“संबोधि क्या है? संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?” – ओशो

प्रश्न: भगवान,संबोधि क्या है और संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?

नरेंद्र बोधिसत्व,
महान सिकंदर भारत आया। उसने एक फकीर के हाथ में एक चमकती हुई चीज देखी। पूछा, क्या है? वह फकीर बोला, बताऊंगा नहीं। बता नहीं सकूंगा। यह राज बताने का नहीं है। लेकिन सिकंदर जिद्द पर अड़ गया। उसने कहा, हार मैंने माननी जीवन में कभी सीखी नहीं। जान कर रहूंगा। तो फकीर ने कहा, एक बात बता सकता हूं कि तुम्हारी सारी धन-दौलत इस छोटी सी चीज के सामने कम वजन की है।

सिकंदर ने तत्क्षण एक बहुत विशाल तराजू बुलाया और लूट का जो भी उसके पास सामान था, हीरे-जवाहरात थे, सोना-चांदी था, सब उस तराजू के एक पलवे पर चढ़ा दिया और उस फकीर ने उस चमकदार छोटी सी चीज को दूसरे पलवे पर रख दिया। उसके रखते ही फकीर का पलवा नीचे बैठ गया और सिकंदर का पलवा ऊपर उठ गया–ऐसे कि जैसे खाली हो! सिकंदर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।

झुका फकीर के चरणों में और कहा, कुछ भी हो, नतमस्तक हूं। लेकिन राज मुझे कहो। फकीर ने कहा, राज कहना बहुत मुश्किल है। कहा नहीं जा सकता, इसलिए नहीं कह रहा हूं। लेकिन तुम झुके हो, इसलिए एक बात और बताए देता हूं। एक चुटकी धूल उठाई रास्ते से और उस चमकदार चीज पर डाल दी और न मालूम क्या हुआ कि फकीर का पलवा एकदम हलका हो गया और ऊपर की तरफ उठने लगा। और सिकंदर का पलवा भारी हो आया और नीचे बैठ गया। स्वभावतः सिकंदर तो और भी चकित हुआ। उसने कहा, यह मामला क्या है? तुम पहेलियों को और पहेलियां बना रहे हो। और उलझा रहे हो। सीधी-सादी बात है। कहना हो कह दो, न कहना हो न कहो।

उस फकीर ने कहा, अब कह सकता हूं। अब तुम जिज्ञासा से पूछ रहे हो। अब जोर-जबरदस्ती नहीं है। यह कोई खास चीज नहीं है; मनुष्य की आंख है। धूल पड़ जाए, दो कौड़ी की। धूल हट जाए तो इससे बहुमूल्य और कुछ भी नहीं–सारी पृथ्वी का राज्य भी नहीं, सारी धन-दौलत फीकी है

संबोधि का अर्थ होता है –तुम्हारे भीतर की आंख। और कुछ ज्यादा कठिनाई की बात नहीं है; थोड़ी सी धूल पड़ी है–सपनों की धूल। धूल भी सच नहीं। विचारों की धूल। कल्पनाओं की धूल। कामनाओं की धूल। धूल भी कुछ वास्तविक नहीं, धुआं-धुआं है; मगर उस धुएं ने तुम्हारी भीतर की आंख को छिपा लिया है। जैसे बादल आ जाएं और सूरज छिप जाए; बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए। बस इतना ही अर्थ है संबोधि का: बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए।

तुम सूरज हो। बुद्धत्व तुम्हारा स्वभाव है। मगर खूब तुमने बादल अपने चारों तरफ सजा लिए हैं! न मालूम कैसी-कैसी कल्पनाओं के बादल! न मालूम कैसी-कैसी कामनाओं के बादल! जिनका कोई मूल्य नहीं। जो कभी पूरे हुए नहीं। जो कभी पूरे होंगे नहीं। मगर तुम उस सबसे घिरे हो, जो नहीं है, और नहीं होगा; और उससे चूक रहे हो, जो है, और जो सदा है, और जो सदा रहेगा! संबोधि का अर्थ होता है: जो है, उसमें जीना; जो है, उसे देखना; जो है, उससे जुड़ जाना। जो नहीं है, उस पर पकड़ छोड़ देना। अतीत नहीं है और हम अतीत को पकड़े हुए हैं। बीत गया कल, हम कितना सम्हल कर रखे हुए हैं। जैसे हीरे-जवाहरातों को कोई सम्हाले। राख है; अंगारा भी नहीं है अब। सब बुझ चुका। जैसे कोई लाशों को ढोए। ऐसा हमारा अतीत है।

