“ओशो की उपस्थिति का अनुभव ! ” – ओशो शैलेन्द्र

“ओंकार रूपी, विदेही परमगुरु”

प्रश्न- परमगुरु ओशो ने कहा है कि शरीर से मुक्त होकर मैं पहले से भी ज्यादा तुम्हें उपलब्ध हो जाऊँगा। उनकी उपस्थिति किस भांति अनुभव होती है?

सर्वाधिक सूक्ष्म, ओंकार-संगीत के रूप में अनुभव होती है।
और यह सिर्फ ओशो की ही बात नहीं, सभी सदगुरुओं के संबंध में सच है। जब वे देह त्याग देते हैं तो देह रूपी पिंजड़े के भीतर जो आलोकमय ओंकार रूपी चैतन्य पंक्षी बन्द था, वह मुक्त हो जाता है शरीर की सीमा से। और तब वे सर्वव्यापी जागतिक ओंकार-नाद के साथ एकात्म हो जाते हैं। तब सदगुरु निराकार परमात्मा हो जाते हैं। जब देह में थे तो एक सीमा थी, एक आकार था, एक विशेष रूप था; अब वह रूप खो गया, सीमा भी विलीन हो गर्इ। सच पूछो तो ओशो ने अपना जो नाम चुना है, वह ओशनिक एक्सपीरियेन्स यानी सागरीय अनुभव से लिया है। यानि व्यक्ति बूंद की भांति अब नहीं रहा, सागर की तरह हो गया, फैलकर विराट हो गया। बूंद की तो एक छोटी सी सीमा थी। अब वह सीमा खो गर्इ। कोर्इ रूप, कोर्इ आकृति ना रही। बूंद बूंद ना रही, सागर हो गर्इ। पूरे सागर में उस बूंद की उपस्थिति महसूस की जा सकती है। अब वह सर्वव्यापक हो गर्इ- ‘ओमनी-प्रेजेन्ट’ यानी ओम की तरह प्रेजेन्ट। पंतजलि योग सूत्र पर बोलते हुए प्रवचन नं 15, 16, 17 और 18 में स्वयं ओशो ने इस सम्बन्ध में कुछ बातें कही हैं। विशेष रूप से उन्होंने उल्लेख किया हैं कि देह छोड़ने के बाद सदगुरु की उपस्थिति से संबंधित।

तीन बातें समझ लें। एक तो शिक्षक-विधार्थी का सम्बन्ध होता है। दूसरा गुरु-शिष्य का सम्बन्ध होता है। और तीसरा गुरु का सम्बन्ध गुरुओं के गुरु से होता है। इस प्रवचन का उन्होंने शीर्षक रखा है- ‘दि मास्टर आफ दि मास्टर्स’ ‘गुरुओं के गुरु’ या दूसरे शब्दों में कह लें परम गुरु। पंतजलि का सूत्र है कि देह त्यागने के बाद सदगुरु गुरुओं के गुरु बन जाते हैं, वे ओंकार स्वरूप हो जाते हैं; और उनसे जुड़ने के लिए ओम का स्मरण करना चाहिए। ओम पर ध्यान दो, ओम में डूबो।

आश्चर्य की बात है, मैं इतने हजारों संन्यासी मित्राों से मिलता हूँ, और उनसे पूछता हूं कि आप ओशो की उपस्थिति किस रूप में अनुभव करने की कोशिश करते हैं? उन्हें कुछ भी पता नहीं है, इस मामले में बिल्कुल ही अन्धेरा छाया हुआ है। जबकि स्वयं ओशो ने खूब विस्तार से वर्णन किया है। मैं चाहूँगा कि सभी संन्यासी मित्रा ओशो के ये चार प्रवचन अवश्य पढ़ें- पंतजलि योग सूत्र भाग 1 के प्रवचन नंबर 15 से लेकर 18 तक। ताकि आपको पता हो कि आप जिस सदगुरु से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, अब वह कहां हैं, किस रूप में है , उनसे जुड़ने का अर्थ क्या है और उनसे जुड़ने की विधि क्या है? पंतजलि ने खूब अच्छे से समझाया है कि ओम को जपो, ओम पर ध्यान दो और ओम में डूबो। क्योंकि सदगुरु देह त्यागने के बाद अनहद-नाद हो जाते हैं। वे ओम का प्रकाश हो जाते हैं। यह नाम आपने सुना होगा? हमारे मुल्क में बहुत कामन नाम है ओमप्रकाश। कभी आपने ख्याल नहीं किया होगा ओमप्रकाश का अभिप्राय क्या है- ओंकार की रोशनी। ओंकार के दो रूप मुख्य हैं- एक ध्वनिमय रूप, एक प्रकाशमय रूप। गोरखनाथ पर प्रवचन देते हुए ‘मरौ हे जोगी मरौ में ओशो समझाते हैं गोरखनाथ का यह प्यारा वचन- ‘शब्द भया उजियाला।’

