ओशो सिद्धार्थ जी का साक्षात्कार (Interview) !

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित सदगुरु ओशो सिद्धार्थ जी का साक्षात्कार :- 

Q. ओशो ने दुनिया के तकरीबन हर टॉपिक पर इतना कुछ बोला है कि मूल भाव के पकड़ने में कुछ दिक्कत हो सकती है। आपके हिसाब से ओशो के दर्शन में सार रूप में कौन-सी पांच मूल बातें हैं?
A.

1. ध्यान में जियो यानी बंद आंख में जो निराकार दिखता है, उसके प्रति जागो।
2. समाधि में जियो यानी अंतर-आकाश के प्रति जागो। अंतर-आकाश का अर्थ है, गहराई के साथ निराकार को देखना।
3. साक्षी में जियो यानी आत्मस्मरण में जियो और कर्म करो।
4. सुमिरन में जियो यानी परमात्मा को जानो और उसके प्रेम में जियो, भक्त बनकर जियो।
5. अभी और यहीं में जियो यानी आती सांस परमात्मा की याद में और जाती सांस आत्मा की याद में चले।
यहां दो बातें और समझ लें। सनातन परंपरा में अध्यात्म के दो मार्ग हैं- एक है निवृत्ति मार्ग यानी ज्ञानमार्ग, ऑल एक्सक्लूजिव। यह बड़ा शुष्क मार्ग है। दूसरा है- प्रवृत्ति मार्ग यानी भक्ति मार्ग, ऑल इन्क्लूजिव। पहली बार ओशो ने तीसरे मार्ग यानी संवृत्ति मार्ग की बात की जिसमें इन दोनों का समावेश है।

Q. ओशो ने 10 हजार बुद्ध पुरुष बनाने का विजन बनाया था, मगर ओशो के सबसे नजदीकी शिष्य भी उनकी जायदाद, वसीयत और कॉपीराइट को लेकर आजकल आपस में झगड़ा कर रहे हैं।
A. जो लोग झगड़े में उलझ रहे हैं, उन्होंने अपने भीतर की यात्रा की ही नहीं है। तभी वे बाहरी चीजों में इतना रस ले रहे हैं। उन्हें व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। असल में ओशो ने अध्यात्म का पूरा विज्ञान तो दिया लेकिन वह साधना करा नहीं पाए। लोग सोचते हैं कि ओशो ने जो ध्यान की विधियां बताई हैं, वही असली बात हैं जबकि ओशो ने खुद कहा है कि ये विधियां ध्यान की तैयारी मात्र हैं। ओशो ने यह तो बताया कि क्या करना है, किंतु कैसे करना है- यह नहीं बताया और इसके लिए किसी जीवित गुरु को पकड़ने की बात कही है। हमने इस कमी को पूरा किया है। ओशो के 10 हजार बुद्ध पुरुषों के विजन को हम पूरा करेंगे। ओशोधारा से अभी तक 7-8 हजार लोग ज्ञान समाधि कर चुके हैं। मैं मानता हूं कि उनमें से 98 प्रतिशत लोग यह जान चुके हैं कि वे देह नहीं, आत्मा हैं। बस एक ही दिक्कत है कि लोग समझ तो गए हैं, मगर जी नहीं पा रहे हैं। इसके लिए थोड़ा अभ्यास चाहिए।