और या फिर हम भविष्य की कामनाओं में उलझे हैं। शेखचिल्ली हैं हम। सोच रहे हैं: ऐसा हो, ऐसा हो, ऐसा हो जाए। कितने सपने तुम फैलाते हो! कितने सपनों के जाल बुनते हो! और इन दो चक्कियों के पाटों के बीच, जो दोनों नहीं हैं–अतीत नहीं है, नहीं हो चुका; भविष्य नहीं है, अभी हुआ ही नहीं–इन दो नहीं के बीच जो है, वर्तमान का छोटा सा क्षण, वह दबा जा रहा है। इन दो चक्कियों के बीच में तुम्हारा अस्तित्व पिसा जा रहा है। अतीत से और भविष्य से जो मुक्त हो गया, वह संबुद्ध है, वह बोधि को उपलब्ध हुआ। उसी आंख खुली। उसकी आंख से धूल हटी। लेकिन तुम धोखा देने में कुशल हो। तुम औरों को धोखा देते-देते इतने कुशल हो गए हो कि अपने को ही धोखा देने लगे हो। और औरों को धोखा दो तो कुछ ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकते। क्या छीन लोगे? लेकिन अपने को धोखा दो तो सब गंवा दोगे। और हर आदमी अपने को धोखा दे रहा है; अपने साथ ही वंचना कर रहा है; अपने को ही भ्रांति में रखे हुए है। मूर्च्छा हमारी अवस्था है, जब कि होनी चाहिए जागृति। लेकिन सारी दुनिया हमें एक ही पाठ सिखाती है कि धोखा मत खाना किसी और से; और सबको धोखा देना। और तुम सबको धोखा देते-देते भूल ही जाओगे कि जीवन धोखा देने में नहीं है। धोखा देने में तुम खुद धोखा खा जाओगे। दूसरों के लिए खोदे गए गङ्ढे तुम्हारे लिए ही गङ्ढे हो जाएंगे, उनमें तुम्हें गिरोगे। तुम्हारे क्रोध में तुम्हीं सड़ोगे। तुम्हारी वासना में तुम्हीं गलोगे। तुम्हारी आकांक्षाएं तुम्हारी छाती पर ही पत्थर होकर बैठ जाएंगी। तुम्हारी आकांक्षाओं में किसी और के जीवन का विनाश नहीं हो रहा, तुम्हारा हो रहा है। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को भी हम धोखा सिखा रहे हैं। हम सोचते हैं यही दुनियादारी है। यहां जीवन का संघर्ष है। यहां हरेक हरेक से जूझ रहा है।

मुल्ला नसरुद्दीन का बेटा फजलू पहले दिन ही स्कूल से देर से लौटा। रास्ते में होता होगा मदारी का खेल, देखने में लग गया होगा। बड़े-बड़े मदारियों के खेल में लगे हैं, छोटे बच्चों का क्या! आया घर, मुल्ला ने पकड़ा कान उसका, की पिटाई और कहा, इससे एक पाठ लो कि अब दुबारा कभी घर देर से मत आना। दूसरे दिन समय पर आया, लेकिन कपड़े उसके गंदे थे और फटे थे। झगड़ा हो गया था खेल-खेल में। मारपीट हो गई थी लड़कों से। मुल्ला ने फिर उसकी पिटाई की और कहा, इससे पाठ लो कि कपड़े आगे से न तो गंदे हों और न फटें। सोच-समझ कर चलो।

तीसरे दिन कपड़े तो ठीक थे, समय पर भी आया था बेटा, लेकिन स्कूल में सबसे फिसड्डी साबित हुआ था। पिछले छोर से प्रथम आया था। फिर मुल्ला ने उसी पिटाई की और कहा, इससे पाठ लो बेटा। ऐसे नहीं चलेगा। यह जिंदगी कठोर संघर्ष है। इसमें छीना-झपटी है। ऐसे पीछे-पीछे रहे, मारे जाओगे। कुछ भी करो, ठीक कि गलत, मगर सीढ़ियां चढ़ो। आगे बढ़ो। हमेशा प्रथम रहो चाहे कोई भी उपाय करना पड़े; येन-केन-प्रकारेण, मगर प्रथम रहना ही है।

