“व्यक्तित्व से तादात्म्य ही अहंकार है!” – ओशो

व्यक्तित्व के बंधन

हम सब पैदा होते हैं। अनिवार्यरूपेण समाज, परिवार, शिक्षा हमें उपलब्ध होती है, संस्कार उपलब्ध होते हैं, धारणाएं उपलब्ध होती हैं। कैसे जीना, कैसे उठना, कैसे बैठना, क्या ठीक है, क्या गलत है—सब हमें रेडीमेड मिलता है। फिर हम उसके अनुसार बड़े होते हैं। और हमें उसके अनुसार ही बड़ा होना पड़ता है। क्योंकि जिनके बीच हम बड़े हो रहे हैं, वे शक्तिशाली हैं। वे जो भी सिखा रहे हैं, वह हमें सीखना ही पड़ेगा। क्योंकि अगर हम न सीखेंगे तो वे हमें जिंदा ही न रहने देंगे। उनकी धारणाएं हमें माननी ही पड़ेगी, क्योंकि उनका दबाव चारों तरफ है, वे शक्तिशाली हैं। समाज उनका है,अधिकार उनका है, ताकत उनकी है, राज्य उनका है। वे सब तरफ से एक छोटे बच्चे को जो भी मनवाना चाहते हैं, मनवा देंगे। फिर यह बच्चा बड़ा होगा एक व्यक्तित्व को ले कर, जो दूसरों ने इसे दिया है। इस व्यक्तित्व के सहारे आज नहीं कल, इसको भयंकर पीड़ा और संताप पैदा होगा। क्योंकि यह झूठा है। झूठ से पीड़ा पैदा होती है।

आनंद तो केवल सत्य से पैदा हो सकता है, जो तुम्हारा स्वभाव है उससे ही। तो फिर यह खोज में लगेगा अध्यात्म की,परमात्मा की, ज्ञान की, योग की, ध्यान की। लेकिन इसे यह खयाल ही नहीं है कि यह जो व्यक्तित्व है, इसे तोड़ना पड़ेगा। यह जैसे एक खोल की तरह तुम्हारे झरने के चारों तरफ हो गया है। जैसे एक पत्थर की तरह तुम्हारे झरने को रोके हुए है। पर यह चाहेगा कि इस व्यक्तित्व को ले कर ही परमात्मा तक पहुंच जाए और शांति तक पहुंच जाए, तो अड़चन है।

और व्यक्तित्व को तोड़ना बड़ी कठिन बात है, क्योंकि हमारा बड़ा मोह निर्मित हो जाता है। हम तो सोचते ही यही हैं कि यही व्यक्तित्व हमारा स्वभाव है, यही हम हैंव्यक्तित्व के साथ इस तादात्म्य का नाम ही अहंकार है

अहंकार की बहुत चर्चा होती है। लोग कहते हैं, अहंकार छोड़ो। लेकिन अहंकार आप समझते ही नहीं कि क्या है। इस व्यक्तित्व के साथ जो तादात्म्य है— कि यही व्यक्तित्व मैं हूं— यही अहंकार है। कोई हिंदू व्यक्तित्व को लिए है, कोई मुसलमान व्यक्तित्व को लिए है, कोई जैन व्यक्तित्व को लिए है, कोई ईसाई व्यक्तित्व को लिए है। वह अड़चन डाल रहा है। और उससे हम जुड़े हुए हैं कि यह मैं हूं। इसको तोड़ना जरूरी है। इसमें थोड़े से छेद भी हो जाएं, तो आपको थोड़ी सी निसर्ग की ताजी हवा मिले। जरूरी नहीं है कि आप इसको तोड़ कर समाज के विपरीत हो जाएं। क्योंकि इसको तोड़ कर अगर आप बिलकुल फेंक दें, तो आप समाज के विपरीत हो जाएंगे। जरूरी नहीं है कि आप समाज के दुश्मन हो जाएं। इतना ही जरूरी है कि आप इस खोल को उतार कर पहनने में समर्थ हो जाएं।

आप मेरी बात को समझ लें। ऐसा नहीं है कि आप वस्त्रों को फेंक दें सारे व्यक्तित्व के। तो आप दिक्कत में पड जाएंगे। क्योंकि जिनके बीच आप रह रहे हैं, उन्होंने व्यक्तित्व नहीं फेंका है। आप अड़चन में पड़ जाएंगे। वे आपको मुसीबत में डाल देंगे। क्योंकि आप उनकी व्यवस्था को तोड़े डाल रहे हैं। और उनकी व्यवस्था में उनका न्यस्त स्वार्थ है, सुविधा है।

व्यक्तित्व को छोड़ने का एक ही अर्थ है कि आपको यह स्मरण आ जाए कि व्यक्तित्व आप नहीं हैं, और चाहें तो उतार कर एक तरफ रख सकते हैं। बस इतना काफी है। फिर समाज में काम के लिए आप व्यक्तित्व को ओढ़े रहें। लेकिन फिर आपकी गुलामी नहीं रही, फिर खेल हो गया। फिर समाज के लिए आप व्यक्तित्व को ओढ़ लेते हैं, और अपने लिए उतार कर रख देते हैं। ध्यान के वक्त आप व्यक्ति नहीं रह जाते, सिर्फ आत्मा हो जाते हैं।

तो आपके जीवन में बाहर के जगत के लिए एक नाटक, एक अभिनय शुरू हो जाएगा। बुद्धिमान आदमी अनिवार्य रूप से समाज में अभिनय के अतिरिक्त और किसी ढंग से नहीं जीता है। समाज के साथ उसका संबंध नाटकीय है।

लेकिन यह नाटकीयता अपने साथ अगर हो जाए, तो कठिनाई खड़ी होती है। आप दूसरे के लिए चेहरा ओढ़ लें। दूसरे को अच्छा लगता है वैसा ही चेहरा, तो क्या अड़चन है? लेकिन जब आप अपने एकांत में हैं, तो वहां तो कम से कम चेहरा उतार दें। क्योंकि अब आप किसके लिए चेहरा ओढ़े हुए हैं? आप किसको धोखा दे रहे हैं अब? लेकिन यह बोधपूर्वक हो तो व्यक्तित्व बंधन नहीं होता! तब व्यक्तित्व एक कुशलता हो जाती है। तब व्यक्तित्व अच्छी बात है। क्योंकि उससे संबंधों में,सामाजिक संबंधों में, लुब्रीकेन्ट का काम हो जाता है, उससे थोड़ा सा संघर्षण कम होता है। व्यर्थ का संघर्षण बच जाता है।

लेकिन खुद के लिए, खुद के एकांत में अगर आप उसको ओढ़े बैठे रहें, तो आप अपनी हत्या कर रहे हैं। समाज के साथ व्यक्तित्व, अपने साथ कोई व्यक्तित्व नहीं। और यह व्यक्तित्व के बंधन जब तक ढीले नहीं होते, तब तक आत्मा का रहस्य खुलना प्रारंभ नहीं होता है। क्योंकि इसके भीतर, इस व्यक्तित्व की गांठ के भीतर ही आत्मा का रहस्य छिपा है।

– ओशो

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