“नेति-नेति” – ओशो

अध्यास का अर्थ है, जैसा नहीं है वैसा देखना। और सत्य का अर्थ है, जैसा है वैसा ही देखना। हम जो भी देखते हैं, वह अध्यास है। हमारी दृष्टि में हम सम्मिलित हो जाते हैं और जो भी हमारा अनुभव है, वह वस्तुगत, आब्जेक्टिव नहीं होता, सब्जेक्टिव, आत्मगत हो जाता है। जो वहां बाहर है, जैसा है, वैसा ही हम तक नहीं पहुंचता; हमारा मन उसे विकृत कर लेता है। सजा-संवार लेता है; सजावट कर देता है; आभूषण पहना देता है; काट-छांट कर देता है; छोटा, बड़ा, बहुत-बहुत रूपों में उसे रूपांतरित कर देता है।

जो बड़े से बड़ा रूपांतरण है, जो गहरे से गहरा अध्यास है, वह है- हम प्रत्येक चीज के साथ अपने को जोड़ लेते हैं, जिससे हम जुड़े हुए नहीं हैं। जुड़ते ही चीज की जो वस्तु-स्थिति है वह खो जाती है और जो स्वप्न-स्थिति है वह सही मालूम पड़ने लगती है।

जैसे, जहां-जहां हम कहते हैं मेरा…कहते हैं, मेरा मकान! मकान हम न थे तब भी था; हम न होंगे तब भी होगा। जो हमारे होने से पहले हो सकता है, और जो हमारे होने के बाद भी बना रहेगा, और जो हमारे मिटने के साथ मिटता नहीं है, वह मेरा कैसे हो सकता है? मैं इसी क्षण मर जाऊं तो मेरा मकान मिटता नहीं है। मेरे मकान को मेरे मिटने का पता भी नहीं चलेगा।

तो मुझ से जोड़ ही क्या है मेरे मकान का? संबंध क्या है? कल कोई और रहेगा उस मकान में और वह भी उसे मेरा कहेगा। कल कोई और रहता था, वह भी उसे मेरा कहता था। न मालूम कितने लोगों ने अपने मैं को उस मकान पर चिपकाया है और विदा हो गए हैं! लेकिन वह मैं चिपक नहीं पाता, वह मकान किसी का हो नहीं पाता। मकान हो भी नहीं सकता किसी का। मकान अपना है, मकान खुद का है।

इस जगत में प्रत्येक वस्तु स्वयं है। इसे हम ठीक से समझ लें तो अध्यास को तोड़ने में आसानी हो जाएगी। जमीन का एक टुकड़ा है, आप कहते हैं- मेरा खेत, मेरा बगीचा। आज नहीं कल, चांद पर दावा खड़ा होगा। अमरीका कहेगा मेरा या रूस कहेगा मेरा। कल तक चांद किसी का भी न था। बस चांद था। चांद का ही था। लेकिन अब कोई न कोई दावा होगा। और आज नहीं कल, संघर्ष खड़ा होगा। अभी सूरज सिर्फ सूरज का है, कल उस पर भी दावा हो सकता है।

आदमी जहां भी पैर रखता है वहीं अपने मैं की छाप लगा देता है। प्रकृति उसकी छाप को मानती नहीं; लेकिन दूसरे आदमियों को मानना पड़ता है, अन्यथा संघर्ष खड़ा होता है। और वे दूसरे लोग भी इसीलिए मानते हैं उस छाप को कि वे भी वैसी छाप लगाना चाहते हैं। तो मकान किसी का हो जाता है; जमीन किसी की हो जाती है।और हमारी इतनी आतुरता क्यों होती है कि हम इस मैं की छाप को कहीं लगा दें? आतुरता इसलिए होती है कि जितनी जगह हम यह छाप लगा देते हैं, हस्ताक्षर कर देते हैं, जितना हमारा मेरे का विस्तार बड़ा हो जाता है, उतना ही बड़ा ‘मैं’ हमारे भीतर हो जाता है। ‘मैं’ उतना ही बड़ा होगा, जितनी चीजों पर उसकी छाप लगी है। अगर कोई आदमी कहता है कि एक एकड़ जमीन मेरी, तो निश्चित ही उसके पास उतना बड़ा ‘मैं’ कैसे होगा! दूसरा आदमी कहता है, एक हजार एकड़ जमीन मेरी। मेरे के विस्तार के साथ ‘मैं’ बड़ा होता मालूम पड़ता है। मेरे का विस्तार कम होता है तो ‘मैं’ छोटा, कम होता है। तो ‘मैं’ की एक-एक ईंट मेरे से निर्मित होती है। तो जितना ज्यादा मैं कह सकूं मेरा, उतना बड़ा ‘मैं’ का महल खड़ा हो जाता है।

