“आतंकवाद की जड़ कहां?” – ओशो शैलेन्द्र

प्रश्नः ऐसा लगता है कि हम सब सभ्य इंसानों के अंदर भी सुसंस्कृत वेशभूषा में कोई आतंकी छिपा है, जो छोटे-मोटे मौके पाकर, समय-समय पर अपना असली रूप प्रगट कर देता है। जिनको बड़ा अवसर प्राप्त हो जाता है, वे विशाल पैमाने पर लोगों को डराने लगते हैं। शक्ति पाकर उग्रवादी बनने की भयावह संभावना बीज रूप में सबमें मौजूद है। क्या मेरी यह प्रतीति ठीक है?

उत्तरः आपका अनुमान बिल्कुल ठीक है। उग्र स्वभाव वाले व्यक्तियों के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करें।

संसार के हित की खातिर अपनी जान भी जोखिम में डालने वालों के मन में निश्चित ही कोई ऐसा सपना होता है जिसे वे अत्यंत महान समझते हैं; वे किसी बहुत उच्च आदर्श में भरोसा करते हैं। इतनी बड़ी भलाई के लिए फिर छोटी-मोटी बुराई करने की मजबूरी, बुराई जैसी नहीं लगती- ‘नैसेसरी ईविल’ का रूप ले लेती है। कुरूपता, सुंदरता के वस्त्र धारण कर लेती है।

डरा-घमका कर बच्चों से अपनी बात मनवाना अधिकांश माता-पिता को उचित प्रतीत होता है। किसी पुरानी हिन्दी फिल्म में एक मां अपनी बगावती पुत्री से कहती है कि बेटी, मैं तुझे इतना प्यार करती हूं कि तेरी भलाई के लिए चाहे तेरे प्राण भी ले लूं; मगर तुझे गलत रास्ते पर न जाने दूंगी।

दुनिया के ‘सेल्फ-एपान्ईटेड पेरेन्ट’ अथवा ‘सेल्फ-एपान्ईटेड टीचर’ अर्थात् विश्व का भला करने वाले महापुरुष, विशेषकर राजनेता, समाज सुधारक, धर्मगुरु, संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी, विद्वान वक्ता एवं लेखकगणों को पता भी नहीं चलता कि कब वे अपने सिद्धांत के प्रचार-प्रसार में ‘विज्ञापन’ की सीमा लांघकर ‘जबरदस्ती’ पर उतर आते हैं। ‘प्रजातांत्रिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान’ और ‘अपने विचारों को सर्वश्रेष्ठ मानने का अभिमान’ इन दोनों के बीच पतली सी भेद-रेखा है। आशा एवं सफलता के नशे में चूर व्यक्ति जाने-अनजाने इस रेखा को प्रायः पार कर जाता है।

उग्रवाद का अर्थ है अपने वाद को बलपूर्वक मनवाने के लिए उग्ररूप धारण करना। दूसरों को पृथक ढंग से जीने का अधिकार न देना। जो मुझसे ‘अलग’ है, वह ‘गलत’ है; ऐसी मान्यता व्यक्ति को तानाशाही बनाती है। कूप-मंडूक वाली संकीर्ण मनोवृत्ति उसे आतंकवादी बनने को उकसाती है।
हर मनुष्य के मन में अहंकार का भाव है- मैं अन्य से श्रेष्ठ, सही, न्यायसंगत और बेहतर हूं। यह ‘सुपीरियरिटी काम्प्लैक्स’ ही ‘टैरोरिज्म’ का बीज है। इसके प्रति जागृति, कट्टर होने की संभावना को समाप्त करती है। चाहे दूसरे हमें गलत दिख रहे हैं, फिर भी उन्हें वैसे होने की स्वतंत्रता का हक है। हाँ, मुझे भी अपने मतानुसार जीने का अधिकार है, बशर्ते कि मैं दूसरों की स्वाधीनता में बाधा न पहुंचाऊं।

स्वयं को परिवार, संस्था, समाज अथवा देश के ठेकेदार समझने वाले व्यक्ति को बारंबार सचेत कराने की जरूरत है कि अगर आपकी बात में दम है तो लोग स्वयं ही मानेंगे। यदि लोग नहीं मान रहे हैं तो मामला स्पष्ट है कि आपके विचार में प्राण नहीं हैं। सदा स्मरण रखें कि गणतंत्र में केवल बहुमत को ही नहीं, अल्पमत को भी जीने का बराबर हक है। बाहरी जगत से साम्राज्यवाद तो लगभग ‘आउट ऑफ डेट’ हो चुका है परंतु मनुष्य जाति के अवचेतन मन में ‘जंगल का कानून’ अभी तक गहरी जड़ें जमाए हुए है- ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’!

यह कहावत ‘सत्यमेव जयते’ कितनी सच है, गूगल जाने! ( यह ‘गॅाड नोज’ या ‘अल्लाह जाने’ का पर्यायवाची नया मुहावरा है। ) गूगल जानता है कि जो जीत जाता है वही सत्य कहलाने लगता है- ‘विजयी सत्य भवते’!!

– ओशो शैलेन्द्र

 

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