“मनुष्य बेचैन, परेशान क्यों है ?” – ओशो

मैं कौन हूं, यह प्रश्‍न पर का फड़फड़ाना है। यह उठता क्यों है। और जो ईमानदार है, मैंने कहा, उसे उठेगा ही। यह उठता इसलिए है कि यहां जो भी आदमी थोड़ा सोच- विचार करेगा, उसे एक बात समझ में आती है कि मैं यहां विदेशी हूं। यहां कुछ भी ऐसा नहीं लगता जिससे तृप्ति मिलती हो। ऐसा लगता है कि मैं किन्हीं और जल- स्रोतों का पीने का आदी रहा हूं, यहां का कोई जल तृप्त करता नहीं मालूम होता। ऐसा लगता है मैंने कुछ प्रेम के और रूप जाने हैं, यहां का कोई प्रेम संतुष्टि देता नहीं मालूम पड़ता। ऐसा लगता है मैंने कुछ और फूल देखे हैं, यहां के सब फूल फीके मालूम पड़ते, रंगहीन मालूम पड़ते हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि मैने कुछ शाश्वत का कभी अनुभव किया है। यहां हर चीज क्षणभंगुर मालूम होती है, पानी का बबूला मालूम होती है। चाहे याद न रह गई हो मुझे, चाहे उस लोक को खोए बहुत दिन हो गए हों। होमा पक्षी गिरते-गिरते आकाश से बहुत नीचे आ गया हो, जमीन पर आ गया हो ।

ऐसा ही समझो कि मानसरोवर का हंस उड़कर आ गया है और एक गंदी तलैया में बैठ गया है। उसे कुछ भी रुचेगा नहीं। पानी भी पिएगा, क्योंकि प्यास लगेगी तो पानी पीना ही पड़ेगा, लेकिन नाक- भौं सिकोडेगा। चाहे मानसरोवर भूल ही क्यों न गया हो, लेकिन फिर भी एक बात उसे खटकती रहेगी कि कुछ गड़बड़ है। जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है। जैसा है, इससे तृप्ति नहीं होती। एक बेचैनी, एक संताप उसे पकड़ा रहेगा। मानसरोवर का स्वच्छ जल जिसने पिया है, आज गंदी तलैया में बैठा है, जिसमें गांवभर की गंदगी आकर पड़ती है – बास भी आएगी उसे, गंदगी भी दिखाई पड़ेगी उसे, उसे बेचैनी भी अनुभव होगी। प्यास लगेगी तो पानी पीना भी पड़ेगा, यह भी सच है। आज तो मानसरोवर नहीं है तो पानी जो है वही पीना पड़ेगा। प्यास हो तो आदमी गंदी नाली का भी पानी पी लेगा। मरने से तो वही बेहतर है। अगर और कहीं रहने का कोई उपाय नहीं है तो कीचड़ में भी जी लेगा। मरने से तो वही बेहतर है। लेकिन कहीं न कहीं कोई न कोई स्वर कहता रहेगा : यह मेरा घर नहीं है। मैं यहां अजनबी हूं।

तुम्हारे मन में यह सवाल नहीं उठता रहा है। एक स्त्री को प्रेम किया और पाया कि कुछ कम है। एक पुरुष को प्रेम किया और पाया कि कुछ कम है। कौन पुरुष किस स्त्री को तृप्त कर पाया है। कौन स्त्री किस पुरुष को तृप्त कर पाई है। इसका मतलब क्या है। इसका इतना ही मतलब है: हमारे प्रेम का मापदंड कुछ बहुत बड़ा है, जिसकी वजह से कोई तृप्ति नहीं हो पाती। और क्या अर्थ है। हम किसी ऐसे बड़े सौंदर्य की अपेक्षा कर रहे हैं, जो यहां स्त्री – पुरुषों में होता ही नहीं। इसमें कुछ स्त्री – पुरुषों का कसूर नहीं। तलैया का क्या कसूर है, अगर गंदी है। तलैया तलैया है। तलैया ने कहा कब कि मैं मानसरोवर हूं। लेकिन हंस का भी क्या कसूर है, अगर तलैया से मन नहीं भरता। समझाता होगा अपने को। देखता होगा आसपास बतखों को – मजे से घूमते हुए, फिरते हुए, कीचड़ में आनंद मनाते हुए। और तड़पता भी होगा कि मुझमें कुछ गड़बड़ है। मैं ही कुछ गड़बड़ हूं। देखो बतखें कितना मजा कर रही हैं।

