“संतोष क्या है ?” – ओशो

मन रे, करु संतोष सनेही! [-रज्जब]

यह तो हम दोहराते हैं खुद ही—संतोषी सदा सुखी। यह तो हम सब जानते ही हैं। मगर जानते कहाँ हैं? सुना है, पकड़ भी लिया है, तोतों की तरह दोहरा भी लेते हैं, मगर जानते कहाँ हैं? यह हमारे अनुभव की संपदा नहीं है, यह हमारा धन नहीं है—यही हमारा धन होता तो हमारे जीवन की रौनक और होती, गरिमा और होती। जंजीरें न होतीं, नृत्य होता। ऑंखों में अंधेरा न होता, रोशनी नाचती। यह सारा आकाश तुम्हारा ऑंगन होता। यह सारा अस्तित्व अपने रहस्यों को तुम पर लुटाता। लेकिन वह तो नहीं हो रहा है। टटोल रहे हैं, अंधे की तरह, अंधी गुफाओं में। जिनको हम जीवन कह रहे हैं, अंधे संबंधों में—जिनको हम प्रेम कहते हैं—टटोल रहे हैं, तलाश चल रही है; हाथ कभी कुछ लगता नहीं, फिर भी टटोल जारी रहती है। हाथ कभी कुछ लगेगा भी नहीं। लेकिन हाथ न भी लगे तो भी क्या करें, टटोलना तो जारी रखना ही पड़ेगा, एक मजबूरी है। टटोलने में कम—से—कम एक आशा बनी रहती है कि आज नहीं तो कल मिलेगा, कल नहीं तो परसों मिलेगा—उलझे तो रहते हैं कम—से—कम, व्यस्तता तो बनी रहती है।

तुम्हारा सारा जीवन का उपक्रम तुम्हारी तथाकथित व्यस्तता का ही एक आयोजन है। आदमी व्यस्त रहता है तो भूला रहता है आदमी खाली होता है तो याद आने लगती है कि मैं क्या कर रहा हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? किसलिए हूँ? मेरा गंतव्य क्या है? मुझे कहाँ होना था? मैं किस कीचड़ में पड़ गया? कमल बनने आया था और कीचड़ में ही दबा रह गया हूँ। झकझोरने वाले प्रश्न उठने लगते हैं। उनसे बचने का एक ही उपाय है—उलझा लो अपने को, कहीं भी काम में लगा दो अपने को। काम से एक झूठी प्रतीति बनी रहती है—कुछ हो रहा है। कुछ नहीं हो रहा है। कुछ न कभी हुआ है यहाँ, न कुछ कभी यहाँ होगा। मगर होने की भ्राँति बनी रहती है। कर तो रहे हैं, दौड़ तो रहे हैं, भाग तो रहे हैं, लड़ तो रहे हैं और क्या करें? सब तो दावँ पर लगा रहे हैं। आज नहीं कल, कल नहीं परसों होगा। देर है, अंधेर तो नहीं है। ऐसे अपने को समझाते हैं। और सब प्यारे शब्द हमें याद हो गए हैं। उन प्यारे शब्दों को हमने याद करके ही मार डाला है, उनकी हत्या कर दी है।

समझो — मन रे, करु संतोष सनेही।

रज्जब कहते हैं—दोस्त तो दुनिया में एक है, प्रेमी तो दुनिया में एक है, अगर प्रेम ही करना हो तो उसीसे कर लेना, उसका नाम संतोष है। संतोष से प्रेम कर लेंगे तो क्या होगा? हमने तो नाते असंतोष से जोड़े हैं। हमने तो विवाह असंतोष से रचाया है। हमने तो हाथ में हाथ डाल दिए हैं असंतोष के। फिर तड़फ रहे हैं, फिर रो रहे हैं, फिर गिड़गिड़ा रहे हैं। मगर दोस्ती नहीं छोड़ते। जितना गिड़गिड़ाते हैं, उतनी ही दोस्ती मजबूत करते चले जाते हैं। इस सीधे से सत्य को देखो—असंतोष से दोस्ती जो बनाएगा, वह कैसे सुखी हो सकता है? इतना सीधा—सा गणित भी दिखायी नहीं पड़ता! असंतोष की कला क्या है? जो है, असंतोष कहता है, उसमें क्या रखा है! असंतोष कहता है—जो तुम्हारे पास नहीं है, उसमें सार है। जो तुम्हारे पास है, निस्सार है। इसलिए जो नहीं है उसे पाने में लगो, तो मजा पाओगे, तो आनंद पाओगे।

