“ॐ: एक संकेत, एक कुंजी” – ओशो

ॐ / ओम -यह शब्द बहुत कीमती है, महत्वपूर्ण है। एक संकेत की भांति, इशारे की तरह वे गुप्त कुंजी की तरह। इसलिए सर्वप्रथम इसे ही खोलें। ओम में पांच मात्राएं हैं। पहली मात्रा है ‘अ’ ; दूसरी है ‘ओ’ ; तीसरी है ‘म’। ये तीन स्थूल चरण हैं। जब हम ओम शब्द को बोलते हैं, तो ये तीन अक्षर होते हैं। परन्तु ओम का उच्चारण करें और अंत में जो म आता है वह ‘म…म…म’ गुंजरित होगा। वह आधी मात्रा है- चौथी। तीन स्थूल हैं और सुनी जा सकती हैं। चौथी आधी स्थूल है। यदि आप काफी सजग हैं तो ही यह सुनी जा सकेगी अन्यथा यह खो जाएगी। और पांचवी कभी नहीं सुनी जाती। जब भी ओम शब्द का गुंजार होता है, तो वह गुंजार ब्रह्रा के शून्य में प्रवेश कर जाती है। जब ओम की ध्वनि चली जाती है और ध्वनिशून्यता बच रहती है, वही पांचवीं मात्रा है। आप ओम का उच्चारण करते हैं, तब अ-ओ-म बड़े स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं, तब एक पीछे चला आता “म..म..म” की आधी मात्रा और तब उसके बाद ध्वनिशून्यता। वही पांचवीं है। यह जो पांचवीं है, केवल इशारा है, बहुत सी चीजों की ओर।

प्रथम, उपनिषदों का जानना है कि मनुष्य की चेतना पांच भागों में बंटी है। हम मोटी-मोटी तीन को जानते हैं- जागरण, स्वप्न और गहरी निद्रा। ये तीन मोटे-मोटे चरण है: अ-ओ-म। उपनिषद चतुर्थ को तुरीय कहते हैं। उन्होंने उसका कोई नाम नहीं दिया, क्योंकि वह कुछ बड़ी मात्रा नहीं। चौथा वह है जो कि गहरी नींद के प्रति भी सजग रहता है। यदि आप गहरी निद्रा में थे, गहरी स्वप्नरहित निद्रा मैं, तो सुबह आप कह सकते हैं, मैं गहरी, बहुत गहरी नींद में था। कोई आपके भीतर जागता था और अब स्मरण करता है कि बहुत गहरी स्वप्नरहित नींद थी। एक साक्षी वहां मौजूद था। वह साक्षी ही चौथे के नाम से जाना जाता है। परन्तु उपनिषद कहते हैं कि वह चौथा भी अंतिम नहीं है, क्योंकि साक्षी होना भी अभी अलग होना है। इसलिए जब वह साक्षी भी मिट जाता है, केवल तभी असितत्व बचता है बिना साक्षी के- वही पांचवीं है। इसलिए यह ओम बहुत सी चीजों के लिए चिहन है; बहुत सी चीजों के लिए: मनुष्य के पांच शरीरों के लिए। उपनिषद उन्हें इस तरह बांटते हैं- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानस्य व आनंदमय; पांच कोष हैं – पांच शरीर। यह ओम ब्रह्रा का चिहन है। यह केवल एक चिहन नहीं है, लेकिन यह एक संकेत भी है। इसका क्या अर्थ है, जबकि मैं कहता हूं कि यह संकेत भी है?

जब कोई असितत्व में गहरे जाता है जड़ों तक, बहुत गहरे, तो वहां विचार नहीं होते। विचार करने वाला भी वहां नहीं होता। विषय-बोध भी वहां नहीं होता, और न कर्ता का बोध होता है, परन्तु फिर भी, सब कुछ होता है। उस विचारशून्य, कर्ताशून्य क्षण में, एक ध्वनि सुनाई पड़ती है, वह ध्वनि ओम की ध्वनि से मिलती है- मात्र मिलती है। वह ओम नहीं है; इसीलिए वह मात्र एक संकेत है। हम उसे कंठ से उत्पन्न नहीं कर सकते। वह करीब-करीब मिलती-जुलती ध्वनि है। इसलिए वह कितनी ही ध्वनियों का समस्वर है, परन्तु सदैव ही ओम के सबसे अधिक पास है।

