“मोहम्मद का अपरिग्रह” – ओशो

मोहम्मद रात सोते, तो सांझ घर में जो भी होता, सब बांट देते। एक पैसा भी न बचाते। कहते, कल सुबह जीए, तो ठीक है; और परमात्मा जिलाना चाहेगा, तो कल सुबह भी इंतजाम करेगा। आज इंतजाम किया था, कल भी इंतजाम किया था। जीवनभर का अनुभव कहता है कि अब तक जिलाना था, तो उसने इंतजाम दिया है। कल भी भरोसा रखें।

मोहम्मद कहते कि जो आदमी तिजोड़ी सम्हालकर रखता है, वह नास्तिक है। है भी। कहेंगे, नास्तिक की बड़ी अजीब परिभाषा है! हम तो नास्तिक उसको कहते हैं, जो भगवान को नहीं मानता। मोहम्मद नास्तिक उसको कहते हैं, जो धन को मानता है, और ध्यान रखें जो धन को मानता है, वह भगवान को मान नहीं सकता। और जो भगवान को मानता है, वह धन को मानना उससे ऐसे ही तिरोहित हो जाता है, जैसे सूखे पत्ते वृक्ष से गिर जाते हैं। क्योंकि जो भगवान को मानता है, वह अपने जीने का मोह छोड़ देता है। परमात्मा का जीवन ही उसका अपना जीवन है अब।

तो मोहम्मद सांझ सब बांट देते। मोहम्मद से अपरिग्रही आदमी पृथ्वी पर बहुत कम हुए हैं। और यह अपरिग्रह कई अर्थों में महावीर और बुद्ध के अपरिग्रह से भी कठिन है। क्योंकि महावीर और बुद्ध एक-बार ही छोड़ देते हैं। छोड़कर बाहर हो जाते हैं। अपरिग्रह उनका इकट्ठा है। बाहर हो गए; बात समाप्त हो गई। मोहम्मद इस तरह बाहर नहीं हो जाते। रोज सुबह से सांझ तक परिग्रह इकट्ठा होता, सांझ सब बांट देते। रात अपरिग्रही हो जाते। सुबह फिर कोई भेंट कर जाता, तो फिर आ जाता। सांझ फिर बांट देते।

इकट्ठे परिग्रह से छलांग लगानी सदा आसान है। रोज-रोज, रोज-रोज, रोज-रोज। एक क्षण में सब छोड़ देना आसान है। क्षण-क्षण, जीवनभर छोड़ते रहना बहुत कठिन है। मगर दिखाई नहीं पड़ सकता ऊपर से। इसलिए मोहम्मद को बहुत लोग तो मानेंगे कि अपरिग्रही हैं ही नहीं। पर मैं कहता हूं कि उनका अपरिग्रह बहुत गहरा है। मरने के दिन, बीमार थे, तो चिकित्सकों ने मोहम्मद की पत्नी को कहा कि आज रात शायद ही कटे। तो उसने पांच दीनार बचाकर रख लिए। दवा की जरूरत पड़ जाए; पांच रुपए बचाकर रख लिए। रात क्या भरोसा! दवा, चिकित्सक, कुछ इंतजाम करना पड़े।

बारह बजे रात मोहम्मद करवट बदलते रहे। लगे कि बहुत बेचैन हैं। लगे कि बहुत परेशान हैं। अंततः उन्होंने आंख खोली और अपनी पत्नी से कहा कि मुझे लगता है, आज मैं अपरिग्रही नहीं हूं। आज घर में कुछ पैसा है। मत करो ऐसा, क्योंकि परमात्मा अगर मुझसे पूछेगा कि मोहम्मद, मरते वक्त नास्तिक हो गया? जिसने जिंदगीभर दिया, वह एक रात और न देता? निकाल! पत्नी ने कहा, तुम्हें पता कैसे चला कि मैंने बचाया होगा? मोहम्मद ने कहा, तेरी आंखों की चोरी कहती है। तेरा डरापन कहता है। आज तू उतनी निर्भय नहीं है, जैसी सदा थी।

निर्भय सिर्फ अपरिग्रही ही हो सकता है; परिग्रही सदा भयभीत होता है। इसलिए परिग्रही के सामने बंदूक लिए हुए पहरेदार खड़ा रहता है। वह उसके भय का सबूत है। परिग्रही भयभीत होगा। जहां मोह होगा, वहां भय होगा। भय मोहजन्य है। भय मोह का ही फूल है। कांटे जैसा है, लेकिन है मोह का ही फूल। खिलता मोह में ही है, निकलता मोह में ही है। ध्यान रखें, भय भी तो यही है कि मिट न जाएं। मोह यह है कि बचाएं अपने को; भय यह है कि मिट न जाएं। इसलिए भय मोह के सिक्के का दूसरा हिस्सा है। जो आदमी निर्भय होना चाहता है, वह अमोही हुए बिना नहीं हो सकता। अभय अमोह के साथ ही आता है।

मोहम्मद ने कहा, तेरा डर कहता कि आज मोह से भरा हुआ है तेरा मन। तू आज मेरी आंखों के सामने नहीं देखती। कुछ तूने छिपाकर रखा है। निकाल ला और उसे बांट दे। बेचारी, पांच रुपए छिपा रखे थे बिस्तर के नीचे, उसने निकाल लिए। मोहम्मद ने कहा, जा सड़क पर, किसी को दे आ। पर उसने कहा, इतनी आधी रात सड़क पर मिलेगा भी कौन! मोहम्मद ने कहा, जिसने मुझे कहा है कि बांट दे, उसने उसको भी भेजा होगा, जो लेने को मौजूद होगा। वह बाहर गई और एक भिखारी खड़ा था! पैसे देकर वह भीतर आ गई। भरोसा गहरा हुआ; ट्रस्ट बढ़ा। मोहम्मद ने कहा, जिसने मुझे कहा कि पैसे बांट दे, उसने उसको भी भेजा होगा जो द्वार पर खड़ा है।

भीतर लौटकर आई। मोहम्मद ने आंखें बंद कीं। मुस्कुराए। चादर ओढ़ ली और श्वास छूट गई। जो जानते हैं, वे कहते हैं, मोहम्मद उतनी देर पांच रुपए बंटवाने को रुके। वह तड़फन यही थी कि कब वह पत्नी को राजी कर लें, छोड़ दे! लेकिन पत्नी ने भी क्यों बचाए थे पांच रुपए? वही जीवन का मोह। हम भी बचाते हैं, तो जीवन का मोह। सब बचाव जीवन के मोह में है। सब भय, मिट न जाएं, इस डर में हैं।

– ओशो

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One thought on ““मोहम्मद का अपरिग्रह” – ओशो

  • October 7, 2015 at 9:53 AM
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    वाह ! हृदयस्पर्शी …..

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