तुम देखते हो, यहां वृक्ष बेचैन नहीं हैं। यहां प्रशु – पक्षी बेचैन नहीं हैं। यहां सिर्फ मनुष्य बेचैन है। यहां चट्टानें बेचैन नहीं हैं। मनुष्य को छोड्कर सारी प्रकृति शांत है। सब ठीक है। जैसा होना था वैसा है। मनुष्य भर में एक तनाव है – एक गहरा तनाव है! जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है। और इस तनाव से दो रास्ते निकलते हैं – एक रास्ता राजनीति का और एक धर्म का। जैसा है वैसा नहीं है, तो मनुष्य सोचता है : वैसा करके दिखा दूं ! उससे राजनीति पैदा होती है। तो तलैया को मानसरोवर बना लें, और क्या करें, कीचड़ छांटें, तलैया को स्वच्छ करें। यही तो है सोशलिज्‍म, कम्यूनिज्म और दुनिया के सारे राजनीतिक सिद्धांत। आशा क्या है। आशा यह है कि किसी तरह हम ठीक कर लेंगे। वैसा कर लेंगे जैसी हमारी आकांक्षा है।

लेकिन तलैया तलैया है- और मानसरोवर नहीं हो सकती। इसलिए राजनीति हमेशा असफल होती है। यद्यपि अनंत – अनंत लोगों को प्रभावित करती है, लेकिन सदा असफल होती है। उसकी असफलता सुनिश्‍चित है।

कुछ भी उपाय करो, पृथ्वी आकाश नहीं हो सकती। और कुछ भी उपाय करो, आंगन की दीवालें मुक्ति का रस नहीं दे सकतीं। कुछ भी करो, पिंजड़े को कितना ही सजाओ, सोने से मढो, हीरे-जवाहरात लगाओ, पिंजड़ा पिंजड़ा है। ज्यादा से ज्यादा पंख फड़फड़ा सकते हो। और ज्यादा फड़फड़ाए तो पंख तोड़ लोगे। खुले आकाश का आनंद कहां?

जिस मनुष्य में थोड़ी भी ईमानदारी है, ईमानदार चिंतन है, उसे यह बात समझ में आए ज्यादा देर नहीं लगती कि मैं जो भी करता हूं उसी में अतृप्ति हाथ लगती है। धन की दौड़ में गया, धन पा लिया और फिर पाया कि कुछ नहीं मिला। धन की दौड़ भी स्वतंत्रता की दौड़ है।

समझना : धन पाकर आदमी स्वतंत्रता पाना चाहता है, मोक्ष पाना चाहता है। उसे ऐसी भ्रांति है कि धन होगा तो मेरे पास स्वतंत्रता होगी; जो चाहूंगा खरीदूंगा; जो चाहूंगा पहनूंगा जिस स्त्री से प्रेम होगा, विवाह करूंगा; जिस मकान में रहना है, वह मकान लूंगा; जिस कार में चलना है, वह कार लूंगा। धन होगा तो स्वतंत्रता होगी, चुनाव की सुविधा होगी।

निर्धन की तकलीफ क्या है?– चुनाव की सुविधा नहीं है। उसे इसी झोपड़ी में रहना होगा। वह लाख चाहे कि इस झोपड़े को बदल लूं, नहीं बदल सकता। धन ही नहीं है पास। उसे यही कपड़े पहने जिंदगी गुजारनी होगी। इससे बेहतर कपड़े नहीं हो सकते। उसे यही भोजन करना होगा सदा और एक बार ही भोजन करके दूसरी बार पेट को मारकर सो जाना पड़ेगा। सुविधा नहीं है, स्वतंत्रता नहीं है।

