“रुपयों की मान्यता” – ओशो

अगर माया असत्य है, फिर सच्चा धन कौन सा है ? 

एक ओंकार सतनाम’ नामक पुस्तक में गुरु नानक देव जी की वाणी जपु जी साहिब को समझाते हुए ओशो कहते हैं-

नानक सचे की साची कार।’ सच्चे का काम सच्चा है।

उस परमात्मा का जो कुछ भी है, वह सत्य है। तुम्हारा जो कुछ भी है, वह असत्य है। क्योंकि तुम्हारा होना ही असत्य है। असत्य से सत्य का कोई जन्म नहीं हो सकता। तुम जो भी बनाओगे वे ताश के पत्तों के घर होंगे। हवा का जरा सा झोंका भी उन्हें गिरा देगा। तुम जो भी बनाओगे वह कागज की नाव होगी। छूटते ही डूबने लगेगी। उसमें यात्रा नहीं हो सकती। अहंकार से निर्मित सभी कुछ असत्य होगा, क्योंकि अहंकार असत्य है। उस परमात्मा का जो भी है वह सत्य है। तुम्हारा जो भी है वह असत्य है।

यह जिस दिन तुम्हें समझ में आ जाएगा, उस दिन तुम असत्य को पैदा करने में श्रम न लगाओगे। उस दिन तुम असत्य को जानने में श्रम लगाओगे। संसारी का अर्थ है, जो असत्य को पैदा करने में लगा है। तुम्हारे संसार की असत्यता का तुम्हें ख्याल नहीं आता, क्योंकि उसमें तुम इतने लीन हो। तुम कभी जरा दूर खड़े हो कर नहीं देखे कि असत्यता कितनी भयंकर है।

एक आदमी नोट इकट्ठे करते जा रहा है। वह कभी नहीं सोचता कि नोट सिर्फ एक मान्यता हैकल सरकार बदल जाए, कानून बदल जाए, सरकार तय कर ले कि ये नोट रद्द हुए, काम के न रहे, तो कागज हो गए। एक मान्यता को इकट्ठा कर रहा है यह आदमी। और मान्यता ऐसी कि जिसका कोई भरोसा नहीं।

अमरीका में एक होटल है। उन्नीस सौ तीस के जमाने में, जब कि अमरीका में बहुत बड़ी आर्थिक गिरावट आयी, जिस आदमी का यह होटल है, उसके करोड़ों रुपए के बांड व्यर्थ हो गए। तो उसने सारी दीवाल पर बांड चिपका दिए। वे जो करोड़ों रुपए के बांड थे, पूरी दीवालें उस होटल की उसने बांड से सजा दीं। वे किसी काम के न रहे, वे दीवाल पर चिपकाने लायक हो गए। उनका कोई उपयोग न रहा।

और एक आदमी नोट पर जिंदगी लगा रहा है। बस, उसका काम ही इतना है कि कितने नोट बढ़ते जाते हैं, उनकी वह गिनती कर रहा है। तिजोड़ी में भरता जाता है नोट। उसे पता नहीं कि हर नोट के बदले में जिंदगी बेच रहा है। क्योंकि एक-एक पल कीमती है। और जिस ऊर्जा से परमात्मा से मिलन होता है, उस ऊर्जा को वह नोटों में लगा रहा है। और नोट सिर्फ मान्यता है। हजारों तरह की मान्यताएं रहीं दुनिया में, हजारों तरह के सिक्के रहे।

मैक्सिको में लोग, इस सदी के प्रारंभ तक, कंकड़-पत्थरों को सिक्के की तरह उपयोग करते थे। कंकड़-पत्थर ही से काम हो जाता था, क्योंकि मान्यता की बात है। तुम कागज का उपयोग कर रहे हो। कंकड़-पत्थर कागज से तो ज्यादा कीमती हैं। सोना मान्यता के कारण सोना है। अगर दुनिया की हवा बदल जाए–कभी भी बदल सकती है–लोग सोने को कीमत न दें, लोहे को कीमत देने लगें, तो तुम लोहे केशृंगार कर लोगे।

