“Generation Gap/पीढ़ी अंतराल कैसे दूर हो?” – ओशो शैलेन्द्र

प्रश्न: पीढ़ी अंतराल कैसे दूर होगा? मेरा बेटा मेरी बात मानने को जरा भी राजी नहीं होता, मैं क्या करूं?

यह बात महत्त्वपूर्ण है, एक व्यक्ति का सवाल नहीं, सारे युग का सवाल है। नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच में एक बड़ा गैप खड़ा हो रहा है और यह गैप प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। पुराने जमाने में यह गैप नहीं था, उसके कारण थे | उस समय शिक्षा प्रणाली नहीं थी। आज शिक्षा प्रणाली आ गई है।

आज एक बूढ़े डाक्टर का जवान बेटा जब मेडिकल कालेज से डाक्टर बनकर लौटता है तो वह अपने बाप से बहुत ज्यादा जानता है। उसकी नजरों में बाप आउट आफ डेट हो चुका है, वह बीस-पच्चीस साल पुराना इलाज कर रहा है, बाप वह दवाइयां लिख रहा है जो प्रचलन के बाहर हो गई हैं। वह उस विधि से आपरेशन कर रहा है जो उसने सीखी थी पच्चीस साल पहले। वह कब की आउट आफ डेट हो चुकी है। उसका बेटा जो अभी-अभी डाक्टरी सीखकर आया है, इसको लेटेस्ट नालेज है। अब यह बेटा बाप का सम्मान नहीं कर पाएगा।

पुराने जमाने में एक बढ़ई का बेटा हमेशा अपने बाप का सम्मान करता था क्योंकि उसका पिता ही उसका शिक्षक था। छोटी उम्र से उसने अपने पिता के साथ काम करना शुरू कर दिया, पिता उससे बीस साल बड़ा है और वह हमेशा बीस साल बड़ा रहेगा, बीस साल ज्यादा अनुभवी रहेगा। यह बेटा अपने पिता से ज्यादा अच्छा कारपेंटर नहीं बन पाएगा, कभी भी ! इसके मन में पिता के प्रति सदा सम्मान रहेगा। जो बेटी अपनी मां से खाना पकाना सीखेगी, बहू अपनी सास से गृह-व्यवस्था चलाना सीखेगी, निशिचत रूप से वह अपनी मां और सास से ज्यादा अनुभवी कभी नहीं बन पाएगी। इनके मन में अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान रहेगा। पुराने जमाने की बात अलग थी।

जब से शिक्षा प्रणाली आई तब से स्तिथि पूरी पलट गई है। इस नई परिसिथति में हमें रीऐडजस्ट करना होगा, अपने आपको समायोजित करना होगा। अब अगर सास सोचती है कि उसकी बहू उसका सम्मान करे तो यह बड़ा मुशिकल मामला है। बहू होम साइंस में एम.एस.सी. करके आई है, उसे इंटरकान्टीनेंटल खाना पकाना आता है और यह सास गांव की गंवार पुराने ढंग का खाना बना रही है। वह बहू आकर कहेगी कि तुम बिल्कुल अनहाइजिनिक तरीके से खाना बना रही हो, तुम्हें साफ-सफाई का पता नहीं, इसमें बैक्टीरिया हो जाएंगे। अब उस बेचारी सास ने तो बैक्टीरिया का नाम ही नहीं सुना था। वह कहेगी कि हम पचास-साठ साल से ऐसे ही खाना बना रहे थे और सब ठीक-ठाक चल रहा था और अब तुम आकर बीच में टांग अड़ा रही हो कि ये विधि गलत है। अब ये बहू सास से कुछ सीख तो सकती नहीं क्योंकि ये तो पहले से ही ज्यादा सीखकर आई है। चूंकि ये सास से ज्यादा जानती है इसलिए इसके मन में सास के प्रति ज्यादा सम्मान नहीं रह सकता।

