“संन्यास सिर्फ शुरुआत है” – ओशो

प्रश्न: क्या संन्यास भक्ति की शुरुआत है? कृपा करके कहिए।

संन्यास सिर्फ शुरुआत है। न भक्ति की न ज्ञान की, न कर्म की। संन्यास सिर्फ शुरुआत है। फिर तीन मार्ग हो जाते हैं। कोर्इ ज्ञान पर जाएगा, कोर्इ भक्ति पर, कोर्इ कर्म पर। संन्यास तो सिर्फ जाने की तैयारी है। संन्यास तो इस बात की घोषणा है कि मैं जाने को तैयार हूं। इसके बाद मार्ग अलग हो जाएंगे।

यहां मेरे पास संन्यासी हैं, हजारों संन्यासी हैं, उनमें भी तीन तरह के लोग हैं- कुछ हैं जो कर्म से ही आ सकेंगे, कर्मोन्मुख हैं। उन्हें मैं कर्म में लगाता हूं। उनके लिए कहता हूं कि कर्म ही प्रार्थना है, कर्म ही पूजा है ; उन्हें कहता हूं कि कृत्य में डूब जाओ। इस कृत्य को परमात्मा का कृत्य मान लो, और इसमें डूब जाओ। और तब छोटा सा कृत्य भी पूजा हो जाता है। जैसे किसी को मैंने कहा उदाहरण के लिए कि आश्रम में सफ़ाई करो। अब तुम यह चकित होओगे कि सफ़ाई किसी के लिए ध्यान बन जाता है।

आश्रम में एक सफ़ाई करने वाले संन्यासी हैं, पी.एच.डी हैं, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे, अब वह मुझसे आकर कहते हैं – इतना आनंद मुझे कभी हुआ ही नहीं। यह क्या कर दिया! अब इस पर भरोसा न आएगा, किसी को भी कि क्या कर दिया? कुछ भी नहीं किया है। आश्रम में बुहारी लगा रहे हैं और उनके जीवन में क्रांति घटित हो गर्इ है। बुहारी लगाने से कहीं क्रांति घटित होती है! तब तो कितने बुहारी लगाने वाले लोग हैं दुनिया में, ये सब सिद्ध जाते। नहीं, जब तुम किसी कृत्य को अपना समर्पण बना लेते हो, तब क्रांति घट जाती है – कृत्य कोर्इ भी हो, बुहारी लगाना ही क्यों न हो।

कुछ लोग हैं जो कृत्य के माध्यम से परमात्मा तक पहुंचेंगे। उनके पास बड़ी ऊर्जा है। उनसे तुम कहो कि आंख बंद करके बैठ जाओ और ध्यान करो, तो उन्हें बड़ी अड़चन हो जाएगी। छोटे बच्चे को कहो कि आंख बंद करके ध्यान करो, वह बैठ भी जाएगा आंख बंद करके तो हिलेगा-डुलेगा, हाथ-पैर चलाएगा, करवटें बदलेगा, इधर खुजलाएगा, उधर खुजलाएगा, बीच-बीच में आंख खोलकर देखेगा। छोटे-छोटे बच्चे मेरे पास जब संन्यास लेने आते हैं – छोटे बच्चे – उनसे मैं कहता हूं आंख बंद करो तो वे इतने भींचकर आंख बंद करते हैं, उसके भींचने का कारण ही यह है कि अगर भींचकर न करें तो खुल जाएगी। सारी ताकत लगा देते हैं, फिर भी खुल-खुल जाती है। फिर भी बीच में जरा देख लेते हैं कि फोटो उनकी निकाली जा रही है कि नहीं, कि चारों तरफ लोग कैसा अनुभव कर रहे हैं, कोर्इ हंस तो नहीं रहा है। छोटे बच्चे के पास इतनी ऊर्जा है, अभी ऊर्जा का प्रवाह शुरू हुआ है, अभी सब ताजा-ताजा है, अभी गंगा को बहुत बहना है, अभी विराट ऊर्जा लेकर आया है परमात्मा के घर से, अभी उसे बुद्ध की तरह आंख बंद करके बिठाया नहीं जा सकता।

