“प्रेम मांग नहीं हैं !!! ” – ओशो

प्रेम की मांग कभी मत करो, प्रेम अपने आप आएगा। तुम प्रेम दोगे, वह आएगा…और आएगा। वह देने से बढ़ता है। जब हम किसी से कहते हैं, आई लव यू, तो दरअसल हम किस बारे में बात कर रहे होते हैं इन शब्दों के साथ हमारी कौनसी मांगे और उम्मीदें, कौनसी अपेक्षाएं और सपने जुड़े हुए हैं।

तुम्हारे जीवन में सच्चे प्रेम की रचना कैसे हो सकती है; तुम जिसे प्रेम कहते हो, दरअसल वो प्रेम नहीं है। जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह और कुछ भी हो सकता है, पर वह प्रेम तो नहीं ही है। हो सकता है कि वह सेक्स हो। हो सकता है कि वह लालच हो। हो सकता है कि वह अकेलापन हो। वह निर्भरता भी हो सकता है। खुद को दूसरे का मालिक समझने की प्रवृत्ति भी हो सकती है। वह और कुछ भी हो सकता है, पर वह प्रेम नहीं है। प्रेम दूसरे का स्वामी बनने की प्रवृत्ति नहीं रखता। प्रेम का किसी अन्य से लेना-देना होता ही नहीं है। वह तो तुम्हारे अस्तित्व की एक स्थिति है।

प्रेम कोई संबंघ भी नहीं है, हो सकता है यह संबंघ बन जाए, पर प्रेम अपने आप में कोई संबंघ नहीं होता। संबंघ हो सकता है, पर प्रेम उसमें सीमित नहीं होता। वह तो उससे कहीं अघिक है। प्रेम अस्तित्व की एक स्थिति है। जब वह संबंघ होता है, तो प्रेम नहीं हो सकता। क्योंकि संबंघ तो दो से मिलकर बनता है। और जब दो अहम होंगे तो लगातार टकराव होना लाजमी होगा। इसलिए जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह तो सतत संघर्ष का नाम है। प्रेम शायद ही कभी प्रवाहित होता हो।

तकरीबन हर समय अहंकार के घोड़े की सवारी ही चलती रहती है। तुम दूसरे को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करते हो और दूसरा तुम्हें अपने हिसाब से। तुम दूसरे पर कब्जा करना चाहते हो और दूसरा तुम पर कब्जा करना चाहता है। यह तो राजनीति है, प्रेम नहीं। यह ताकत का एक खेल है। यही कारण है की प्रेम से इतना दुख उपजता है। अगर वो प्रेम होता, तो दुनिया स्वर्ग बन चुकी होती, जो कि वह नहीं है। जो व्यक्ति प्रेम को जानता है वह आनंदमग्न रहता है, बिना किसी शर्त के। उसके वजूद के साथ जो होता रहे, उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

मैं चाहता हूं कि तुम्हारा प्रेम फैले, बढ़े ताकि प्रेम की ऊर्जा तुम पर छा जाए। जब ऎसा होगा, तब प्रेम निर्देशित नहीं होगा। तब वह सांस लेने की तरह होगा। तुम जहां भी जाओगे, तुम सांस लोगे। तुम जहां भी जाओगे, प्रेम करोगे। प्रेम करना तुम्हारे अस्तित्व की एक सहज स्थिति बन जाएगा। किसी व्यक्ति से प्रेम करना, तो एक संबंघ बनाना भर है। यह तो ऎसा हुआ कि जब तुम किसी खास व्यक्ति के साथ होते हो, तो सांस लेते हो और जब उसे छोड़ देते हो, तो सांस लेना बंद कर देते हो। सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के लिए तुम जीवित हो उसके बिना सांस कैसे ले सकते हो। प्रेम के साथ यही हुआ है।

हर कोई आग्रह कर रहा है, मुझे प्रेम करो, पर साथ ही शक भी कर रहा है कि शायद तुम दूसरे लेागों को भी प्रेम कर रहे होंगे। इसी ईर्ष्या और संदेह ने प्रेम को मार डाला है। पत्नी चाहती है कि पति केवल उससे प्रेम करे। उसका आग्रह होता है कि केवल मुझसे प्रेम करो। जब तुम दुनिया में बाहर जाओगे, दूसरे लोगों से मिलोगे, तो क्या करोगे। तुम्हें लगातार चौकन्ना रहना होगा कि कहीं किसी के प्रति प्रेम ना जता दो।