Q. ओशो से ओशोधारा कितनी अलग है?
A. ओशो से बिल्कुल अलग नहीं है। ओशोधारा ओशो की ही परंपरा में है। जब भी कोई युगपुरुष आता है तो उसके बाद एक स्कूल तैयार हो जाता है जो कहता है कि आखिरी गुरु हो गया और अब आगे किसी गुरु की जरूरत नहीं है। जैसे बुद्ध आए, तो कहा गया कि वह आखिरी बुद्ध हैं। लेकिन बुद्ध के बाद मंजूश्री ने कहा कि परंपरा को अगर आगे ले जाना है तो आगे भी गुरु की जरूरत होगी। इसलिए मंजूश्री के साथ जो लोग चले, उन्हें महायानी कहा गया यानी गुरु एक जहाज की तरह होता है जिसमें अनेक लोग सवार होकर भवसागर को पार करते हैं। लेकिन बाकी शिष्यों ने कहा कि बुद्ध ने जो कहा, उसी को समझना काफी है। उन लोगों को हीनयान कहा गया। करीब-करीब सभी गुरुओं के साथ यही हुआ। हजरत मुहम्मद के साथ भी यही हुआ। लेकिन उनके बाद मौला अली से सूफियों की जीवंत परंपरा चली। सूफी भी गुरु परंपरा में विश्वास करते हैं। ओशो भी विदा हुए तो लोग ऐसी ही बात करने लगे लेकिन हम लोगों ने महसूस किया कि शास्त्र के आधार पर परंपरा जीवित नहीं रह सकती, शास्ता (बुद्ध पुरुष) के आधार पर जीवित रह सकती है। यही सोचकर मैंने ओशोधारा की शुरुआत की। फिर इसमें ओशो शैलेंद्र जी और मां प्रिया जुड़ीं।

Q. ओशोधारा में तीन-तीन गुरु क्यों हैं?
A. मैंने देखा कि कई परंपराएं मृत हो गईं। इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि गुरु एक ही होता था। कोई भी गुरु जब आता है, तो वह बहुत-सी खोजें करता है। लेकिन अगर गुरु बेवक्त विदा हो जाए तो उसके साथ ही चीजें खत्म हो जाती थीं। नए गुरु को फिर नए सिरे से वे खोजें करनी पड़ती थीं। इसीलिए कई पुरानी परंपराएं लुप्त हो गईं। यही सोचकर हमने तीन गुरुओँ की परंपरा रखी ताकि सभी एक साथ विदा न हो जाएं। इसकी जो जीवंतता है, इसके जो प्रयोग हैं, वे आगे भी चलते रहें। फिर, परंपरा एक व्यक्ति से असुरक्षित रहती है क्योंकि एक व्यक्ति की सत्ता को चुनौती देना भी आसान होता है। तीन की सत्ता में एक सुरक्षा है।

Q. क्या गुरु का होना जरूरी है? बुद्ध, महावीर के तो गुरु नहीं थे। जे. कृष्णमूर्ति ने गुरु बनने से इनकार कर दिया था।
A. कृष्णमूर्ति की गुरु एनी बेसेंट थीं। बुद्ध के तो 99 गुरु थे। पगला बाबा, मग्गा बाबा ओशो के गुरु ही थे। गुरु नानक देव, सूफी बाबा, ओशो मेरे गुरु थे। अगर ज्ञान चाहिए तो गुरु की जरूरत होगी ही। सामान्य शिक्षक ज्ञान साझा करता है और आध्यात्मिक गुरु अपना अनुभव। अगर ऐसा गुरु उपलब्ध हो तो इतना भी क्या अहंकार कि हम उसके बगैर ही यात्रा करेंगे।

Q. सही गुरु की पहचान कैसे करें?
A. अपनी प्रज्ञा होनी चाहिए यह जानने के लिए कि अनुभव की पूंजी किसके पास है। आज 99 प्रतिशत गुरु अपनी विद्वता, कर्मकांड और ज्योतिष के आधार पर गुरु बन गए हैं। ये गुरु कहलवा रहे हैं लेकिन गुरु हैं नहीं। जो एक प्रतिशत गुरु हैं अनुभव वाले, उनको ढूंढने की तरकीब कबीर ने बताई है- ‘हीरा परखे जौहरी, शब्दहि परखे साध। कबिरा परखे साध को ताको मता अगाध।।’ कबीर ने साफ कसौटी दी है- जहां ओंकार की चर्चा है, वहीं सत्संग है और जो नाद श्रवण और नाद के स्रोत तक ले जा सके, वही सद्गुरु है।

