“ओशो की मुख्य देशना” – ओशो शैलेन्द्र

ओशो-अमृत-दिवस पर ओशो शैलेन्द्र जी का उद्बोधन

19 जनवरी 2016, ओशो के छब्बीसवें अमृत दिवस के संदर्भ में कुछ बातें आपसे शेयर करना चाहूंगा।

ओशो से एक बार पूछा गया कि आप रोज सुबह-शाम डेढ़-डेढ़ घंटा प्रवचन देते हैं, हमें समझाते हैं, और पिछले कई सालों से बोल रहे हैं। क्या वह बात अभी तक पूरी नहीं हुई जो आप कहना चाहते हैं?

सदगुरु ने जवाब दिया कि वह बात ही अकथनीय है, वह भाषा में अभिव्यक्त नहीं होती। वह अवर्णनीय है, शब्दों में नहीं समाती। इसलिए मैं कितना ही बोलूं; वह बात कभी पूरी नहीं होगी। वह तो मौन में सुनी जाती है, बोली नहीं जाती। और एक दिन ऐसा आएगा कि जब मेरे शिष्य श्रवण में सक्षम हो जाएंगे, तब वे मेरे संग मौन सत्संग में बैठेंगे। मैं कुछ भी नहीं कहूंगा और तुम सुनोगे। वही असली बात होगी, उसके लिए मैं तुम्हें तैयार कर रहा हूं। थोड़ी रिहर्सल हो जाए चुप रहने की। शांत बैठने की तुम्हारी आदत हो जाए, तब असली बात होगी।

फिर एक दिन आया 25 मार्च 1981, जब ओशो ने घोषणा की, कि आज से उनके कार्य का एक नया आयाम शुरू होता है मौन सत्संग! वे आएंगे, बैठेंगे, संगीत बजेगा कुछ मिनट, फिर कुछ मिनट सन्नाटा होगा। ऐसा तीन-चार बार रिपीट होगा। संगीत, मौन, फिर संगीत, फिर मौन; और एक घंटे बाद ओशो विदा लेंगे। इस प्रकार यह प्रक्रिया शुरू हुई मौन सत्संग की। ओशो का इशारा आप समझ गए होंगे… संगीत सुनने के लिए जब हम तत्पर होते, शांत होते, झूमते, प्रफुल्लित होते; और अचानक संगीत बंद हो जाता। सदगुरु के निर्देशानुसार कुछ विशेष ढंग से संगीत के आयोजन किए गए। अचानक बंद होने का संकेत मिलते ही संगीतकार एकदम रुक जाते। उस गहन चुप्पी में अपने भीतर के संगीत यानी अनहद नाद में हम डूब सकें, ऐसी व्यवस्था की गई।

करीब साढ़े तीन साल बाद अक्टूबर 1984 के अंत में, एक दिन ओशो ने पुनः प्रवचन देना आरंभ कर दिया। क्योंकि अधिकांश लोग मौन सत्संग के लक्ष्य को प्राप्त करने से चूक रहे थे। सदगुरु जो बताना चाह रहे, उसको पकड़ नहीं पा रहे थे। अभी बहुतेरे लोग इस योग्य नहीं हुए थे कि निःशब्द वाणी को सुन सकें।

जनवरी 1987 में पूना आगमन के पश्चात आखिरी तीन साल की प्रवचनमालाओं में मुख्य रूप से उन्होंने झेन कथाओं पर प्रकाश डाला। झेन सद्गुरुओं की मुख्य देशना है ‘दि साउंड आफ वन हेंड क्लेपिंग’ अर्थात एक हाथ की ताली। यहां आपको यह भी याद दिला दूं कि 1981 में जब ओशो ने मौन धारण किया था उस समय जो अंतिम किताब प्रकाशित हुई थी उसका शीर्षक भी यही था ‘दि साउंड आफ वन हेंड क्लेपिंग’। 1987 से लेकर 89 तक ओशो मुख्य रूप से इस अनाहत संगीत के बारे में खूब विस्तार से समझाए, बारंबार इसी पर जोर दिए।

