“आतंकवादः कारण और निवारण” – ओशो सिद्धार्थ ‘औलिया’

प्रिय आत्मन्!

काठमांडु आता हूं तो ऐसा लगता है कि घर आ गया। आपका इतना प्रेम, इतना सम्मान तो खुशी देता ही है। लेकिन इससे ज्यादा आनंद मुझे तब मिलता है, जब मैं आपके मुस्कुराते चेहरे देखता हूं। मैंने इतने मुस्कुराते हुए चेहरे दुनिया में कहीं नहीं देखे। मैं नहीं जानता कि ओशोधारा में होने के कारण आपके चेहरों पर मुस्कुराहट है या नेपाल के होने के कारण। श्रेय किसी को जाए इससे कोई मतलब नहीं, लेकिन चेहरों पर मुस्कुराहट हो तो जीवन की दिशा ठीक है। अगर चेहरों पर मुस्कुराहट न हो तो जीवन की दिशा गलत है।

ऐसे ही हंसते-मुस्कुराते चेहरे कभी ईराक में दिखा करते थे। सीरिया में दिखा करते थे। वह संतो और फकीरों का जमाना था। मगर आज वहां किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं है। मैं बच्चों की कुछ तस्वीरें देख रहा था, बच्चों के चेहरों पर से मुस्कुराहट समाप्त हो गयी है। धीरे-धीरे सीरिया, ईराक, ईरान, सउदी अरबिया, साउथ अफ्रिका जैसे विश्व की बड़ी आवादी इसके चपेट में आ रही है।

हमें सोचना होगा कि विज्ञान ने इतना वैभव दिया, इतनी समृद्धि दी, लेकिन जीवन की दिशा का क्या हो गया। इस पर हम सबको मंथन करने की जरूरत है। क्योंकि जो आग आज सीरिया और ईराक में जल रही है, यमन और कुवैत में जल रही है, पाकिस्तान में जल रही है, हिन्दुस्तान में भी जलसा रही है, नेपाल में उसकी आंच अभी पहुंची नहीं है, मगर पड़ोस जल रहा हो तो पड़ोसी चैन से नहीं बैठ सकता। क्योंकि वही आंच कल हमें भी जला सकती है। इसलिए जीवन की दिशा को ठीक से समझ लो। हम सभी किसी न किसी रूप में धर्म से जुड़े हैं। कोई कह सकता है कि माओवादी धर्म से नहीं जुड़े हैं, माओवाद उनका धर्म है। धर्म की दो दिशाएं हैं। एक दिशा सद्गुरु की ओर ले जाती है। और दूसरी दिशा सिद्वांत की ओर ले जाती है। सद्गुरु हमारा चुनाव है और सिद्वांत भी हमारा चुनाव है। बाकी जो सिद्धांत से नहीं जुड़े होते हैं और न सद्गुरु से जुडे़ होते हैं, उनकी जिन्दगी दिशाहीन हो जाती है। उनकी जीवन की कोई दिशा नहीं होती है। लेकिन कम से कम वे लोग दूसरे के लिए अगर फायदेमंद नहीं हैं, तो हानिकारक भी नहीं हैं।

जिनकी जीवन की दिशा सद्गुरु की ओर जाती है, उनका परम उद्देश्य, उनका लक्ष्य क्या है? सत्यम-शिवम-सुंदरम्सत्यम् क्या है? सत्य की खोज। उनकी जिन्दगी में न्याय महत्त्वपूर्ण है। वे किसी पर अन्याय नहीं करते हैं और न्यास का साथ देते हैं। अभी दशहरा बीता है। राम की रावण पर विजय क्या है? सत्य की असत्य पर विजय। न्याय की अन्याय पर विजय। निश्चित जो सद्गुरु से जुड़ेंगे वे सत्यम की दिशा को अपनाएंगे। सत्य को खोजेंगे। शाश्वत को खोजेंगे। अमृत को खोजेंगे। प्रकाश को खोजेंगे।