Q. आपने ओशोधारा में कई नए कार्यक्रम शुरू किए हैं। यहां तक कि वे कार्यक्रम पुणे आश्रम में भी कभी नहीं रहे। क्या आप ओशो से कहीं असहमत भी हैं?
A. अध्यात्म में कभी भी कार्यक्रमों की सीरीज नहीं रही है। बुद्ध के समय में भी सत्संग तो साथ होता था, मगर ध्यान अकेले ही कराया जाता था। सबसे पहले ओशो ने ही समूह में नौ दिन का ध्यान कराने की परंपरा शुरू की। फिर उसे तीन दिन का कर दिया था। हमने भी पहले तीन दिन से शुरुआत की थी किंतु दूरदराज से आनेवालों ने कहा कि आने-जाने में ही उनका काफी वक्त लग जाता है। फिर हमने तीन कार्यक्रमों को मिलाकर इसे नौ दिन का कर दिया, तो लोगों को छुट्टी की दिक्कत होने लगी। तब हमने इसे छह दिन का निश्चित किया ताकि वीकेंड का भी इस्तेमाल हो जाए। इस प्रकार ओशो समेत तमाम परंपराओं में जो कुछ भी कहा गया है – बुद्ध, कबीर, लाओत्से समेत – चाहे वह हठयोग हो या तंत्र, ऐसे तमाम आधुनिक रहस्यों का व्यावहारिक ज्ञान देने की व्यवस्था आज अगर कहीं है, तो यहीं है। ओशो से कहीं असहमति नहीं है, सिर्फ इतना है कि ओशो ने सिद्धांत के रूप में जो कुछ भी समझाया, उसे हमने एक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है। ओशो ने खुद ऐसे मिस्ट्री स्कूल की परिकल्पना की थी, जहां अध्यात्म का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाए। ओशो ने खुद ज्ञान मार्ग की साधना की, पर जीवनभर वह भक्ति मार्ग की साधना पर जोर देते रहे। ओशोधारा में दोनों की सिनर्जी की गई है। यह ओशो के दर्शन से भटकाव नहीं, बल्कि ओशो के कहे का अमल है।

Q. ओशो ने जिस कर्मकांड का जिंदगी भर विरोध किया, उसे ओशोधारा में अपनाने की बात कही जाती है, जैसे ज्योतिष, पूर्वजन्म, हवन में देवी-देवताओं का आगमन वगैरह।
A. ओशो ने ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ पुस्तक में ज्योतिष और शिव की सत्ता को स्वीकार किया है। सारी दुनिया में ‘पास्ट लाइफ रिग्रेशन’ (पिछले जन्मों की याद) ओशो के विदा होने के बाद आया है। इसकी एक अहम किताब है ‘जर्नी ऑफ सोल्स।’ इसे माइकल न्यूटन ने लिखा है। इसमें दैवी सत्ता को साफ तौर पर स्वीकार किया गया है। मैंने खुद कभी देवी-देवताओं की पूजा नहीं की लेकिन जब माइकल न्यूटन की शिष्या जेरी ने मुझे ‘पास्ट लाइफ रिग्रेशन’ कराया, तब मुझे भी स्वीकार करना पड़ा। हमारे यहां महाजीवन-प्रज्ञा कार्यक्रम में आत्म-सम्मोहन के माध्यम से सैकड़ों लोग पिछले जन्मों में जा चुके हैं और लोगों ने इंसान से अलग दूसरे रूपों में भी अपने जन्मों को देखा है। ओशो ने भी माना है कि वैदिक युग में लोग देवी-देवताओं से बात करते थे। धीरे-धीरे वह विधा खो गई लेकिन हमने उसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। जो आधुनिक ज्ञान है, उसे सिर्फ इसलिए नहीं ठुकराया जाना चाहिए कि पहले के संतों, महापुरुषों ने उसकी चर्चा नहीं की।