चौथे दिन लड़का प्रसन्न चला आ रहा था। समय पर आया था, कपड़े भी नहीं फटे थे। हाथ में शिक्षक का प्रमाणपत्र भी लेकर आया था और बड़ा खुश था कि आज पिटाई नहीं होगी। मगर मुल्ला ने न आव देखा न ताव, एकदम झपटा, पकड़ी गर्दन, कर दी पिटाई। लड़का चिल्लाता ही रहा कि सुनो तो, सुनो तो! मगर तब तक तो पिटाई हो चुकी थी। लड़के ने कहा कि आप होश में हैं? आप पागल तो नहीं हो गए? न मैं देर से आया, न कपड़े फटे और यह प्रमाणपत्र कि आज मैं प्रथम आया हूं कक्षा में! मुल्ला ने कहा, इससे तुम पाठ लो बेटा कि इस संसार में न्याय कहीं है ही नहीं।

प्रत्येक व्यक्ति दीक्षित हो रहा है इस तरह। प्रत्येक व्यक्ति दीक्षित किया जा रहा है इस तरह। माता-पिता कर रहे हैं, परिवार कर रहा है, शिक्षक कर रहे हैं, पंडित-पुरोहित कर रहे हैं, राजनेता कर रहे हैं। बेईमानी, धोखाधड़ी हमारे जीवन की शैली है। इसलिए हम चूक रहे हैं उससे, जो हमारा धन है, जो हमारी वास्तविक संपदा है। हममें से कोई भी गरीब नहीं है। हममें से कोई भी भिखारी नहीं है। परमात्मा भिखारी पैदा करता ही नहीं। परमात्मा भिखारी पैदा करना भी चाहे तो नहीं कर सकता है। परमात्मा जिसे भी बनाएगा उसे सम्राट ही बनाएगा। उसके हाथों से सम्राट ही निर्मित हो सकते हैं। तुम भी सम्राट हो। इसे जान लेना संबोधि है। तुम भी मालिकों के मालिक हो। इसे पहचान लेना बुद्धत्व है। तुम्हारे भीतर एक लोक है–अकूत संपदा का, अपरिसीम आनंद का–रहस्यों का, कि उघाड़े जाओ कितने ही, कभी पूरे उघाड़ न पाओगे। ऐसी अनंत शृंखला है उनकी! इतने दीये जल रहे हैं भीतर, इतनी रोशनी है और तुम अंधेरे में जी रहे हो, क्योंकि तुम्हारी आंखें बाहर अटकी हैं। बाहर अंधेरा है, भीतर प्रकाश है। बाहर अंधकार है, भीतर आलोक है। जो भीतर मुड़ा, जिसने अपने आलोक को पहचाना, वही बुद्ध है।

बुद्धत्व प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता है, जन्मसिद्ध अधिकार है। अगर तुम चूको तो तुम्हारे अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं है।

और तुमने पूछा है “संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?’

आनंदित होओ। आनंद बांटो। और जो आनंदित है वही आनंद बांट सकता है, स्मरण रखो। दुखी दुख ही बांट सकता है। हम वही बांट सकते हैं जो हम हैं। जो हम नहीं हैं, उसे हम चाहें तो भी नहीं बांट सकते। इसलिए तो इस दुनिया में लोग ऐसा नहीं है कि दूसरों को सुख नहीं देना चाहते। कौन मां-बाप अपने बच्चों को दुख देना चाहता है! कौन पति अपनी पत्नी को दुख देना चाहता है! कौन पत्नी अपने पति को दुख देना चाहती है! कौन बच्चे अपने मां-बाप को दुख देना चाहते हैं! नहीं; लेकिन तुम्हारी चाह का सवाल नहीं है। दुख ही फलित होता है। नीम लाख चाहे कि उसमें मीठे आम लगें और कांटे लाख चाहें कि गुलाब के फूल हो जाएं, चाहने से क्या होगा? मात्र चाहने से कुछ भी न होगा। तो तुम चाहते हो कि लोगों को आनंदित करो, लेकिन कर तुम पाते हो केवल दुखी। चाहते तो हो कि पृथ्वी स्वर्ग बन जाए, लेकिन बनती जाती है रोज-रोज नरक।

इसलिए मैं तुमसे कहना चाहता हूं, यह मेरा संदेश है: इसके पहले कि तुम किसी और को आनंद देने जाओ, तुम्हें अपने भीतर आनंद की बांसुरी बजानी पड़ेगी, आनंद का झरना तुम्हारे भीतर पहले फूटना चाहिए। मैं तुम्हें स्वार्थी बनाना चाहता हूं।