मुसलमानों व ईसाइयों ने उसे आमीन की तरह पहचाना है। वह ध्वनि जो कि सुनाई देती है, जब सब कुछ खो जाता है और केवल ध्वनि गूंजती रह जाती है; वह ओम से मिलती-जुलती होती है; वह आमीन से भी मिल सकती है। अंग्रेजी में बहुत से शब्द हैं- ओमनिप्रजेंट, ओमनिशियन्ट, ओमनिपोटेंट- यह ओमनि मात्र ध्वनि है। वास्तव में ओमनिशियन्ट का अर्थ होता है: वह जिसने कि ओम को देखा हो, और ओम सब के लिए ही संकेत है। ओमनिपोटेंट का अर्थ होता है वह जो कि ओम के साथ एक हो गया है, क्योंकि वही सब से बड़ी संभावना है सारे ब्रह्रा की ध्वनि में भी मौजूद है। और वह ध्वनि सब को चारों तरफ से घेरे है, सर्व के ऊपर से बह रही है। ओमनिशियेन्ट, ओमनिप्रजेंट व ओमनिपोटेंट में जो ओमनि है वह ओम है। आमीन भी ओम है।

अलग-अलग साधक, अलग-अलग लोग भिन्न-भिन्न ढंग से पहचाने हैं। परन्तु वे सब किसी भी प्रकार से ओम से मिलते-जुलते हैं। आधुनिक विज्ञान विधुतकणों को असितत्व की आधारभूत इकाई समझता है। परन्तु उपनिषद विधुतकणों को नहीं, बलिक ध्वनिकणों को आधार मानता है। विज्ञान कहता है कि ध्वनि विधुतकणों की ही बदलाहट है, रूपांतरण है; ध्वनि स्वयं अपने में कुछ नहीं वरन विधुत है। उपनिषद कहते हैं कि विधुत कुछ नहीं है, बलिक ध्वनि का रूपांतरण है। एक बात जरूर है कि किसी भी तरह ध्वनि व विधुत परिवर्तित की जा सकती हैं एक-दूसरे में। परन्तु आधारभूत कौन है? विज्ञान का कहना है कि विधुत आधारभूत है। उपनिषदों का कहना है कि ध्वनि आधारभूत है, और मैं सोचता हूं कि यह जो भेद है, वह केवल उनकी पहुंच के कारण से है।

उपनिषद अंतिम सत्य तक ध्वनि के माध्यम से पहुंचते हैं, मंत्रों के द्वारा। वे ध्वनि का उपयोग करते हैं ध्वनिशून्य को उपलब्ध करने के लिए। धीरे-धीरे ध्वनि को छोड़ दिया जाता है; और धीरे-धीरे ध्वनिशून्यता पा ली जाती है। अंत में, जब वे नीचे पेंदे में पहुंचते हैं वे उस कासिमक साउंड- ब्रह्रा की ध्वनि को सुनते हैं। वह कोई विचार नहीं है, वह कोई पैदा की गई ध्वनि नहीं है, वह तो असितत्व के अपने स्वभाव में अंतर्निहित है। उसी ध्वनि को उन्होंने ओम कहा है। वे कहते हैं कि जब हम ओम को दोहराते हैं, वह मात्र समरूपता है; दूर बहुत दूर की नकल। वे कहते हैं, वह सही नहीं है; यह वह नहीं है जो कि वहां जानी जाती है, क्योंकि यह तो हमारे द्वारा उत्पन्न की गई है। यह तो मात्र किसी फोटोग्राफ की तरह है, यह सिर्फ उससे मिलती-जुलती है। मेरी फोटो मुझसे मिलती है, पर वह मैं नहीं हूं।

मैंने एक डच पेंटर, वान गाग के बाबत सुना है। एक बहुत सभ्य महिला वान गाग को सड़क पर मिली और कहने लगी- मैंने आपकी तसवीर देखी है और वह इतनी सुंदर थी एवं इतनी प्यारी थी कि मैंने उसे चूम लिया। वान गाग ने पूछा- क्या उस तस्वीर ने कुछ जवाब दिया? महिला ने कहां- नहीं, तस्वीर कैसे जवाब दे सकती है? वान गाग ने कहा- तब वह मैं नहीं था। एक फोटो समरूप हो सकती है, परन्तु वह वास्तविक नहीं है। उसके साथ कुछ गलती नहीं है, बस इतना काफी है कि वह मिलती-जुलती है। परन्तु किसी को उसे मूल समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इसलिए ओम मात्र संकेत है उसका जिससे कि वह मिलता-जुलता है, एक फोटो की तरह।