अंतिम नौ महिनों में वे पुनः मौन हो गए। जैसे इस शरीर के जन्म होने के पहले नौ महीने मां के गर्भ में रहते हैं ठीक वैसे ही 285 दिन का मौन- 10 अप्रेल से लेकर 19 जनवरी तक। ठीक गर्भकाल के बराबर, जैसे महाजीवन में महाजन्म लेने की तैयारी चली। वे मौन के गर्भ में समा गए, नाद में डूबे रहे

आखिरी तीन महिने में एक विशेष घटना घटी। ओशो की तरफ से संदेश आया कि जब वह शाम को बुद्धा हाल में आकर सब के संग बैठते हैं, उस समय कोई व्यक्ति फुसफुसाहट जैसी धीमी आवाज में, बहुत बारीक स्वर में कोई मंत्रोच्चार कर रहा है। उस मंत्र की ध्वनि उनके जीवन केंद्र पर चोट कर रही है और वह प्राणघाती साबित होगी। यह करुणावान सदगुरु का उपाय था कि अब तो जागो! यह उनकी डिव्हाइस थी, एक तरकीब थी कि सारे शिष्य अत्यंत सजग होकर सुनें

स्वामी अमृतो द्वारा बुद्धा हाल में घोषणा की गई कि उस व्यक्ति को खोजना है। वह आवाज कहां से आ रही है? ओशो कह रहे हैं कि वह आवाज उनकी दाहिनी तरफ से आ रही है। उस व्यक्ति को खोजो और उसे ऐसा करने से मना करो, वरना उनके जीवन को खतरा है।

अब सोचो, इतनी बड़ी बात… सभी शिष्य-शिष्याओं पर क्या गुजरी होगी? व्यवस्थापकों ने बड़े उलट-फेर किए। कभी दाहिने तरफ बैठने वालों को बायीं तरफ बैठाया, बायें वालों को दाहिने तरफ बैठाया। अचानक परिर्वतन किया जाता ताकि उस व्यक्ति को पकड़ सकें। सभी लोग बहुत सजग होकर सुनते कि कहां से आवाज आ रही है? लेकिन कोई भी पकड़ नहीं पाया। अनेक दफे श्रोताओं की वीडियो फिल्म बनाई गई। एक-एक आदमी का क्लोज-अप लिया जाता, फिर वीडियो फिल्म में ढूंढने का प्रयत्न होता। कोई कुछ उच्चार कर रहा है तो उसके होंठ तो हिल रहे होंगे। कई-कई प्रकार से प्रयास किए गए लेकिन कुछ बात न बनी। बार-बार ओशो का संदेश सुनाया जाता कि वह मंत्र उच्चार अभी भी बंद नहीं हुआ है, और ज्यादा गौर से सुनो। यह एक विधि थी। जिंदगी भर वह जिस प्रणवरूपी परमात्मा की ध्वनि को सुनाने की कोशिश करते रहे, अब उनके विदा होने का समय आ गया; अब तो उसे सुनो।

विदाई के पूर्व उन्होंने कई किताबों के नाम भी परिवर्तित किए। एक किताब का उपशीर्षक, सबटाईटल रखा- ‘सुन सको तो सुनो, थोड़ी देर और पुकारूंगा फिर मैं चला जाऊंगा।’

उन्होंने अपने लिए नया शयनकक्ष बनवाया। जिस च्वांग्त्सु आडिटोरियम नामक प्रवचनहाल में 500-600 श्रोता बैठ सकते थे, उस बड़े हाल को बेडरूम में बदलवाया। साउंड प्रूफ कांच से बनाई गईं उसकी दीवारें ताकि कहीं से कोई ध्वनि न आ सके। एयर कंडीसनर इतनी दूर लगवाया कि उसकी भी कोई आवाज वहां ना पहुंच सके। बनवाया तो उन्होंने बेडरूम कहकर, लेकिन उसमें दस-बारह दिन ही वे रहे और फिर अपने पुराने कमरे में वापिस चले गए। अंतिम दिन उन्होंने निर्देश दिया कि उस कक्ष में मेरी समाधि बनाना। वहां सब लोग आकर मौन ध्यान में बैठेंगे, कोई आवाज नहीं करेगा। सदगुरु ने इंतजाम किया कि सब लोग मौन समाधि में डूब सकें । सामूहिक समाधि में डुबकी लग सके, इसका आखिरी उपाय वे कर गए।