वह जो भीतर शब्द गूंज रहा हैं ओंकार का, जैसे वह प्रकाशित हो जाए, ऐसी अदभुत घटना घटती है। शब्द भया उजियाला। भीतर का अनाहत शब्द दो रूपों में प्रगट होता है- स्वर व उजाले की तरह। अशरीरी सदगुरु भी उसी आलोकित शब्द में समा जाते हैं। कबीर ने कहा है-
‘बूंद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाए’
सीमित बूंद असीमित सागर हो गर्इ। ओशनिक एक्सपीरियेन्स हुआ, अब वह ओशो हो गर्इ। ओंकार के सागर में समाकर स्वयं सागर हो गर्इ। अत: सदगुरु से जुड़ने के लिए शिष्य को ओंकार के श्रवण में डूबना होगा। ओंकार की साधना करनी होगी।

बहुतेरे मित्रा मुझ पर आरोप लगाते हैं कि यहाँ समाधि कार्यक्रमों में जो सिखाया जा रहा है वह ओशो की देशना से कुछ हटकर है। नहीं, बिल्कुल भी हटकर नहीं है। शायद आपने ओशो को ठीक से सुना-पढ़ा नहीं। या फिर आपने ओशो को समझा नहीं। आप बिना जाने ही ओशो की अदृश्य उपस्थिति से जुड़ने का प्रयास कर रहे हो, बिना समझे कि ओशो ने क्या कहा है? यहाँ इन समाधि कार्यक्रमों में जो सिखाया जा रहा है वह ठीक ओशो की मूल देशना है।

ओशो ने ‘योगा: दि अल्फा एंड दि ओमेगा’ के पन्द्रवे प्रवचन में यह भी समझाया है कि जब कोर्इ गुरु शरीर से विदा हो जाता है तब भी वह अपने शिष्यों को मदद पहुँचाने की कोशिश करता है। पहले से भी ज्यादा अच्छे से मदद कर सकता है। क्योंकि पहले तो वह सीमित था एक जगह, एक शरीर में। अब वह सर्वव्यापी हो गया। सारी दुनिया में काम कर सकता है, सब के ऊपर, एक साथ। क्योंकि वह समय और स्थान के पार चला गया है। ओशो ने एक उदाहरण दिया है कि गुरजियफ की मृत्यु के बाद गुरजियफ की परम्परा में कोर्इ भी सम्बुद्ध शिष्य ना हो पाया। आस्पेंस्की बुद्धत्व के बिल्कुल निकट था, लेकिन वह भी पूर्णरूप से ना जाग सका। वह दूसरा जन्म लेने की प्रतीक्षा में है, लेकिन वह अभी जन्म नहीं ले पाया। शायद लम्बा वक्त लगे। तब तक के लिए गुरिजयफ की श्रृंखला टूट गर्इ। गुरिजयफ की परम्परा में कोर्इ जीवित गुरु नहीं है। ओशो ने कहा- इसलिए गुरिजयफ अपने सारे शिष्यों को मेरे पास भेज रहा है। उन शिष्यों को खुद नहीं पता होगा कि वे कैसे मेरे पास आए? उनसे पूछोगे तो वे बहुत ही स्थूल कारण बताएंगे।

