“असली दिवाली कैसे हो ?” – ओशो

जीवन की कुटिया में हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।
आशा के मंदिर में हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं, बुझा हुआ सा दीपक।।
कजराए दीवट पर धरा हूं यूं कुटिया में हाए।
जैसे कोयल सीस नवा कर अंबुआ पर सो जाए।।
जैसे श्यामा गाते-गाते कुहरे में खो जाए।
जैसे दीपक आग में अपने-आप भस्म हो जाए।।
विरह में जैसे आंख किसी क्वांरी की पथरा जाए।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं बुझा हुआ सा दीपक।।
आतम, हिरदय जीवन, मृत्यु, सतयुग, कलियुग, माया।
हर रिश्ते पर मैंने अपने नूर का जाल बिछाया।।
चारों ओर चमक कर अपनी किरनों को दौड़ाया।
जितना ढूंढा उतना खोया खोकर खाक न पाया।।
बीत गए जुग लेकिन ‘सागर’ मुझ तक कोई न आया।
बुझा हुआ सा दीपक हूं मैं, बुझा हुआ सा दीपक।।

आदमी एक अंधेरा है। आदमी है अमावस की रात। और दीवाली तुम बाहर कितनी ही मनाओ, भीतर का अंधेरा बाहर के दीयों से कटता नहीं, कटेगा नहीं। धोखे तुम अपने को कितने ही दो, पछताओगे अंततः। देखते हो, दीवाली हम मनाते हैं अमावस की रात! वह हमारे धोखे की कथा है। रात है अमावस की, दीयों की पंक्तियां जला लेते हैं। पर दीये तो होंगे बाहर। दीये तो भीतर नहीं जा सकते। बाहर की कोई प्रकाश की किरण भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। भीतर की अमावस तो भीतर अमावस ही रहती है। बाहर की पूर्णिमा कितनी ही बनाओ, तुम तो भीतर जानते ही रहोगे कि बुझे हुए दीपक हो। तुम तो भीतर रोते ही रहोगे। तुम्हारी सब मुस्कुराहटें भी तुम्हारे आंसुओं को छुपाने में असमर्थ हैं। और छुपा भी लें तो सार क्या? मिटाने में निश्चित असमर्थ हैं।

धोखे छोड़ो! इस सीधे सत्य को स्वीकार करो कि तुम बुझे हुए दीपक हो। होने की जरूरत नहीं है। होना तुम्हारी नियति भी नहीं है। ऐसा होना ही चाहिए, ऐसा कोई भाग्य का विधान नहीं है। अपने ही कारण तुम बुझे हुए हो। अपने ही कारण चांद नहीं उगा। अपने ही कारण भीतर प्रकाश नहीं जगा। कहां भूल हो गई है? कहां चूक हो गई है?

हमारी सारी जीवन-ऊर्जा बाहर की तरफ यात्रा कर रही है। इस बहिर्यात्रा में ही हम भीतर अंधेरे में पड़े हैं। यह ऊर्जा भीतर की तरफ लौटे तो यही ऊर्जा प्रकाश बनेगी। यह ऊर्जा ही प्रकाश है।

तुम्हारा सारा प्रकाश बाहर पड़ रहा है..वृक्षों पर, पर्वतों पर, पहाड़ों पर, लोगों पर। लेकिन तुम एक अपने पर अपनी रोशनी नहीं डालते। सबको देख लेते हो अपने प्रति अंधे रह जाते हो। और सबको देखने से क्या होगा? जिसने अपने को न देखा, उसने कुछ भी न देखा।

आज के सूत्र तुम्हारे भीतर का दीया कैसे जले, सच्ची दीवाली कैसे पैदा हो, कैसे तुम भीतर चांद बनो, कैसे तुम्हारे भीतर चांदनी का जन्म हो..उसके सूत्र हैं। बड़े मधु-भरे! सुंदर ने बहुत प्यारे वचन कहे हैं, पर आज के सूत्रों का कोई मुकाबला नहीं है। बहुत रस-भरे हैं, पीओगे तो जी उठोगे। ध्यान धरोगे इन पर, संभल जाओगे। डुबकी मारोगे इनमें, तो तुम जैसे हो वैसे मिट जाओगे; और तुम्हें जैसा होना चाहिए वैसे प्रकट हो जाओगे।

है दिल मैं दिलदार…।

जिसको तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। तुम्हारी खोज के कारण ही तुम उसे नहीं पा रहे हो। तुम दौड़े चले जाते हो। सारी दिशाओं में खोजते हो, थकते हो, गिरते हो। हर बार जीवन कब्र में समाप्त हो जाता है। जीवन से मिलन नहीं हो पाता। और जिसे तुम खोजने चले हो, जिस मालिक को तुम खोजने चले हो, उस मालिक ने तुम्हारे घर में बसेरा किया हुआ है। तुम जिसे खोजने चले हो, वह अतिथि नहीं है, आतिथेय है। खोजनेवाले में ही छिपा है। वह जो गंतव्य है, कहीं दूर नहीं, कहीं भिन्न नहीं, गंता की आंतरिक अवस्था है।