यह स्वार्थ शब्द बड़ा प्यारा है। गंदा हो गया। गलत अर्थ लोगों ने दे दिए। स्वार्थ का अर्थ होता है: स्वयं का अर्थ। अपने भीतर के अर्थ को जो जान ले, स्व के बोध को जो जान ले, वही स्वार्थी है। मैं तुमसे कहता हूं: स्वार्थी बनो, क्योंकि तुम्हारे स्वार्थी बनने में ही परार्थ की संभावना है। तुम अगर स्वार्थी हो जाओ पूरे-पूरे और तुम्हारे भीतर अर्थ के फूल खिलें, आनंद की ज्योति जले, रस का सागर उमड़े, तो तुमसे परार्थ होगा ही होगा।

इसलिए मैं सेवा नहीं सिखाता, स्वार्थ सिखाता हूं। मैं नहीं कहता कि किसी और की सेवा करो। तुम कर भी न सकोगे। तुम करोगे तो भी गलती हो जाएगी। तुम करने जाओगे सेवा और कुछ हानि करके लौट आओगे। तुम करना चाहोगे सृजन और तुमसे विध्वंस होगा। तुम ही गलत हो तो तुम जो करोगे वह गलत होगा। इसलिए मैं तुम्हारे कृत्यों पर बहुत जोर नहीं देता। मेरा जोर है तुम पर। तुम क्या करते हो, यह गौण है; तुम क्या हो, यही महत्वपूर्ण है।

आनंदित होओ। और आनंदित होने का एक ही उपाय है, मात्र एक ही उपाय है, कभी दूसरा उपाय नहीं रहा, आज भी नहीं है, आगे भी कभी नहीं होगा। ध्यान के अतिरिक्त आनंदित होने का कोई उपाय नहीं है। धन से कोई आनंदित नहीं होता; हां, ध्यानी के हाथ में धन हो तो धन से भी आनंद झरेगा। महलों से कोई आनंदित नहीं होता; लेकिन ध्यानी अगर महल में हो तो आनंद झरेगा। ध्यानी अगर झोपड़ी में हो तो भी महल हो जाता है। ध्यानी अगर नरक में हो तो भी स्वर्ग में ही होता है। ध्यानी को नरक में भेजने का कोई उपाय ही नहीं है। वह जहां है वहीं स्वर्ग है, क्योंकि उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग आविर्भूत, उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग की किरणें चारों तरफ झर रही हैं। जैसे वृक्षों में फूल लगते हैं, ऐसे ध्यानी में स्वर्ग लगता है।

मेरा संदेश है: ध्यान में डूबो। और ध्यान को कोई गंभीर कृत्य मत समझना। ध्यान को गंभीर समझने से बड़ी भूल हो गई है। ध्यान को हलका-फुलका समझो। खेल-खेल में लो। हंसिबा खेलिबा करिबा ध्यानम्। गोरखनाथ का यह वचन याद रखना: हंसो, खेलो और ध्यान करो। हंसते खेलते ध्यान करो। उदास चेहरा बना कर, अकड़ कर, गुरु-गंभीर होकर धार्मिक होकर, मत बैठ जाना। इस तरह के मुर्दों से पृथ्वी भरी है। वैसे ही लोग बहुत उदास हैं, और तुम और उदासीन होकर बैठ गए। क्षमा करो। लोग वैसे ही बहुत दीनऱ्हीन हैं, अब और उदासीनों को यह पृथ्वी नहीं सह सकती। अब पृथ्वी को नाचते हुए, गाते हुए ध्यानी चाहिए। आह्लादित! एक ऐसा धर्म चाहिए पृथ्वी को, जिसका मूल स्वर आनंद हो; जिसका मूल स्वर उत्सव हो।

अब तक के सारे धर्म उदास थे। बुद्ध उदास नहीं थे, न क्राइस्ट उदास थे, न महावीर उदास थे। मगर उनके आस-पास जो लोग इकट्ठे हुए, वे सब उदास लोग थे। उनके आस-पास जो लोग इकट्ठे हुए, वे सब बीमार थे। वे गलत कारणों से उनके पास इकट्ठे हो गए थे। इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं है। अब बुद्ध करें भी क्या? और अक्सर ऐसा होता है कि जब भी कोई बुद्ध पुरुष होगा, तो सब तरह के विक्षिप्त, तो सब तरह के रुग्ण, सब तरह के मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोग, उसके आस-पास इकट्ठे होने लगेंगे–इस आशा में कि होगा कोई चमत्कार! इस आशा में कि और कहीं तो कोई चिकित्सा नहीं हो सकी, अब शायद चिकित्सा हो जाए; अब शायद बुद्ध में मिल जाए चिकित्सक; शायद बुद्ध के वचनों में मिल जाए औषधि। पंडित इकट्ठे होंगे, क्योंकि बुद्ध के वचनों की खबर दूर-दूर तक फैलने लगेगी।

धर्म तो एक है! धर्म दो कैसे हो सकते हैं? जब विज्ञान ही दो नहीं होते, जब पदार्थ का विज्ञान तक एक होता है, तो चैतन्य का विज्ञान तो कैसे अनेक हो सकता है?