फिर है शिवम्। उनके जीवन में मंगल का उदय होगा। ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखायः। जिसको भगवान बुद्ध कहते हैं-उनके जीवन में शुभता अवतरित हो गयी है। वे सबके मंगल के लिए परोपकार की दिशा में काम करेंगे ही करेंगे। यह नहीं हो सकता कि कोई सद्गुरु से जुड़ा हो और सत्य की खोज न करे। न्यास का साथ न दे। वे तटस्थ नहीं रह सकते हैं। कहीं भी अन्याय हो रहा हो, चाहे मनुष्य पर हो या पशु पर, वे अन्याय को नहीं देख सकते। क्योंकि वे बहुत संवेदनशील हो गये हैं, वे रह नहीं सकते हैं।

भारत के राष्ट्रकवि दिनकर कहते हैं- वह व्याध, जो पंछी को मार रहा है, केवल वही अपराधी नहीं है।
‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध;
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’

जो तटस्थ हैं, अन्याय को होते हुए देखते हैं; उनका भी अपराध है। जो सद्गुरु से जुड़ेगा, निश्चित वह किसी पर अन्याय नहीं करेगा और अन्याय का साथ भी नहीं देगा। चुपचाप अन्याय होते हुए भी नहीं देखेगा। शिवम न केवल वह न्याय का साथ देगा बल्कि शुभता के लिए भी कुछ करेगा। मंगल के लिए कुछ करेगा। जगत के लिए कुछ करेगा। और फिर सुंदरम क्या करेगा? इस जगत को थोड़ा और सुंदर बनाएगा।

मैं बच्चन की आत्मकथा पढ़ रहा था- ‘क्या भूलूं क्या याद करूं।’ इसमें उन्होंने कहा है कि पश्चिम का व्यक्ति जहां-जहां प्रकृति में गया है, उसने प्रकृति को थोड़ा और सुंदर बना दिया है। लेकिन भारत के लोग जहां-जहां गये हैं, उन्होंने प्रकृति को थोड़ा कुरूप किया है। जो नियम भारत पर लागू है, करीब-करीब यही नियम नेपाल के लिए भी लागू है।

सुंदरम की दिशा है कि जगत को और सुंदर बनाओ। और फूल खिलाओ। और जंगल लगाओ। इस जगत के जीवन को सुंदर बनाने के लिए कुछ करना है। यह धर्म की दिशा है, जो सद्गुरु से जुड़कर चलती है। अगर तुम सत्यम-शिवम-सुंदरम की दिशा में अपनी जिन्दगी ले जा रहे हो, तो तुम्हारे चेहरों पर मुस्कुराहट होगी और तुम्हारी जीवन की दिशा ठीक होगी। जब मैं आपके चेहरों पर मुस्कुराहट देखता हूं तो मुझे लगता है कि आप सबके जीवन की दिशा ठीक है।