ओम एक गुप्त कुंजी भी है। जब मैं कहता हूं कि गुप्त कुंजी, तो मेरा अर्थ है कि वह अंतिम ध्वनि से मिलती-जुलती है। यदि आप उसका उपयोग कर सकें और उसके साथ-साथ धीरे-धीरे भीतर गहरे में जा सकें, तो आप अंतिम द्वार तक पहुंच जाएंगे, क्योंकि वह मिलता-जुलता है और वह और भी अधिक मिलेगा, यदि आप कुछ बातें और करें। जैसे, यदि आप ओम का उच्चारण करें, तो आपको अपने होंठ काम में लेने पड़ते हैं- आपका शरीर-यंत्र भी काम में लेना पड़ता है और तब बहुत कम सादृश्यता होगी। एक बहुत ही मोटी यांत्रिकता काम में लेनी पड़ती है और वह उसे विकृत कर देती है। ओम एक मोटी वस्तु में बदल जाता है। अपने होंठ काम में मत लें; केवल अपने भीतर अपने मन की सहायता से ओम की ध्वनि उत्पन्न करें। अपने शरीर को भी काम में मत लें, तब वह और भी मिलती-जुलती होगी; क्योंकि तब आप एक और अधिक सूक्ष्म माध्यम का उपयोग करेंगे। वह और भी अच्छी फोटो पेश करेगा।

मन का भी उपयोग न करें। प्रथम, ऊपरी शरीर को काम में लें, फिर उसे छोड़ दें। फिर मन को काम में ले। बस भीतर ओम शब्द की ध्वनि उत्पन्न करें। तब उसे भी बंद कर दें और ध्वनि को प्रतिध्वनित होने दें। कोई भी प्रयास न करें, यह अपने से आता है; तब यह वह जप बन जाता है। तब आप उसे उत्पन्न नहीं कर रहे, आप तो मात्र उसके प्रवाह में हैं। तब वह और भी गहरा चला जाता है, और वह और भी अधिक वास्तविक हो जाता है। आप उसे एक कुंजी की भांति काम में ले सकते हैं। जब वह बिना प्रयत्न के होने लगे, जब वह आपके शरीर के बिना होने लगे बिना मन के होने लगे- और जब केवल ध्वनि ही आपके भीतर प्रवाहित होने लगे, तो आप उसके बहुत समीप हैं।

अब केवल एक चीज और गिरा देनी है- उसे जो कि ओम की ध्वनि को अनुभव कर रहा है- वह ‘मैं-भाव (ईगो), वह अहं जो कि अनुभव कर रहा है कि ओम की ध्वनि मेरे चारों ओर गूंज रही है। यदि आप इसे भी गिरा दें, तब कोई बाधा नहीं रहती और फोटो की नकल असली फोटो में बदल जाती है। इसलिए यह गुप्त कुंजी है।

यह ओम बहुत अदभुत है। यह रहस्यविदों के लिए उतना ही आधार भूत है, जितना कि आइंस्टीन का सापेक्षता का नियम भौतिक शास्त्र के लिए। उस फारमूला में भी तीन बातें हैं- एक चिहन, एक संकेत व एक गुप्त कुंजी। इस ओम में भी तीन बातें हैं, परन्तु आधारभूत में यह एक गुप्त कुंजी है। जब आप उससे द्वार न खोलें, तब तक इसके बारे में सोचना बिल्कुल व्यर्थ है; समय, जीवन व शक्ति सिब व्यर्थ नष्ट करना है। जब तक कि आप द्वार खोलने के लिए तैयार नहीं हों, क्या लाभ होगा खाली कुंजी की बात करने से! यहां तक कि आप इसके सारे दार्शनिक रहस्य भी जाने लें तो भी वह बेकार है।

इसलिए इसे सदैव प्रारंभ में रखते हैं- ओम। यह चाबी है। यदि आप एक घर में घुसें, तो पहली वस्तु जो काम में ली जाएगी, वह है चाबी। इसलिए घुसें, कुंजी को काम में लें; परन्तु यदि आप मात्र चाबी के बारे में सोचने में लगे रहे और बराबर द्वार पर ही बैठे रहे, तो यह चाबी फिर आपके लिए एक चाबी नहीं है, बलिक एक बाधा है। तब उसे फेंक दें, क्योंकि वह कुछ खोल तो रही नहीं, बलिक वह बंद कर रही है। और चाबी के कारण, आप लगातार सोचते चले जाते हैं। कोई चाबी के बारे में मनन करता रह सकता है, बिना उसका उपयोग किए।

