“कार्यकर्ताओं के लिए सुझाव !” – ओशो

जीवन क्रांति के सूत्र-1 (कार्यकर्त्ताओं से चर्चा) 
(लोनावला – 4 दिसंबर, 1967 )

जब भी किसी नए विचार को, किसी नई हवा को, लोकमानस तक पहुंचाना हो तब जो लोग पहुंचाना चाहते हैं, उनकी एक विशेष मानसिक तैयारी अत्यंत जरूरी और आवश्यक है। यदि उनकी मानसिक तैयारी नहीं है तो वे जो पहुंचाना चाहते हैं उसे तो नहीं पहुंचा पाएंगे। बल्कि हो सकता है उनके सारे प्रयत्न जो वे नहीं चाहते थे वैसा परिणाम ले आएं।

मानसिक तैयारी से मेरा क्या प्रयोजन है, क्या अर्थ है?

एक तो- जिन लोगों ने भी जगत में मनुष्य के हृदय तक कोई नए विचार-बीज पहुंचाए हैं, मनुष्य के हृदय में कोई नई फसल उगाने की कोशिश की है, उसकी भूमिका में बहुत गहरे प्रेम, बहुत गहरी दया और करुणा का हाथ रहा है।

दो बातें हैंः एक तो जो विचार हम करते हैं वह विचार हमें प्रीतिकर लगता है इसलिए हम उसे लोगों तक पहुंचाएं। साथ ही जिन लोगों तक पहुंचाना है, उनके प्रति हमें इतना प्रेम मालूम होता है कि हम इतनी महत्वपूर्ण बात उन तक बिना पहुंचाए नहीं रुकेंगे। अकेला विचार के प्रति आदर का भाव खतरनाक भी हो सकता है। जिन लोगों तक हमें पहुंचाना है उनके प्रति प्रेम; वे ऐसी स्थिति में हैं कि उन तक पहुंचाना है इस ख्याल को ज्यादा जरूरी और केंद्रीय होना चाहिए। क्योंकि जब उनके प्रति हमें प्रेम नहीं होता और केवल किसी विचार को पहुंचाने की तीव्रता हमारे मन में होती है, तो हम जाने-अनजाने लोगों के साथ हिंसा करना शुरू कर देते हैं।

ऐसा पूरे मनुष्य जाति के इतिहास में होता रहा है। मुसलमानों ने सारी दुनिया में जाकर लोगों के मंदिर तोड़ दिए, मूर्तियां तोड़ दीं। एक ख्याल के वशीभूत होकर कि मूर्ति परमात्मा तक पहुंचने में बाधा है। फिर इस ख्याल को पहुंचाने के लिए वे इतने दीवाने हो गए कि इस बात की फिकर ही छोड़ दी कि जिन लोगों तक पहुंचाना है, कहीं उनकी हत्या तो नहीं हुई जा रही, कहीं वे दबाए तो नहीं जा रहे, कहीं उनके साथ हिंसा तो नहीं हो रही। उन्हें विचार इतना महत्वपूर्ण हो गया कि जिस तक पहुंचाना है, वह कम महत्व का हो गया। सारी दुनिया में आज तक विचारों को पहुंचाने वाले लोगों ने बहुत हिंसा की है। और वह हिंसा इस कारण हो सकी कि विचार तो बहुत महत्वपूर्ण हो गया और जिस तक पहुंचाना है, उसकी कोई फिकर न रही। यह ख्याल में रखना जरूरी है विचार कितना ही महत्वपूर्ण हो लेकिन विचार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह है जिस तक हमें पहुंचाना है। वह गौण नहीं है। वही मूल्यवान है। और हम विचार को सिर्फ इसलिए उस तक पहुंचाना चाहते हैं।