लेकिन एक दूसरी भी दिशा है और ज्यादा लोगों की जीवन की दिशा वही है। उनकी आंच उन्हें भी प्रभावित करती है, जिनके चेहरों पर मुस्कुराहट है। बाकी कौन से लोग हैं? वे लोग जो सिद्धांत से जुड़े हुए हैं। गुरु से जुड़ोगे तो सिद्धि होगी, अनुभव होगा, अपने अनुभव से जिन्दगी को जियोगे। लेकिन अगर गुरु से नहीं जुड़े, सद्गुरु से नहीं जुडे़ और सिद्धांत से जुड़ गये हो, तो तुम्हारे जीवन में क्या होगा? जो सद्गुरु से नहीं जुड़े हैं, उनके जीवन में क्या हो रहा है? वे किसी न किसी वाद से जुड़ेंगे। वाद का मतलब- सिद्धांत। माओवाद, गांधावाद, लैनिनवाद और बड़े सारे वाद हैं। वहाबी वाद सबसे खतरनाक है। सलाफी वाद और भी खतरनाक है। क्योंकि जब वाद होगा तो विवाद भी होगा। यह हो ही नहीं सकता कि वाद हो और विवाद न हो। वाद, विवाद तक रूक जाए तो कोई दिक्कत नहीं, विवाद हो रहा है, बहस हो रही है। लेकिन जब विवाद होगा तो फसाद भी होगा। फसाद यानि हिंसा। नेपाल ने झेला है। नेपाल से ज्यादा दंश किसने झेला है? नेपाल ने देखा है कि बरसों तक विवाद हुआ और विवाद का परिणाम फसाद हुआ। मगर नेपाल ने जो देखा वह कुछ भी नहीं था। आज ईराक देख रहा है। आज सीरिया देख रहा है। यमन देख रहा है। नाइजेरिया रहा है। इसको समझना बहुत जरूरी है। धर्म का केंद्र जब सिद्धांत हो जाता है, तो सिद्धांत का परिणाम वाद-विवाद और फसाद कैसे हो गया? यह बात समझने की है। क्योंकि नेपाल में शुरुआत हो गयी है। तुम्हें पता नहीं चह रहा है, मुझे पता चल रहा है। लोग सोए हुए हैं।

जब अंग्रेज भारत में आए तो सबसे पहले सूरत में आए। व्यापारी बनकर आए थे। उस समय सम्राट अकबर का जमाना था। ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं कि किसी ने अकबर से कहा कि सूरत में कुछ अंग्रेज आए हुए हैं व्यापारी बनकर और मगर उनका इरादा ठीक नहीं लगता है। कुछ करो उनके लिए और उन्हें यहां से विदा करो। अकबर से कहा कि हमारा इतना बड़ा साम्राज्य है, कुछ मुट्ठी भर लोग कुछ कर रहे हैं करने दो। उपेक्षा कर दी। परिणाम क्या हुआ? एक दिन सारा भारत गुलाम हो गया। मैं भारत को यह बात बताना चाहूंगा। वह घड़ी नेपाल के जीवन में भी आ गयी है और हम सब इग्नोर कर रहे हैं। उपेक्षा कर रह हैं।

1905 में वहाबी आंदोलन शुरू हुआ और उसके बाद सलाफी आंदोलन शुरू हुआ। वहाबी क्या है? मिश्र में एक इस्लामिक फिलॅास्फर हुआ वहाबी। उसने कहा कि धर्म में गुरुओं का कोई स्थान नहीं है। पीरों का कोई स्थान नहीं है। फकीरों का कोई स्थान नहीं है। इसलिए जहां-जहां संत हों, फकीर हों, गुरु हों इनका सफाया करो। उसका सबसे बड़ा समर्थक सउदी अरब हो गया। सबसे पहले पीरों को, फकीरों को और सूफियों को सउदी अरब ने साफ कर दिया। आज से आठ-दस साल पहले सउदी अरब के कुछ मित्र आये थे। उन्होंने ध्यान समाधि की। उसके बाद उन्होंने मुझे निमंत्रित किया कि आप सउदी अरब चलें और वहां ध्यान समाधि कराएं। लेकिन एक बात है सूफीज्म की चर्चा मत करना। आप टीचर बनकर जाना गुरु बनकर नहीं। गलती से लोगों को यह पता नहीं लगना चाहिए कि आप किसी भी तरह से सूफीज्म से कनेक्टेड हैं। मैंने कहा- अगर पता चल जाए तो परिणाम क्या होगा? उन्होंने कहा- छः इंच छोटा (गला काट देना)। मैं फिर भी तैयार हो गया। लेकिन जो लोग हमें प्रेम करते हैं, उन्होंने कहा कि जाने की जरूरत नहीं है। सउदी अरब में कोई सूफी नहीं है। ईराक और ईरान जो सूफीज्म का गढ़ था, वहां भी सूफी खत्म कर दिए गये। उन सूफियों से जुड़कर, पीरों और फकीरों से जुड़कर लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट थी, लेकिन जब गुरुओं को खत्म का दिया गया, पीरों को, फकीरों को, सूफियों को खत्म कर दिया गया तो आज बच्चों के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं है। बच्चे सहमे हुए हैं।

