“जीवन एक रहस्य है,पहेली नहीं !” – ओशो

“Life is a Mystery not a Puzzle”

जीवन एक रहस्य है जिसे हम जीवन जानते हैं, जैसा जानते हैं, वैसा ही सब कुछ नहीं है। बहुत कुछ है जो अनजाना ही रह जाता है। शायद सब कुछ ही अनजाना रह जाता है। जो हम जान पाते हैं वह ऐसा ही है जैसे कोई लहरों को देख कर समझ ले कि सागर को जान लिया। लहरें भी सागर की हैं, लेकिन लहरों को देख कर सागर को नहीं समझा जा सकता। और जो लहरों में उलझ जाएगा वह सागर तक पहुंचने का शायद मार्ग भी न खोज सके। असल में जिसने लहरों को ही सागर समझ लिया, उसके लिए सागर की खोज का सवाल भी नहीं उठता।

जो दिखाई पड़ता है हमें वह जीवन के सागर पर लहरों से ज्यादा नहीं है। जो नहीं दिखाई पड़ता है वही सागर है। जो नहीं दिखाई पड़ता है वही वस्तुतः जीवन है। जो दृश्य है वह सब कुछ नहीं है, सब कुछ का अत्यंत छोटा सा अंश है। जो अदृश्य है वही सब कुछ है। लेकिन हम सब दृश्य पर ही अटक जाते हैं और अदृश्य तक नहीं पहुंच पाते हैं। जो ज्ञात है वह अणु भी नहीं है और जो अज्ञात है वह विराट है। लेकिन हम सब अणु को ही विराट समझ लेते हैं और जीवन की जो यात्रा विराट तक पहुंच सकती थी, वह अणु के इर्द-गिर्द ही घूम-घूम कर नष्ट हो जाती है।

जीवन रहस्य है, जब मैं ऐसा कहता हूं, तो मेरा मतलब है कि जितना ही हम जानेंगे उतना ही जानने को सदा और भी मुक्त और खुला हो जाएगा। जितना हम जान लेंगे उतने जानने से जीवन समाप्त नहीं होगा, बल्कि जितना हम जानेंगे उतना ही हमारे ज्ञान का अहंकार समाप्त हो जाता है। जो जितना ही जान लेता है उतना ही बड़ा अज्ञानी हो जाता है। इस जगत में अज्ञानियों के सिवाय ज्ञानी होने का भ्रम और किसी को भी नहीं होता। ज्ञानी को तो दिखाई पड़ने लगता है कि सब कुछ अज्ञात है, और मुझसे बड़ा अज्ञानी कौन! जितना ही हम जानते हैं उतना ही जान नहीं पाते, बल्कि जानने वाला ही धीरे-धीरे खो जाता है। जितना ही हम खोजते हैं, खोज पूरी नहीं होती, खोजने वाला ही समाप्त हो जाता है।

इसलिए कहता हूंः जीवन रहस्य है, मिस्ट्री है। जीवन पहेली नहीं है। पहेली और रहस्य में कुछ फर्क है। पहेली हम उसे कहते हैं जो हल हो सके। रहस्य उसे कहते हैं कि जितना हम हल करेंगे उतना ही हल होना मुश्किल होता जाएगा। पहेली उसे कहते हैं कि जिसकी सुलझ जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि पहेली को जान-बूझ कर उलझाया गया है। उलझन बनाई हुई है, निर्मित है। जीवन पहेली नहीं है। उसकी उलझन बनाई हुई नहीं है, निर्मित नहीं है। किसी ने उसे उलझाया नहीं है। सिर्फ सुलझाने वाले ही उलझन में पड़ जाते हैं। जीवन रहस्य है, उसका मतलब यह है कि सुलझाने की कोशिश की तो उलझ जाएगा। और अगर सहज स्वीकार कर लिया तो सब सुलझा हुआ है।

जीवन रहस्य है, उसका अर्थ यह है कि हम कहीं से भी यात्रा करें और कहीं की भी यात्रा करें, अंततः जहां हम पहुंचेंगे वह वही जगह होगी जहां से हमने शुरू किया था। जीवन रहस्य है का अर्थ यह है कि जो प्रारंभ का बिंदु है वही अंत का बिंदु भी है; और जो साधन है वही साध्य भी है; और जो खोज रहा है वही खोजा जाने वाला भी है।

इस रहस्य, इस जीवन की निश्चित ही कुंजी भी है,’सीक्रेट की’ भी है। उस कुंजी को समझने, खोजने के लिए हम यहां उपस्थित हुए हैं।

पहली बातः जो व्यक्ति विचार से खोजने जाएगा जीवन को, वह उलझा लेगा। विचार कुंजी नहीं है, कुंजी का धोखा है। कितना ही हम विचार करें, जितना हम विचार करेंगे उतना हम जीवन से दूर चले जाते हैं। जितना हम विचार करते हैं उतना ही सत्य से हमारा फासला बढ़ता चला जाता है। उन्हीं क्षणों में हम सत्य के निकट होते हैं जब हम विचार से बाहर होते हैं। जो विचार करेगा वह भटक जाएगा।

इसलिए इन चार दिनों में मैं आपको विचार करने को नहीं कहूंगा। इन चार दिनों में हम अनुभव करने की कोशिश करेंगे। थिंकिंग नहीं, विचार नहीं, एक्सपीरिएंस की, अनुभव की, अनुभूति की कोशिश करेंगे। अनुभूति ही कुंजी है। वे जो इस रहस्य को जानना चाहते हैं, खोलना चाहते हैं, उघाड़ना चाहते हैं, उनके लिए अनुभूति के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। लेकिन अत्यधिक अनुभूति की जगह हम विचार में उलझ जाते हैं। हम सोचने लगते हैं कि सत्य क्या है। हम सोचने लगते हैं कि जीवन क्या है। हम सोचने लगते हैं कि मृत्यु क्या है। हम सोचने लगते हैं…और जितना हम सोचते हैं उतना ही हम सिद्धांतों को तो पा लेते हैं, लेकिन सत्य को पाने से वंचित रह जाते हैं। सब सोचना अंततः सिद्धांत दे सकता है–मृत, मरे हुए। सब सोचना शास्त्र दे सकता है–मृत, मरे हुए। सब सोचना पहेलियां दे सकता है–खुद की बनाई हुई, खुद की सुलझाई हुई। लेकिन सोचने से कोई सत्य तक न कभी पहुंचा है, न कभी पहुंच सकता है।

– ओशो

[जो घर बारे अपना -1 ]

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