“दुख से महासुख की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

“गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य”

प्रश्न : आज से ढार्इ हज़ार साल पहले, गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य प्रतिपादित किए थे, तब से आज तक चिन्तन, दर्शन, विज्ञान में खूब प्रगति हुर्इ है। ओशो का विराट चिन्तन भी अब उपलब्ध है। आपकी दृष्टि में, आज के मनुष्य के लिए जीवन के आर्य सत्य क्या हैं?

गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य
गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य प्रतिपादित किए-जीवन दुख है, दुख का कारण है, दुख दूर होने की संभावना है और दुख दूर करने का उपाय आष्टांगिक मार्ग है। गौतम बुद्ध मजिझम निकाय (मध्यमार्ग) के प्रवर्तक रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि गौतम बुद्ध ने अपने चार आर्य सत्यों के प्रतिपादन में मध्य की तो बात की ही लेकिन कुछ महत्वपूर्ण था जो शुरू में जोड़ा जाना चाहिए था, वह छूट गया और कुछ महत्वपूर्ण था जो अंत में जोड़ा जाना चाहिए था, वह भी छूट गया। आदि और अंत की बात नहीं हो पार्इ, केवल मध्यकी बात हो पार्इ। कारण यह भी हो सकता है कि वह भिक्षुओं से बात कर रहे थे, जिनके लिए वैराग्य एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयाम था। ‘जीवन दुख है ऐसा कहकर ही वैराग्य की ओर आकर्षित किया जा सकता था। लेकिन गौतम बुद्ध के बाद धर्म ने दिशा बदली, आयाम बदला। अध्यात्म ने भी दिशा बदली, आयाम बदला। लेकिन आज अध्यात्म केवल भिक्षुओं के लिए नहीं है। ओशो ने अध्यात्म को सबके लिए उपलब्ध कर दिया। इसलिए अब ओशो के बाद, आर्य सत्य को केवल दुख और उससे संबंधित नहीं कहा जा सकता और जीवन का आर्य सत्य केवल भिक्षुओं का आर्य सत्य नहीं हो सकता। इसलिए ओशो के बाद अगर जीवन का आर्य सत्य प्रतिपादित करना हो तो समग्र जीवन की बात करनी होगी। अगर आज जीवन के सत्य प्रतिपादित करने हों तो मैं कुछ अन्य तरह से जीवन के आर्य सत्य प्रतिपादित करना चाहूंगा।

पहला आर्य सत्य:
अगर आज जीवन के चार आर्य सत्य कहने हों तो पहला आर्य सत्य होगा – जीवन की अपनी आवश्यकतायें हैं जिनकी पूर्ति के लिए कर्म आवश्यक है। जीवन है तो जीवन की आवश्यकतायें हैं। हम कर्म क्यों करते हैं। क्योंकि कुछ हमारी आवश्यकतायें हैं और संत हो कि संसारी हो, कर्म सबको करना पड़ेगा।
आवश्यकताओं पर सबसे ज्यादा काम हमारे युग के सबसे बड़े मनोविज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने किया। उसने सात आवश्यकतायें प्रतिपादित की। ओशो ने मैस्लो द्वारा प्रतिपादित आवश्यकताओं की चर्चा की है। खूब मनोविज्ञानिक ढंग से मैस्लो ने अपनी किताब ‘मोटिवेशन ऐंड पर्सनालिटी’ में इन आवश्यकताओं की चर्चा की है। और एक क्रांतिकारी बात है कि हर व्यक्ति कुछ कर्म करेगा। गीता में अर्जुन पूछता है कृष्ण से कि हम कर्म क्यों करें। कृष्ण बहुत संतुष्ट नहीं कर पाते है अर्जुन को। कहते हैं कर्म तो करना ही पड़ेगा कुछ न कुछ। इसलिए अर्जुन, कुछ न कुछ करना ही है, तो तुम भी कुछ करो। यह तो कोर्इ उत्तर न हुआ। ठीक-ठीक उत्तर मैस्लो देता है। कहता है हमारी आवश्यकतायें है, इसलिए हम कर्म करते हैं। क्या आवश्यकतायें हो सकती हैं?