Q. जो विधियां पूर्व के संतों ने नहीं दीं, ओशो ने भी जिस पर कुछ नहीं कहा, आपको वे विधियां कैसे हासिल हुईं?
A. ऐसा नहीं कि पहली बार मुझे ही यह पता चला। कई संतों ने इस बारे में खूब इशारे किए हैं। पूर्व जन्मों के गुरु भी मदद करते हैं। समय के साथ पूर्व जन्मों का अर्जित ज्ञान आप पर प्रकट होने लगता है।

Q. बहुत-से लोगों को ओशोधारा की जानकारी ही नहीं है।
A. संत सुमिरन में जीता है। मैं प्रसिद्धि से दूर रहा हूं। प्रसिद्धि के पीछे अगर आप भागेंगे तो आपसे मिलने-जुलने वाले बहुत से लोग होंगे। इससे सुमिरन बाधित होता है। इसलिए, हमने प्रचार पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। फिर भी, मैं मानता हूं कि आप जो कुछ भी करते हैं, उसकी जानकारी लोगों को होनी चाहिए।

Q. आपका रुटीन क्या है?
A. मैं आश्रम में दो सेशन लेता हूं- एक ध्यान का और एक ओशो दरबार यानी सत्संग का। मेरा ज्यादातर समय सुमिरन में बीतता है। आस्था चैनल पर प्रवचन के लिए भी चिंतन करना पड़ता है। हमारे जितने भी कार्यक्रम हैं, उसे अनुभव के आधार पर लगातार अपडेट करने पर भी ध्यान देना होता है।

Q. यानी ओशोधारा एक बहता पानी है, ऐसा नहीं कि आपने जो कर दिया, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा?
A. बिल्कुल। हमने इसके लिए सभी कार्यक्रमों के एक-एक सेशन का मैनुअल तैयार किया है किंतु उसमें लगातार नई चीजें जुड़ती जाती हैं ताकि कार्यक्रम को अधिक रुचिकर एवं प्रभावशाली बनाया जा सके। अगर आप कोई कार्यक्रम आज करें और वही कार्यक्रम कुछ समय बाद दुहराने आएं तो आपको कम से कम 25 प्रतिशत बदलाव दिखेगा उसमें। यह एक दूसरा आकर्षण है यहां के कार्यक्रमों के प्रति साधकों में। आने वाले सद्गुरु त्रिविर चाहें तो इस मैनुअल को पूरी तरह बदल सकेंगे, चाहें तो पुराने मैनुअल से कोई चीज बाद के कार्यक्रमों में शामिल कर सकेंगे।

Q. आम तौर पर गुरु अपने बताए कार्यक्रम से छेड़छाड़ करने की छूट नहीं देते। मसलन, गोयनका जी विपश्यना में कुछ भी जोड़ने-छोड़ने के सख्त खिलाफ हैं।
A. अगर किसी अनुभवी व्यक्ति को परिवर्तन की छूट न दी जाए तो परम्परा खत्म हो जाती है। ज्ञान तो गंगा की तरह है। वह बहती रहनी चाहिए। साधना के दो आयाम हैं। एक है, ऑब्जेक्टिव अवेयरनेस और दूसरा, सब्जेक्टिव अवेरयनेस। गोयनकाजी ने विचार सतियोग, भाव सतियोग और अनापान सतियोग को रखा है। किंतु ये सब ऑब्जेक्टिव अवेयरनेस की बातें हैं। शरीर, विचार, भाव, सांस आदि के प्रति जागरूकता की बातें हैं। ये सब आत्मा का हिस्सा नहीं बल्कि आकार का हिस्सा हैं। गोयनका जी की परंपरा में सांस पर ध्यान दिया जाता है जबकि सांस आत्मा का हिस्सा नहीं है। बुद्ध का मूल दर्शन है- शून्य सतियोग जिसे गोयनकाजी ने स्वीकार नहीं किया। जागरूकतापूर्वक चक्रमण (भ्रमण) पर बुद्ध ने बहुत जोर दिया था जिसे गोयनका जी ने छोड़ दिया। बुद्ध के मंदिर का गर्भगृह है- ध्यान यानी शून्य के प्रति जागना मगर उसे भी गोयनका जी ने छोड़ दिया । बुद्ध ने आत्मा को आत्मा न कहकर अनत्ता या शून्यता कहा है। जब तक आपने शून्य सतियोग नहीं किया, तब तक आत्मा का ज्ञान हो ही नहीं सकता और जब तक आत्मा का ज्ञान नहीं हो, तब तक आत्मज्ञान नहीं हो सकता। मैं सांस या विचार को चाहे जितना देखता रहूं, मैं आत्मा को नहीं जान सकता। जो सांस या विचार को देखता है, वह तो निराकार है। उसी निराकार में नाद गूंजता है, नूर जगमगाता है। यह नादमय, नूरमय निराकार ही आत्मा है। इसलिए जब तक आप शून्य सतियोग न कर लें, तब तक आत्मज्ञान हो ही नहीं सकता। इसलिए गोयनका जी की विपश्यना करने वाले लोगों को आत्मविस्मरण का रोग हो जाता है। वे भुलक्कड़ हो जाते हैं। इसलिए ओशो ने कहा है कि गोयनका जी की विपश्यना बंद की जानी चाहिए।