अभी कुछ दिन पहले मैं एक फोटोग्राफ देख रहा था। कोई व्यक्ति कैमरा लेकर एक बच्चे की फोटो खींच रहा था। बच्चा डर गया कि यह कैमरा नहीं शायद रिवॅाल्वर है और उसने सेरेंडर के मुद्रा में हाथ उठा दिए। बच्चे इतने डर गये हैं। एक वीडियो हमने देखा- एक बच्ची अपनी मां को कविता सुना रही है, तभी धमाके की आवाज होती है और बच्ची गिर जाती है। यह वहाबी और सलाफ़ी मत का परिणाम है।

1905 के पहले ईराक, ईरान, सीरिया और सउदी अरब अलग था। लेकिन अब वहाबी और सलाफ़ी मत हिन्दुस्तान और नेपाल में भी आ गया है। जहां-जहां मदरसे खुल रहे हैं, सब जगह सउदी अरब से पैसा आ रहा है। एक शर्त पर पैसा दिया जा रहा है कि वहाबी मत का प्रचार करो अन्यथा पैसा नहीं दिया जाएगा। पूरे भारत में दस साल पहले 500 मदरसे थे और आज वहाबी मत के 5000 मदरसे हैं। मैं बाकी मदरसों की बात नहीं कर रहा हूं। मदरसे अच्छे हैं, विद्यालय हैं। मगर जो वहाबी मत से जुड़े हुए मदरसे हैं, मैं उनकी संख्या बता रहा हूं। सब मदरसों में बताया जा रहा है कि पीरों और फकीरों को साफ करो। जो लोग इस्लाम को नहीं मानते हैं, वे काफ़िर हैं और उनको भी साफ करो। यह फैक्ट्री खोली जा रही है। यह फैक्ट्री है। तराई (नेपाल) में जो मदरसे हैं, उनमें भी यही पढ़ाया जा रहा है। खूब पैसा आ रहा है, नेपाल के लोग खुश हैं। पैसा आने दो जिस नाम से भी आता हो, लेकिन यह कोई नहीं सोच रहा है कि यह पैसा आंतक पैदा करने के लिए आ रहा है। कल यह आंच पहुंच जाएगी और फिर क्या करोगे? क्या आग लगने पर कुंआ खोदोगे या कुंआ पहले से खोदकर रख दोगे? खुश नहीं होना है कि पैसा बाहर से आ रहा है। इस बात को जानना होगा कि पैसा किसलिए आ रहा है। हम आंख बंद करके नहीं बैठ सकते। निश्चित इस दिशा में कुछ करने और सोचने की जरूरत है।

कबीर साहब कहते हैं-
निगुरा मिले न एक, पापी मिले हजार।

मैं हजार पापियों को झेल सकता हूं, लेकिन एक निगुरा को नहीं झेल सकता। जो गुरु से न जुड़ा हो, मैं उसको नहीं झेल सकता। भारत में एक गाली है और बिहार में उसका रूप थोड़ा बदला है। मुझे पता नहीं है कि नेपाल में बिहार की वह गाली पहुंची है कि नहीं पहुंची! बिहार में खासकर गांव में जब औरतें बहुत गुस्सा हो जाती हैं तो वे कहती हैं- निगोड़ा कहीं का। नेपाल में शायद नहीं हैं। अच्छी बात है गाली नहीं पहुंचनी चाहिए, फूल पहुंचने चाहिए। वह ‘निगोड़ा’ शब्द ‘निगुरा’ का अपभ्रंश है। जिसका कोई गुरु ही नहीं है, वह बात करने लायक नहीं है। निगुरा कबीर साहब के जमाने में सबसे बड़ी गाली मानी जाती थी। जब मैंने पहली बार कबीर साहब को पढ़ा, तो मैं हैरान हुआ कि निगुरा होना क्या इतना बड़ा पाप है? लेकिब अब मैं वहाबी मत और सलाफ़ी मत को देखता हूं कि उन्होंने आंदोलन चला रखा है कि गुरुओं को साफ करो। न गुरु रहेगा, न सगुरा लोग पैदा होंगे।