लेकिन, यह सूत्र तो ऐसा हुआ—आत्मघाती सूत्र है यह—जैसे ही तुम उसे पा लोगे वह व्यर्थ हो जाएगा।

असंतोष का तर्क समझो। असंतोष की व्यवस्था समझो। असंतोष की व्यवस्था यह है कि जो मिल गया, वही व्यर्थ हो जाता है। सार्थकता तभी तक मालूम होती है जब तक मिले नहीं। जिस स्त्री को तुम चाहते थे, जब तक मिले न तब तक बड़ी सुंदर। मिल जाए, सब सौंदर्य तिरोहित। जिस मकान को तुम चाहते थे—कितनी रात सोए नहीं थे! कैसे—कैसे सपने सजाए थे!—फिर मिल गया और बात व्यर्थ हो गयी। जो भी हाथ में आ जाता है, हाथ में आते ही से व्यर्थ हो जाता है। इस असंतोष को तुम दोस्त कहोगे? यही तो तुम्हारा दुश्मन है। यह तुम्हें दौड़ाता है—सिर्फ दौड़ाता है—और जब भी कुछ मिल जाता है, मिलते ही उसे व्यर्थ कर देता है। फिर दौड़ाने लगता है। यह दौड़ाता रहा है जन्मों—जन्मों से तुम्हें। वह जो चौरासी कोटियों में तुम दौड़े हो, असंतोष की दोस्ती के कारण दौड़े हो। दस हजार रुपए पास में हैं—क्या है मेरे पास, कुछ भी तो नहीं! लाख हो जाएँ तो कुछ होगा! लाख होते ही तुम्हारा असंतोष—तुम्हारा मित्र, तुम्हारा साझीदार—कहेगा, लाख में क्या होता है? ज़रा चारों तरफ देखो, लोगों ने दस—दस लाख बना लिए हैं। अरे मूढ़, तू लाख में ही बैठा है! अब लाख की कीमत ही क्या रही? अब गए दिन लाखों के, अब दिन करोड़ों के हैं। करोड़ बना! तो कुछ होगा।

तुम सोचते हो करोड़ हो जाएगा तुम्हारे पास तो कुछ होगा? कुछ भी नहीं होगा। यही असंतोष तुम्हारा साथी वहाँ भी मौजूद रहेगा। करोड़ होते—होते—होते—होते काफी समय बीतेगा, दौड़ होगी, जीवन गँवाया जाएगा, और जब पहुँच जाओगे, तो यही असंतोष कहेगा कि करोड़ भी कोई बात है! अरबपति हैं दुनिया में! आगे देख! ठहरना नहीं, अरबपति होना है! और ऐसे ही दौड़ाता रहेगा। जो नहीं है, उसमें रस पैदा करवाता रहेगा। और जो है, उसमें विरस पैदा करवा देगा। जो है, वह होने के कारण ही अर्थहीन है। और जो नहीं है, वह न होने के कारण ही सार्थक है। तभी तो दौड़ जारी रहती है। नहीं तो दौड़ ही मर जाए।

संतोष से जिसने दोस्ती बाँधी, उसकी दौड़ ही गयी। उसकी आपाधापी समाप्त हो जाती है। संतोष का सूत्र उलटा है। संतोष कहता है—जो है, वही सार्थक है। जो नहीं है, उसमें क्या रखा है! जो अपने पास है, वही धन्यभाग है। और जो अपने पास नहीं है, उसमें कुछ भी नहीं है। संतोष से जिसने दोस्ती बाँध ली, वह अगर सुखी न होगा तो क्या होगा? और असंतोष से जिसने दोस्ती बाँधी, अगर वह दुःखी न होगा तो क्या होगा? असंतोष की सहज निष्पत्ति दुःख है। अगर तुम मेरी बात ठीक से समझो तो असंतोष में जीनेवाला मन ही नरक में जीता है। संतोष में जीनेवाला मन स्वर्ग में जीता है। जिसने संतोष बना लिया, स्वर्ग बना लिया।

