“लोभ और लाभ” – ओशो

प्रश्न : लोभ और लाभ का रास्ता ईर्ष्या और घृणा से, भय और दुश्चिंता से पटा पड़ा है; वह जीवन में जहर घोलकर रख देता है, ऐसा मेरे लंबे जीवन का अनुभव है। फिर भी क्या कारण है कि किसी न किसी रूप में लाभ की दृष्टि बनी ही रहती है?

लोभ से जीवन में दुख आया, लोभ से जीवन में जहर मिला, लोभ से जीवन में विपदाएं आयीं, कष्ट-चिंताएं आयीं, अगर ऐसा समझकर लोभ को छोड़ा तो लोभ को नहीं छोड़ा। क्योंकि यह समझ ही लोभ की है। जहां अमृत की आकांक्षा की थी, वहां जहर पाया-हानि हुई, लाभ न हुआ। जहा सुख चाहा था, वहा दुख मिला-हानि हुई, लाभ न हुआ। सोचा था चैन और सुख और शांति का जीवन होगा, दुश्चिंता से पट गया-हानि हुई, लाभ न हुआ। लोभ में हानि पाई इसलिए लोभ से छूटने चले, यह तो फिर लोभ के हाथ में ही पड़ जाना हुआ। हानि दिखाई पड़ती है लोभ की दृष्टि को।

इसे समझने की कोशिश करना, बारीक है। कौन है जिसको दिखाई पड़ता है कि हानि हुई? कौन कहता है तुमसे कि हानि हुई? लोभ ! लोभ की वृत्ति ही तुम्हें हानि दिखला रही है। अब अगर तुम बच रहे हो, बचना चाहते हो, तो तुम लोभ से नहीं बचना चाह रहे हो, लोभ की दृष्टि ने तुम्हें जो हानि दिखाई, तुम हानि से बचना चाहते हो। अगर लोभ में हानि न होती तो? अगर लोभ से सुख-शाति मिली होती तो? अगर लोभ से चिंताएं न आती, चैन आता तो? तो तुम लोभ को छोड़ते?

तुम कहते, फिर क्या बात थी छोड़ने की? लोभ के कारण ही तुम लोभ को भी छोड़ने को उत्सुक हो जाते हो। तो ऊपर से लोभ छूटता दिखाई पड़ता है, भीतर से तुम्हें पकड़ लेता है; और भी सूक्ष्म हो जाता है। अगर दृष्टि ठीक हो-ठीक दृष्टि का अर्थ है, लोभ के ढंग से जीवन को देखो ही मत;तब तुम्हें ऐसा न लगेगा कि लोभ के कारण जहर मिला। जिससे अमृत नहीं मिल सकता, उससे जहर भी कैसे मिलेगा? और जिससे लाभ नहीं हो सकता, उससे हानि कैसे होगी? अगर तुम लोभ को गौर से देखोगे तो तुम पाओगे, कुछ भी न मिला-हानि तक न मिली। हानि भी मिल जाती तो भी ठीक था; हाथ में कुछ तो होता। कहने को कुछ तो होता-मिला। जहर भी न मिला।

लोभ नपुंसक है; उससे जहर भी पैदा नहीं होता। तब तुम्हें लोभ में हानि नहीं, लोभ की व्यर्थता दिखाई पड़ेगी। और इन दोनों बातों में भेद है। लोभ की व्यर्थता का अनुभव लोभ की मृत्यु हो जाती है। लोभ की असारता का अनुभव; हानि की मैं नहीं कह रहा हूं। क्योंकि हानि में तो फिर लोभ छिपकर बच जाता है। और यही चल रहा है। जिन्हें हम धार्मिक लोग कहते हैं, वे नए लोभ से पीड़ित हो गए लोग हैं; और कुछ भी नहीं। संसार को व्यर्थ पाया ऐसा नहीं, संसार को हानिपूर्ण पाया; तो लाभ के लिए स्वर्ग की तरफ देख रहे हैं। यहां हाथ खाली रह गए, स्वर्ग में भरने की चेष्टा कर रहे हैं। जिंदगी तो गंवाई ही गंवाई, परलोक को भी गंवाने के लिए अब तैयार हैं।

तुम परलोक में क्या पाना चाहते हो? थोड़ा सोचो; तुम वही पाना चाहते हो, जो तुम यहां नहीं पा सके हो। अगर तुम अपने परलोक की बात मुझसे कह दो, तो मैं ठीक से जान लूंगा कि इस संसार में तुम्हें क्या-क्या नहीं मिला; क्योंकि परलोक परिपूरक है। अगर तुमने यहां सुंदर स्त्री न पाई, जो कि पानी असंभव है; क्योंकि सौंदर्य का कोई वास्ता शरीर से नहीं। यहां अगर तुमने सुंदर पति न पाया, जो कि पाना असंभव है; क्योंकि सौंदर्य तो आत्मिक सुगंध है।