पहली आवश्यकता, कुछ हमारी भौतिक आवश्यकतायें है, इस शरीर की आवश्यकताए हैं, भोजन की आवश्यकता है। हमारा ऋषि कहता है कि हमारे अंदर बुभुक्षा है-भोजन की इच्छा है, भूख है। दूसरी आवश्यकता भोग की आवश्यकता है, जिसको मैस्लो कहता है – सेक्स नीडस । जिसे हमारा ऋषि कहता है कि बुभुत्सा है-भोग की इच्छा। तीसरी आवश्यकता हमारा ऋषि कहता है जिजीविषा है-जीने की इच्छा है। जिसको मैस्लो कहता है-सुरक्षा की आवश्यकता, सेक्युरिटी एण्ड सेफटी नीडस। फिर चौथी आवश्यकता है-मैस्लो कहता है प्रेम की आवश्यकता, लव नीडस। हमारा ऋषि कहता है प्रेमाकांक्षा। पांचवी आवश्यकता मैसलो कहता है – बिलौंगिंगनेस नीडस -मित्रााकांक्षा। फिर छठी आवश्यकता है। मैस्लो कहता है-एसटीम नीड। हमारा ऋषि कहता है महत्वाकांक्षा। हम केवल किसी का होकर नहीं रह जाना चाहते, बल्कि वहां हमें महत्व मिले। कोर्इ हमें महत्व दे। इसके लिए हम कर्म करना चाहते हैं -यश की आकांक्षा। और फिर सांतवीं आकांक्षा जिसकी ओर मैस्लो इशारा करता है-कहता है-सेल्फ ऐक्चुअलाइजेशन (self Actualization) । जो प्रतिभा हमारे भीतर छुपी है वह पूरी तरह खिल जाए। जो हम होने को आए हैं, जो हमारे बीज रूप में पड़ा है-वह पूरा खिल जाए, इसके लिए भी हम कर्म करते हैं। यश नहीं चाहिए अब उसे, अब उसे प्रेम नहीं चाहिए। क्योंकि यह नीचे की आवश्यकतायें हैं। नीचे तल की आवष्ठश्यकता अब करीब-करीब उसकी पूरी हो चुकी हैं। और अगर चाहिए भी तो उस पर वह संतुष्ट नहीं है अब। अब जो उसके भीतर एक आविष्कारक है-अब उसको पूरे रूप में वह खिलाना चाहेगा। मैस्लो यहां तक कहता है कि जैसे कोर्इ संत, जैसे कोर्इ बुद्ध, जैसे कोर्इ महावीर, जैसे कोर्इ ओशो, कर्म तो ये भी करते हैं। क्यों करते हैं? क्योंकि भीतर जो एक प्रतिभा है-अध्यात्मिक प्रतिभा कह लो, वह भी अपनी पूरी खिलावट में तभी प्रकट हो पाएगी जब भीतर का जो सदगुरु छिपा है, वह पूर्ण खिलावट में प्रकट हो जाएगा। हमारा ऋषि इसको मुमुक्षा कहता है – मुक्ति की इच्छा कहता है। इसके कारण भी हम कर्म करते हैं।

इसलिए पहला आर्य सत्य जो मैं कहना चाहूंगा-कि जीवन की अपनी आवश्यकतायें हैं, जिनकी पूर्ति के लिए कर्म आवश्यक है। इसलिए जब भी कर्म करो तो यह ख्याल रखो कि जीवन की सात आवश्यकतायें हैं-जिनकी चर्चा अभी-अभी हमने की है, इनकी पूर्ति के लिए हम कर्म करते हैं।

दूसरा आर्य सत्य:
जब पहले आर्य सत्य पर तुम सहमत हो, तब दूसरे आर्य सत्य की चर्चा की जा सकती है। दूसरा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा-कर्म कामना पैदा करता है, जो दुख का कारण है। कामना का अर्थ हुआ कि किसी खास उद्देश्य के लिए कर्म करते हैं, लेकिन फल उद्देश्य के अनुसार हो, इसका नाम कामना है। सामान्यत: हम यह सोचते हैं कि कामना हमें कर्म में ले जाती है, लेकिन बात ठीक उल्टी है। कामना कर्म में नहीं ले जाती, आवश्यकता कर्म में ले जाती है और कर्म कामना में ले जाता है। पहले कर्म फिर कामना। सामान्यत: हम सोचते हैं कि पहले कामना और फिर कर्म। लेकिन ऐसा है नहीं। पहले आवश्यकता, फिर कर्म और कर्म के बाद कामना। क्योंकि हम सोचते हैं कि हमारा उद्देश्य पूरा हो, जिस उद्देश्य के लिए हम काम कर रहे हैं। जैसे मान लो, हम व्यापार कर रहे हैं, हमारा उद्देश्य है कि इसमें हमारा कुछ लाभ हो। तो पहले कर्म हमने शुरू किया और फिर उसके अनुसार यह कामना बनी कि जो हमारा उद्देश्य है-लाभ का उद्देश्य -यह पूरा हो।

