“जीवन का लक्ष्य क्या है?” – ओशो

जीवन का लक्ष्य क्या है?  यह प्रश्न तो बहुत सीधा-सादा मालूम पड़ता है। लेकिन शायद इससे जटिल और कोई प्रश्न नहीं है। और प्रश्न की जटिलता यह है कि इसका जो भी उत्तर होगा वह गलत होगा। इस प्रश्न का जो भी उत्तर होगा वह गलत होगा।

ऐसा नहीं कि एक उत्तर गलत होगा और दूसरा सही हो जाएगा। इस प्रश्न के सभी उत्तर गलत होंगे। क्योंकि जीवन से बड़ी और कोई चीज नहीं है जो लक्ष्य हो सकें। जीवन खुद अपना लक्ष्य है। जीवन से बड़ी और कोई बात नहीं है जिसके लिए जीवन साधन हो सकें और जो साध्य हो सकें। और सारी चीजों के तो साध्य और साधन के संबंध हो सकते हैं। जीवन का नहीं, जीवन से बड़ा और कुछ भी नहीं है। जीवन ही अपनी पूर्णता में परमात्मा है। जीवन ही, वह जो जीवंत ऊर्जा है हमारे भीतर। वह जो जीवन है पौधों में, पक्षियों में, आकाश में, तारों में, वह जो हम सबका जीवन है। वह सबका समग्रीभूत जीवन ही तो परमात्मा है। यह पूछना कि जीवन का क्या लक्ष्य है, यही पूछना है कि परमात्मा का क्या लक्ष्य है। यह बात वैसी ही है जैसे कोई पूछे प्रेम का क्या लक्ष्य है। जैसे कोई पूछे आनंद का क्या लक्ष्य है। आनंद का क्या लक्ष्य होगा, प्रेम का क्या लक्ष्य होगा, जीवन का क्या लक्ष्य होगा।

संसार में दो तरह की चीजें हैं। एक जो अपने आपमें व्यर्थ होती है। उनकी सार्थकता इसमें होती है कि वह किसी सार्थक चीज तक पहुंचा दें। उन चीजों को साधन कहा जाता है। वह मीन्स होती है। एक बैलगाड़ी है उसका अपने में क्या लक्ष्य है। कुछ भी नहीं लेकिन उसमें बैठकर कहीं पहुंच सकते हैं। अगर पहुंचना लक्ष्य में हो तो बैलगाड़ी साधन बन सकती है। एक तलवार का अपने-आपमें क्या लक्ष्य है। लेकिन अगर लड़ना हो, लड़ना लक्ष्य हो तो तलवार साधन बन सकती है। तो जीवन में एक तो वे चीजें हैं। जो साधन है और कुछ करना हो तो उनके द्वारा किया जा सकता है और अगर न करना हो तो बिल्कुल बेकार हो जाते हैं। जीवन में ऐसी चीजें भी हैं जो साधन नहीं है। वे स्वयं ही साध्य है उनका मूल्य इसमें नहीं है कि वह कहीं आपको पहुंचा दे। उनका मूल्य खुद उनके भीतर है, खुद उनमें ही छिपा है। प्रेम ऐसा ही अनुभव है। प्रेम अपने आप में ही अपनी उपलबिध है। उसे पा लेने के पीछे कुछ और नहीं पा लेने को बचता। और वह किसी और चीज का साधन भी नहीं है।