समझो कोर्इ आदमी जर्मनी से आया। उससे पूछो कि कैसे आए? तो वह कहेगा कि मैं एक बुक-स्टोर में गया था। किताबें देख रहा था। एक किताब पर छपे फोटोग्राफ को देखकर मैं आकर्षित हुआ। वह किताब मैंने उठा ली, खरीद ली। घर आकर उसको पढ़ा। वह भगवान श्री रजनीश की पुस्तक थी। पढ़कर मैं बहुत प्रभावित हुआ। मैंने पता लगाया कि यह व्यक्ति कहां रहते हैं? इस प्रकार मैं पूना आश्रम चला आया। यहां ध्यान-साधना की, खूब आनन्द आया। फिर भाव उठा संन्यास लेने का और मैं ओशो का संन्यासी हो गया हूं।

ऐसी कोर्इ कहानी वह व्यक्ति सुनाएगा। ओशो कहते हैं कि असली कहानी कुछ और है। वह व्यक्ति गुरजियफ का शिष्य था। गुरु के देह-त्यागने तक वह अपनी मंजिल को, बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं कर सका। गुरजियफ उसकी मदद कर रहा है। वह व्यक्ति भी नहीं जानता कि कौन उसको उस बुक-स्टोर में ले गया और उस किताब पर ही उसकी नजर क्यों पड़ी? और उस चित्रा ने आकर्षित क्यों किया? गुरजियफ उसके अन्दर से प्रेरणा जगा रहा है। सूक्ष्म जगत से निर्देश भेज रहा है। वह व्यक्ति नहीं जानता लेकिन उसे कोर्इ मार्ग-दर्शन दे रहा है। गुरजियफ यह प्रयास कर रहा है कि इस वक्त धरती पर जो बुद्धपुरुष हैं उनके पास अपने शिष्यों को भेज दे। इस तरह गुरजियफ ने अपने शिष्यों को ओशो के पास भेजा। वे गुरजियफ की प्रेरणा से ही आए और यह कोर्इ नर्इ घटना नहीं है, ऐसा सदा-सदा होता रहा है।

यदि उस परम्परा में उस सदगुरु के शिष्य एनलाइटैंन्ड नहीं हो पाते, अगर वह धारा आगे नहीं बहती, टूट जाती है, जैसा की महावीर के बाद जैनों की धारा टूट गर्इ। चौबीसवें तीथकर के बाद फिर कोर्इ व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ, महावीर जिसको सन्देश दे सकें, जिसके माध्यम से काम कर सकें। सिक्ख गुरुओं में दस गुरुओं के बाद धारा टूट गर्इ। ग्यारहवां कोर्इ मौजूद नहीं था जो प्रवाह को आगे बढ़ा सके। सभी परम्पराएं एक ना एक दिन टूट जाती हैं। गुरजियफ के तुरंत बाद ही कोर्इ अगला व्यक्ति मौजूद नहीं था; दूसरा तीर्थंकर भी नहीं था। जैनियों के तो चौबीस तीर्थंकर हुए, सिक्खों के तो दस गुरु हुए तब धारा टूटी। गुरजियफ ने जो काम किया, वह एकदम से अधूरा छूट गया। गुरजियफ अपने शिष्यों को ओशो के पास जाने का इशारा किया। इसके बाद गुरजियफ की जिम्मेवारी समाप्त हो जाती है। यह भी स्मरणीय है। गुरजियफ ने अपना वह काम कर दिया जो शेष बचा था, उसने अपना वचन सूक्ष्म-लोक में पहुँच कर भी निभाया। लेकिन अब शिष्य की जिम्मेवारी है कि वह क्या करता है? हो सकता हैं कि वह ओशो के पास पहुँचे और फिर भी संन्यस्त ना हो। उसका अहंकार बीच में आ जाए। सोचे कि मैं तो गुरजियफ का प्रेमी हूँ, किसी अन्य का शिष्य कैसे बन जाऊँ? उसका अहंकार अगर दीवाल बन जाएगा तो फिर बात ना बनेगी। लेकिन तब गुरजियफ की जिम्मेवारी समाप्त हो गर्इ। अब गुरजियफ इस व्यक्ति के लिए रिसपौनिसबल नहीं है। अब यह स्वयं अपना उत्तरदायित्व संभाले।