तो दूसरा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा कि कर्म कामना पैदा करता है, जो दुख का कारण है। दुख का कारण यही कामना है। कर्म दुख का कारण नहीं है। कोर्इ दूसरे तुम्हारे दुख के कारण नहीं हैं। बल्कि यह जो कामना है-ये जो हमारे उद्देश्य के अनुसार फल मिले-यह कामना ही हमारे दुख का कारण है।

कृष्ण इसलिए जब कहते हैं-निष्काम कर्म योग, तो बस इतनी सी बात कहते हैं कि उद्देश्य तो रखो कर्म का, लेकिन यह कामना मत रखो कि फल तुम्हारे उद्देश्य के अनुरूप हो। अगर कृष्ण के अनुसार तुम कर्म करो तो तुम दुखी न होओगे। लेकिन कर्म करते तुम दुखी होते हो। और इसका कारण है तुम्हारा कर्म नहीं, बल्कि कर्म के साथ जुड़ी कामना । दूसरे शब्दों में कहना चाहो, तो कह सकते हो कि सकाम कर्म दुख का कारण है। निष्काम कर्म दुख का कारण नहीं है। तो इसलिए दूसरा आर्य सत्य-कर्म कामना पैदा करता है, जो दुख का कारण है।

तीसरा आर्य सत्य:
तीसरा आर्य सत्य है कि आष्टांगिक मार्ग दुख मुक्ति का उपाय है। गौतम बुद्ध ने जो आष्टांगिक मार्ग प्रतिपादित किया, निशिचत रूप से वह दुख से मुक्ति कर सकता है। क्या है आष्टांगिक मार्ग? गौतम बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग इतना वैज्ञानिक है कि इसमें बहुत ज्यादा परिवर्तन की अभी भी गुंजाइश नहीं है। हां, आज की भाषा के अनुरूप व्याख्या में थोड़ा परिवर्तन किया जा सकता है। लेकिन यह बात ठीक से हमें समझ लेना है कि दुख से मुक्ति का उपाय है आष्टांगिक मार्ग, लेकिन सुख लाने का उपाय आष्टांगिक मार्ग नहीं है। ओशोधारा के आनंदप्रज्ञा कार्यक्रम में अष्टांगिक मार्ग से परिचय कराया जाता है।

चौथा आर्य सत्य:
गौतम बुद्ध यहां रुक जाते हैं। आगे की बात अभी नहीं करते। क्योंकि मैंने कहा कि गौतम ने अपने आर्य सत्यों में मध्यकी बात कही है। थोड़ा शुरू में छोड़ दिया, थोड़ा अंत में छोड़ दिया। लेकिन सम समाधि कह करके इशारे तो कर दिए। इसलिए, निशिचत रूप से आज जीवन का आर्य सत्य – तीसरा-आष्टांगिक मार्ग दुख मुक्ति का उपाय है -यदि एक बार इस तीसरे आर्य सत्य से राजी हो -तो चौथा आर्य सत्य अब घोषित किया जा सकता है कि-सुख उपाय से नहीं मिलता, बल्कि जीवन की सहज अवस्था है। याद रखो कि यह, गौतम बुद्ध में एक नया जोड़ है। और आज के व्यक्ति के लिए जरूरी है। हम कर्म करते हैं-सोचते हैं कि कर्म से हमें सुख मिलेगा। किसी से भी पूछो कि तुम कर्म क्यों करते हो? गोस्वामी तुलसीदास से किसी ने पूछा कि आप रामायण क्यों लिखते हो? तुलसीदास ने कहा-‘स्वान्त:सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा।’ अपने सुख के लिए हमने रामचरित मानस की रचना की।