चैनल वाले कुछ मित्र आए थे। उन्होंने कहा- आतंकवाद की समस्या का समाधान क्या है? मैंने कहा- वहाबी मत को साफ करो। गुरुओं को साफ करने की जरूरत नहीं है, तुम वहाबी मत को साफ करो। इस्माल प्यारा धर्म है, लेकिन हम वहाबी मत को इस्लाम मान लेते हैं, इसमें हमारी भी गलती है। इस्लाम तो मुहम्मद साहब के आधार पर चलता है। वह तो दीन-ए-मुहम्मदी है। वह तो प्रेम पर आधारित है। वह तो इश्क पर आधारित है। वह तो सूफीमत पर आधारित है। वह तो तसव्वुफ पर आधारित है। लेकिन जब उसमें सिद्धांत आ गया, विरोध हो गया गुरुओं का, तो बात गलत दिशा की ओर मुड़ गयी।

मैंने चैनल वालों से कहा कि आप भी संतों के खिलाफ बहुत कुछ बोलते हो। कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से तुम भी वहाबी मत का समर्थन कर रहे हो। तुम नहीं समझ रहे हो कि आज अगर तुम संतों के खिलाफ, गुरुओं के खिलाफ कुछ कह रहे हो तो तुम प्रछन्न वहाबी हो। तुम आतंकवाद का समर्थन कर रहे हो। आतंकवाद के समर्थन में प्रचार-प्रसार कर रहे हो। पत्रकारों को भी संभलने की जरूरत है। हम सब को संभलने की जरूरत है। अगर तुम चाहते हो कि सबके चेहरों पर मुस्कुराहट हो, ईराक और सीरिया की तरह चेहरे मुरझाए हुए न हों तो हमें इस बात को धार्मिकता की ओर लेना जाना होगा। धर्म से धार्मिकता की ओर। क्योंकि धर्म का आधार अब सिंद्धांत हो गया है और धार्मिकता का आधार सद्गुरु हो गया है। धार्मिकता सद्गुरु से जुड़कर चलती है और धर्म सिद्धांत से जुड़कर चलता है। जो भी धर्म सिद्धांत से जुड़कर चलेगा वह हिंसा की ओर बढ़ेगा और जो धर्म धार्मिकता की ओर मुड़ेगा, सद्गुरु की ओर मुड़ेगा, निश्चित उसके जीवन में उत्सव होगा, प्रेम होगा, आनंद होगा।

मैं आप सबको बधाई देता हूं कि आप धार्मिकता से जुड़े हो, सद्गुरु से जुड़े हो। आप इसलिए भी बधाई के पात्र हो कि आपके जीवन मे शुभता का उदय हुआ है। आपकी जीवन की दिशा असत्य से सत्य की ओर है। आपकी जीवन की दिशा तमस से ज्योति की ओर है। आपकी जीवन की दिशा मृत्यु से अमृत की ओर है। आपकी जीवन की दिशा सत्यम की ओर है, शिवम की ओर है, सुंदरम की ओर है। लेकिन यह फसल तभी तक लहलहाती रहेगी जब तक बाड़े से सुरक्षित है। अगर इस फसल के चारों तरु धार्मिकता का बाड़ा नहीं लगाया गया, प्रज्ञा का बाढ़ा नहीं लगाया गया तो फिर यह फसल ज़्यादा दिन तक नहीं बच सकती। समझ का उपयोग करना होगा, ताकि धर्म और धार्मिकता की फसल जो ओशोधारा में लहरा रही है, यह पूरे विश्व में लहराये। इसके लिए हम सबको कुछ करना होगा। हमें लोगों को यह समझाना होगा कि जैसे अकबर ने उपेक्षा कर दी और उसका परिणाम बुरा हुआ, ऐसे ही अगर तुमने भी उपेक्षा कर दी, तो जो वहाबी मदरसों में आंतक की फसल तैयार हो रही है, आंतक की आग जल रही है यह कल तुम्हारे घरों को भी जलाएगी।