इसलिए सारे जीवन हम एक ही दौड़ में होते हैं कि कितनी ज्यादा चीजों पर छाप लगा दें अपनी, कह पाएं कि मेरी हैं। इस छाप लगाने-लगाने में चीजों पर छाप लग भी जाती है और हम छाप लगाते-लगाते विदा हो जाते हैं। और जिसे हमने कहा था मेरा, उस पर कोई और छाप लगाना शुरू कर देता है। वस्तुएं अपनी हैं, किसी की भी नहीं। उपयोग उनका हो भी सकता है, मालकियत नहीं हो सकती। मालकियत भ्रम है। और उपयोग जब हम करते हैं तब अनुग्रह का भाव होना चाहिए, क्योंकि जो हमारा नहीं है उसका हम उपयोग कर रहे हैं। लेकिन जब हम कहते हैं मेरा तो अनुग्रह का भाव भी चला जाता है और मेरे का एक जगत निर्मित हो जाता है।

उसमें धन है, पद है, प्रतिष्ठा है, शिक्षा है, सब सम्मिलित है।और ये ही सम्मिलित हों तो भी आश्चर्य नहीं, जिन चीजों का मैं से कोई भी संबंध नहीं होता, वे भी सम्मिलित हो जाती हैं। हम कहते हैं- मेरा धर्म, मेरा ईश्वर, मेरा देवता, मेरा मंदिर; जिनसे कि मैं का कोई भी संबंध नहीं हो सकता। और अगर हो, तो फिर इस जगत से छुटकारे का कोई उपाय नहीं। क्योंकि अगर धर्म भी मेरा और तेरा हो सके, और ईश्वर भी मेरा और तेरा हो सके, तब तो बड़ी कठिनाई है; फिर तो इस मेरे के बाहर जाने का मार्ग कहां मिलेगा! ईश्वर भी इसके भीतर आ जाता हो,तो फिर बाहर जाने के लिए कोई जगह भी नहीं बचती। लेकिन हम मेरे की छाप मंदिर और मस्जिद पर भी लगा देते हैं, हम ईश्वर पर भी लगा देते हैं। आदमी जहां भी जाता है, वहां मेरे को लेकर पहुंच जाता है।

और इसके अनुषांगिक हिस्से समझ लें- ‘मैं’ बड़ा होता है मेरे से; लेकिन जितना मेरे का फैलाव होता है, उतना दुख भी बढ़ जाता है। अकेला ‘मैं’ ही बड़ा होता, तब भी कोई कठिनाई न थी। ‘मैं’ की बढ़ती दुख की भी बढ़ती है; क्योंकि ‘मैं’ है एक घाव। और जितना बड़ा ‘मैं’ होता है, उतने ही आप चोट के लिए खुले हो जाते हैं; उतनी बड़ी जगह हो जाती है जिस पर चोट की जा सकती है। जैसे कि बड़ा घाव हो तो उस पर दिन भर चोट लगे; कहीं से भी उठें-बैठें और चोट लगे। घाव है बड़ा, जगह है बड़ी, कुछ भी इशारा चोट बन जाता है। जितना बड़ा मैं हो, उतनी बड़ी चोट लगने लगती है, उतना दुख होता है।

मेरे के विस्तार से मैं बढ़ता है, रस आता है। ‘मैं’ बढ़ता है, दुख भी बढ़ता है। इधर लगता है सुख बढ़ रहा है, उधर साथ-साथ दुख भी बढ़ता जाता है। जितना हम सुख बढ़ाते हैं, उतना दुख बढ़ता चला जाता है। और इन दोनों के बीच में एक अध्यास, एक भ्रम चल रहा है। जहां मेरे का कोई उपाय नहीं कहने का, वहां हम व्यर्थ ही, झूठ ही मेरा कहे चले जा रहे हैं।