जिनके पास आत्मा ही नहीं है, वे सुंदर कैसे हो सकेंगे? दिख सकते हैं, हो नहीं सकते। तो दूर से दिखाई पड़ेंगे, जब पास आओगे, कांटे चुभेंगे। दूर से सौंदर्य जो दिखाई पड़ता था, पास आते ही कुरूपता हो जाता है। और जहां से सुगंध मालूम होती थी, वहां दुर्गंध के अनुभव होने लगते हैं। सुंदर लोगों से जरा दूर रहना-अगर उनको सुंदर ही देखते रहना हो। उनके पास आए तो जल्दी ही सौंदर्य समाप्त हो जाएगा।

तो फिर तुम अप्सराओं की कल्पना करोगे स्वर्ग में, देव पुरुषों की कल्पना करोगे-स्वर्ण की उनकी देह! यहां देह को बड़ा दीन और जर्जर पाया, हड्डी मांस-मज्जा का पाया; तो तुम वहां स्वर्ण की देह की कल्पना कर रहे हो। यहां तुमने जो नहीं पाया, वही स्वर्ग में तुम वासना कर रहे हो। लोभ ने स्थान बदल लिया, दिशा बदल ली। लोभ गया नहीं। लोभी परलोक का लोभ देखने लगता है, भीतर का लोभ देखने लगता है। लेकिन लोभी उसे पा ही नहीं सकता। जो भीतर की है, उससे लोभ का कोई संबंध नहीं जुड़ता। लोभ की दृष्टि ही बाहर जाती हुई दृष्टि है।

तो अगर तुमने देखा कि लोभ ने दुख दिया, पीड़ा दी, नर्क बनाया, इसलिए तुम भागने लगे लोभ से, तो तुम भागे नहीं, लोभ तो बच गया। तुम हानियों से भागे। तुम नुकसान से भागे। करो क्या? गौर से देखो, फिर से देखो; जहर नहीं दे सकता लोभ। क्या लोभ जहर देगा? लोभ सिर्फ सपने दे सकता है। लोभ सिर्फ झूठ दे सकता है। जहर तो सच्चाई है, वह लोभ से नहीं मिलता। लोभ सिर्फ सपने बसा सकता है चारों तरफ।

आंख जब खुलेगी तो तुम ऐसा न पाओगे कि हाथ में कूड़ा-करकट है, कूड़ा-करकट भी नहीं है। आख जब खुलेगी तो तुम ऐसा न पाओगे कि हाथ में जहर है, सपनों ने जहर दे दिया। सपने क्या जहर देंगे? और सपने अगर जहर दे दें तो सपने नहीं, सच हो गए। और फिर तो भागने की जरूरत नहीं है। जहां से जहर निकल आया, वहां से अमृत भी निकलेगा।

तुमने समुद्र-मंथन की कथा पढ़ी है। मंथन हुआ तो जहां से जहर निकला वहीं से अमृत भी निकला। असल में जहा से जहर निकल आया, वहां से अमृत निकलने की सुविधा शुरू हो गई। इतना यथार्थ! जहां से मौत निकल सकती है, वहीं से जीवन भी निकल सकता है। जहां से काटा निकल आया, अब फूल भी निकल सकता है। थोड़ा और खोजना होगा।

अगर तुमने देखा कि जहर निकला है लोभ से, तब तुम्हारी खोज बंद न होगी। तुम कहोगे, जब जहर तक निकल आया तो अमृत भी थोड़े दूर होगा; और थोड़े चले चलें, यह घूंट भी पी जाएँ, थोड़े और बढ़ लें। जागोगे तो तुम उस दिन, जिस दिन तुम पाओगे कि लोभ नपुंसक है; इससे कुछ भी नहीं निकलता। यह खाली आपा-धापी है। यह व्यर्थ की दौड़-धूप है। यह नशे में चलते हुए आदमी के सपने हैं। जब जाग होती है तो कुछ भी हाथ में नहीं होता। तब लोभ टूटेगा। ‘माना कि लोभ और लाभ का रास्ता ईर्ष्या, घृणा और भय और दुश्चिंता से पटा है।

यह लोभ ही बोल रहा है। यह लोभ ही डर रहा है। लोभ कुछ और चाहता था, वैसा न हुआ। ‘वह जीवन में जहर घोल देता है, ऐसा मेरे लंबे जीवन का अनुभव है।’ ऐसा लंबे लोभ का अनुभव है। यह लोभ की प्रतीति है। यह जागरण की प्रतीति नहीं है। और इसमें भटक जाना बहुत आसान है। अगर इस कारण तुमने लोभ की दुनिया छोड़ने की कोशिश की तो तुम लोभ को कहीं और आरोपित कर लोगे। तुम दान करोगे, लेकिन स्वर्ग में मल करोगे। तुम बदला चाहोगे। तुम सेवा करोगे तो तुम प्रतीक्षा करोगे कि कब अमृत की वर्षा मेरे ऊपर हो। लोभ बड़ा कुशल है-बच गया; छिप गया भीतर।

