“अन्नं ब्रह्म (Food is God) !” – ओशो

हिंदुओं ने अन्न को ब्रह्म कहा है। जिन्होंने अन्न को ब्रह्म कहा है उन्होंने जरूर स्वाद लिया होगा। उन्होंने तुम जैसे ही भोजन न किया होगा। वे बड़े होशियार लोग रहे होंगे, बड़े कुशल रहे होंगे। कोई गहरी कला उन्हें आती थी कि रोटी में उन्होंने ब्रह्म को देख लिया। दुनिया में किसी ने भी नहीं कहा है अन्नं ब्रह्म। कैसे लोग थे! रोटी में ब्रह्म! जरूर उन्होंने रोटी कुछ और ढंग से खाई होगी। उन्होंने भोजन को ध्यान बना लिया होगा। वे भागे-भागे नहीं थे। वे जब भोजन कर रहे थे तो भोजन ही कर रहे थे। उनकी पूरी प्राण-ऊर्जा भोजन में लीन थी। और तब जरूर रूखी रोटी में भी वह रस है जिसको ब्रह्म कहा है। तुम्हें भोजन करना आना चाहिए।

इसलिए मैं कहता हूं कि जब अन्न में ब्रह्म है तो निद्रा में भी है। उसे लेना आना चाहिए। तुम अगर ठीक से सोना जान जाओ, जहां सपने खो जाएं। क्योंकि सपने का अर्थ है, तुम्हें सोना नहीं आता। तुम आधे-आधे सो रहे हो। सपने का अर्थ है, कुछ जागे हो, कुछ सोए हो। इसीलिए तो बेचैनी है। जब सपना रहित नींद हो जाती है तब नींद में भी ब्रह्म है। तब तुम पाओगे कि श्वास-श्वास में उसी का वास है। तब तुम पाओगे, वही श्वास से भीतर आता, वही श्वास से बाहर जाता। तब हर तरफ तुम्हें उसकी ही झलक मिलेगी।

[ताओ-उपनिषद-भाग-5]

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उपनिषद कहते हैं–“अन्नं ब्रह्म।’ और ब्रह्म के साथ कम से कम इतना तो सम्मान करो कि होशपूर्वक उसे अपने भीतर जाने दो।

इसलिए सारे धर्म कहते हैं, भोजन के पहले प्रार्थना करो, प्रभु को स्मरण करो। स्नान करो, ध्यान करो, फिर भोजन में जाओ, ताकि तुम जागे हुए रहो। जागे रहे तो जरूरत से ज्यादा खा न सकोगे। जागे रहे, तो जो खाओगे वह तृप्त करेगा। जागे रहे, तो जो खाओगे वह चबाया जाएगा, पचेगा, रक्त-मांस-मज्जा बनेगा, शरीर की जरूरत पूरी होगी। और भोजन शरीर की जरूरत है, मन की जरूरत नहीं।

जागे हुए भोजन करोगे तो तुम एक क्रांति घटते देखोगे कि धीरे-धीरे स्वाद से आकांक्षा उखड़ने लगी। स्वाद की जगह स्वास्थ्य पर आकांक्षा जमने लगी। स्वाद से ज्यादा मूल्यवान भोजन के प्राणदायी तत्व हो गये। तब तुम वही खाओगे, जो शरीर की निसर्गता में आवश्यक है, शरीर के स्वभाव की मांग है। तब तुम कृत्रिम से बचोगे, निसर्ग की तरफ मुड़ोगे।

[जिनसूत्र-भाग-1-प्रवचन-1 ]

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गहरा भोग त्याग ले आता है। और गहरे त्यागी के भोग की चर्चा करनी मुश्किल है, क्योंकि वही भोगना जानता है।

तुम जरा सोचो! जब कृष्ण भोजन करते होंगे या महावीर भी जब भोजन करते होंगे, तो तुमने ऐसा भोजन कभी भी नहीं किया जैसा महावीर करते होंगे। चाहे उन्हें रूखी-सूखी रोटी ही मिली हो, उस रूखी-सूखी में से भी ब्रह्म को निचोड़ लेते होंगे। उस रूखी-सूखी रोटी में से सिर्फ खून और मांस-मज्जा ही नहीं आती थी उनको, ब्रह्म भी आता था। इसलिए तो उपनिषद कहते हैं: अन्नं ब्रह्म! अन्न ब्रह्म है। जिन्होंने लिखा है, उन्होंने खूब भोगकर लिखा होगा, खूब अन्न को परखकर लिखा होगा।

एक संन्यासी बीमार था। थोड़ा-थोड़ा भोजन लेता था। चिकित्सकों ने उससे कहा कि इतने थोड़े भोजन से काम न चलेगा, थोड़ा और भोजन लो। तो उस संन्यासी ने कहा, इतना काफी है, क्योंकि इसमें से मैं वही नहीं ले रहा हूं जो दिखाई पड़ता है, वह भी ले रहा हूं जो दिखाई नहीं पड़ता। और जब मैं श्वास लेता हूं, तब भी मैं भोजन कर रहा हूं–क्योंकि प्राण…। और जब मैं आकाश को देखता हूं, तब भी भोजन कर रहा हूं–क्योंकि आकाश…। जब सूरज की किरणें मुझ पर पड़ती हैं, तब भी भोजन कर रहा हूं–क्योंकि किरणें प्रवेश करती हैं। भोजन तो चौबीस घंटे चल रहा है। ब्रह्म चौबीस घंटे हजार-हजार मार्गों से तुम में उतर रहा है और नाच रहा है।