कौमें हैं अफ्रीका में, जो हड्डियों की कीमत करती हैं, सोने की कीमत नहीं करतीं, तो हड्डियों को गले में लटकाए हुए हैं। सोना फिजूल है। तुम उनसे कहो कि सोने को लटका लो, वे राजी नहीं हैं।

मान्यता का खेल है। और उस मान्यता के लिए तुम जीवन गंवा देते हो। लोग प्रतिष्ठा दें, इसके लिए तुम जीवन गंवा देते हो। लोगों की प्रतिष्ठा का क्या अर्थ है? कौन हैं ये लोग जिनकी प्रतिष्ठा के लिए तुम दीवाने हो? ये वे ही लोग हैं जो तुम्हारी प्रतिष्ठा के लिए दीवाने हैं। इनकी कीमत क्या है? नासमझों से अगर प्रतिष्ठा मिल जाए तो इससे तुम्हें क्या मिलेगा? और नासमझ भीड़ का कोई हिसाब है!

विंसटन अमरीका गया। एक सभा में बोला। बड़ी भीड़ थी, हाल खचाखच भरा था। सभा के बाद एक महिला ने उससे कहा कि आप जरूर प्रसन्न होते होंगे। जब भी आप बोलते हैं, हाल खचाखच भरा होता है।

विंसटन ने कहा, जब भी मैं हाल को खचाखच भरा देखता हूं, तब मैं सोचता हूं कि अगर मुझे फांसी लग रही होती तो कम से कम पचास गुना ज्यादा लोग मुझे देखने आए होते। इन लोगों का क्या भरोसा? ये मुझे ताली बजाने आए हैं, ये मेरी फांसी देखते, वहां भी ताली बजाते। तो जब भी मैं देखता हूं कि हाल खचाखच भरा है, तो पहले मैं सोच लेता हूं कि ये वे ही लोग हैं कि अगर मुझे फांसी लग रही हो, तो भी देखने आएंगे और मजा लूटेंगे। और अपने बच्चों को भी लाएंगे कि चलो, देख आओ। ऐसा अवसर फिर आए, न आए। इनका कोई भरोसा नहीं।

वे ही चेहरे, जब तुम गिर रहे होओगे तब भी ताली बजाएंगे। वे ही चेहरे, जब तुम उठ रहे होओगे तब भी ताली बजाएंगे। इन चेहरों को देख कर, इनकी गिनती करके, इनका मत मान कर, तुम कहां पहुंच जाओगे? ये तुम्हारे साथ हैं, इससे क्या साथ मिलता है? ये तुम्हें सिर पर भी उठा लें, तो इनका मूल्य क्या? इनकी ऊंचाई कितनी है? इनके कंधे पर बैठ कर तुम कितने ऊंचे हो जाओगे? लेकिन आदमी जीवन लगा देता है, कैसे प्रतिष्ठा मिले! कैसे पद मिले! कैसे लोगों का आदर मिले!

नानक कहते हैं कि अहंकार से तो जो भी पैदा होगा वह झूठ ही होगा। यह सब अहंकार की ही खोज है। और यह पारस्परिक है।

नेता तुम्हारे दरवाजे पर आता है। सिर झुका कर प्रणाम करता है, कि मत देना। तुम उसे मत देते हो, वह पद पर पहुंच जाता है। एक म्युचुअल, एक पारस्परिक अहंकार की तृप्ति कर रहे हो।