स्वर्ग और नरक भौगोलिक अवस्थाएँ नहीं हैं; कहीं भूगोल में नहीं हैं, किसी नक्शे में नहीं मिलेंगे, मनोदशाएँ हैं। मनोवैज्ञानिक हैं। संतोषी आदमी में तुम स्वर्ग पाओगे। उसके पास तुम्हें स्वर्ग के फूल खिलते मिलेंगे। उसके पास तुम्हें स्वर्ग की आभा मिलेगी। धूल में भी बैठा होगा तो तुम उसे महल में पाओगे। क्योंकि धूल को भी महल बना लेने की कला उसके पास है, कीमिया उसके पास है। संतोषी आदमी के हाथ में जादू है। रूखी रोटी खाएगा तो ऐसे कि सम्राट भीर् ईष्यालु हो जाएँ। नंगा भी चलेगा रास्ते पर तो ऐसे कि सम्राटों की बड़ी—बड़ी शोभायात्राएँ फीकी पड़ जाएँ। देखा नहीं है महावीर को नग्न चलते हुए रास्तों पर? देखा नहीं है महावीर के चरणों में सम्राटों को झुकते हुए? क्या था इस आदमी के पास? लंगोटी भी न थी। मगर एक मस्ती थी। यह मस्ती कहाँ से आयी थी? इस मस्ती का खजाना कहाँ मिला था? संतोष से दोस्ती बाँध ली थी। और यह सम्राटों को क्यों झुकना पड़ रहा था महावीर के सामने, जिनके पास सब था? असंतोष से दोस्ती थी। सोचते थे कि शायद सम्राट होकर तो मिला नहीं, अब फकीर होकर मिल जाए। चलो फकीर के चरणों में बैठें। यह भी असंतोष की ही दौड़ है। संसार में नहीं मिला, तो चलो अब हिमालय पर चले जाएँ। यह भी असंतोष का नया कदम है : ध्यान रखना, संन्यास अगर असंतोष से ही उठता हो, तो गलत होगा। अगर संतोष से उठता होगा तो सम्यक् होगा। और दोनों में जमीन—आसमान का फर्क होगा।

भगोड़ा संन्यासी असंतोष से ही संन्यासी है। असंतोष से कोई संन्यासी है, मतलब अभी भी संसारी है। बाजार में रहकर देख लिया, नहीं पाया। असंतोष ने कहा—बाजार में क्या रखा है, पागल! असंतोष को समझ लेना। असंतोष सब तरह की भाषाएँ जानता है। आध्यात्मिक भाषा भी जानता है। असंतोष बड़ा कुशल है। उसने देखा तुम्हें कि अब तुम बाजार से ऊबे जा रहे हो, वह कहता है कि बिल्कुल ठीक ही है, बाजार में रखा क्या है? और मजा यह है कि यही असंतोष जिंदगी—भर तुमसे कहता रहा कि बाजार में सब रखा है। तुम्हारा अंधापन अद्भुत है। पहले भी इसकी माने चले गए, अब भी इसकी मान लेते हो। यही कहता था बाजार में सब रखा है, धन में सब रखा है, पद—प्रतिष्ठा में। इसके पहले कि यह देखता है कि हवा बदलने लगी, अब तुम चौंकने लगे, अब तुम जागने लगे थोड़े, यह कहता है—यहाँ क्या रखा है? पागल, मैं तो पहले ही से कहता था! यहीं होता तो त्यागी-त्तपस्वी जंगल जाते! असली चीज जंगल में है। जंगल में मंगल है। चल जंगल। छोड़। छोड़ पत्नी, छोड़ घर—द्वार। और तुम सोचते हो—बड़े संन्यास की आकांक्षा उठ रही है! तुम्हें असंतोष ने फिर धोखा दिया। अब यह तुम्हें जंगल में बिठा देगा। और वहाँ भी थोड़े दिन बैठकर तुम पाओगे, कुछ नहीं मिल रहा है। और यही असंतोष तुमसे कहेगा—पहले ही कहा था कि जंगल में मंगल, यह सब फिजूल की बकवास है! अपने घर लौट चलो। जो है वहीं है, संसार में है। थोड़ी और चेष्टा करते तो मिल जाता। दो—चार कदम चलने की बात थी, मंजिल के करीब आ—आकर आ गए? मूढ़ हो, नासमझ हो। जो पीछे रह गए हैं, देखो मजा कर रहे हैं। और तुम यहाँ बैठे गुफा में क्या कर रहे हो?