प्यारे मित्रो, सद्गुरु ने अपनी तरफ से जो भी प्रयत्न संभव था, वह किया। डिव्हाइस का मतलब होता है कि चाहे वह बात तथ्य नहीं है किंतु उपयोगी सत्य है। वह विधि की तरह हमारे काम आ सकती है। कई बार सीधा-सीधा सत्य हमारे काम का नहीं होता, उपयोगी नहीं होता। कोई प्राणघातक मंत्रोच्चार कर रहा है, ओशो ने यह बात हमारे श्रवण में इन्टेंसिटी लाने के उद्देश्य से कही। ताकि बड़ी त्वरा से, समग्रता से, टोटलिटी के साथ हम सुन पाएं- क्योंकि अब सद्गुरु के जीवन का सवाल है!

कितने सौभाग्यशाली हैं ओशोधारा के साधकगण, ओशो ने जो ओंकार की धारा बहानी चाही, उस अंतर्संगीत-सरिता में हम बह रहे हैं, और हजारों मित्रों की मदद कर पा रहे हैं। उस मार्ग पर चलना कितना सहज-सुगम है जो सद्गुरु ने प्रस्तावित किया है- ‘दि साउंड आफ वन हेंड क्लेपिंग’ एक हाथ की ताली, शून्य का संगीत, साउन्डलैस साउन्ड, निर्ध्वनि की ध्वनि, चाहे जो नाम दे दो!

सूफियों की एक किताब है ‘अल्लाह के सौ नाम’ लेकिन वास्तव में उसमें 99 ही नाम है। एक नाम मिसिंग है। कोई पहली बार पढ़ता है तो उसको लगता है शायद वह गिनती करना भूल गया, फिर से गिनता है। फिर लगता है कि शायद प्रिंटिंग मिस्टेक हो गई, कुछ छूट गया है, संपादन की भूलचूक हो गई। नहीं, न तो संपादन की गलती है, न गिनने में भूल-चूक हुई है। आपने ठीक गिना, 99 ही हैं। और ये 99 वस्तुतः परमात्मा के गुण हैं, उसके नाम नहीं। जो वास्तविक नाम है उसको तो छोड़ दिया गया है। जैसे कहा गया है अल्लाह रहमान है, अर्थात् दयालु है। यह तो उसका गुणधर्म हुआ। करूणावान तो एक क्वालिटी है, नाम नहीं। ठीक इसी प्रकार 99 जो नाम हैं वे प्रभु के गुण दर्शाते हैं। एक छोड़ दिया है क्योंकि वह कहा नहीं जा सकता, वह लिखा नहीं जा सकता, वह बोला नहीं जा सकता, किंतु सुना जा सकता है। वही असली नाम है- एक ओंकार सतनाम।

न केवल हमारे सदगुरु ओशो की मुख्य देशना ओंकार है, बल्कि आज तक जितने भी संबुद्ध हुए, भक्त हुए, तांत्रिक हुए या अन्य विभिन्न मार्गों पर चलने वाले ज्ञानमार्गी, सांख्यमार्गी, योगमार्गी आदि हुए; उन सबका इशारा उसी तरफ है। मौन संगीत, अनहद नाद, प्रणव; यही सब संतों के प्रभु तक पहुंचने का सरल-सुलभ रास्ता रहा है। हमें अपने सौभाग्य पर नाज है और आने वाले युगों के लिए यह बात इतनी सुगम हो गई जो कि ओशो के पहले कभी नहीं थी। इसे सदा गोपनीय तत्व माना जाता रहा।