बहुत से लोग हैं जिन्होंने कि ओम के विषय में सोचा है, चिंतन किया है कि क्या अर्थ है ओम का। उन्होंने ढांचे खड़े किए बड़े-बड़े ढांचे, परन्तु उन्होंने कभी चाबी का उपयोग नहीं किया; वे कभी उस महल के भीतर नहीं घुसे। यह एक चिहन है; एक संकेत है, परन्तु आधारत: यह एक गुप्त कुंजी है। इसे ब्रह्म में प्रवेश के लिए एक विधि की तरह काम में लिया जा सकता है- उस सागर रूप में घुसने के लिए विधि की तरह इसका उपयोग किया जा सकता है। जितना सूक्ष्म यह होता जाता है, उतना ही वास्तविक के पास होता जाता है और जितना स्थूल होता है, उतना कम पास होता है।

ध्यान उसका सतत स्मरण है। यह पहला सूत्र है। हम तीन आयामों के जगत में रहते हैं। पहला आयाम है – मैं; यह, वस्तुओं का संसार – मैं और मेरा घर, मैं और मेरा फर्नीचर, मैं और मेरा धन। यह एक मैं-यह मेरे का घेरा है। एक वस्तुओं का जगत मुझे घेरे है।

फिर एक दूसरा आयाम है- “मैं-तू” , मैं और मेरी प्रेयसी, मैं और मेरा मित्र, मैं और मेरा कुटुंब, -एक व्यक्तियिों का जगत। यह दूसरा घेरा है।

उसके बाद एक तीसरा आयाम है- “मैं-वह” , मैं और विश्व। उपनिषद कहते हैं, ध्यान उसका सतत स्मरण है- न तो वस्तु का, न ही तेरा, वह कोई व्यक्ति निहीं है। वह तो वह है, परन्तु हम उसे वह क्यों कहते हैं?जब कभी हम वह कहते हैं, उसका अर्थ होता है वह कुछ जो कि अतिक्रमण करता है, वह जो कि पार है, वह कुछ जो कि वहां नहीं है जहां हम हैं- न तो हमारी वस्तुओं के संबंध में है और न हमारे व्यक्तियों के साथ संबंधों में है- वह उसका कोई नाम नहीं है, क्योंकि यदि उसे आप कोई भी नाम देते हैं, जैसे कि ईश्वर, तो वह मैं-तू का संबंध बन जाता है। यदि आप उसे माता या पिता कहते हैं, तो आप उसे दूसरे आयाम में ले जाते हैं। यदि आप कहते हैं कि कोई ईश्वर नहीं है, तो फिर आपको एक ही आयाम में रहना पड़ता है- मैं-वस्तु।

वह वस्तु नहीं है। आस्तिक इस बात से राजी हैं कि वह कोई वस्तु नहीं है, परन्तु वे कहते हैं कि वह व्यक्ति है । उपनिषद उसे एक व्यक्ति की तरह पुकारने के लिए राजी नहीं हैं, क्योंकि एक व्यक्ति की तरह उसे बताना उसे सीमित करना है, एक व्यक्ति की तरह उसे मानना उसे सीमाओं में बांधना है। वे केवल उसका, वह (दैट) शब्द का उपयोग करते हैं। वे कहते हैं, बस इतना पर्याप्त है, लेकिन उसे हम कोई नाम नहीं दे सकते हैं, क्योंकि उसकी कोई आकृति नहीं है, कोई सीमा नहीं है- वह सर्वस्व है- आलनेस। इसलिए क्या कहें उसे?इसलिए वे उसे ईश्वर कह कर भी नहीं पुकारते, वे उसे भागवत- डिवाइन भी नहीं कहते; वे उसे लार्ड- मालिक भी नहीं कहते। वे उसे किसी भी नाम से नहीं पुकारते। जब उसका कोई रूप नहीं है, कोई नाम नहीं है, तो वे मात्र उसे लिए दैट- वह शब्द का उपयोग करते हैं।