मैंने सुना है कि एक गांव में ऐसा हुआ कि एक आदमी, जो गांव का घंटाघर था, वह उसमें घंटे बजाता था। और गांव में छोटा एक टेलीफोन एक्सचेंज था। रोज टेलीफोन एक्सचेंज नौ बजे सुबह, किसी का फोन आता था कि कितना समय है? तो टेलीफोन एक्सचेंज उसको समय बता देता था। वह नौ के घंटे बजा देता था। और नौ बजे टेलीफोन एक्सचेंज जब घंटे बजते घंटाघर के तो अपनी घड़ी ठीक कर लेता था। यह सालों तक चला। यह तो अचानक एक दिन उस टेलीफोन एक्सचेंज वाले ने पूछा कि भाई, तुम हो कौन? रोज ही पूछते हो ठीक नौ बजे! उसने कहा कि मैं घंटाघर का रख वाला हूं। घंटे बजाने के लिए पूछता हूं कि कितना समय? उन्होंने कहा कि हद हो गयी! अब पता ही नहीं कि क्या हालत होगी समय की। क्योंकि हम तुम पर भरोसा कर रहे हैं, तुम हम पर भरोसा कर रहे हो।

एक पारस्परिक स्थिति है। मैं आपकी तरफ देखता हूं, आप मेरी तरफ देखते हैं। मैं आपका सम्मान करता हूं, आप मेरा सम्मान करते हैं। मैं आपके अहंकार को सहारा देता हूं, आप मेरे अहंकार को सहारा देते हैं। ऐसे यह सारा का सारा झूठ का बड़ा जाल है।

नानक कहते हैं, ‘उस मालिक का काम सच्चा। सच्चे का काम सच्चा।’

तुम पहले सत्य को खोजो। उसके पहले कुछ भी मत करो। क्योंकि उसके पहले तुम जो भी करोगे वह असत्य हो जाएगा। एक ही बात करने योग्य है कि सत्य को पहचानो। और फिर तुम कुछ करना। क्योंकि फिर सत्य तुम्हारे भीतर से कुछ करेगा।

‘प्रणाम करना हो तो उसे ही प्रणाम करो। वह आदि, शुद्ध, अनादि, अनाहद है। और युग-युग से एक ही वेश वाला है।’

यह ‘एक ही वेश वाला है’, इसे याद रखना। जो चीज भी बदलती हो, वह माया है, वह संसार है, वह असत्य है, सपना है। और जो चीज सदा शाश्वत रहती हो और कभी न बदलती हो, वही परमात्मा है। तो तुम इस सूत्र को अगर ठीक से पकड़ लो, तो तुम्हारे भीतर तुम आज नहीं कल, उसको खोज लोगे जो कभी नहीं बदलता है।

शायद निरीक्षण किया हो, न किया हो, तुम्हारे भीतर कोई ऐसा तत्व है जो कभी नहीं बदलता है। कभी क्रोध आता है, लेकिन चैबीस घंटे नहीं रहता। इसलिए क्रोध माया है। कभी प्रेम आता है, लेकिन प्रेम चैबीस घंटे नहीं रहता, प्रेम माया है। कभी तुम प्रसन्न होते हो, लेकिन प्रसन्नता टिकती नहीं, माया है। कभी तुम उदास होते हो, उदासी चैबीस घंटे नहीं रहती, सदा नहीं रहती, इसलिए माया है।

फिर क्या है तुम्हारे भीतर कुछ, जो चैबीस घंटे टिकता है? वह साक्षी का भाव है जो चैबीस घंटे टिकता है। जो चैबीस घंटे है। चाहे तुम जानो, चाहे न जानो। कौन देखता है क्रोध को? कौन देखता है लोभ को? कौन देखता है प्रेम को, घृणा को? कौन पहचानता है कि मैं उदास हूं? कौन कहता है कि प्रसन्न हूं? कौन कहता है बीमार हूं, स्वस्थ हूं? कौन कहता है कि रात नींद अच्छी हुई? कौन कहता है कि रात सपने बहुत आए? कि नींद हो ही न सकी?

चैबीस घंटे तुम्हारे भीतर एक जानने वाला है। जाग रहा है। वही चैबीस घंटे है। बाकी सब आता है, जाता है। तुम उसी को पकड़ो। क्योंकि उसी में थोड़ी परमात्मा की झलक है। इसलिए नानक कहते हैं कि प्रणाम करना हो तो उसे ही। क्योंकि वह अनाहद है। युग-युग से एक ही वेश वाला है।

आदेसु तिसै आदेसु।।

आदि अनीलु अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

– ओशो

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