“जीवन क्या है?” – ओशो

पहला प्रश्न : जीवन क्या है?

ऐसे प्रश्न सरल लगते हैं। सभी के मन में उठते है। पर ऐसे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है। ऐसे प्रश्न वस्तुत: प्रश्न ही नहीं हैं, इसलिए उनका उत्तर नहीं।

जीवन क्या है, इसका उत्तर तभी हो सकता है जब जीवन के अतिरिक्त कुछ और भी हो। जीवन ही है, उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं है। हम उत्तर किसी और के संदर्भ में दे सकते थे, लेकिन कोई और है नहीं, जीवन ही जीवन है। तो न तो कुछ लक्ष्य हो सकता है जीवन का, न कोई कारण हो सकता जीवन का। कारण भी जीवन है और लक्ष्य भी जीवन है।

ऐसा समझो, तुमसे कोई पूछे -किस चीज पर ठहरे हो? तुम कहो,छत पर। और छत किस पर ठहरी है? तो तुम कहो- दीवालों पर। और दीवालें किस पर ठहरी हैं? तो तुम कहो, पृथ्वी पर। और पृथ्वी किसी पर ठहरी है? तो तुम कहो गुरुत्वाकर्षण पर। और ऐसा कोई पूछता चले , गुरुत्वाकर्षण किस पर ठहरा है? तो चाद-सूरज पर। और चांद-सूरज तारो पर। और अंतत: पूछे कि यह सब किस पर ठहरा है? तो प्रश्न तो ठीक लगता है, भाषा में ठीक जंचता है, लेकिन सब किसी पर कैसे ठहर सकेगा, सब में तो वह भी आ गया है जिस पर ठहरा है। सब में तो सब आ गया। बाहर कुछ बचा नहीं।

इसको ज्ञानियो ने अति प्रश्न कहा है। सब किसी पर नहीं ठहर सकता। इसलिए परमात्मा को स्वयंभू कहा है। अपने पर ही ठहरा है। अपने पर ही ठहरा है, इसका अर्थ होता है, किसी पर नहीं ठहरा है।

जीवन क्या है, तुम पूछते। जीवन जीवन है। क्योंकि जीवन ही सब कुछ है। मेरे लिए जीवन परमात्मा का पर्यायवाची है। लेकिन प्रश्न पूछा है, जिज्ञासा उठी है, तो थोड़ी खोजबीन करें। अगर उत्तर देना ही हो, अगर उत्तर के बिना बेचैनी मालूम पड़ती हो, तो फिर जीवन को दो हिस्सों में तोड़ना पड़ेगा। जिनने उत्तर दिए, उन्होंने जीवन को दो हिस्सों में तोड़ लिया। एक को कहा – यह जीवन और एक को कहा – वह जीवन। यह जीवन माया, वह जीवन सत्य इस जीवन का अर्थ फिर खोजा जा सकता है। इस जीवन का अर्थ है, उस जीवन को खोजना। इस जीवन का प्रयोजन है – उस जीवन को पाना। यह अवसर है। मगर तब जीवन को बांटना पड़ा। बाटो तो उत्तर मिल जाएगा। मगर उत्तर थोड़ी दूर तक ही काम आएगा। फिर अगर कोई पूछे कि वह जीवन क्यो है – सत्य का, मोक्ष का, ब्रह्म का, फिर बात वहीं अटक जाएगी। वह जीवन बस है।

लेकिन यह विभाजन काम का है। कृत्रिम है, फिर भी काम है। अपने भीतर भी तुम इन दो धाराओं को थोड़ा पृथक-पृथक करके देख सकते हो। थोड़ी दूर तक सहारा मिलेगा। एक तो वह है जो तुम्हें दिखायी पड़ता है, और एक वह है जो देखता है। दृश्य और द्रष्टा। ज्ञाता और ज्ञेय। जाननेवाला और जाना जानेवाला। उसमें ही जीवन को खोजना जो जाननेवाला है। अधिक लोग उसमें खोजते हैं जो दृश्य है, धन में खोजते, पद में खोजते। पद और धन दृश्य हैं। बाहर खोजते। बाहर जो भी है सब दृश्य है : उसमें खोजना जो द्रष्टा है, साक्षी है, तो तुम्हें परम जीवन की स्फुरणा मिलेगी। उसी स्फुरणा में उत्तर है,मैं उत्तर नहीं दे सकूंगा। कोई उत्तर कभी नहीं दिया है। उत्तर है नहीं, मजबूरी है, देना चाहा है बहुतों ने कभी किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया है। और जिन्होंने उत्तर सच में देने की चेष्टा की है, उन्होंने सिर्फ इशारे बताए हैं कि तुम अपना उत्तर कैसे खोज लो। उत्तर नहीं दिया, संकेत किए हैं, ऐसे चलो, तो उत्तर मिल जाएगा।