एक भूखा आदमी है। उसके पास हम भोजन पहुंचाते हैं। भोजन का कोई मूल्य नहीं है, मूल्य तो उस आदमी की भूख का है। वह भूखा है इसलिए हम भोजन पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन अगर भोजन महत्वपूर्ण हो जाए और वह आदमी भोजन लेने से इनकार कर दे और हम उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगें और जबर्दस्ती पकड़कर, हथकड़ियां डालकर उसको भोजन कराने लगें तो फिर हमें भोजन महत्वपूर्ण हो गया और उसकी भूख कम महत्वपूर्ण हो गई। अब तक दुनिया में ऐसा ही हुआ है। विचार महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस तक पहुंचाना है, जो भूखा है वह कम महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि हमारे लिए विचार इतना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण तो वही व्यक्ति है- वह जो दुख और पीड़ा में खड़ा हुआ आज का मनुष्य है वही महत्वपूर्ण है। उसके उपयोग में आ सके कोई बात तो हम सेवा के लिए तैयार हैं। लेकिन उस पर कुछ थोप नहीं देना है। कोई फेनेटिक ख्याल पैदा नहीं हो जाना चाहिए कि उसे उस पर थोप देना है। ऐसा अक्सर हो जाता है, सहज हो जाता है, अनजाने हो जाता है। हमें पता भी नहीं होता। तो वह ध्यान में रखना जरूरी है। जब काम को बड़ा करने का ख्याल पैदा हो गया तो वह काम सच में कैसे बड़ा होगा, कैसे उदात्त होगा उसकी सारी भूमिका भी ध्यान में रख लेनी जरूरी है।

तो पहली तो बात यह ध्यान में रख लेनी जरूरी है।

दूसरी बात यह ध्यान में ले लेनी जरूरी है कि हम जो इस दिशा में काम करने वाले मित्र होंगे इन मित्रों को बहुत सा आत्म-परीक्षण, बहुत सा आत्म-निरीक्षण करना होगा। आप अकेले हैं तब तक कोई बात नहीं, आप जैसे भी हैं ठीक हैं। लेकिन जिस दिन आप कोई बात किसी दूसरे तक पहुंचाना चाहते हैं उस दिन अत्यंत विचार की, अत्यंत निरीक्षण की जरूरत पड़ जाती है। उस दिन यह बहुत ध्यान रखने की जरूरत है कि मैं क्या बोलता हूं, कैसे बोलता हूं, क्या मेरा व्यवहार है? क्योंकि एक बड़े विचार को लेकर जब मैं जा रहा हूं तो मेरे विचार का उतना ही आदर होगा जितनी मेरे व्यक्तित्व और मेरे व्यवहार की गहराई होगी। क्योंकि मेरे विचार को तो लोग बाद में देख पाएंगे, मुझे पहले देख लेंगे। मैं तो उन्हें पहले दिखाई पड़ जाऊंगा। मेरा विचार तो मेरे पीछे आएगा। मुझे देखकर वह मेरे विचार और मेरे जीवन-दर्शन के प्रति उत्सुक होंगे।

तो जब भी कोई संदेश पहुंचाने के किसी काम में संलग्न होता है तो संदेश पहुंचाना अनिवार्य रूप से एक आत्मक्रांति बननी शुरू हो जाती है। तब उसका व्यवहार, उसका उठना-बैठना, उसका बोलना, उसके संबंध, सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। और वे उसी अर्थ में महत्वपूर्ण हो जाते हैं जितनी बड़ी बात वह पहुंचाने के लिए उत्सुक हुआ है। वह वाहक बन रहा है, वह वाहन बन रहा है किसी बड़े विचार का। तो उस बड़े विचार के अनुकूल उसे अपने व्यक्तित्व को जमाने की भी जरूरत होती है। नहीं तो अक्सर यह होता है कि विचार के प्रभाव में हम उसे पहुंचाना शुरू कर देते हैं और हम यह भूल ही जाते हैं कि हम उसे पहुंचाने की पात्रता स्वयं के भीतर खड़ी नहीं कर रहे हैं। इस पात्रता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