उसका सतत स्मरण ही ध्यान है। यदि आप उसे सतत स्मरण कर सकें, तो फिर आप ध्यान में हैं। जब आप वस्तुओं के साथ हो, उसे स्मरण रखें; जब आप लोगों के साथ हों, उसे स्मरण रखें। जहां भी आप हों; उसे सदैव स्मरण रखें। हम कभी सीमित को सीमित की भांति नहीं देखते; सदैव गहरे देखें और उस असीम को अनुभव करें। कभी आकृति को आकृति तरह न देखें; सदैव आकृति के नीचे गहरे जो आकृतिहीन है उसे देखें। कभी वस्तुओं को वस्तुओं की तरह न देखें, गहरे जाए, उन्हें अनुभव करें, और वह- दैट प्रकट हो जाएगा। कभी किसी व्यक्ति को उसके व्यक्तितिव में कैद न देखें। उसके भीतर गहरे में प्रवेश कर जाएं और उसका अनुभव करें जो कि पार चला जाता है, वह जो भीतर है उसके भी पार चला जाता है। उसका सतत स्मरण ही ध्यान है। कोई विधि, कोई पद्धति, कोई तरीका नहीं है- बस, केवल सतत स्मरण। परन्तु यह बहुत कठिन है।

उसका सतत स्मरण रखना है- बिना किसी अंतराल के, बिना क्रम टूटे, बिना एक क्षण के लिए भूले। सतत स्मरण हो- लगातार बिना किसी भी अंतराल के। यह जो निरंतर स्मरण है, बहुत ही कठिन है। हम कुछ लोगों के लिए लगातार स्मरण नहीं कर सकते। जरा अपनी सांसों को गिनना शुरू करो, और याद रखो कि लगातार स्मरण के आप कितनी श्वासें गिन पाते हैं, श्वास की क्रिया को, आती-जाती श्वास को ख्याल में रखना कितने श्वास गिन पाते हैं। स्मरण रखें और गिनें। आप तीन या चार गिन पाएंगे और फिर चूक जाएंगे। कुछ बीच में आ गया और आप भूल गए। और तब आपको याद आता है कि ओह, मैं तो गिन रहा था और मैंने तीन गिने और चूक गया।

स्मरण सबसे कठिन बात है, क्योंकि हम सोए हुए लोग हैं। हम गहरी नींद में सोए हुए हैं। हम नींद में चल रहे हैं, नींद में बात कर रहे हैं, गति कर रहे हैं, जी रहे हैं, प्रेम कर रहे हैं! हम सब कुछ नींद में ही कर रहे हैं, एक गहरी निद्रा में, एक गहरे प्राकृतिक सम्मोहन में। इसीलिए इतनी गड़बड़ है, इतना संघर्ष है। इतनी हिंसा है और इतनी लड़ाई है। और अभी भी हम किसी तरह चला रहे हैं। परन्तु हम सोए हुए हैं। हमारा व्यवहार ऐसा व्यवहार नहीं कि उसे जागा हुआ, सावधानी पूर्ण या सचेतन कहा जा सके। हम जागे हुए नहीं हैं। एक मिनिट के लिए भी हम अपने प्रति सजग नहीं रह सकते। इसका थोड़ा प्रयत्न करें और तब आपको पता चलेगा कि आप कितने सोए हुए हैं। यदि मैं अपने आपको एक मिनट के- साठ सेकेंड के लिए भी लगातार स्मरण नहीं रख सकता, तो कितनी गहरी नींद में मैं सोया हूं! दो या तीन सेकेंड और फिर नींद आ जाती है, और मैं वहां नहीं होता- मैं कहीं चला गया। सजगता चली गई और मूर्छा उसकी जगह आ गई। एक गहरा अंधकार हो जाता है और फिर मुझे ख्याल आता है कि मैं अपने प्रति सजग हो रहा था।

पी. डी. आसपेन्स्की, गुरजिएफ के साथ काम कर रहा था तथा उसके स्व-स्मरण की विधि पर भी। जब वह पहली दफा गुरजिएफ से मिला, उसने पूछा- आपका स्व-स्मरण (सेल्फ रिमेंबरिंग) से क्या तात्पर्य है? मुझे याद है कि मैं पी. डी. आसपेन्स्की हूं। गुरजिएफ ने कहा- अपनी आंखें बंद करो और स्मरण करो कि तुम पी. डी. आसपेन्स्की हो, और जब विस्मरण हो जाए तो मुझे कह देना। स्पष्ट कह देना। केवल दो या तीन स्मरण बार के बाद उसने कहा – मैं तो स्वप्न देखने लगा। मैं तो भूल गया कि मैं पी. डी. आसपेन्स्की हूं। मैंने तीन या चार बार कोशिश की। मैंने अपने भीतर कहा कि मैं पी. डी. आसपेन्स्की हूं। और तब एक सपना शुरू हो गया और मैं सजग नहीं रह पाया। गुरजिएफ ने कहा, यह स्व-स्मरण नहीं हुआ, तुम सजग नहीं रह पाए। पहली बात तो यह है कि तुम पी. डी. आसपेन्स्की नहीं हो, और दूसरी बात यह कि यह स्मरण नहीं है। जब स्मरण आएगा, तो तुम पहले व्यक्ति होगे जो कि मना करोगे कि तुम पी. डी. आसपेन्स्की हो।