उत्तर बाहर नहीं है, उत्तर तुम्हारे भीतर है। उत्तर है इस रूपांतरण में कि मेरी आखें बाहर न देखें, भीतर देखें। मेरी आखें दृश्य को न देखें, द्रष्टा को देखें। मैं अपने अंतरतम में खड़ा हो जाऊं, जहां कोई तरंग नहीं उठती; वहीं उत्तर है, क्योंकि वहीं जीवन अपनी पूरी विभा में प्रकट होता है। वहीं जीवन के सारे फूल खिलते हैं। वहीं जीवन का नाद है – ओंकार है।

जिंदगी, सच है कि झूठ ही लगती अगर अफसाना न होती। वह जो दृश्य का जगत है, एक कहानी है, जो तुमने रची और जो तुमने तुमसे ही कही। एक नाटक है, जिसमे निर्देशक भी तुम, कथा-लेखक भी तुम, अभिनेता भी तुम, मंच भी तुम, मंच पर टंगे पर्दे भी तुम और दर्शक भी तुम। एक सपना है, जो तुम्हारी वासनाओं में उठा और धुएं की तरह जिसने तुम्हें घेर लिया। एक तो जिंदगी यह रही,दुकान की, बाजार की, पत्नी-बेटे की, आंकाक्षाओं की। संसार जिसे कहा है। और एक जिंदगी और भी है, वह जो भीतर बैठा देख रहा है। देखता है कि जवान था, अब बूढ़ा हुआ; देखता था कि तमन्नाएं थीं, अब तमन्नाएं न रहीं; देखता था कि बहुत दौड़ा और कहीं न पहुंचा; देखता था, देखता रहा है, सब आया, सब गया, जीवन की धारा बहती रही, बहती रही, लेकिन एक है कुछ भीतर जो नहीं बहता, जो ठहरा है, जो थिर है, जो अडिग है, वह साक्षी। एक जीवन वह है।

बाहर का जीवन भटकाता , भरमाता है । उत्तर के आश्वासन देगा और उत्तर कभी आएगा नहीं। भीतर का जीवन ही उत्तर है।

तुम पूछते हो—जीवन क्या है? तुम्हें जानना होगा। तुम्हें अपने भीतर चलना होगा। मैं कोई उत्तर दूं; वह मेरा उत्तर होगा। शांडिल्य कोई उत्तर दें, वह शांडिल्य का उत्तर होगा। वह उन्होंने जाना, तुम्हारे लिए जानकारी होगी। और जानकारी ज्ञान में बाधा बन जाती है। जानकारी से कभी जानना नहीं निकलता। उधारी से कहीं जीवन निकला है!

बजाय तुम बाहर उत्तर खोजो, तुम अपने को भीतर समेटो। शास्त्र कहते हैं, जैसे कछुवा अपने को समेट लेता है भीतर, ऐसे तुम अपने को भीतर समेटो। तुम्हारी आंख भीतर खुले, और तुम्हारे कान भीतर सुनें, और तुम्हारे नासापुट भीतर सूंघें, और तुम्हारी जीभ भीतर स्वाद ले, और तुम्हारे हाथ भीतर टटोलें, और तुम्हारी पांचों इंद्रियां अंतर्मुखी हो जाएं; जब तुम्हारी पाचों इंद्रियां भीतर की तरफ चलती हैं, केंद्र की तरफ चलती हैं, तो एक दिन वह अहोभाग्य का क्षण निश्चित आता है जब तुम रोशन हो जाते हो। जब तुम्हारे भीतर रोशनी ही रोशनी होती है। और ऐसी रोशनी जो फिर कभी बुझती नहीं। ऐसी रोशनी जो बुझ ही नहीं सकती। क्योंकि वह रोशनी किसी तेल पर निर्भर नहीं— ‘ बिन बाती बिन तेल’। अकारण है। वही जीवन का सार है। वही जीवन का ‘क्या’ है।

उत्तारो में नहीं मिलेगा समाधान। समाधि में समाधान है।

– ओशो

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9 thoughts on ““जीवन क्या है?” – ओशो

  • April 26, 2016 at 11:55 AM
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    Can you send title /link of speech of Osho on Anger to my mail ID

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      • January 9, 2018 at 3:18 PM
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        please send this video to my email i d

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      • January 20, 2018 at 2:25 PM
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        this video is unavailable now on youtube , please send this video to me any how ( whatsapp , email etc ) or reupload it on youtube . this video and the background music helped me to relax a lot , i miss this video , please please please help me .
        send it to my email if possible

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  • January 30, 2017 at 6:10 AM
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    Which book is this from.? I want full audio? So which book or audio is this from?

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  • January 6, 2018 at 3:33 PM
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    Please share the audio

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