्से हैं, इसी सोसायटी ने उसे पैदा कर दिया है। इसने गाली दी है तो उसने दोगुनी गाली दी है, बस इतना फर्क पड़ा है। मगर यह माइंड, चित्त इसी से जुड़ा हुआ है। यह सोसायटी गई तो वह भी गया। अगर यह नहीं गई, तो वह भी जाने वाला नहीं है। यह बढ़ता चला जाएगा।

अब मेरा कहना यह है कि क्रांतिकारी के सामने दो सवाल हैं। ठीक विचार करने वाले के सामने दो सवाल हैं। वह यह कि या तो सोसायटी में क्रांति आए, और सृजनात्मक रूप में; और नहीं आ पाती है तो नक्सलाइड विकल्प रह जाएगा। और वह कोई सुखद विकल्प नहीं है। वह सुखद भी नहीं है, गहरा भी नहीं है, जरा भी गहरा नहीं है। वह उसी तल पर है, जहाँ हमारा समाज है। वह सिर्फ रिएक्शन कर रहा है, वह जरूरी है। यह मैं नहीं कहता कि बुरा है तो गैर-जरूरी है। बुरा है, नहीं हो, ऐसी हमें व्यवस्था करनी चाहिए।
और वह व्यवस्था हम तभी कर पाएँगे जब हम पूरी सोसायटी को बदलेंगे। नक्सलाइड को हम रोक नहीं पाएँगे, उनको रोकने का सवाल ही नहीं है। पूरी सोसायटी उसे पैदा कर रही है। इसका जड़ होना उसको पैदा कर रहा है, इसके न बदलने की आकांक्षा उसको पैदा कर रही है, इसका पुराना ढाँचा उसको पैदा कर रहा है, यह ढाँचा पूरी तरह गया तो इसके साथ नक्सलाइड गया।

नक्सलाइड एक संकेत है, जो बता रहा है कि सोसायटी इस जगह पहुँच गई कि अगर क्रांति नहीं होती तो यह होगा। और अब सोसायटी को समझ लेना चाहिए। वह पुराना ढाँचा तो नहीं बचेगा। या तो क्रांति आएगी या यह ढाँचा जाएगा। ये दो चीजें आ सकती हैं और अगर आप मर्जी से लाएँ तो क्रांति आएगी, अगर आप सोचकर लाएँ तो क्रांति आएगी, विचार करके लाएँ तो क्रांति आएगी और अगर आप क्रांति न लाएँ, इसके लिए जिद में रहे कि नहीं आने देंगे तो यह विचारहीन प्रतिक्रिया आएगी। यानी मेरा कहना है कि नक्सलाइड एक थॉटलेस रिएक्शन, विचारहीन प्रतिक्रिया है।

थॉटलेस रिएक्शन तो है। इसका परपज, लक्ष्य है कि वह प्रचलित मूल्यों को चैलेंज करता है? परपज, लक्ष्य वैसा ही है जैसे कि आप बीमार हैं और जोर से बुखार हो गया है। सारा शरीर गर्म है और एक सौ चार डिग्री बुखार है। एक सौ चार डिग्री में जलना सिर्फ खबर है कि भीतर बीमारी है और यह चीज ऐसी है कि शरीर को अस्वस्थ किए दे रही है, बेचैन किए दे रही है, उत्तप्त किए दे रही है। यह बुखार का परपज है। यह त्वचा का, फीवर, बुखार का परपज है कि आपको खबर दे रहा है कि भीतर डिसीज, बीमारी है।

डिसीज मिटेगी तो यह बुखार जाएगा और किसी ने अगर ठंडा पानी डालकर इस बुखार को कम करने की कोशिश की तो डिसीज तो नहीं मिटेगी, आदमी मरेगा। नक्सलाइड को सिर्फ ठंडा करने की कोशिश की तो सोसायटी मरेगी। नक्सलाइड सिर्फ फीवर है। परपज है फीवर का, लेकिन फीवर बचाने योग्य नहीं होता है,
मिटाने योग्य होता है।

परपज तो उसका है कि उसने खबर दी है आपको, आपके शरीर के ऊपर आकर कि आप बचेंगे नहीं, अगर बीमारी दूर नहीं होती तो। अभी बुखार बढ़ता है, एक सौ चार से एक सौ दस तक जाएगा। अब जल्दी बीमारी अलग करो। सिर्फ इतना परपज है उसका और बीमारी अलग हुई कि परपज इसका खत्म हुआ। मगर खतरा है कि कहीं हम बीमारी को इसका विकल्प न मान लें।