यह हाथ जिसको आप मेरा कहते हैं, शरीर जिसको आप मेरा कहते हैं, यह भी आपका नहीं है। आप नहीं थे तब भी इस हाथ की हड्डी, इस हाथ की चमड़ी, इस हाथ का खून कहीं था; और आप नहीं होंगे तब भी यह होगा। आपके शरीर में जो हड्डियां हैं, वे न मालूम कितने शरीरों में हड्डियां रह चुकी हैं। जो आज आपका खून है, कल किसी पशु में बहता था, परसों किसी वृक्ष में बहता था। और न मालूम कितनी लंबी यात्रा है उसकी अरबों-खरबों वर्षों की। आप नहीं होंगे तब भी आपके शरीर में एक-एक कण कोई भी नष्ट होने वाला नहीं है। वह सब बना रहेगा। वह किन्हीं और शरीरों में बहेगा।

इसे ऐसा समझें कि जो सांस अभी आपके भीतर है, एक क्षण पहले आपके पड़ोसी के भीतर थी। जो आपके पास में बैठा है, उसने जो सांस छोड़ दी है, वह अब आपकी सांस हो गई है। क्षण भर पहले वह कहता था मेरी सांस, क्षण भर बाद उसकी नहीं रही, किसी और की हो गई है। और अब दूसरा भी कह न पाएगा मेरी सांस कि दूसरे की हो जाएगी।

जिंदगी प्रतिपल किसी का दावा स्वीकार नहीं करती, बही चली जाती है। और हम दावे ठोंकते चले जाते हैं। यह दावे का जो भ्रम है, यह मनुष्य का गहरे से गहरा अध्यास है। तो जब भी कोई आदमी कहता है मेरा, तब अज्ञान में गिरता है।

यह सूत्र इस अध्यास को तोड़ने के लिए है। [ नेति -नेति  ]

जमीन तो मेरी है ही नहीं, मकान तो मेरा है ही नहीं, धन तो मेरा है ही नहीं, शरीर भी मेरा नहीं है। आपका जो शरीर है वह आपके मां और पिता के अणुओं से बना है। वे आपके पहले थे। और वे अणु लंबी यात्रा करके आ रहे हैं; वे आपके माता-पिता के माता-पिता के पास थे। हजारों-लाखों वर्षों की यात्रा उन अणुओं की है। उनसे आपका शरीर बना है। वह शरीर भी एक क्षेत्र है, एक जमीन है, जिसमें आप स्थापित हैं, लेकिन आप हैं नहीं। आप वही नहीं हैं, उससे अलग हैं।

यह सूत्र कहता है, मनुष्य शरीर भी नहीं है। इतना ही नहीं, यह सूत्र और गहरे जाता है और कहता है, मनुष्य मन भी नहीं है। क्योंकि मन भी तो संग्रह है।

आपके पास कोई भी ऐसा एक विचार है जो आपका हो? जिसको आप कह सकें मेरा? कोई विचार नहीं है। कोई परंपरा से आया, कोई शास्त्र से आया, कोई किसी से सुन कर, कहीं से पढ़ कर, कहीं न कहीं से आया है। अगर आप अपने एक-एक विचार की जन्मपत्री की खोज करें, और एक-एक विचार की यात्रा देखें, तो आप पाएंगे आपके पास एक भी विचार अपना नहीं है, सब विचार उधार हैं; सब कहीं से आए हैं।

कोई विचार मौलिक नहीं होता, ओरिजनल नहीं होता, सब विचार उधार होते हैं। पर विचार को भी हम कहते हैं, मेरा!

ध्यान रहे, श्वास तक मेरी नहीं कही जा सकती, विचार और भी सूक्ष्म बात है। लेकिन उसे भी मेरा नहीं कहा जा सकता। इस विश्लेषण में गहरे उतरते-उतरते कहां पहुंचता है आदमी? उपनिषद कहां पहुंचे हैं? बुद्ध कहां पहुंचते हैं? महावीर कहां पहुंचते हैं?