कुछ लोग हैं जिनके पास सामान्य से ज्यादा ऊर्जा है, उनके लिए कृत्य ही मार्ग बनेगा। फर्क इतना ही हो जाएगा कि अब कृत्य उनका नहीं होगा, परमात्मा का होगा, वे उपकरण होंगे। यही भेद होगा संन्यासी और संसारी में। काम तो दोनों करेंगे, संन्यासी भी करेगा, संसारी भी करेगा। संसारी करता है इस भाव से कि मैं कर्ता; और संन्यासी करता है इस भाव से कि प्रभु कर्ता है, मैं सिर्फ उपकरण, उसके हाथ का हथियार। बस उसी समर्पण भाव में क्रांति घटती है।

फिर किसी को मैं भक्ति में लगाऊंगा। जैसे स्त्रियाँ हैं, या बहुत से भावुक पुरुष हैं, जिनकी सारी ऊर्जा हृदय के पास संगृहीत है, जिनके हृदय के पास सारी धड़कन है। न तो देह की शक्ति में उनका प्रवाह है और न मसितष्क के विचारों में उनका प्रवाह है, उनका सारा जीवन केंद्रति है भाव के पास, प्रीति उनका द्वार है, उनको मैं कहूंगा – नाचो, प्रभु के गीत गाओ, स्तुति करो, प्रार्थना करो, आधदित होओ; उनको संगीत में डुबाऊंगा, उन्हें नृत्य में लगाऊंगा, उन्हें प्रार्थना-पूजा की विधियों में ले जाऊंगा।

फिर कोर्इ है जिसकी सारी ऊर्जा मसितष्क में इकट्ठी है। ये तीन जगह हैं जहां ऊर्जा इकट्ठी होती है – शरीर, हृदय और मन। शरीर अर्थात कर्म, हृदय अर्थात भक्ति, मन अर्थात ज्ञान। जिनकी ऊर्जा वहां संगृहीत है, उन्हें ध्यान की कुछ विधि दूंगा; उन्हें चिंतन-मनन-निदिध्यासन की कोर्इ विधि दूंगा।

संन्यास सिर्फ शुरुआत है – भक्ति की नहीं – संन्यास शुरुआत है परमात्मा की तरफ जाने की। तुमने संकल्प किया कि अब जाता हूं, यात्राा पर निकलूंगा, तुमने पाथेय तैयार कर लिया, तुमने अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया, तुम आकर गांव के द्वार पर खड़े हो गए। संन्यास महाप्रस्थान है। अब तीन रास्ते निकलेंगे। जिस दिन तुमने तय कर लिया कि जाना है उस यात्राा पर, प्रभु को खोजना है, फिर तीन रास्ते निकलेंगे। फिर संन्यासी तीन हिस्सों में विभाजित हो जाएंगे। इन तीनों का मिलन होगा अंतिम दिन फिर, लेकिन बीच में कहीं मिलन न होगा। इनके रास्ते बीच में कभी नहीं कटेंगे।

जो भक्ति के मार्ग से गया है, उसे पता ही नहीं चलेगा कि ज्ञानी का रास्ता कहां है, और ज्ञानी कहां खो गया है। जो कर्म के मार्ग से गया है, उसे भक्ति की भाषा समझ में नहीं आएगी। जो ज्ञान के मार्ग से गया है, उसे भी कर्म और भक्ति दुरूह मालूम पड़ेंगी, असंभव मालूम पड़ेंगी। भीतर उसके यही ख्याल होगा कि ये लोग भटक गए, मैं पहुंच रहा हूं। तीनों जानेंगे कि मैं पहुंच रहा हूं, बाकी दो भटक गए। क्योंकि बाकी दो दिखते ही नहीं रास्ते पर कहीं। लेकिन अंतिम घड़ी में फिर मिलन है। प्रस्थान के पूर्व तीनों एक जगह खड़े होते हैं, और जब यात्राा पूरी हो गर्इ तब तीनों फिर एक शिखर पर पहुंच जाते हैं।

– ओशो

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