तीन महीने के लिए आसपेन्स्की ने बड़ी मेहनत की, बहुत परिश्रम किया। जितनी कोशिश तुम करते हो, उतना पता चलता है कि यह कितना मुशिकल है। जितना भी तुम प्रयत्न करते हो, उतना ही तुम्हें पता चलता है कि तुम अपनी सारी जिंदगी सोए हुए ही रहे। यह जो हमारे पास है, यह मात्र यांत्रिक सजगता है। हम इससे चल सकते हैं, रोजाना का काम कर सकते हैं, परन्तु कभी गहरे में नहीं जा सकते।

तीन महीने के लिए उसने कोशिश की और बहुत कोशिश की और जब सजगता को प्राप्त हुआ, तो चेतना का एक नया ही स्तंभ प्रकट हुआ। जब वह अनुभव कर सकता था और साथ ही लगातार सजग भी रह सकता था, तो गुरजिएफ उसको एक सड़क पर घुमाने के लिए साथ ले गया। तब आसपेन्स्की ने कहा- पहली बार, एक शहर की सड़क पर, मैंने जाना कि प्रत्येक व्यक्ति सोया हुआ है, प्रत्येक व्यक्ति नींद में चल रहा है। लेकिन मैं भी उस नींद में चल चुका था, उस दशा में, और कभी सजग नहीं था। और मैंने देखा कि हर एक आदमी सोया हुआ है, अपनी खुली आंखों से। वह इतना घबड़ाया कि उसने अपने गुरु से कहा- मैं आगे नहीं चल सकता, मैं वास लौटूंगा। यहां हर एक ऐसा सोया है कि यहां कुछ भी हो सकता है। मैं आगे नहीं बढ़ सकता।

एक सड़क के किनारे बैठ जाऐं, और लोगों की घूमती हुई आंखों की ओर देखें। तब तुम्हें मालूम होता है कि हर एक मनुष्य अपने में बंद है। उसे बिल्कुल ही होश नहीं है कि उसके चारों तरफ क्या हो रहा है। कोई अपने से बात कर रहा है, कोई अपने हाथ हिला रहा है, शक्लें बना रहा है, जैसे वह किसी सपने में हो सकता है। होंठ हिल रहे हैं; प्रत्येक अपने भीतर बात कर रहा है। किसी को भी होश नहीं कि बाहर उसके चारों तरफ क्या हो रहा है। सब लोग यंत्रवत चले जा रहे हैं। वे अपने घरों को लौट रहे हैं। उन्हें यह स्मरण रखने की आवश्यकता नहीं कि उनके घर कहां हैं। वे यंत्रवत चलते हैं। उनकी टांगें चलती हैं; उनके हाथ कार के पहिए को घुमाते हैं, वे अपने घर पहुंच जाते हैं, परन्तु यह सारी प्रक्रिया सोते में हो रही है- एक यांत्रिक क्रिया है रोज की। रास्ते बने हैं और उन रास्तों पर वे चढ़े चले जाते हैं। इसीलिए हम सदैव नये से घबड़ाते हैं, क्योंकि तब हमें नए रास्ते बनाने पड़ते हैं। हम नए से डरते हैं, क्योंकि नए के साथ रोजमर्रा की बात नहीं चलेगी और कुछ समय के लिए हमें सावधान होना पड़ेगा। हम हमेशा ही अपने मृत दैनिक कार्यों में गड़े हुए रहते हैं और एक तरफ से मरे हुए होते हैं। एक सोया हुआ आदमी, वास्तव में, मृत होता है, उसे जीवित नहीं कह सकते।

पूरे जीवन में मात्र कुछ ही क्षणों के लिए हम जागते हैं और वे क्षण गहरे प्रेम के क्षण होते हैं जो कि बहुत ही मुशिकल से होता है। यह केवल कुछ ही लोगों को होता है- बहुत ही कम लोगों को। और जब यह होता है, प्रत्येक यह समझेगा कि वह आदमी पागल हो गया है, क्योंकि वह इतना भिन्न हो गया होता है- क्योंकि उसने वस्तुओं को दूसरे रंग में देखा होता हैं, एक भिन्न ही संगीत में, एक अलग ही रोशनी में। वह अपने चारों ओर देखता है और एक भिन्न ही दुनिया को देखता है। सचमुच ही वह व्यक्ति हमारे लिए पागल हो गया है, इसलिए हम उसे क्षमा कर सकते हैं, क्योंकि वह पागल है। वह एक स्वप्न में है!