है दिल मैं दिलदार सही अंखियां उलटि करि ताहि चितइए।

लेकिन अगर उसे देखना हो, अगर उसके प्रति चैतन्य से भरना हो तो आंखें उलटाना सीखना पड़े। आंख उलटाना ही ध्यान है। ध्यान साधारणतया दृश्य से जुड़ा है। ऐसा मत सोचना कि तुम्हारे पास ध्यान नहीं है। तुम्हारे पास ध्यान है..उतना ही जितना बुद्धों के पास। रत्ती भर कम नहीं। परमात्मा किसी को कम औरज्यादा देता नहीं। उसके बादल सब पर बराबर बरसते हैं। उसका सूरज सबके लिए उगता है। उसकी आंखों में न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। ऐसा मत सोचना कि कृष्ण को कुछ ज्यादा दिया था, कि बुद्ध को कुछ ज्यादा दिया था, कि सुंदरदास को जरूर कुछ ज्यादा दे दिया होगा..कि ये रोशन हुए, कि ये जगमगाए। न खुद जगमगाए, बल्कि इनकी जगमगाहट से और भी लोग जगमगाए। दीयों से दीये जलते चले गए। ज्योति से ज्योति जले! जरूर इन्हें कुछ ज्यादा दे दिया होगा छिपा कर; हमें दिया नहीं, हम क्या करें? नहीं; ऐसा मत सोचना।

परमात्मा की तरफ से प्रत्येक को बराबर मिला है। रत्ती भर भेद नहीं। फिर हम अंधेरे में क्यों हैं? फिर कोई बुद्ध रोशन हो जाता है और हम बुद्धू के बुद्धू क्यों रह जाते हैं। हमें जो मिला है, हमने उसे गलत से जोड़ा है। जैसे कोई सरिता मरुस्थल में खो जाए, जल तो लाए बहुत हिमालय से और मरुस्थल में खो जाए..ऐसी हमारी जीवन-ऊर्जा मरुस्थल में खोई जा रही है। बाहर विस्तार है मरुस्थल का।

ध्यान तुम्हारे पास उतना ही है जितना मेरे पास। लेकिन तुमने ध्यान वस्तुओं पर लगाया है। तुमने ध्यान किसी विषय पर लगाया है। तुम्हारा ध्यान हमेशा किसी चीज पर अटका है। चीजों को गिर जाने दो..चीजों को हट जाने दो। विषय वस्तु से मुत्त हो जाओ, मात्र ध्यान को रह जाने दो, निरालंब! और आंख भीतर मुड़ जाती है।

निरालंब ध्यान का नाम समाधि। आलंबन से भरे ध्यान का नाम संसार। जब तक आलंबन है तब तक तुम बाहर जाओगे, क्योंकि आलंबन बाहर है। जब आलंबन नहीं तब तुम भीतर आओगे। कोई उपाय ही न बचा तो तुम्हें भीतर आना ही होगा। ध्यान को कहीं ठहरना ही होगा। बाहर न ठहराओगे तो अपने-आप सहज सरलता से ध्यान लौट आता है।

पुराने दिनों में जब समुद्र की लोग यात्रा करते थे और यंत्र नहीं थे जानने के, पहचानने के लिए नक्शे नहीं थे, कि हम भूमि के करीब पहुंच गए या नहीं। तो वे एक प्रयोग करते थे। हर जहाज पर कबूतर पाल कर रखते थे। कबूतरों को छोड़ देते थे। अगर कबूतर न लौटते तो इसका मतलब, जमीन करीब है। उन्होंने कहीं वृक्ष पा लिए होंगे, भूमि पा ली होगी, कोई आलंबन मिल गया होगा, अब लौटने की कोई जरूरत नहीं है। अगर कबूतर लौट आते तो उसका अर्थ है कि जमीन करीब नहीं है, .जमीन अभी दूर है। कबूतर को कहीं बैठना तो होगा, कहीं बसना तो होगा। अगर बाहर कोई सहारा मिल जाएगा तो वह फिकर छोड़ देगा जहाज की। ऐसे थक गया होगा जहाज पर बैठ-बैठे। पानी और पानी और पानी…! मिल गई होगी हरियाली, अटक गया होगा। लेकिन अगर कोई भूमि न मिले तो क्या करेगा? लौटना ही होगा, लौट आएगा वापिस।

ऐसा ही हमारा चित्त है। जब तक हम उसे बाहर भूमि दिए जाते हैं, तब तक भीतर नहीं लौटता। किसी का धन में अटका है, किसी का प्रतिष्ठा में अटका है, किसी का वस्तुओं में अटका है, किसी का संबंधों में अटका है..लेकिन मन जब तक बाहर अटका है तब तक भीतर नहीें लौटेगा। इसलिए सारे ज्ञानी कहते हैं: बाहर से तादात्म्य छोड़ो। मन को बाहर मत अटकाओ। बाहर से सारे सेतु काट दो। और तब अचानक एक प्रकांड ऊर्जा घर की तरफ वापिस लौटती है; जैसे गंगा वापिस लौट पड़े गंगोत्री में, ऐसी आंदोलनकारी घटना घटती है। तुम्हारी ही ऊर्जा जब तुम्हारे ऊपर वापिस लौटती है, रोशन हो जाते हो तुम। इसी से दूसरी चीजें रोशन हो रही थीं।

– ओशो

[ज्योति से ज्योति जले-5]

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