इसी संबंध से एक बात और याद आती है 19 जनवरी का दिन था, सन् 1998 की बात है। मां प्रिया और हम दोनों सुबह रोज सक्रिय ध्यान किया करते थे। उस दिन ध्यान के पश्चात दोनों को ओंकार नाद सुनाई देने लगा। मुझे पहचान नहीं थी कि यही ओम् की ध्वनि हैं। मेरा डॉक्टर वाला दिमाग… मैंने सोचा शायद ब्लड प्रेसर बढ़ गया है या कान में कुछ खराबी हो गई अथवा ब्लड सुगर डाउन हो गई! अस्पताल पहुंचकर मैंने सारी जाचें कराईं। नाक-कान-गला विशेषज्ञ को अपना कान भी दिखाया। वे कहने लगे सब ठीक है कुछ खराबी नहीं है। सब टेस्ट की रिपोर्ट नॉर्मल आई।

सुबह सक्रिय ध्यान के तुरंत बाद मैं अस्पताल चला गया, जब 12 बजे घर लौटा तब मां अपनी ड्यूटी करने स्कूल चली गईं। शाम को हम दोनों मिले, आपस में अनुभव शेयर किया। जब मैंने बताया तो मां ने कहा अरे! मैं भी तुमसे कहने वाली थी- सुबह से मैं भी यही सुन रही हूं। हम लोगों ने विस्तार से जब वर्णन किया कि कैसी ध्वनि है; तब पता चला कि हम दोनों एक सी आवाज सुन रहे हैं। निश्चित ही दोनों को अचानक एक ही रोग तो नहीं हो सकता! वास्तव में ओशो की कृपा से ‘योग’ घटित हो रहा था, ‘रोग’ नही।

मां का अंदाज था कि यही ओंकार की ध्वनि है। उनके मंझले भाई स्वामी दीप ने कई वर्ष पूर्व ऐसे अनुभव का जिक्र किया था। वह तारीख इसलिए याद रह गई क्योंकि वह भी 19 जनवरी का दिन था और हम दोनों को यह बात स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आ रही थी कि हमें क्या हो रहा है? यह स्पष्ट हो रहा है कि आज ध्यान के पश्चात कुछ विचित्र सी शांति घेरे हुए है- रोज से भिन्न। लेकिन यह क्या है इसकी व्याख्या हम लोग नहीं कर पाये। रोज-रोज उसमें डूबते रहे। ठीक एक हफ्ते बाद 26 जनवरी को ओशो सिद्धार्थ जी का हमारे घर आगमन हुआ। स्वतंत्रता दिवस, छुट्टी का दिन था इसलिए वह तारीख भी याद है आज तक। उन्होंने हम लोगों से पूछा कि ध्यान में कुछ सुनाई देता है? हम लोग साफ-साफ नहीं समझ पाए कि वह क्या पूछना चाह रहे हैं? जब उन्होंने दो-तीन बार अलग-अलग ढंगों से पूछा कि कुछ सुनाई पड़ता है? तब हमें अचानक याद आया कि हां, एक सप्ताह से कुछ सुनाई पड़ रहा है। तब सिद्धार्थ जी ने हम लोगों को समझाया। सिद्धार्थ जी स्वयं पिछले एक बरस से यानी 1997 से ओंकार में डूबे हुए थे।

हम लोगों को एहसास हुआ कि उस 19 जनवरी को ओशो की विशेष कृपा हम दोनों पर बरसी। ओशो सिद्धार्थ जी का आना और बौद्धिक रूप से उस बात को समझाना भी महत्वपूर्ण रहा। अगर हमारी बुद्धि किसी चीज को नहीं समझती, उससे राजी नहीं होती, तो हम उसमें डूब नहीं पाते; क्योंकि हमें उसकी महिमा भी मालूम नहीं होती। हीरा हमको मिल गया लेकिन हम जौहरी नहीं हैं, हम पहचानते ही नहीं कि यह हीरा है; तब हमारे लिए मिला, या ना-मिला बराबर है। हीरा भी साधारण पत्थर जैसा ही रहेगा।

आज 19 जनवरी को ये बातें याद आईं। आप लोगों से शेयर करने का सुअवसर मिला।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
जय ओशो !!

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