इस विश्लेषण को करते-करते, इस काट को करते-करते–यह भी मैं नहीं हूं, यह भी मैं नहीं हूं, यह भी मैं नहीं हूं–आखिर में जब काटने को कुछ भी नहीं बचता; जब कुछ भी नहीं बचता जिसको मैं सोच भी सकूं कि मेरा है या नहीं, तब भी जो बच रहता है; जब सब काट डाला जाता है और काटने का कोई उपाय नहीं रह जाता; जब सब तोड़ दिए जाते हैं संबंध और कोई संबंध बचता नहीं जिसे तोड़ा जाए, तब भी जो बच रहता है, उसी को उपनिषद साक्षी कहते हैं; वही है विटनेस।

यह बड़ा संसार है चारों तरफ, यह मेरा नहीं है। और सिकुड़ कर पास आता हूं, यह शरीर भी मेरा नहीं है। और भीतर उतरता हूं, यह मन भी मेरा नहीं है। फिर कौन है जिसको मैं कहूं मैं? या कि मेरे भीतर कोई भी नहीं है जिसको मैं कहूं मैं! मैं हूं या नहीं हूं? सब मेरे को तोड़ते-तोड़ते शुद्धतम क्या बचता है भीतर? एक चीज बच रहती है जो नहीं कटती। जिसको काटने का कोई भी उपाय नहीं है।

उपनिषद इसी की खोज में चलते हैं। साफ करते चले जाते हैं; एक-एक चीज को अलग करते जाते हैं, जैसे कोई प्याज के छिलके को उघाड़ता चला जाए। और जब तक छिलके बचते हैं, उघाड़ते ही चले जाते हैं। अगर प्याज के छिलके उघाड़ते चले जाएं तो पीछे आपके हाथ कुछ भी न लगेगा। प्याज छिलका ही छिलका है, वस्त्र ही वस्त्र; निकालते चले जाएं तो भीतर कुछ भी न मिलेगा। जैसे किसी ने कपड़ों की एक गुड़िया बनाई हो, और हम एक-एक कपड़ा निकालते चले जाएं। एक कपड़े को निकालें, दूसरा कपड़ा बचे। उसे निकालें, तीसरा निकल आए। निकालते चले जाएं, लेकिन कपड़े की ही गुड़िया हो तो आखिर में सब कपड़े निकल जाएंगे, गुड़िया पीछे बचेगी नहीं। आखिर में शून्य हाथ लगेगा।

तो बड़ी खोज यही है मनुष्य की कि आदमी भी कहीं पर्तों का ही एक जोड़ तो नहीं है? कि हम उघाड़ते चले जाएं और भीतर फिर कुछ बचे ही न! कह दें कि शरीर भी मैं नहीं हूं और मन भी मैं नहीं हूं; और यह भी नहीं और यह भी नहीं; फिर कहीं ऐसा न हो कि प्याज की कहानी हो जाए! आखिर में कुछ भी न बचे जिसको हम कह सकें कि मैं हूं।

लेकिन उपनिषद कहते हैं, अगर यह भी हो तो भी सत्य को जान लेना जरूरी है। अगर यह भी सत्य हो कि भीतर कुछ भी नहीं है, तो भी जान लेना जरूरी है; क्योंकि सत्य को जान लेने के परिणाम महत्वपूर्ण हैं। लेकिन खोज करने पर अंततः पता चलता है कि नहीं, वस्त्रों का जोड़ ही नहीं है आदमी, मात्र पर्त और पर्त और पर्त ही नहीं है, पर्तों के भीतर भी कुछ है जो पर्तों से भिन्न है। लेकिन उसका पता तभी चलता है जब हम सब पर्तों को उखाड़ कर भीतर पहुंच जाएं।

उस तत्व का नाम उपनिषद कहते हैं साक्षी। यह बड़ा कीमती शब्द है, और बड़ा मूल्यवान। और पूरब का सारा चिंतन, सारी मनीषा, सारी प्रतिभा, इस एक छोटे से शब्द में निहित हो गई है। इससे महत्वपूर्ण शब्द पूरब ने दूसरा दुनिया को नहीं दिया है–साक्षी।

साक्षी का मतलब क्या है? साक्षी का मतलब है- देखने वाला, गवाह।

मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? ऐसा
कौन इनकार करता चला जाता है कि मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं?

– ओशो

[अध्यात्म उपनिषद्]

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One thought on ““नेति-नेति” – ओशो

  • November 26, 2016 at 7:44 PM
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    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति …. very nice article …. Thanks for sharing this!! 🙂

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