वास्तव में, ठीक इसके विपरीत, मामला उल्टा ही है। हम सोए हुए हैं, और एक क्षण के लिए वह एक गहरी वास्तविकता के प्रति जाग गया है। परन्तु वह अकेला है और वह जागरूकता लगातार नहीं रह सकती; क्योंकि वह एक आकसिमक घटना है। वह उसके प्रयत्न से नहीं हुआ जो कुछ उसने पाया। वह एक अकस्मात घटना है। वह फिर सो जाएगा, और जब वह सो जाएगा, तब वह अनुभव करेगा कि उसे अपने प्रेमी या प्रेयसी द्वारा धोखा हुआ है; क्योंकि वह जादू अब वहां नहीं है। वह जादू आया, क्योंकि वह एक नए ही संसार के प्रति जागा। इस संसार में कितने ही संसार हैं। वह अवगत हुआ, और अब फिर से सो गया, इसलिए वह अनुभव करता है कि उसके साथ धोखा हुआ है। हर एक प्रेम करने वाला यह सोचता है कि उसके साथ धोखा हुआ है। किसी ने उसे धोखा नहीं दिया है। केवल एक अचानक जागरण में उसने एक अलग ही संसार के दर्शन कर लिए, एक अलग ही सौंदर्य से भरे, अलग-अलग ध्वनियों से भरे, और अब वह फिर से सो गया है। वह झलक खो गई और अब ऐसा अनुभव करता है कि उसे धोखा दिया गया। किसी ने उसे धोखा नहीं दिया है। केवल इतना ही हुआ कि अचानक वह जाग गया था।

कोई या तो प्रेम में, अथवा मृत्यु में सजग हो पाता है। आप मृत्यु की मुट्ठी में आ गए हैं, तो आप जाग जाएंगे। आकसिमक दुर्घटनाओं में- कार काबू से बाहर पहाड़ी के नीचे आ रही है- आप जाग जाएंगे; क्योंकि अब कोई भविष्य नहीं है और अतीत समाप्त हो गया है। केवल यह वर्तमान क्षण, यह पहाड़ी से नीचे गिरने का क्षण ही सब कुछ है। अब एक अलग ही समय का आयाम खुलता है। आप यहां और अभी में है, पहली बार, क्योंकि कोई भविष्य नहीं है। आप भविष्य के बार में नहीं सोच सकते, अतीत समाप्त हो ही रहा है। इन दोनों के बीच, एक क्षण के लिए, इस संकट में, आप सजग हो गए हैं। इसलिए प्रेम व मृत्यु ही ऐसे क्षण हैं, जब कि हम जागरूक होते हैं, लेकिन वे हमारे हाथ में नहीं हैं।

इसलिए जब उपनिषद कहते हैं- उसका सतत स्मरण तो इसका अर्थ है कि यदि आप लगातार, सतत उसका स्मरण कर सकें प्रत्येक वस्तु में, प्रत्येक घटना में, जो कुछ भी है उसमें वही है, भीतर व बाहर, यदि हर चीज उसकी ही स्मृति के लिए संकेत बन जाए, तो चेतना का विस्फोट होगा। नींद तब नहीं होगी। आप सजग व जागरूक हो जाएंगे। वह सजगता, वह जागरूकता ही ध्यान है।
दो बातें और हैं। लगातार का अर्थ होना है बिना किसी अंतराल के- बिना एक क्षण के गैप के भी। परन्तु यह बहुत कठिन है, क्योंकि तब आपकी जिंदगी असंभव हो जाती है। यदि आप निरंतर, उसका स्मरण करते चले जाते हैं, तो आप जीएंगे कैसे? आप चलेंगे कैसे? आप खाएंगे कैसे? यह समस्या खड़ी होती है यदि आप उसका नाम स्मरण करते हैं, यदि राम का स्मरण करते हैं, जीसस का या किसी का भी करते हैं तो। यदि आप उसके नाम का स्मरण करते हैं, उसे कोई भी नाम देते हैं, यदि आप बार-बार राम-राम दोहराते हैं, तो आपका जीवन असंभव हो जाएगा; क्योंकि या तो आप राम-राम का स्मरण ही कर सकते हैं या आप सड़क पर चल ही सकते हैं।