पृथ्वी पर तीन सौ धर्म हैं और तीन सौ धर्म के कम से कम तीन हजार उपधर्म हैं, और और कम से कम तीन लाख उन उपधर्मों के छोटे-छोटे संप्रदाय हैं। इतने छोटे-छोटे संप्रदाय कि उनके नाम भी याद रखना मुश्किल है। अब एक मित्र बार-बार पूछे जाते हैं कि आप यह बताइए, गहोई समाज का किसने निर्माण किया? एक दूसरे सज्जन आ गए हैं, वे प्रश्न पूछते हैं कि विश्नोई समाज का कौन जन्मदाता था? आप महावीर पर बोलते हैं, बुद्ध पर बोलते हैं, कृष्ण पर बोलते हैं, क्राइस्ट पर बोलते हैं, मोहम्मद पर बोलते हैं; आप हमारे भगवान जंभेश्वरनाथ पर क्यों नहीं बोलते? जंभेश्वरनाथ ने विश्नोई समाज का निर्माण किया था।

जरूर किया होगा। एक से एक उपद्रव, कितने उपद्रव चल रहे हैं! और उनको फिक्र नहीं है समझने की कुछ। जो गहोई है, उसको फिक्र यह पड़ी है कि गहोई का क्या अर्थ है। जो विश्नोई है, उसको–विश्नोई का क्या अर्थ है! सबको अपनी-अपनी पड़ी है। सत्य से किसी को लेना-देना नहीं है। और सत्य एक है–न गहोई, न विश्नोई। और वह सत्य एक तुम्हारे भीतर छिपा है–न वेद में है, न कुरान में है, न बाइबिल में है। ध्यान से उस सत्य को खोजो।

ध्यान का अर्थ है: शांत होओ, मौन होओ, भीतर जागो! तुम भी संबुद्ध हो सकोगे। जरा सा श्रम चाहिए! जरा सा रुख परिवर्तन चाहिए। जितनी शक्ति तुम बाहर दौड़ने में लगा रहे हो, जितनी शक्ति तुम व्यर्थ की चीजों को संगृहीत करने में लगा रहे हो, उसका दसवां हिस्सा भी अगर तुम भीतर बैठने में लगा दो तो क्रांति हो जाए। तो हजार-हजार सूरज तुम्हारे भीतर भी ऊग आएं! तुम्हारे भीतर भी नृत्य हो, संगीत हो। तुम्हारे भीतर भी आनंद के फव्वारे फूटें, हंसी की फुलझड़ियां छूटें, रास-महारास रचे! तुम्हारे भीतर भी फाग हो, रंग झरें, पिचकारियां भरी जाएं, गुलाल उड़े!

ऐसे ही मर जाना है? जीवन को बिना जाने मर जाना है? अधिक लोग ऐसे ही मर जाते हैं। जीते ही नहीं और मर जाते हैं। इतना ही कस्त करो कि बिना जीए नहीं मरेंगे, जीवन को जान कर ही विदा होंगे। और आश्चर्य की बात तो यह है कि जो जीवन को जान लेता है, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं है। जीवन को जान लिया तो प्रभु को जान लिया, तो शाश्वत को जान लिया, तो सत्य को जान लिया। सत्य कहो, शाश्वत कहो, प्रभु कहो, निर्वाण कहो, बुद्धत्व कहो–ये सब एक ही घटना के अलग-अलग नाम हैं। इन नामों में मत उलझ जाना।

मेरा तो एक ही छोटा सा सूत्र है, छोटा सा संदेश है: भीतर डुबकी मारो। जितने गहरे जा सको, जाओ–अपने में! वहीं पाओगे जो पाने योग्य है। और उसे पाकर निश्चित ही बांट सकोगे! पृथ्वी तुम्हारे हंसी के फूलों से भर सकती है।

– ओशो

[प्रीतम छबि नैनन बसी-11, दिनांक २१ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना]

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