जिसने ठीक से भोगा, वह हर भोग में ब्रह्म को खोज लेगा। और जिसने ठीक से त्यागा, उसकी आंख इतनी शुद्ध और निर्मल हो जाती है कि उसे सिवाय ब्रह्म के फिर कुछ दिखाई पड़ता नहीं।

[जिनसूत्र-भाग-1-प्रवचन-4]

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उपनिषद कहते हैं, वह परमात्मा दूर से भी दूर, और पास से भी पास है। दूर से दूर–अगर मंदिरों में खोजा; पास से पास–अगर आंख खुली, और चारों तरफ देखा। वह परमात्मा निकट से भी निकट है। क्योंकि तुम भी वही हो। श्वास भी वही ले रहा है तुम्हारे भीतर। मोहम्मद ने कहा है, कि श्वास की नली से भी वह पास है। एक बार तुम बिना श्वास के भी जी लो, उसके बिना तुम जी सकोगे। उसके बिना कोई जीवन ही नहीं है। वह जीवन का सारभूत है।

तब जीवन की निंदा से कोई उस तक नहीं पहुंच पाएगा। और सभी धर्मों ने जीवन की निंदा की है। सिर्फ ज्ञानी पुरुषों ने जीवन की निंदा नहीं की है। उन्होंने तो जीवन का गौरव गाया है। असल में उनके जीवन में गौरव का जो गीत है, वही तो उनकी परमात्मा की स्तृति है।

इसलिए अन्नं ब्रह्म है। स्वाद भी उसी का है। शरीर भी उसी का है, काम भी उसी का है। राम भी वही है। और जिस दिन तुम द्वंद्व खड़ा न करोगे, और तुम्हें दोनों में वही दिखाई पड़ने लगेगा, उसी दिन अद्वैत उपलब्ध होगा। अद्वैत कोई सिद्धांत नहीं है, कि तुमने शंकराचार्य के ग्रंथ पढ़ लिए और तुम्हें अद्वैत की समझ आ गई।

अद्वैत तो जीवन को जीने की एक शैली है। इस भांति जीना है, कि दो के बीच विरोध खड़ा न हो। दो के बीच दो पन न आए। दो के बीच भी एक ही दिखाई पड़ता रहे। इसलिए कबीर के वचन उलटबांसी मालूम पड़ते हैं। वह सीधी बांसुरी है।

[कहे-कबीर-दीवाना-7]
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‘नानक कहते हैं कि उस गुणनिधान का भजन करो। उसका ही भजन करो, श्रवण करो, उसका ही भाव मन में रखो। इस प्रकार दुख से छूट कर सुख घर ले जाओगे।’

उस गुणनिधान का भजन, श्रवण, उसका ही भाव। तुम जो भी करो, उसे परमात्मा को समर्पित कर दो, तभी यह हो पाएगा। दूकान पर बैठो और ग्राहक आए, तो तुम ग्राहक को मत देखो, उसको ही देखो। और ग्राहक के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसा परमात्मा आया होता तो तुम उससे व्यवहार करते। क्योंकि चौबीस घंटे अगर उसके भाव में डूबना है, तो इसके सिवाय कोई उपाय नहीं। भोजन करो, तो वही भोजन से तुम में प्रवेश कर रहा है। इसलिए हिंदुओं ने कहा, अन्नं ब्रह्म, अन्न ब्रह्म है। तुम ऐसे ही भोजन मत करो। क्योंकि वही खिला है। वही अनाज बना है। तुम बड़े अनुग्रह भाव से उसे ग्रहण करो। और भोजन को, अन्न को जब तुम ब्रह्म मान लोगे–पानी पीओगे और वही पानी में आया है तुम्हारी प्यास को तृप्त करने को–तभी तो चौबीस घंटे उसका भजन होगा। नहीं तो कैसे होगा?

तुम जा कर गुरुद्वारा में, मंदिर में घड़ी भर भजन कर आओगे। लेकिन जब तुम भजन कर रहे हो तब भी मन भागा-भागा है। तब भी तुम बीच-बीच में घड़ी देख लेते हो कि समय ज्यादा हुआ जा रहा है। दूकान खोलने का वक्त हुआ जा रहा है। तुम कैसे उसका भजन करोगे? खंड-खंड भजन नहीं किया जा सकता कि सुबह कर लिया, कि सांझ कर लिया, और चौबीस घंटे साधारण हो गए।

धार्मिक होना चौबीस घंटे का कृत्य है, भाव है। इसे तुम कभी-कभी नहीं कर सकते। न कोई धार्मिक दिवस है और न कोई धार्मिक घड़ी है। समस्त जीवन उसी का है। सब क्षण उसी के हैं। तो तुम इस ढंग से जीयो–धर्म जीने की एक अलग शैली है–तुम इस ढंग से जीयो कि तुम जो भी करो, वह किसी न किसी रूप में परमात्मा से संयुक्त हो जाए।

[एक-ओंकार-सतनाम-नानक-2]

– ओशो

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