और अब उसने जो छांव अपने लिए बनाई है, वह ज्यादा देर टिकेगी। अब तो तुम बहुत ही सजग होओगे तो ही समझ पाओगे। संसार में जो लोभ की यात्रा चलती है, वह तो मूढ़ भी समझ लेते हैं, बड़ी स्थूल है। लेकिन परलोक के नाम से जो लोभ की यात्रा चलती है, बड़ी सूक्ष्म है। तुम्हारे तथाकथित बुद्धिमान भी नहीं समझ पाते। कोई कभी हजारों में एक जाग पाता है और देख पाता है।

सौ बार तेरा दामन हाथों में आया
जब आंख खुली देखा अपना ही गिरेबा था

सपने में तुम कितने ही बार, क्या-क्या नहीं सोच लेते हो! अपने ही कपड़े को पकड़ लेते हो, सोचते हो, प्रेमी का दामन हाथ में आ गया, प्रेयसी का दामन हाथ में आ गया। आख खुलती है, पाते हो, अपना ही कपड़ा है। जिसको तुमने लोभ कहा है, वह तुम्हारी मूर्च्छा है। मूर्च्छा को तोड़ो। लोभ को छोड़ने की बात ही मत सोचना। क्योंकि तुम छोड़ोगे तभी, जब तुम्हें कुछ मिलने की आकांक्षा होगी। इसलिए छोड़ने की बात ही छोड़ दो। त्यागने की भाषा का उपयोग ही मत करना, क्योंकि वह भोगी की ही भाषा है। वह भोगी ही शीर्षासन कर रहा है अब। पहले पैर के बल खड़ा था, अब सिर के बल खड़ा हो गया-वह है भोगी ही। पहले गिनता था तिजोड़ी में कितने रुपए हैं, अब गिनती रखता है कि कितने त्यागे है। पहले गिनता था, अब भी गिनता है। गिनती में कोई फर्क नहीं पड़ा है। पहले सिक्के स्थूल थे, अब बड़े सूक्ष्म हो गए हैं।

तुम जाकर देखो तुम्हारे मंदिरों में बैठे हुए साधु-संन्यासियों को, हिसाब रखे बैठे हैं; डायरी भरते हैं, कितने उपवास किए; इस वर्ष कितने’ उपवास किए। सिक्के कमा रहे हैं, बैंक बैलेंस इकट्ठा कर रहे हैं। ये परमात्मा के सामने जाकर अपनी पूरी फेहरिश्त रख देंगे कि देखो, इतने उपवास किए, इतनी प्रार्थना की, इतने व्रत-नियम लिए। यह लोभ ही है-नए ढंग पर खड़ा हो गया।

मैं तुमसे कहता हूं – लोभ को छोड़ने की बात ही मत करना। क्योंकि छोड़ते तो तुम तभी हो कुछ, जब पाने के लिए पहले इंतजाम कर लो। तुम पूछोगे, छोड़े किसलिए? चूंकि तुम पूछते हो, छोड़े किसलिए, कुछ जालसाज तुम्हें बताने मिल जाते हैं कि इसलिए छोड़ो कि स्वर्ग मिलेगा; इसलिए छोड़ो कि पुण्य मिलेगा; इसलिए छोड़ो कि आनंद मिलेगा, ब्रह्म मिलेगा, मोक्ष मिलेगा। छोड़ने के लिए तुम पूछते हो, किसलिए छोड़े? वे बताते हैं, इसलिए छोड़ो। और जब तक इसलिए मन में है, तब तक लोभ है।

मूर्च्छा तोड़ो; लोभ को छोड़ो मत। लोभ को पड़ा रहने दो जहां है। तुम जागकर देखने की कोशिश करो। जैसे-जैसे तुम जागोगे, लोभ छोड़ना न पड़ेगा। लोभ ऐसे ही विदा हो जाता है, जैसे दीया जल जाए तो अंधेरा विदा हो जाता है। कोई अंधेरे को छोड़ता है? दीया जलाकर फिर तुम क्या करते हो? अंधेरे को बाहर फेंकने जाते हो? दीया जलाकर फिर तुम क्या करते हो? अंधेरे का त्याग करते हो? दीया जल गया, बात पूरी हो गई; अंधेरा नहीं है। होश जग गया, बात पूरी हो गई; लोभ नहीं है।

लोभ को छोड़ना नहीं है; जागकर लोभ को देखना है। बस, उस दृष्टि में ही लोभ तिरोधान हो जाता है, तिरोहित हो जाता है। उस आंख को खोजो, जहां अंधकार, दीये के सामने आ जाता है-उस आंख को खोजो।

-ओशो

 

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