मगर तुम्हारा अंधापन ऐसा है कि तुम असंतोष से कभी पूछते ही नहीं कि तू पहले यह कहता था, अब तू यह कहता है, तू बदलता जाता है? नहीं, दोस्ती गहरी है, दोस्त पर भरोसा होता है। भरोसे का नाम ही तो दोस्ती है।

रज्जब कहते हैं—यह दोस्ती छोड़ो। इसने तुम्हें जन्मों—जन्मों भटकाया है, नरकों की यात्रा करवायी है, दुःख से और महादुःख में ले गया है, यह दोस्ती छोड़ो। अब एक नयी दोस्ती बनाओ, संतोष से दोस्ती बनाओ।

मन रे, करु संतोष सनेही।

प्यारे, संतोष को पकड़ो। संतोष से प्रेम लगाओ। संतोष से भाँवर पाड़ो। असंतोष के साथ रहकर बहुत देख लिया, कुछ भी न पाया, अब तो चेतो! संतोष का मतलब होता है—जो है, धन्य मेरा भाग! असंतोष कहता है—इतना ही! और होना चाहिए, मैं अभागा हूँ! संतोष कहता है—जो है, धन्य मेरा भाग! इससे भी कम हो सकता था। जो है, इतना भी क्या कम है! इतना भी होना ही चाहिए, इसकी कोई अनिवार्यता थोड़े ही है! यह भी परमात्मा की देन है। मैं अनुगृहीत हूँ।

बस इस अनुग्रह की भाषा में जीवन का रूपांतरण हो जाता है। तब तुम जहाँ हो, अचानक पाते हो वहीं स्वर्ग की धुन बजने लगी। बज ही रही थी, सिर्फ तुम्हारे असंतोष के कारण सुनायी नहीं पड़ती थी। तुम्हारे आसपास देवदूत निरंतर मौजूद थे, मगर असंतोष से भरी ऑंखें देख नहीं पाती थीं। तुम सदा से ही इसके हकदार और मालिक थे, मगर असंतोष की दोस्ती तुम्हें बहुत दूर ले गयी—अपने से दूर ले गयी।

संतोष तुम्हें अपने पास ले आता है। क्यों? क्योंकि असंतोष की प्रक्रिया में दूर जाना जरूरी है। असंतोष तुम्हारी ऑंखों को दूर और दूर रखता है। वह कहता है—वहाँ चलो, चाँद पर चलो; भविष्य में, आगे, और आगे; आज थोड़े ही मिलने वाला है सुख, कल मिलेगा सुख। असंतोष कहता है—कल ज्यादा दूर थोड़े ही है! थोड़ा ही, चार कदम की यात्रा और है। और कल कभी आता नहीं। और कल भी असंतोष यही कहेगा कि थोड़ा और, थोड़ा और—चले चलो, चले चलो! असंतोष धीरज बँधा जाता है और अतृप्ति को जगाए जाता है। चलाए रखता है, चलाए रखता है, चलाए रखता है, दौड़ाता है। और जिस दिन तुम गिरते हो तो कब्र में ही पहुँचते हो। और कहीं नहीं पहुँचते।

संतोष कहता है—वहाँ नहीं, यहाँ। कल नहीं, अभी। इस क्षण सब है। संतोष से दोस्ती बाँधते ही इस क्षण के अतिरिक्त समय का और कोई अर्थ नहीं रह जाता है। यही क्षण सारा अस्तित्व हो जाता है। हो जाने दो इसी क्षण को सारा अस्तित्व! चलो थोड़ी ही देर को सही, मेरे साथ! इस क्षण संतोष से दोस्ती बाँध लो! ये हवाओं में लहराते हुए वृक्ष, यह सन्नाटा, यह मेरा होना, तुम्हारा होना, यह आमना—सामना, यह इस क्षण में जो घट रहा है इसके पार मत देखो, बस इसी में ऑंखें गड़ाओ, और तुम अचानक पाओगे—तुम किसी सुख के स्रोत के करीब आने लगे। अचानक भीतर से एक शांति उमगेगी और तुम्हें घेर लेगी। चूक जाओगे तुम इससे फिर, क्योंकि असंतोष इतनी जल्दी दोस्ती नहीं छोड़ देगा। दोस्ती बनानी आसान है, छोड़नी बहुत मुश्किल होती है। विवाह करने बहुत आसान, तलाक में अदालतें बड़ी झंझटें देती हैं। फिर पकड़ लेगा। फिर असंतुष्ट। फिर दुःखी। फिर चिंतित। फिर आतुर भविष्य के लिए। लेकिन जब भी तुम अवसर दोगे संतोष को, क्षण—भर को ही सही संतोष से नाता बाँधोगे, उसी क्षण तुम पाओगे वर्षा हो जाती है अनंत की। ये ही क्षण ध्यान के क्षण हैं। और इन्हीं क्षणों के राज़ को जिसने समझ लिया, वह समाधि को उपलब्ध हो जाएगा।