आनंद…आनंद अपने आप में अपना साध्य है। जीवन तो परम-साध्य है स्वयं में, उसके पार और उसके ऊपर कुछ भी नहीं है। जिसे पाने के लिए वह माध्यम बन सकें। इसलिए यह पूछना कि जीवन का लक्ष्य क्या है। एकदम ही ऐसा प्रश्न पूछना है, कि इसके जो भी उत्तर दिए जाएंगे। वह सभी गलत होंगे, लेकिन हम पूछते हैं। और पूछना हमारा सब प्रयोजन है, अर्थपूर्ण है। हम इसलिए पूछते हैं क्योंकि हमें जीवन का पता ही नहीं कि वह क्या है। अगर हमें यह पता होता कि जीवन क्या है। तो हम कभी न पूछते कि उसका लक्ष्य क्या है। जिसने कभी प्रेम नहीं किया, वह पूछ सकता है कि प्रेम का लक्ष्य क्या है। और जिसने कभी आनंद नहीं जाना वह पूछ सकता है कि आनंद का लक्ष्य क्या है। लेकिन जिसने प्रेम को जाना है, उसके जानने में ही उसके लक्ष्य को भी पा लेगा। और नहीं पूछेगा कि प्रेम का लक्ष्य क्या है।

इसलिए जब कोई यह पूछता है कि जीवन का क्या लक्ष्य है? तो मैं जानता हूं, कि वह इसलिए पूछ रहा है कि उसे जीवन का ही पता नहीं। अगर जीवन का पता हो तो कोई उसका लक्ष्य नहीं पूछेगा। जीवन खुद है अपना लक्ष्य। लेकिन चूंकि हमें जीवन का ही पता नहीं है कि जीवन क्या है। इसलिए हम पूछते हैं कि जीवन का लक्ष्य क्या है। और जिसे हम जीवन जानते हैं वह बिल्कुल जीवन नहीं है। हम किसे जीवन जानते हैं। जन्म ले लेने से मृत्यु लेने तक का जो उपक्रम है उसे हम जीवन समझते हैं। वह जीवन नहीं है, वह धीरे-धीरे मरने का नाम है। उसका जीवन से क्या संबंध, बच्चा पैदा होने के बाद मरना शुरू हो जाता है।

आप जिसको जन्मदिन कहते हैं वह मृत्यु की घड़ी है। शुरुआत है मृत्यु की। सत्तर वर्ष बाद वह मरेगा, सौ वर्ष बाद मरेगा, मरना आकसिमक नहीं है कि अचानक आ जाता है, रोज-रोज हम मरते जाते हैं, धीमे-धीमे मरते जाते हैं। मरने की लंबी क्रिया है लंबी प्रोसेस है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम मरते हैं। रोज मरते जाते हैं थोड़ा-थोड़ा मरते जाते हैं। इसी मरने की लंबी क्रिया को हम जीवन समझ लेते हैं। यह जो लंबी ग्रेजुअल डेथ है, यह जो धीमे-धीमे मरते जाना है रोज-रोज। इसी को हम समझ लेते है कि जीवन है। कल और आज में आप थोड़ा मर चुके हैं। नहीं तो आप बूढ़े नहीं हो सकते थे। कल आप और थोड़े मर जाएंगे। रोज हम मर रहे हैं, इस मरने को हम जीवन समझते हैं। तो प्रश्न खड़ा हो जाता है कि जीवन का लक्ष्य क्या है। जिसमें हम पैदा होते है जन्मते और मरते और रोज-रोज वही रिपीटीशन, वही दोहराना, वही सुबह उठाना, वही सांझ सो जाना, वही भोजन, वही कपड़े, वही झगड़े, वही संघर्ष, वही सब रोज-रोज इसका अर्थ क्या है, इसका प्रयोजन क्या है? तो हम पूछते हैं कि जीवन का लक्ष्य क्या है?

मैं आपसे पहली बात तो यह निवेदन कर दूं, कि यह जीवन ही नहीं है जिसको आप जीवन कह रहे हैं। और इसका आप कोई भी लक्ष्य बना लें। वह कोई भी लक्ष्य इसको जीवन न बना सकेगा। यह जीवन है ही नहीं, यह तो लंबी मरने की प्रक्रिया है। और इसीलिए तो इसे हम जीवन कहते हैं लेकिन न तो इसमें हम आनंद को जान पाते हैं, न हम शांति को जान पाते हैं, न हम प्रेम को जान पाते हैं, न हम प्रकाश को जान पाते हैं। कोई सौंदर्य का अनुभव जीवन में नहीं हो पाता। होगा कैसे? मरने के प्रक्रिया में होगा कैसे? मरने में होगा दुख, मरने में होगी पीड़ा, मरने में होगी चिंता, मरने में होगा अंधकार। रोज बढ़ता हुआ अंधकार जीवन को घेरता चला जाता है।