यहां स्मरण का यह मतलब नहीं है। इसीलिए उपनिषद उसका कोई नाम नहीं दे रहे, कोई रूप नहीं दे रहे, केवल कह रहे हैं- वह- दैट। और उसका निरंतर स्मरण असंभव है, क्योंकि उसका नाम-स्मरण नहीं करना है। बलिक आपको उसे अनुभव करना है प्रत्येक बात में जो भी आप कर रहे हैं- यहां तक कुएं से पानी ला रहे हैं उसमें भी। किसी झेन फकीर बोकूजू से पूछा कि वह हर समय क्या करता है?उसने कहा- मैं कुछ भी लगातार नहीं करता हूं। जो कुछ भी मैं कर रहा हूं, मैं समग्र रूप से करता हूं। जब मैं कुएं से पानी ला रहा हूं, तो मैं कुएं से पानी ही ला रहा हूं। जब मैं लकड़ी काट रहा हूं, तो मैं लकड़ी ही काट रहा हूं। जब मैं सो रहा हूं तो मैं सो रहा हूं। प्रश्नकर्ता ने पूछा- तब फिर आप क्या कर रहे हो? बोकूजू ने सीधा उत्तर दिया- मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूं। जब मैं लकड़ी काट रहा हूं, तब वह लकड़ी काट रहा हूं। जब मैं पानी ला रहा हूं, तो वही पानी ला रहा है। और वही पानी भी है जो कि लाया जा रहा है और वही लकड़ी भी है जो कि काटी जा रही है। अब वह ही है, और मैं नहीं हूं। इसलिए हर चीज पूजा हो गई है और प्रत्येक बात ध्यान हो गई है।

यह सारा उपनिषद इसी एक बात से संबंधित है कि कैसे आपकी जिंदगी को ही एक पूजा बना दे। यह उपनिषद पूर्णरूप से सब क्रियाकांड के विरोध में है। किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं- केवल एक अलग रुख- एक स्मरण उसका- कुछ भी करने में, कुछ भी न करने में, परन्तु सतत स्मरण उसका। आपको याद नहीं करना कि- चलो, अच्छा, यह पत्थर भी वह है। यदि आप इस तरह याद करने चले कि यह पत्थर भी वह है, तब वह स्मरण नहीं है क्योंकि तब दो मौजूद हैं- यह पत्थर और वह। जब उपनिषद कहते हैं- सतत स्मरण उसका तो उसका अर्थ है कि पत्थर गिर जाना चाहिए। केवल वही है। वह गहरा अनुभव है, एक सतत अनुभव।

अनुभव करना प्रारंभ करें। किसी भी वस्तु को छुएं नहीं बिना उसका अनुभव किए। बिना उसका अनुभव किए किसी को भी प्रेम न करें। हिलें भी नहीं, यहां तक कि श्वास भी न लें बिना उसका अनुभव किए। ऐसा नहीं है कि आपको उसे प्रत्येक चीज पर आरोपित करना है। आपको तो उसे प्रत्येक वस्तु में खोजना है। यह भेद स्पष्ट हो जाना चाहिए। आपके किसी भी चीज पर उसे आरोपित नहीं करना है। आप आरोपित कर सकते हैं, वह एक तरकीब होगी। आपको खोजना है। एक फूल को देखकर आप आरोपित कर सकते हैं और कह सकते हैं, ओह, वह फूल वह ही है।

नहीं, आरोपण न करें। कुछ भी न कहें। बस केवल फूल के पास चुप हो जाएं उसकी तरफ देखें। गहरी सहानुभूति में हो जाएं, उसके साथ गहरे में जुड़ जाएं। अपने को भूल जाएं। मात्र निषिक्रय सजगता में हों और फूल खिल उठेगा। उसका वह प्रकट हो जाएगा। इसलिए उसे खोजते चले जाएं। यही मतलब है सतत स्मरण का, और उसका सतत स्मरण ही ध्यान है।
आज इतना ही।

– ओशो

[आत्म पूजा उपनिशद-1]

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