समाधि का क्या अर्थ है? संतोष से दोस्ती थिर हो गयी। अडिग हो गयी। असंतोष के हमले बंद हो गए। समाधि शब्द को देखते हो? उसी धातु से बना है जिससे समाधान। समाधान का अर्थ होता है—अब कोई असमाधान नहीं है चित्त में। ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, ऐसी कोई चिंता नहीं है चित्त में, अब कोई समस्या नहीं है चित्त में। अब तो जैसा है वैसा है—”ज्यूँ का त्यूँ ठहराया’।

मन रे, करु संतोष सनेही।

नहीं तो घूमोगे भिखारी बने—बने। बन जाओ सम्राट! जब्त भी कब तक हो सकता है? सब्र की भी इक हद होती है।

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यही संतोष है। अपनी तरफ से मैं अब कुछ भी न करूँगा। तुझसे भिन्न कुछ भी न करूँगा। अगर तेरी मर्जी मुझे गरीब रखने की है, तो गरीब रहूँगा। और तेरी मर्जी अगर मुझे अमीर रखने की है, तो अमीर रहूँगा। खयाल रखना, पहली मर्जी तो तुमने बहुत बार सुनी है साधुओं—संन्यासियों से, दूसरी मर्जी तुमने नहीं सुनी क्योंकि तुम्हारा साधु—संन्यासी भी असली संतोषी नहीं है। एक है, जो कहता है जब तक धनी न होऊँगा तब तक रुकूँगा नहीं। दूसरा कहता है —धन? कभी नहीं। मैं तो निर्धन होकर रहूँगा! एक धन का गौरव गाता है, दूसरा दरिद्रता का गौरव गाता है।

इस देश में तो दरिद्रता का गौरव बहुत गाया गया है। उसी गौरव के कारण तुम दरिद्र हो गए हो। अभी भी तुम्हारे महात्मा दरिद्रता को दरिद्रनारायण का नाम दिए जाते हैं। ठीक है, फिर तुमने दरिद्र होने का तय ही कर लिया है। उसकी तरफ से तो मोती बरसते हैं मगर तुम काँटे बना लेते हो। यहाँ कोई भी दरिद्र होने को पैदा नहीं हुआ है। परमात्मा से आए हैं सब, कैसे दरिद्र हो सकते हैं! हमने इस देश में परमात्मा को जो नाम दिया है उस पर कभी खयाल किया? ईश्वर कहां है उसे। ईश्वर का अर्थ होता है—ऐश्वर्य। जिसका सारा ऐश्वर्य है, जिसकी सारी महिमा है, जिसका सारा धन है। हम उससे आए, उसकी किरणें, उसकी संतति, हम कैसे दरिद्र हो सकते हैं! लेकिन कुछ लोगों ने जिद्द कर रखी है कि अमीर होकर रहेंगे। जो आदमी कहता है मैं अमीर होकर रहूँगा, वह भी चूक रहा है। क्योंकि अमीर हम हैं, होने की जरूरत नहीं है।

एक भूल कि मैं अमीर होकर रहूँगा। अमीर थे ही, होने की क्या जरूरत थी? भूल में पड़ गए। फिर अमीर होने की चेष्टा में बहुत दुःख पाए। तो जिद्द दूसरी पैदा हुई एक दिन कि मैं अब गरीब होकर रहूँगा। यह अक्सर हो जाता है। आदमी विपरीत पर चला जाता है। अमीरी में बहुत दुःख पाए, एक दिन आदमी कहता है कि बहुत हो गया, अमीरी में दुःख मिल रहे हैं। अमीरी में दुःख नहीं मिल रहे हैं मैं तुमसे कहता हूँ, असंतोष में दूख मिल रहे हैं। अमीरी क्या दुःख देगी! जब गरीबी तक दुःख नहीं दे सकती तो अमीरी कैसे दुःख देगी? असंतोष में दुःख मिल रहा है।

