“हिंसा-अहिंसा क्या है ?” – ओशो

अहिंसा का मार्ग क्या है?

अहिंसा का मार्ग क्या यह है कि मैं किसी को न मारूं? अगर यह है, तो कृष्ण की बात फिर उलटी है, जो उन्होंने पहले कही उससे। फिर तो कृष्ण जो बता रहे हैं, वह हिंसा का मार्ग बता रहे हैं!

नहीं; अहिंसा के मार्ग का अर्थ बहुत गहरा है, जितना कि अहिंसक कभी भी नहीं समझ पाते। अहिंसक–तथाकथित अहिंसक, जो समझते हैं कि वे नानवायलेंट हैं; अहिंसा, नानवायलेंस के मानने वाले हैं–उनको भी पता नहीं कि अहिंसा का क्या अर्थ है। किसी महावीर को कभी पता होता है कि अहिंसा का क्या अर्थ है।

अहिंसा का यह अर्थ नहीं है कि तुम किसी को मत मारो। क्योंकि अगर अहिंसा का यह मतलब है कि तुम किसी को मत मारो, तब तो अहिंसा का यह मतलब हुआ कि आत्मा मर सकती है! तो महावीर तो निरंतर चिल्लाकर कहते हैं कि आत्मा अमर है। जब महावीर कहते हैं, आत्मा अमर है, तो तुम मार ही कैसे सकते हो? जब मार ही नहीं सकते हो, तो हिंसा की बात ही कहां रही? हां, इतना ही कर सकते हो कि शरीर और आत्मा को अलग कर दो। तो शरीर सदा से मरा हुआ है और आत्मा कभी मरी हुई नहीं है। तो मरे हुए को, गैर-मरे हुए से अगर किसी ने अलग भी कर दिया, तो हर्जा क्या है? कुछ भी तो हर्ज नहीं है।

महावीर खुद कहते हैं, आत्मा अमर है, इसलिए महावीर का यह मतलब नहीं हो सकता अहिंसा से कि तुम किसी को मारो मत। महावीर का भी मतलब यही है और कृष्ण का भी मतलब यही है कि मारने की इच्छा मत करो। मरता तो कोई कभी नहीं, लेकिन मारने की इच्छा की जा सकती है। और पाप मारने से नहीं लगता, मारने की इच्छा से लगता है। मरता नहीं है कोई।

मैंने एक पत्थर उठाया और आपका सिर तोड़ देने के लिए फेंका। नहीं लगा पत्थर और किनारे से निकल गया। कुछ चोट नहीं पहुंची; कहीं कुछ नहीं हुआ। लेकिन मेरी हिंसा पूरी हो गई। असल में मैंने पत्थर फेंका, तब हिंसा प्रकट हुई। पत्थर फेंकने की कामना की, आकांक्षा की, वासना की, तभी हिंसा पूरी हो गई। पत्थर फेंकने की वासना की, तब भी हिंसा मेरे सामने प्रकट हुई। पत्थर फेंकने की वासना कर सकता हूं, इसकी संभावना मेरे अचेतन में छिपी है, तभी हिंसा हो गई। मैं हिंसा कर सकता हूं, तो मैंने हिंसा कर दी।

हिंसा का संबंध किसी को मारने से नहीं, हिंसा का संबंध मारने की वासना से है। तो जब कृष्ण कहते हैं, अहिंसा के मार्ग से भी! वे जो किसी को मारने की वासना से मुक्त हो जाते हैं! तो इसे जरा समझना पड़ेगा।

वे जो किसी को मारने की वासना से मुक्त हो जाते हैं, वे भी पहुंच जाते हैं वहीं, जहां कोई योग से, कोई सांख्य से, कोई सेवा से, प्रभु-अर्पण से पहुंचता है।

अहिंसा की कामना या हिंसा की वासना से मुक्त हो जाने का क्या अर्थ है?

बहुत मजे की बात है कि ये सारे भिन्न-भिन्न मार्ग बहुत गहरे में कहीं एक ही मूल से जुड़े होते हैं। जब तक मनुष्य के मन में इंद्रियों का लोभ है, तब तक हिंसा से मुक्ति असंभव है। जब तक आदमी इंद्रियों को तृप्त करने के लिए विक्षिप्त है, तब तक हिंसा से मुक्ति असंभव है।

इंद्रियां पूरे समय हिंसा कर रही हैं। जब आपकी आंख किसी के शरीर पर वासना बन जाती है, तब हिंसा हो जाती है। तब आपने बलात्कार कर लिया। अदालत में नहीं पकड़े जा सकते हैं आप, क्योंकि अदालत के पास आंखों से किए गए बलात्कार को पकड़ने का अब तक कोई उपाय नहीं है। लेकिन जब आंख किसी के शरीर पर पड़ी और आंख मांग बन गई, काम बन गई, वासना बन गई; और आंख ने एक क्षण में उस शरीर को चाह लिया, पजेस कर लिया; एक क्षण में उस शरीर को भोगने की कामना का धुआं चारों तरफ फैल गया–बलात्कार हो गया। आंख से हुआ, आंख शरीर का हिस्सा है। आंख से हुआ, आंख के पीछे आप खड़े हैं। आंख से हुआ, आपने किया; हिंसा हो गई। हिंसा सिर्फ छुरा भोंकने से नहीं होती, आंख भौंकने से भी हो जाती है।