अगर आज पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी से सम्मान हासिल करना है तो कुछ नई गुणवत्ताएं पैदा करनी होंगी। पुराने जमाने में उम्र की वजह से सम्मान नहीं था, ज्ञान की वजह से सम्मान था। माता-पिता, वृद्धजन युवकों से ज्यादा ज्ञानी थे और हमेशा ज्यादा ज्ञानी ही रहते थे। इसलिए उनका सम्मान था, उम्र का सम्मान नहीं था। हम भूल में हैं, हम सोचते हैं कि पहले बुजुर्गों की इज्जत होती थी और अब नहीं होती, ऐसी बात नहीं है। पहले भी बुजुर्गों की इज्जत नहीं थी, उनके ज्ञान की, उनके अनुभव की इज्जत थी। अब आज वह सिथति तो नहीं हो सकती। या तो तुम्हें हमेशा अपटूडेट होना होगा, हमेशा नया सीखने को तत्पर होना होगा, वरना तुम्हारे बेटे आएंगे और पूछेंगे कि पापा कंप्यूटर चलाना आता है? तुम कहोगे नहीं। अब उनकी नजरों में तुम अनपढ़ गांव के गंवार जैसे लगोगे। यह बेटा अब बाप की इज्जत नहीं कर पाएगा।

अगर बाप चाहता है कि उसकी इज्जत हो तो उसे नई गुणवत्ताएं पैदा करनी होंगी। ज्ञान के बारे में तो आगे नहीं बढ़ा जा सकता, एक सीमा है उसकी, सीखने की एक उम्र होती है, उसके बाद सीखना बहुत मुशिकल है। लेकन दूसरी चीजें हो सकती हैं।

तुम्हारा हृदय ज्यादा प्रेमपूर्ण हो, तुम ज्यादा करुणावान बनो, तुम्हारे भीतर भाईचारे की भावना हो, तुम एक ज्यादा अच्छे मनुष्य साबित होओ तब हो सकता है कि तुम्हारा बेटा, कि तुम्हारी बहू, तुम्हारी बेटी तुम्हारा सम्मान कर पाएंगे। ज्ञान की वजह से अब सम्मान नहीं मिलेगा। पीढ़ी-अंतराल और भी तीव्र गति से बढ़ता चला जाएगा। नई पीढ़ी से निवेदन करने की भाषा सीखो। संवाद की नई कला विकसित करनी होगी, पुराने ढंग की आज्ञाएं नहीं चलेंगी कि दशरथ ने राम से कह दिया कि चले जाओ चौदह वर्ष के लिए वनवास, तो रामचन्द्र जी पैर छूकर चले गए।

अब तुम अपने बेटे से अगर ऐसा कहोगे तो बेटा पच्चीस सवाल पूछेगा कि क्यों चले जाएं, आपका दिमाग खराब हो गया है, बुढ़ापे में सठिया गए हैं, आप खुद ही क्यों नहीं चले जाते, वानप्रस्थ होने की उम्र तो आपकी है। अब कोई तुम्हारी आज्ञा नहीं मानने वाला, अब वे दिन गए। अब अगर तुम्हें कोई बात कहनी है तो तर्कयुक्त ढंग से कहनी होगी, वैज्ञानिक ढंग से समझानी होगी, उसे सिद्ध करना होगा कि जो तुम कह रहे हो वह सही है। अगर वह समझदारी की बात होगी तो कोई सुनेगा, वरना कोई नहीं सुनेगा। बच्चों के अपने तर्क होंगे।

आज सुबह मैं एक चुटकुला सुना रहा था, एक लड़के ने अपने कमरे में से आवाज लगाई क्योंकि उसके पिताजी दूसरे कमरे में थे। उसने कहा कि डैडी कृपया मुझे एक गिलास पानी दीजिए। बाप को गुस्सा आया और उसने कहा कि साहबजादे, आप खुद उठकर पानी पीजिए। लड़के ने कहा नहीं पापा प्लीज, एक गिलास पानी दे दीजिए न। बाप ने कहा कि अगर दोबारा पानी मांगा न तो आकर एक थप्पड़ दूंगा। बेटे ने कहा पापा, जब आप थप्पड़ मारने आएं न तो उस समय एक गिलास पानी लेते आइएगा।

भाषा बदल गई है, जमाना बदल गया है, सारी परिसिथति भी बदल गई है। अब पुराने ढंग का मान-सम्मान नहीं मिल सकता, अब तुम्हें भी बदलना होगा।

– ओशो शैलेन्द्र

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