धन की आशा में आदमी सोचता है स्वतंत्रता हो जाएगी; जैसा करना है वैसा करूंगा। धन की दौड़ स्वतंत्रता की ही खोज है; यद्यपि भ्रांत खोज है। धन मिल जाता है, स्वतंत्रता नहीं मिलती। धन मिलकर यह पता चलता है : एक तरह की स्वतंत्रता मिली कि मैं चाहूं तो यह दुःख उठाऊं और चाहे तो वह दुःख उठाऊं। दुःख में चुनाव करने की स्वतंत्रता मिली। गरीब का दुःख बंधा-बंधाया होता है। वह वही-वही दुःख उठाता है रोज। अमीर नए-नए दुःख उठाता है, बस इतना ही फर्क होता है। गरीब उन्हीं कपड़ों में परेशान होता है, अमीर रोज-रोज नए कपड़ों में परेशान होता है। बस इतना ही फर्क होता है। गरीब उसी स्त्री के साथ सिर फोड़ता है, उसी पति के साथ सिर तोड़ती है स्त्री; अमीर नई-नई स्त्रियों के साथ सर फोड़ता है। बस इतना ही फर्क होता है। स्वतंत्रता मिलती है एक तरह की– एक नकारात्मक तरह की स्वतंत्रता! अब दुःख चुनने का उपाय है। इस बोतल में जहर पियो या उस बोतल से जहर पियो, स्वतंत्रता है। हजार तरह की बोतलें रख सकते हो, रंग-बिरंगी बोतलें, मगर जहर वही है।

गरीब-अमीर का फर्क क्या है? बस इतना ही फर्क है। न तो गरीब सुखी है न अमीर सुखी है। दोनों दुःखी हैं। इस पृथ्वी पर कोई सुखी नहीं है। इससे ही सबूत मिलता है कि यह पृथ्वी हमारा घर नहीं है। हम कहीं और से आते हैं। हम कहीं दूर से आते हैं। हमें भूल ही गया होगा अपना घर शायद। लेकिन कहीं दूर अचेतन की पर्तो में याद्दाश्त है! कहीं दूर हमारे भीतर छिपी हुई किसी तलहटी में अब भी पुरानी स्मृति जगती है, कोई दीया जलता है। उसी दीए से हम तौल रहे हैं।

जब भी कोई आदमी किसी के प्रेम में पडता है तो उसे प्रेयसी परमात्मा दिखाई पड़ती है, अपना प्रेमी परमात्मा दिखाई पड़ता है। जैसे-जैसे करीब आते हैं, बात गड़बड़ होने लगती है। जब बहुत करीब आ जाते हैं, तब पता चलता है कि साधारण से मनुष्य हैं। वही सब चूके, वही सब भूलें वही कमियां, वही सीमाएं, वही उपद्रव! एक प्रेम फिर असफल हुआ। मगर तुम्हारी यह आकांक्षा कैसी है? यह असंभव की आकांक्षा तुममें कहां से है? इसी आकांक्षा को जो समझ लेता है, वह ईमानदार है। उसकी दुनिया में क्रांति होनी शुरू हो जाती है।

राजनीति दुनिया को बदलने में लग जाती है और धार्मिक व्यक्ति अपने भीतर तलाश करने लगता है कि मैं उस मापदंड को खोजूं जो मेरे भीतर पड़ा है। उसी मापदंड में मेरी सारी कथा है और मेरे सारी कथा का राज है। मेरी असली आत्मकथा वहीं है। अगर मैं अपने भीतर उतर-उतर कर कुएं में सीढ़ी-सीढ़ी गहरे तक पहुंच कर उस जगह को पा लूं, जहां मेरा मापदंड पड़ा है कि सौंदर्य कैसा होना चाहिए, कि प्रेम कैसा होना चाहिए, कि मैं आनंद किसको कहूंगा, कि जीवन क्या है, मैं किस बात से तृप्त हो सकूंगा, उसका आधार क्या है मेरे भीतर, मापदंड क्या है, मूल्यांकन क्या है, तराजू कहां है– जो व्यक्ति अपने भीतर उसको, उस तराजू को खोज लेता है, वह चकित हो जाता है। उस तराजू को खोजते ही उसे याद अपने घर की आनी शुरू हो जाती है।

– ओशो

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