इसीलिए तो लोग कहते हैं कि बचपन के दिन बड़े सुख के दिन थे। कैसी अजीब बात है, अगर जीवन विकसित हो रहा है तो बुढ़ापे के दिन सबसे ज्यादा सुख के दिन होना चाहिए। बचपन के दिन क्यों? बचपन तो थी शुरुआत, बुढ़ापा है पूर्णता, तो दिन होने चाहिए सुख के बुढ़ापे के। अगर जीवन बड़ा है तो आनंद बढ़ना चाहिए। लेकिन हम सारे लोग तो गीत गाते हैं बचपन के कि बड़े खुशी के दिन थे। और हमारे कवि-कविताएं लिखते हैं कि बड़े सुख थे बचपन में। बड़ा आनंद था बालपन में निशिचत ही यह इस बात का सबूत है। कि बचपन के बाद हम जिस यात्रा पर चल रहे हैं वह जीवन की यात्रा नहीं है, मृत्यु की यात्रा है। इसलिए दुख बढ़ता जाता है। मृत्यु की छाया बढ़ती जाती है, पीड़ा बढ़ती जाती है। और बचपन के दिन सुखद मालूम होते हैं। ठीक कोई आदमी जीएगा और जीवन को अनुभव करेगा। तो रोज-रोज उसका आनंद बढ़ता जाना चाहिए। विकास का अर्थ यही होगा तो यह विकास होता है जीवन में या पतन।

हम नीचे उतरते हैं या ऊपर जाते हैं। बचपन की सुखद स्मृति गलत जीवन का सबूत है। जीवन ठीक से नहीं जीया गया जाना नहीं गया पहचाना नहीं गया। लेकिन इसको हम मान लेते हैं, कि यह जीवन है। यह जीवन नहीं है। यह जीवन हो भी नहीं सकता। जीवन की हमें गंध भी नहीं है। जीवन के स्वरों का हमें कोई बोध भी नहीं है कि कहां जीवन का संगीत छिपा है।

बुद्ध के पास एक बूढ़ा भिक्षु आया। बुद्ध ने उस भिक्षु को पूछा तेरी उम्र क्या है? उस भिक्षु ने कहा, चार वर्ष। वह बूढ़ा था, बुद्ध और उनके आस-पास के भिक्षु हैरान हुए। सोचा बुद्ध ने शायद मेरे समझने में हो गई है भूल। पूछा फिर मेरे मित्र तेरी उम्र क्या है? उस बूढ़े ने कहा, मैंने निवेदन किया चार वर्ष। बुद्ध ने कहा बड़ी हैरानी में डाल दिया तुमने। प्रतीत होते हो कोई सत्तर वर्ष तुम्हारी उम्र होगी कहते हो चार वर्ष किस हिसाब से गणना करते हो। उस बूढ़े ने कहा, चार वर्ष के पहले जो था वह जीवन नहीं था। उसकी मैं गिनती नहीं करता। इधर चार वर्षो से जीवन की सुगंध मिलनी शुरू हुई। इधर चार वर्षो से चित्त हुआ शांत। इधर चार वर्षो से निर्विचार हुआ। इधर चार वर्षो से भीतर झांका, तो उसकी प्रतीति हुई जो जीवन है। बाहर तो थी मृत्यु, जीवन था भीतर। और मैं बाहर ही देखता रहा, तो मैंने मृत्यु को जाना था चार वर्ष पहले। उस उम्र को कैसे जीवन की उम्र बताऊं। वह मेरी गणना में नहीं आती।

बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा, भिक्षुओं सुन रखो मन में। इस आदमी ने जिंदगी को नापने की नई बात बताई है। और आज से मेरे भिक्षुओं की उम्र उसी दिन से नापी जाए। जिस दिन से उनको शांति मिलें, वह जीवन को अनुभव करें। उसके पहले कि उम्र को जोड़ने की अब कोई जरूरत नहीं। कौन सी बात भीतर दिखाई होगी उस बूढ़े भिक्षु को क्या दर्शन हुआ होगा। कौन है? क्या है भीतर? क्या दर्शन हुआ होगा? कोई उसे आत्मा कहें, परमात्मा कहें, उचित तो यही है कि हम उसे जीवन कहें।

जीवन है भीतर, जीवंत कोई धारा, कोई चेतना भीतर है। और उसके ऊपर एक खोल है शरीर की, शरीर मरण-धर्मा है। शरीर को जो जीवन मान लेता है, वह मृत्यु को ही जीवन समझकर जी लेता है। और तब होता है बहुत दुख और बहुत पीड़ा। और इस पीड़ा और दुख में वह पूछने लगता है कि क्या है लक्ष्य? क्योंकि इस दुख, पीड़ा में कोई लक्ष्य तो दिखाई पड़ता नहीं। इस दुख पीड़ा में इस रोज के दैनंदिन अंधकार में कोई अर्थ, कोई अभिप्राय, कोई मीनिंग तो दिखाई पड़ता नहीं। तो मन में प्रश्न उठने लगता है, क्या है इस जीवन का अर्थ? ठीक है पूछने वाला, लेकिन उसको निवेदन कर दे।

पहली बात, यह जीवन ही नहीं है जिसका वह अर्थ पूछ रहा है। रह गया दूसरा जीवन उसे हम जानते नहीं है। क्योंकि जो उसे जान लेता है, वह अर्थ नहीं पूछता। क्योंकि उसे पा लेना ही उसका अर्थ है। वह स्वयं साध्य है उसके पार फिर पा लेने को कुछ भी नहीं है। उसे पा लेना है, उस जीवन को जान लेना, उस जीवन के साथ एक हो जाना। सब कुछ पा लेना है। क्योंकि उसके बाद मन में कोई अभाव नहीं रह जाता। कोई कामना नहीं रह जाती, कोई मांग नहीं रह जाती। मन सब भांति शांत और तृप्त और संतुष्ट हो जाता है। वह जो परम विश्राम और परम संतुषिट है। वही उस जीवन को पाने से और जानने से मिल जाती है। तो जीवन का लक्ष्य है, जीवन को पा लेना।

जीवन का लक्ष्य है, जीवन को पा लेना। हम जीवित नहीं है। हम करीब-करीब मृत है और हम जो भी करते हैं, जो भी श्रम करते हैं, जो भी मेहनत करते हैं। इस जीवन को खड़ा करने की जो कि झूठा है। जो कि सच्चा नहीं, उस सारी मेहनत और श्रम का सिवाय इसके कोई परिणाम नहीं होता कि हम रोज-रोज अपनी ही मेहनत से अपनी ही कब्र के करीब पहुंचते चले जाते हैं।

जन्म जीवन की शुरुआत नहीं, मृत्यु की शुरुआत है। जन्म जीवन का प्रारंभ नहीं, मृत्यु का प्रारंभ है। जन्म बीज नहीं है अमृत का, मृत्यु का ही बीज है। लेकिन जन्म को हम समझ लेते हैं जीवन का प्रारंभ और तब सारी भूल हो जाती है।

तो आज की संध्या मैं आपसे निवेदन करूं- जन्म को जीवन मत समझ लेना, जन्म जीवन नहीं है और न ही जन्म और मृत्यु के बीच जो सिलसिला है वह जीवन है। यह स्मरण आ जाए कि यह जीवन नहीं है तो आंखें उस तरफ उठाई जा सकती हैं जो कि जीवन है। उसको खोजा जा सकता है–स्वयं में में जो कि जीवन है। लेकिन जो इसे ही जीवन समझ लेंगे, वे कैसे खोज पाएंगे तो यह भ्रम टूट जाना चाहिए, यह इल्युजन टूट जाना चाहिए कि यह जीवन है। अगर यह टूट जाए तो आज ही इसी क्षण भी उस तरफ आंख जा सकती है। वह हमारे भीतर मौजदू है, हमारे भीतर कुछ मौजूद है जिसका कोई जन्म नहीं है और कोई मृत्यु नहीं है।