प्रेम करना तुम्हारे अस्तित्व की एक स्थिति है। प्रेम सांस लेने के समान है। सांसें जो शरीर के लिए करती हैं, प्रेम वही तुम्हारी आत्मा के लिए करता है। प्रेम के माघ्यम से तुम्हारी आत्मा सांस लेती है। जितना तुम प्रेम करोगे, उतनी ही आत्मा तुम्हारे पास होगी इसलिए ईष्र्यालु मत बनो। यही वजह है कि सारी दुनिया में हर व्यक्ति कहता है कि आई लव यू पर कहीं पर कोई प्रेम नहीं दिखाई पड़ता। उसकी आंखों में न कोई चमक होती है और न चेहरे पर कोई वैभव। न ही तुम्हें उसके ह्वदय की घड़कनें तेज होते हुए सुनाई देंगी। किसी भी कीमत पर अपने प्रेम को ना मरने दो वरना तुम अपनी आत्मा को मार डालोगे और न किसी दूसरे को यह नुकसान पहुंचने दो।

प्रेम आजादी देता है। और प्रेम जितनी आजादी देता है उतना ही प्रेममय होता जाता है। प्रेम एक पंछी है, उसे आजाद रखो। उस पर एकाघिकार करने की कोशिश मत करो। एकाघिकार करोगे, तो वह मर जाएगा। एक संपूर्ण व्यक्ति वह है, जो बिना शर्त प्रेम कर सकता है। जब प्रेम बिना संबंघ, बिना शर्त प्रवाहित होता है, तो और कुछ उपलब्घ करने के लिए नहीं रह जाता, व्यक्ति को उसकी मंजिल मिल जाती है। अगर प्रेम प्रवाहित नहीं हो रहा है, तो भले ही तुम महान संत क्यों न बन जाओ, रहोगे दुखी ही। अगर प्रेम प्रवाहित नहीं हो रहा है, तो भले ही तुम महान विद्वान, घर्मशास्त्री या दार्शनिक क्यों न बन जाओ, तुम न बदल पाओेगे। न ही रूपांतरित हो पाओगे।

केवल प्रेम ही रूपांतरण कर सकता है, क्योंकि केवल प्रेम के माघ्यम से ही अहंकार समाप्त होता है। घ्यान में प्रवेश का अर्थ है, प्रेम के संसार में प्रवेश। सबसे बड़ा साहस है, बिना शर्तो के प्रेम करना, केवल प्रेम के लिए प्रेम करना-इसी को तो घ्यान कहते हैं। और प्रेम तुम्हें फौरन बदलना शुरू कर देगा। वह अपने साथ एक नया मौसम लाएगा और तुम खिलना शुरू हो जाओगे। लेकिन एक बात याद रखो, व्यक्ति को प्रेममय होना होगा। तुम्हें इसके लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है कि दूसरा बदले में प्रेम करता है कि नहीं।

प्रेम की मांग कभी मत करो, प्रेम अपने आप आएगा। वह जब आता है, तो सौ गुना मात्रा से आता है। तुम प्रेम दोगे, तो वह आएगा। हम जो भी देते हैं वह वापस मिलता है। याद रहे कि जो भी तुम्हें मिल रहा है, वह तुम्हें किसी न किसी रूप में मिल जरूर रहा है। लोग सोचते हैं कि उन्हें कोई प्रेम नहीं करता और इससे साफ हो जाता है कि उन्होंने प्रेम नहीं किया। वे दूसरों को कसूरवार समझते हैं, पर उन्होंने जो फसल बोई नहीं वह काट कैसे सकते हैं। इसलिए अगर प्रेम तुम्हारे पास आया है, तो समझ लो कि तुम्हें पे्रम देना आ गया है। तो फिर और प्रेम दो, तुम्हें भी और मिलेगा। इसमें कभी कंजूसी न बरतो। प्रेम कोई ऎसी चीज नहीं है, जो देने से खत्म हो जाए-असलियत तो यह है कि वह देने से बढ़ता है।

– ओशो

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