सभी सदगरू इस प्रकार से मदद पहुँचाते हैं। उनकी उपस्थिति ओंकार स्वरूप होती है– यह सूक्ष्म बात समझें। स्थूल बात की पहले चर्चा हो गर्इ- उत्सवरूपी, आनन्दरूपी और प्रेमरूपी मौजूदगी। सूक्ष्मतर बात हुर्इ सुगन्धमय, खुमारी रूपी, र्निभार-चैतन्यरूपी मौजूदगी। अति-सूक्ष्म बात पंतजलि ने कही कि देह त्यागने के बाद सदगुरु प्रणव-स्वरूप हो जाते हैं। ओशो होने का यही अर्थ है। सीमित बूंद ना रहे, असीम, अनंत, अरूप, निराकार, विराट सागर हो गए। स्वयं परमात्मा ओम-स्वरूप हैऋ उसके साथ वे भी एकात्म हो गए। उस ‘एक ओंकार सतनाम’ में डूब गए, विलीन हो गए।

उपरोक्त प्रवचन में एक और अदभुत बात ओशो ने समझार्इ कि कोर्इ भी बुद्धपुरुष नया धर्म शुरू करना नहीं चाहता। लेकिन मजबूरी की स्थिति पैदा हो जाती है। पुराने धर्म मानने वाले लोग उसे स्वीकार नहीं करते। जीसस क्राइस्ट कोर्इ नया धर्म- र्इसार्इ धर्म शुरू करना नहीं चाहते थे। वे स्वयं यहूदी जन्मे थे। यहूदी की भांति जीए और मरे। उनके मन में ऐसी कोर्इ भावना न थी कि नया धर्म शुरू किया जाए। क्योंकि वे जो कुछ भी कह रहे थे, पुराने यहूदी धर्मगुरुओं की आज्ञा से ही कह रहे थे। सूक्ष्म लोक से उन्हें पुराने यहूदी पैगम्बरों से निर्देश मिल रहे थे। लेकिन संदेश समयानुसार बदल जाते हैं। युग बदलता है, लोगों की समस्याएं बदल जाती हैं, लोगों का मनोविज्ञान बदलता है। भिन्न-भिन्न देश व काल के अनुसार व्यक्तियों व परिसिथतियों को देखकर नए समाधन देने पड़ते हैं।

निशिचत रूप से जीसस कुछ ऐसी बातें कह रहे थे जो पुराने यहूदी पैगम्बरों ने नहीं कहीं। लेकिन वे ही पैगम्बर जीसस से कहलवा रहे थे कुछ नर्इ बातें। क्योंकि जीसस का समय आते-आते बात बहुत बदल गर्इ। हजरत मूसा जब हुए थे, तब खूंखार और जंगली किस्म के लोग थे, बहुत बर्बर, आदिम। उस समय र्इश्वर की जो धरणा थी बड़ी इर्शालू और हिंसक किस्म की धरणा थी। पुरानी बाइबिल कहती है कि परमात्मा तुम्हारा चाचा नहीं लगता। ईट का जवाब पत्थर से देगा। तुम एक आँख फोड़ोगे किसी की वह तुम्हारी दोनों आँखें फोड़ देगा। अनन्त काल तक नरक में सड़ाएगा। अन्तहीन तड़फाएगा। परमात्मा तुम्हारा चाचा नहीं है कोर्इ… ऐसा था पुरानी बाइबिल का र्इश्वर, शैतान जैसा ज्यादा। और जीसस कहने लगे कि परमात्मा प्रेम है। गाड इज लव। परमात्मा करुणावान है, अगर तुम प्रायशिचत करो, वह तुम्हें क्षमा कर देगा। यह तो बात बिल्कुल विपरीत हो गर्इ। लेकिन मूसा जिन लोगों से बात कर रहे थे; वे केवल हिंसा की भाषा समझ सकते थे। वे बड़े खूंखार, जंगली, असंस्कृत किस्म के लोग थे। जीसस का समय आते-आते थोड़ी सम्यता विकसित हुर्इ। लोग जरा प्रेमपूर्ण हुए, थोड़ी चेतना का विकास हुआ। तब इनको डराने की जरूरत न रही। इनको प्रेम से समझाया जा सकता है कि परमात्मा करुणावान है। कोर्इ बात नहीं… तुमसे भूलचूक हो गर्इ, ठीकऋ तुम क्षमा मांग लो। वह क्षमा कर देगा। लेकिन यहूदियों को लगा कि र्इसा उनके ग्रन्थ के खिलाफ बोल रहे हैं।