लेकिन मेरे कहने से वह मौजूद नहीं हो जाएगा, उपनिषदों के कहने से मौजूद नहीं हो जाएगा, गीता लाख चिल्लाए तो मौजूद नहीं हो जाएगा, दुनिया भर के शिक्षक समझाएं तो मौजूद नहीं हो जाएगा, मौजूद है कुछ लेकिन वह आप ही आंख उठाएंगे तो ही मौजूद हो सकता है, नहीं तो मौजूद नहीं हो सकता। वह आपकी आंखों की प्रतीक्षा कर रहा है कि आप देखें, तो वह मौजूद हो जाएगा वह है मौजूद। आपकी आंख देखने को तैयार होनी चाहिए, तो उसे देखते ही आपको पहली दफा जीवन का पता चलेगा और जिस दिन आपको जीवन का पता चल जाएगा, उसी दिन, उसी क्षण, उसी के साथ आपका यह ख्याल मिट जाएगा कि जीवन का लक्ष्य क्या है?

जीवन को पा लेना, जीवन के लक्ष्य को भी पा लेना। वह अपना लक्ष्य स्वयं जीवन के पार ऊपर कुछ भी नहीं, जीवन के आगे कुछ भी नहीं, जीवन खुद ही वह सागर अनंत और असीम; जिसको कोई परमात्मा कहें तो कहें; कोई मोक्ष कहें तो कहें; कोई निर्वाण कहे तो कहे नाम कोई और दे तो कहे, लेकिन जीवन सीधा-सदा सरल सा नाम है, बाकी सब नाम झगड़े के हैं। आसितक और नासितक का झगड़ा खड़ा हो जाता है कि ईश्वर है या नहीं। लेकिन जीवन तो है: कोई आसितक नासितक का झगड़ा भी नहीं है। जीवन है: आज तक किसी ने शक नहीं किया कि जीवन नहीं है। जीवन निअववाद अनुभव है कि जीवन है निर्वाद, निर्पवाद कोई ने कभी अपवाद में नहीं कहा कि जीवन नहीं। जीवन है, और इस जीवन की हम सबको तलाश है लेकिन कठिनाई, सारी कठिनाई एक जगह रुक जाती है।

जिसे हम जीवन समझ लेते हैं वह जीवन नहीं और तब सारी उलझन हो जाती है। इसलिए पहली तो बात इस संबंध में यही जानने की है कि यह जो भ्रामक जिसे हम जीवन कहते हैं उसे जानना होगा यह जीवन नहीं है। बड़ी उदासी होगी तब तो, बड़ी चिंता सी मालूम होगी कि अगर यह जीवन नहीं तो फिर क्या? फिर तो हम खाली छूट गए अधर में, फिर तो कोई रास्ता न रहा, यही तो हम जीवन जानते थे: यही धन कमाने को; यश कमाने को; बड़ा मकान बनाने को; मैं इनकीनिंदा नहीं कर रहा हूं। मेरे मन में किसी चीज की कोईनिंदा नहीं है। लेकिन इनको ही जीवन समझने को मैं गलती कह रहा हूं, जरूर मकान बनाएं, जरूर खोज करें जीवन की, जरूर यह सब जो चल रहा है, लेकिन इसे जीवन न समझ लें। तो बस अगर यह जीवन समझ में न आए तो आपके भीतर एक खोज जारी रहेगी उसकी खोजने की जो कि जीवन है। इसे हम जीवन समझ लेते हैं इसलिए वह खोज बंद हो जाती है। अगर यह भ्रम टूट जाए कि जीवन है तो उसकी खोज शुरू होगी।

– ओशो

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