Q. आपका निष्कर्ष गलत भी तो हो सकता है।
A. हो सकता है, इसलिए नई व्याख्या के लिए हमने द्वार खुला रखा है। ओशो ने सिर्फ यह कहा है कि क्या करना है। कैसे करना है, यह ओशो ने नहीं कहा है। युग के अनुरूप सत्य बदलता है, मगर परमसत्य हमेशा वही रहता है। वाणी से जो भी कहा जाता है, वह सत्य हो सकता है, परमसत्य नहीं। परम सत्य केवल अनुभव में आता है। मेरे बाद कोई दूसरे रूप में भी इसकी व्याख्या कर सकता है। इसलिए मैंने पूरी व्यवस्था को ओपन रखा है कि अगर बाद के गुरु पिछले गुरु के कहे में किसी बदलाव को अनिवार्य मानें, तो निस्संकोच करें। राधास्वामी में भी, खासकर नाद-श्रवण के संबंध में, बाद के गुरुओं ने अपने पहले के गुरुओं के निर्देशों को बदला है।

Q. मुरथल आश्रम ओशो इंटरनेशनल रिजोर्ट जैसा आलीशान नहीं है।
A. जहां भव्यता होगी, वहां साधना नहीं होगी क्योंकि साधना थोड़े ही लोगों में होती है। राधास्वामी जैसी जीवंत परंपरा और उनसे अलग हुए कुछ संगठनों में भी सारा ज्ञान होने के बावजूद ठीक से साधना नहीं हो पा रही क्योंकि वहां आने वाले लोगों की संख्या हजारों और कई बार लाखों में होती है और इतने ज्यादा लोगों को एक साथ साधना कराना मुमकिन ही नहीं है। वे बड़े ईमानदार लोग हैं और इस तथ्य को स्वीकार भी करते हैं।

Q. दूसरे किन आश्रमों में आपके हिसाब से ठीक काम हो रहा है?
A. सावन कृपाल मिशन है, उसमें नाद और नूर की साधना ठीक कराई जा रही है। दिव्य ज्योति जागरण संस्थान है। इसमें नाद का ज्ञान ठीक दिया जा रहा है लेकिन जिसे वे नूर बता रहे हैं, वह नूर है ही नहीं। हालांकि आशुतोषजी महाराज ने जो साधिकाएं तैयार की हैं वे बहुत उम्दा कोटि की हैं। विश्वास मेडिटेशन में भी निराकार से जागने की शिक्षा ठीक दी जा रही है। उन्हें ध्यान की समझ तो है, मगर समाधि या ओंकार का ज्ञान उन्हें नहीं है। बाकी जो पश्चिमी संस्थाएं हैं, माइंडफुलनेस से जुड़ी हुई, वे बुद्ध के ध्यान से अलग हैं क्योंकि ध्यान माइंडफुलनेस नहीं है, बल्कि माइंडफुलनेस के पार जाना है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आज ओशो की परम्परा में दुनिया में कहीं भी ठीक से ध्यान नहीं हो रहा क्योंकि दरअसल लोगों को पता ही नहीं है कि वास्तव में ध्यान है क्या।