ओशो ने समझाया है कि माना र्इसा धर्मग्रन्थ के तो खिलाफ बोल रहे हैं लेकिन मूसा और अन्य पैगम्बरों की आज्ञा से ही बोल रहे हैं। वे सूक्ष्म लोक से जो निर्देश दे रहे हैं, जीसस उन्हीं का पालन कर रहे हैं; कोर्इ नर्इ बात अपनी तरफ से नहीं कह रहे हैं। लेकिन जो पंडित हैं, पुरोहित हैं, यहूदी धर्म के रबार्इ हैं, वे कैसे मानेंगे? वे कहेंगे कि बताओ किस किताब में ऐसा कहा है कि प्रभु प्रेमपूर्ण व क्षमाशील है? किस शास्त्र में लिखा है?

शास्त्र में तो कहीं नहीं लिखा। कोर्इ प्रमाण नहीं है जीसस के पास। सिद्ध नहीं कर सकते, लेकिन वह जो कह रहे हैं यहूदी पैगम्बरों के मार्ग निर्देशन में ही कह रहे हैं। मजबूरी में जब यहूदी उन्हें स्वीकार नहीं करते तो एक नए धर्म की रचना होती है, र्इसार्इ धर्म दुनिया में आता है। लेकिन यह लाचारी की बात है। जीसस ने कभी ऐसा नहीं चाहा। कोर्इ सदगुरु नहीं चाहता कि नए धर्म की शुरूआत हो। लेकिन मजबूरी में करनी पड़ती है।

जरा सोचो ओशो जैन परिवार में पैदा हुए और वे कहने लगें कि मैं पच्चीसवाँ तीर्थंकर हूँ तो क्या जैन इसे स्वीकार कर पाएंगे? कतर्इ नहीं, वे भूल जाएंगे कि ‘अहिंसा परमो धर्म:’ इत्यादि के सिद्धांत । तलवारें-बंदूकें निकल आएंगी, हत्या ही कर देंगे वे। यह स्वीकार ना कर सकेंगे कि कोर्इ पच्चीसवां तीर्थंकर हो सकता है। वे तो यह भी नहीं स्वीकारते कि इस पंचम काल में कोर्इ व्यक्ति चौथे गुणस्थान तक जा सकता हैं। यह सम्भव नहीं, बुद्धत्व तो बहुत दूर की बात है। महावीर ने बताये हैं चौदह गुणस्थान, साधना के 14 पड़ाव। बुद्धत्व तो बहुत दूर की बात है, अन्त में आता है। जैन तो कहते हैं चौथे पड़ाव तक भी कोर्इ नहीं जा सकता इस पंचम काल में; फिर कोर्इ व्यक्ति तीर्थंकर कैसे हो सकता है? कोर्इ भी धर्म स्वीकार करने को राजी नहीं होता नए बुद्धपुरुष को। तब उस मजबूरी की सिथति में एक नए धर्म की शुरूआत होती है, एक नर्इ धारा जोड़नी पड़ती है। यह बिल्कुल लाचारी की अवस्था है।

तो स्मरण रखें कि विदेही सदगुरु की उपस्थिति ओंकार-रूपी होती है, हम समाधि में डूबकर उनसे जुड़ते हैं। वे नाद-नूर स्वरूप हैं, प्रकाशमय संगीत हैं। यहां सुरति समाधि में, निरति समाधि में जो सिखाया जा रहा है, वह सदगुरु की उस अलौकिक सूक्ष्म उपस्थिति से जुड़ने का मार्ग है। सभी सदगुरु उस एक परमात्मा में ही समा जाते हैं। वहां सारी बूंदें अलग-थलग नहीं रहतीं। ऐसा नहीं हैं कि महावीर की बूंद अलग है, बुद्ध की बूंद अलग है, ओशो की बूंद अलग है। अब बूंदें, बूंदें ना रही, सब सागर में समा गई और सागर ही हो गईं ।

– ओशो शैलेन्द्र

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