कहीं हम ऐसा न समझ लें कि बीमारी का दुश्मन है, यह फीवर जो है। यह दुश्मन नहीं है, बीमारी का ही हिस्सा है, बीमारी की ही खबर है, बीमारी से ही जुड़ा है। तो ऐसा नहीं है कि बीमारी को छोड़ें और बुखार को पकड़ लें। ऐसा परपज नहीं है नक्सलाइड का कि हम आज सोसायटी के पुराने ढाँचे को छोड़ दें और नक्सलाइड, जो बेवकूफी की बात कर रहा हो उसे पकड़ लें। यह विकल्प नहीं है।

जानना यह है कि नक्सलाइड आपकी पुरानी सोसायटी पैदा कर रही है। आप पुरानी सोसायटी को खत्म नहीं करेंगे तो नक्सलाइड पैदा होगी। यानी नक्सलाइड का एक ही परपज है और वह यह कि वह पूरी खबर कर दे कि पुरानी सोसायटी आखिरी क्षण में है, और अगर नहीं मरती है तो नक्सलाइड को पैदा कर जाएगी और इससे अगर बचना है तो पुरानी सोसायटी खत्म करो, उस बीमारी को जाने दो।

यह इसका रिएक्शन है। इसको बचाना नहीं है, जाने देना है| सोसायटी के साथ जाने देना है, बचाना नहीं है। इसलिए नक्सलाइड पुरानी सोसायटी का दुश्मन है और मैं मानता हूँ कि वह उसी का हिस्सा है जो घबरा गया है, क्रोध से भर गया है और जो वह सोसायटी करती थी उससे उलटा काम कर रहा है। ठीक उलटा कर रहा है। पुरानी सोसायटी जैसे आज अमेरिका में है, यूरोप में है, उसके विरोध में प्रतिक्रिया स्वरूप बीटल्स और बीटनिक पैदा हो गए हैं।

वे भी उसी पुरानी सोसायटी के हिस्से हैं। पुरानी सोसायटी कहती है कि सड़क पर कपड़े ढँककर चलो, तो वह सड़क पर नंगा खड़ा हो गया है। मेरा मानना यह है कि यह जो नंगा खड़ा होना है, यह जो कपड़े पहनने का अति आग्रह है, दबाने का, छिपाने का, उसका ही रिएक्शन है। मानता कपड़े को यह भी है, क्योंकि कपड़े उतारकर बहादुरी दिखा रहा है। यह दिखा रहा है कपड़े उतारकर बहादुरी, हम दिखा रहे हैं ! लेकिन यह है हमारा ही दूसरा विपरीत हिस्सा, डायमेट्रिकली अपोजिट, द पार्ट एंड पार्सिल, बिलकुल उलटा रूप है, लेकिन हमसे जुड़ा हुआ है।जब तक दुनिया में कपड़े पहनने का बहुत आग्रह जिद्दपूर्वक जारी रहेगा, गिन्सबर्ग पैदा होगा। अगर हमने मनुष्य के शरीर को इस भाँति इनकारा कि इसको देखने को मत देना, तो कुछ विद्रोही लड़के पैदा होंगे, जो कहेंगे कि हम नंगे खड़े होंगे।

हम सड़कों पर नंचे चलेंगे। और आज नहीं कल, यह पक्का ही मानना कि लड़के और लड़कियाँ सड़कों पर नंगे खड़े होकर कपड़ों के खिलाफ बगावत करेंगे, क्योंकि हमने अति आग्रह कर लिया है। कपड़ा पहनना एक सुविधा की बात है, वह एक मॉरेलिटी न बन जाए और कोई पैटर्न न बन जाए कि उघाड़ा होना एक पाप हो जाए।

नक्सलाइड जो है वह हमारी सोसायटी का हिस्सा है। वह ढाँचे से छूटकर उलटा खड़ा हो गया है। लेकिन उलटा खड़ा होना उतना ही पागलपन है। सोसायटी को, सोसायटी को उलटी नहीं करना है।

– ओशो
[भारत के जलते प्रश्न]

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