Q. आशुतोष महाराज के शरीर को डीप फ्रीजर में रखने के बारे में आपका क्या कहना है?
A. गलत तो है ही। आशुतोष महाराज ने कभी नहीं कहा कि मेरे शरीर को कैसे रखा जाए। यह दुर्भाग्य है कि एक मृत व्यक्ति को समाधिस्थ घोषित कर लोगों को गुमराह किया जा रहा है।

Q. श्रीश्री रविशंकर की सुदर्शन क्रिया, आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में क्या कहेंगे?
A. सुदर्शन क्रिया और आर्ट ऑफ लिविंग में ध्यान है ही नहीं। ध्यान है- निराकार के प्रति जागना। मगर रविशंकर जी खुद ही कहते हैं कि जो ध्यान करता है, वही जानता है कि ध्यान क्या है। यह तो कोई बात नहीं हुई। मैं मानता हूं कि परमसत्य को जाना भी जा सकता है और व्यक्त भी किया जा सकता है। हां, उन्हें प्रज्ञा गुरु तक कह सकते हैं क्योंकि वे समझ की बात करते हैं। लेकिन आध्यात्मिक गुरु नहीं कह सकते। उन्हें ध्यान, समाधि, सुमिरन, साक्षी आदि का कुछ पता नहीं है। आखिर किसी संगीतकार को चित्रकार के रूप में कैसे स्वीकार किया जा सकता है?

Q. तो आप प्राणायाम की भूमिका को नकारते हैं?
A. नहीं। प्राणायाम की जरूरत है। इससे आपकी सांस गहरी चलती है जिससे ऊर्जा सहस्त्रार की ओर जाती है। मगर ध्यान रहे, यह ध्यान की यात्रा में सहायक तो हैं किंतु खुद में ध्यान नहीं है। पतंजलि ने भी नहीं कहा कि प्राणायाम ध्यान है। रामदेव जी भी दावा नहीं करते कि वह ध्यान या समाधि में ले जा सकते हैं। ओशोधारा में प्राणायाम का उपयोग ध्यान और समाधि में ले जाने के लिए किया जाता है।

Q. ईशा फाउंडेशन के सद्गुरु योग भी कराते हैं।
A. उनको ध्यान वगैरह का कोई पता नहीं है। हां, वह अच्छे वक्ता हैं।

Q. और योगानन्द जी की संस्था जो क्रियायोग सिखाती है?
A. योगानन्द जी नाद से परिचित थे। पुरानी जो परम्पराएं थीं, उनमें नाद श्रवण अंतिम हुआ करता था। क्रियायोग में ओंकार अंतिम है, मगर हम वहां से अपनी शुरुआत करते हैं।

Q. ब्रहमाकुमारी?
A. ओशो ने महेश योगी के भावातीत ध्यान और ब्रह्माकुमारी के राजयोग- दोनों को धार्मिक दुर्घटना कहा है। ब्रह्माकुमारी की शिक्षा मान्यता पर टिकी हुई है कि मैं शांत आत्मा हूं। वहां अनुभव या आत्मज्ञान की साधना नहीं है। उनकी बातें नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।

Q. पश्चिमी संत मूजी महर्षि रमण की इस सीख पर जोर देते हैं कि शरीर और मन के लेवल से बाहर निकलने की जरूरत है।
A. महर्षि रमण की मूल देशना है- समाधि। वह खुद समाधि में जाते थे। दक्षिण भारत में पंचतत्वों के मंदिर हैं। महर्षि रमण की साधना इन्हीं पांच तत्वों की साधना थी। बाद में महर्षि रमण सांख्य योगी हो गए। सांख्य योगी और वेदांती जितने भी हैं, वे कहते हैं कि मैं चैतन्य आत्मा हूं। रमण नाद को, नूर को नहीं जान पाए। जनक, अष्टावक्र, मेहर बाबा हों या जे.कृष्णमूर्ति- जितने भी सांख्ययोगी थे, वे बता नहीं पाए कि तुम सब्जेक्टिव अवेयरनेस हो, चैतन्य हो, प्रेम हो। सांख्यवादी संत साधना नहीं कराते, सीधे जागरण की बात करते हैं।