इस बात के प्रति हमें सावधान रहना होगा। जो हम कर सकते हैं, हमें करना होगा। तटस्थ रहने से काम नहीं चलेगा।
‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध;
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’

इसलिए सावधान हो जाओ। मैं एक उदाहरण के साथ अपनी बात पूरी करना चाहूंगा। मैं धनबाद सी.एम.पी.डी. आई. में कार्यरत था। सुबह दस बजे एक सज्जन मेरे पास आए। वे वहीं काम करते थे। उन्होंने कहा कि आपसे एक सवाल पूछना है। मैंने कहा- पूछिये। उन्होंने कहा कि सीता की चोरी तो रावण ने की थी लेकिन हनुमान ने पूरी लंका क्यों जला दी? जब शुरू-शुरू में कोई आफिस जाता है तो कुछ नया प्लान लेकर जाता है। आज आफिस में यह काम करना है, वह काम करना है। मैंने उनको टालने के लिए कह दिया कि डेड बजे लंच ब्रेक में आना फिर बात करेंगे। वे चले गये। मैंने सोचा कि बला टली। मगर वे डेड बजे आ गये। उन्होंने कहा कि बताइये? मैंने सोचा कि अब तो ये आ ही गये हैं, अब तो बताना ही पड़ेगा। फिर मैंने चिंतन किया। मैंने उनसे कहा कि सारी लंका कहां जली थी, विभीषण की कुटिया तो नहीं जली थी। उन्होंने कहा- हां, नहीं जली थी। मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने इस बात पर चिंतन किया कि बाकी लंका जली और विभीषण की कुटिया नहीं जली। उन्होंने कहा- ‘नहीं, आप ही बता दीजिए।’ मैंने कहा- ‘केवल एक विभीषण ही था, जिसने रावण को जाकर कहा कि भैय्या, किसी की पत्नी चुराना ठीक नहीं है। किसी की पत्नी उठाना ठीक नहीं है और तुम तो जगत जननी जानकी का अपहरण करके ले आए!! यह बात ठीक नहीं है। रावण ने विभीषण की खूब पिटाई की। कोई बात नहीं। अगर विभीषण रोक नहीं पाया, तो उसने टोका तो। इसी पुण्य की वजह से उनकी कुटिया बच गयी।

‘अपराधी तो अपराधी है, चुप्पी भी गलती आधी है।’

रावण ने अपराध किया, लेकिन बाकी लंका वाले क्या कर रहे थे? वे चुप होकर उस अपराध में शामिल थे। तुम्हें चुप नहीं रहना है। अन्याय के विरोध में आवाज उठानी है। न्याय का साथ देना है ताकि जब लंका जले तो तुम्हारी कुटिया न जले। इस बात को ठीक से समझना है। तुम सोचो कि इस दिशा में क्या कर सकते हो, ताकि यह जो मनुष्यता की फसल है, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ हमारा संदेश है, जो प्रेम और आनंद की फसल है, आज जो तुम्हारे चेहरों पर मुस्कुराहट है, वह मुस्कुराहट सात अरब लोगों तक पहुंचनी चाहिए। हमें इस दिशा में काम करना है और इसके लिए यही मेरा आज का संदश भी है और यही मेरा आज का आर्शीवाद भी है।

हरिओम तत्सत!

– ओशो सिद्धार्थ ‘औलिया’

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