इंद्रियां जब तक आतुर हैं भोगने को, तब तक हिंसा जारी रहती है। इंद्रियां जब भोगने को आतुर नहीं रहतीं, तभी हिंसा से छुटकारा है।

जिसे हम हिंसा कहते हैं, वह कब पैदा होती है? यह सूक्ष्म हिंसा छोड़ें; जिसे हम हिंसा कहते हैं, स्थूल, वह कब पैदा होती है? वह तभी पैदा होती है, जब आपकी किसी कामना में अवरोध आ जाता है, अटकाव आ जाता है। तभी पैदा होती है। अगर आप किसी के शरीर को भोगना चाहते हैं और कोई दूसरा बीच में आ जाता है; या जिसका शरीर है, वही बीच में आ जाता है कि नहीं भोगने देंगे–तब हिंसा शुरू होती है।

जब भी आपकी इंद्रियां भोगने के लिए कहीं कब्जा मांगती हैं और कब्जा नहीं मिल पाता, तभी हिंसा शुरू हो जाती है। स्थूल हिंसा शुरू हो जाती है। सूक्ष्म हिंसा पहले, भाव हिंसा पहले, फिर हिंसा सक्रिय होती और स्थूल बन जाती है।

कृष्ण कहते हैं, अहिंसा के मार्ग से भी, अर्थात इंद्रियों से जिसने अब मांगना छोड़ दिया, इंद्रियां जिसके भिक्षापात्र न रहीं; इंद्रियों से जिसने छेदना छोड़ दिया, इंद्रियां जिसके शस्त्र न रहीं; इंद्रियों से जिसने आक्रमण छोड़ दिया।

महावीर का एक बहुत कीमती शब्द यहां खयाल में रख लेना उपयोगी होगा। महावीर ध्यान के पहले प्रतिक्रमण शब्द का उपयोग करते हैं। ध्यान में जाना हो, तो पहले प्रतिक्रमण।

कभी आपने सोचा है कि प्रतिक्रमण का मतलब होता है, आक्रमण से उलटा! आक्रमण का मतलब है, दूसरे पर हमला। प्रतिक्रमण का मतलब है, आक्रमण की सारी शक्तियों को अपने में वापस लौटा ले जाना। एग्रेशन, आक्रमण। प्रतिक्रमण, रिग्रेशन; कमिंग बैक टु वनसेल्फ। आंख गई आप पर आक्रमण करने को, तो हिंसा हो गई। और मैंने आंख को वापस लौटा लिया उसकी पूरी कामना के साथ अपने भीतर, अपने भीतर, गहरे में वहां, जहां से उठती है कामना, वहीं उसे ले गया वापस–तो यह हुआ प्रतिक्रमण। और जब प्रतिक्रमण हो, तभी महावीर कहते हैं कि ध्यान हो सकता है, अन्यथा ध्यान नहीं हो सकता। क्योंकि आक्रमण करने वाली इंद्रियों के साथ ध्यान कैसा? प्रतिक्रमण करने वाली इंद्रियों के साथ ध्यान फलित हो सकता है।

कृष्ण कहते हैं, अहिंसा के मार्ग से भी, अर्थात आक्रमण जो नहीं कर रहा।

अब ध्यान रखें, अगर ठीक से समझें, तो किसी भी तल पर आक्रमण की कामना हिंसा है–किसी भी तल पर। सूक्ष्म से सूक्ष्म तल पर भी आक्रमण की इच्छा हिंसा है। अनाक्रमण, नान-एग्रेशन, प्रतिक्रमण, शक्तियों को लौटा लेना वापस अपने में–आंख लौट जाए आंख के मूल में; कान लौट जाए कान के मूल में; स्वाद लौट जाए स्वाद के मूल में; फैलाव बंद हो; सब सिकुड़ आए अपने मूल में–जब ऐसा प्रतिक्रमण फलित हो, तब व्यक्ति ध्यान को उपलब्ध हो पाता है।

अहिंसा का अर्थ है, प्रतिक्रमण, लौटना, कमिंग बैक टु वनसेल्फ। हिंसा का मतलब है, जाना दूसरे के ऊपर, किसी भी रूप में दूसरे के ऊपर जाना। दूसरे पर जाना! यह हिंसा शत्रुतापूर्ण भी हो सकती है, मित्रतापूर्ण भी हो सकती है। जो नासमझ हैं, वे शत्रुता के ढंग से दूसरे पर जाते हैं; जो होशियार हैं, वे मित्रतापूर्ण ढंग से दूसरों के ऊपर जाते हैं।

लेकिन जब तक कोई दूसरे पर जाता है, तब तक हिंसा है। और जब कोई दूसरे पर जाता ही नहीं, अपने जाने को ही वापस लौटा लेता है, तब अहिंसा है। इस अहिंसा के क्षण में भी वही हो जाता है, जो योगाग्नि में जलकर होता है।

– ओशो

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