Q. कई बार लगता है कि धर्म मेल-मिलाप नहीं, खून-खराबे की वजह बनता जा रहा है। खाड़ी के देशों को ही देख लें।
A. इसका एक बड़ी वजह इस्लाम का इतिहास है। इस्लाम के व्याख्याकारों ने हजरत मोहम्मद की बातों को खूब तोड़ा-मरोड़ा है। भारत में भी औरंगजेब की किताब फतवा-ए-आलमगिरी को कुरान और हदीस के बाद सबसे पवित्र किताब माना जाता है। मोहम्मद, बुद्ध और कृष्ण के अनुभव में कोई भेद नहीं है। व्याख्या करनेवालों ने इस्लाम के 72 फिरके कर दिए और अब हर फिरका दूसरे को काफिर कह रहा है। सारा जिहाद इसी का नतीजा है, जो असल में उनका अंतर्संघर्ष है।

Q. आप बुद्धत्व की बात करते हैं लेकिन बुद्ध ने तो आत्मा की अवधारणा को ठुकराया था।
A. ऐसा नहीं कि बुद्ध ने आत्मा को नहीं माना। बुद्ध ने सिर्फ शब्द बदला, शून्यता या अनत्ता कहा। शब्द बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आत्मा कहने से लगता है कि वह अस्तित्व से कटा हुआ है। शून्यता कहने से लगता है कि वह अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। सिर्फ इतना भेद है। ‘मैं’ का शुद्ध होना ही आत्मा है, इससे कोई बुद्ध कैसे इनकार कर सकता है? सारा विवाद मत माननेवाले खड़ा करते हैं। जाननेवालों में कोई भेद नहीं होता।

Q. ओशो अपने आखिरी बरसों में बुद्धिजम या जेन पर ही बोलते रहे, बाकी सबकुछ उन्होंने खारिज कर दिया था।
A. यह लोगों की अपनी व्याख्या है। ओशो अंत में बुद्धिजम या जेन पर बोल रहे थे क्योंकि वे दूसरे विषयों पर पहले बोल चुके थे। ओशो ने जो कहा है, उसके संदर्भ अलग-अलग रहे हैं। उन्हें उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

Q. ध्यान या दीक्षा के लिए फीस लेना कितना जायज है?
A. हर आश्रम की व्यवस्था पर कुछ खर्च आता है। यह पैसा या तो डोनेशन से आ सकता है या सहयोग राशि के जरिए। ओशोधारा में ध्यान कार्यक्रम बिल्कुल फ्री है। साधकों से ली जा रही सहयोग राशि उनके रहने-खाने पर ही खर्च होती है। हम सरकार से कोई फंड नहीं ले रहे। आप स्कूल में भी जाते हैं तो कुछ न कुछ फीस देते ही हैं।

Q. ओशोधारा में साधकों को कराए जाने वाले कार्यक्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब कुल मिलाकर 28 कार्यक्रम हो गए हैं।
A. यहां किसी को बाध्य नहीं किया जाता। लेकिन कार्यक्रमों की रूपरेखा इतनी रुचिकर है कि साधक खुद बार-बार आना चाहते हैं।

Q. पहले दो कार्यक्रमों के बीच तीन महीने का गैप अनिवार्य था, अब वह भी हटा दिया गया है।
A. कार्यक्रमों की संख्या जब बढ़ी तो साधकों ने कहा कि तीन-तीन महीने के गैप पर कार्यक्रम करने में पूरे 28 कार्यक्रम करने में कई साल लग जाएंगे। बहुत-से साधक ठीक तीन महीने पर आ भी नहीं पाते थे। इसलिए इस शर्त को हटाया गया है।

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