मगर असली चीजें हम देखते ही नहीं। हम कहते हैं—अमीरी में दुःख मिल रहा है। अमीरी छोड़कर रहूँगा। मैं गरीब होकर रहूँगा। अब गरीब होने चले! मगर यात्रा जारी है। पहले गरीब से अमीर होने का असंतोष था, अब अमीर से गरीब होने का असंतोष है, लेकिन असंतोष से तुम्हारा नाता नहीं टूटता।

मैं तुमसे जो कह रहा हूँ, उसकी क्रांति समझो। मैं तुमसे यह कह रहा हूँ—जो हो, जहाँ हो, जैसे हो, उससे अन्यथा होने की बात ही छोड़ दो। अगर उसके इरादे गरीब होने के हैं, तो गरीब; उसका इरादा अमीर रखने का है, तो अमीर। और तुम तब चकित हो जाओगे। जो तुम हो, जहाँ हो, जैसे हो, वैसे ही राजी हो जाओ। उस राजीपन में ही असली धन पैदा होता है। राजीपन धन है। उस संतोष में धन है। फिर गरीब भी अमीर हो जाता है। अमीर की तो बात ही क्या करनी, गरीब भी अमीर हो जाता है। अमीरी एक ही बात का नाम है—संतोष का।

लेकिन तुमने दोनों तरह के लोग देखे हैं और तुम समझते हो कि दोनों बड़े विपरीत हैं। ज़रा भी विपरीत नहीं हैं। उनका तर्क एक, उनकी तर्कसारणी एक, उनके सोचने की प्रक्रिया एक। असंतोष दोनों का स्वर है।

– ओशो

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2 thoughts on ““संतोष क्या है ?” – ओशो

  • August 3, 2016 at 10:35 PM
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    agr aapko santosh hai toh duniya jaisi hai chod do usko vese hi…kyun badlte ho

    mujhe sirf itna puchna hai ki osho,budha,jain,guru nanak,jesus sab ne jo kuch bhi bola vo sahi tha. pr agar yeh sab log apni ishaayo ko khatam kr chuke the,inko na sukh se sukh tha na dukh se dukh tha,inko kisi insaan se koi lena dena hi nhi tha,yeh log duniya se detach the,inme koi emotions na reh gye,toh enko kya pdi thi duniya ko lecture deni ki?? yeh log aaye,bhagwan ko smja,mocsh paa liya,ab duniya k saath kya pyaar ,kyun ” karuna ” dikhayi in sab logo ne? mje aisa lagta hai in sab logo ko shayad apni ego ko satisfy krna tha ki “yeh log duniya se alag hai” toh shayad lecture dene shuru kr diye… mein aapse bhi puchta chahta hun ki aap ko bhawan smj a gya “ab aap kyun lecture dete ho”,aapko kya pdi kisi ki life ki? vese bhi app sabki life badal nai sakte toh thode logo ki life se kaisa pyaar…aapko kis cheez ka moh hai??

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  • August 5, 2016 at 6:25 PM
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    aapne likha hai ” समाधि का क्या अर्थ है? संतोष से दोस्ती थिर हो गयी। अडिग हो गयी। असंतोष के हमले बंद हो गए। समाधि शब्द को देखते हो? उसी धातु से बना है जिससे समाधान। समाधान का अर्थ होता है—अब कोई असमाधान नहीं है चित्त में। ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, ऐसी कोई चिंता नहीं है चित्त में, अब कोई समस्या नहीं है चित्त में। अब तो जैसा है वैसा है—”ज्यूँ का त्यूँ ठहराया’। ”

    ab aap dunya ko vese hi chod do ,woh jaisi bhi hai….aap duniya ka ” smadhan” kyun kr rhe ho?

    plz mere question ka gussa mat krna..pr mje pta krna hai ki aisa kya ho jata hai enlightened logo ko ki vo duniya theek krne lag jaate hai …jabki woh khud yeh kehte hai “duniya jaisi hai usme khush rho”…fir khud duniya se dukhi kyun hai enlightened log ?

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