सारा संसार इस मृगमरिचिका में पड़ा है कि कर्म से सुख मिलता है। लेकिन कर्म से सुख मिलता नहीं। सुख बाहर से मिलने की चीज़ ही नहीं है। ‘सुखस्य दुखस्य नवकोपिदाता, परोददाति इति विमूढ़चेता।’ सुख बाहर से मिलता नहीं। इसीलिए चौथा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा कि सुख उपाय से नहीं मिलता, क्योंकि सुख बाहर से नहीं मिलता। अगर बाहर से मिलता हो, तो कुछ उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन सुख बाहर से मिलता नहीं। इसलिए सुख का कोर्इ उपाय नहीं हो सकता। सुख जीवन की सहज अवस्था है। जिसको ओशो कहते हैं-‘परमात्मा तुम्हारा स्वभाव है।’ सुख तुम्हारा स्वभाव है। ‘आनंद आमार गोत्रा, उत्सव आमार जाति।’ आनंद तुम्हारा बीज है। सुख तुम्हारा बीज है। सुख अभी, यहीं और अकारण है। याद रखना सुख का कोर्इ कारण नहीं है। दुख का कारण है। सुख का कारण नहीं है। दुख का कारण क्या है-कामना।

लेकिन सुख का कारण पूछो कि सुख का कारण क्या है? तो सुख का कोर्इ कारण नहीं है। सुख तुम्हारे भीतर मौजूद है। सुख अकारण है। अभी है और यहीं है। फिर भी सुख की तलाश हम सब करते हैं। लेकिन इस बात को ठीक से समझ लो कि सुख भीतर मौजूद है। सदा सर्वदा मौजूद है। जैसे तुम कुआं खोदते हो। तो कुए में पानी मौजूद है। कहीं से लाया नहीं जाता। तुम कहो कि हम खोद रहे हैं पानी लाने के लिए, तो नहीं। तुम खोद-खोद करके पानी लाते नहीं हो। बस केवल डिस्कवर करते हो। तो यूं कह सकते हो कि सुख एक डिस्कवरी है। सुख को केवल तुम अनावरित कर सकते हो। सुख तो सदा विधमान है। जरा सा भीतर मुड़ जाओ, सुख वहां मौजूद है। इसलिए संतों ने सदा सदा कहा है कि सुख बाहर नहीं, बल्कि भीतर मिलता है। कैसे मिलता है? कौन पा सकता है सुख को? जो जान लेता है कि सुख मेरा स्वभाव है। सुख का स्रोत मेरे भीतर है। सुख का केंद्र मेरे भीतर है। सुख का स्रोत तुम्हारे भीतर सिथत तुम्हारी आत्मा है, तुम्हारा ओंकार है, परमात्मा है। उसको जो नाम देना चाहो, तुम दे लो। लेकिन तुम्हारा जो मूलभूत स्वभाव है, बुद्ध प्रकृति कहो, इंडिविजुऐलिटी (individuality)कहो। बस वहां पर सुख विधमान है। और सुख का स्वभाव है, सुख की प्रकृति है कि सुख के स्मरण से सुख बढ़ता है। याद रखना-सुख बढ़ाने का एक ही उपाय है कि सुख का स्मरण करो। और दुख बढ़ाने का एक ही उपाय है कि दुख को स्मरण करो। दुख का स्मरण करने वाला दुखी रहता है और सुख का स्मरण करने वाला सुखी रहता है। यह क्रांतिकारी बात है।

– ओशो सिद्धार्थ

 

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One thought on ““दुख से महासुख की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

  • May 7, 2016 at 4:21 PM
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    Charno mein shat shat nama.

    Gurudev aaj jo hamri suvidhaoon ki andhi daud hai uske liye ham kya karein. Hamein jeevan mein aisa lagta hai jaise suvidhayein hain to sukh hai aur nahin hai to dukh hai. Aisi aasakti ki isthiti mein sadhak apne ko frustation se kaise bachaye. Hum kai sadhkon ke jeevan mein paryapt suvidhayein nahin hain aisi isthi mein ham dukhi hote hain.
    Kripaya margdarshan karein.

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