साधक का काम उतना बड़ा नहीं है जितना कार्यकर्त्ता का बड़ा है। साधक अकेला है, अपने में जीता है, अपने लिए कुछ कर रहा है। कार्यकर्त्ता ने और भी बड़ी जिम्मेवारी ली है। वह साधक भी है और जो उसे प्रीतिकर लगा है उसे पहुंचाने के लिए वह माध्यम भी बन रहा है। तो यह माध्यम का ख्याल…। और यह माध्यम कैसा हो, कैसे लोगों तक पहुंचा सकेगा, छोटी-छोटी चीज से फर्क पड़ जाता है। एक-एक शब्द से फर्क पड़ जाता है। इधर तो मैं देखता हूं एक छोटी सी बात थोड़े से और ढंग से कही जाए तो किसी के हृदय में पहुंच जाती है। थोड़े और ढंग से कही जाए तो कोई लड़ने को तैयार हो जाता है।

राजा भोज के दरबार में एक ज्योतिषी आया। उसने राजा भोज का हाथ देखा और कहा कि तू अत्यंत अभागा व्यक्ति है। अपने लड़के को अरथी पर तू ही चढ़ाएगा। अपनी पत्नी को भी अरथी पर तू ही चढ़ाएगा। तेरे सारे लड़के, तेरी सारी लड़कियां- तू ही उनको मरघट तक पहुंचाएगा। भोज ने क्रोध से उस ज्योतिषी को हथकड़ियां डलवा दीं और कहा कि इसको जाकर जेलखाने में बंद कर दो। कैसे बोलना चाहिए यह भी इसे पता नहीं है क्या बोल रहा है पागल।

कालिदास बैठकर यह सारी बात सुनते थे। वह ज्योतिषी चला गया तो कालिदास ने कहा कि उस ज्योतिषी को पुरकार देकर विदा कर दें। राजा ने कहा, उसे पुरकार दूं। सुनते हो तुम उसने क्या कहा था। कालिदास ने कहा कि क्या मैं भी आपका हाथ देखूं? कालिदास ने हाथ देखा और कहा कि आप बहुत धन्यभागी हैं। आप सौ वर्ष के पार तक जीएंगे। आप बहुत लंबी उम्र उपलब्ध किए हैं। आप इतने धन्यभागी हैं कि आपके पुत्र भी आपकी उम्र नहीं पा सकेंगे, पीछे छूट जाएंगे।

राजा ने कहा, क्या यही वह कहता था? कालिदास ने कहा यही वह कह रहा था लेकिन उसके कहने का ढंग बिल्कुल ही गड़बड़ था। भोज ने उसे एक लाख रुपए इनाम दिया उसे विदा किया सम्मान से। और उससे जाते वक्त कहा, मेरे मित्र अगर यही तुझे कहना था तो ऐसे ही तूने क्यों न कहा। तूने कहने का ढंग कौन सा चुना?

जोशुआ लीयनमेन करके एक यहूदी विचारक और पुरोहित था। उसने संमरण लिखा है कि जब मैं युवा था और पहली दफा गुरु के आश्रम में शिक्षा लेने गया तो मेरा एक मित्र भी मेरे साथ, था हम दोनों को सिगरेट पीने की आदत थी। हम दोनों ही परेशान थे कि क्या करें, क्या न करें? सिर्फ एक घंटा मानेटरी के बाहर ईश्वर चिंतन के लिए बगिया में जाने को मिलता था। उसी वक्त पी सकते थे सिगरेट और तो कोई मौका न था। लेकिन फिर भी यह सोचा कि पीने के पहले गुरु को पूछ लेना उचित है तो मैं और मेरा मित्र दोनों पूछने गए। जब मैं पूछकर वापस लौटा तो मैं बहुत क्रोध में था क्योंकि गुरु ने मुझे मना कर दिया था। और जब मैं बगीचे में आया तो मेरा क्रोध और भी बढ़ गया क्योंकि मेरा मित्र तो आकर बेंच पर बैठा हुआ सिगरेट पी रहा था। मालूम होता है कि गुरु ने उसे हां भर दी। यह तो हद अन्याय हो गया। मैंने जाकर उस मित्र को कहा कि मुझे तो मना कर दिया है उन्होंने क्या तुम्हें हां भर दी है या कि तुम बिना उनकी हां किए ही सिगरेट पी रहे हो। उस मित्र ने कहा कि तुमने क्या पूछा था? लीयनमेन ने कहा कि मैंने पूछा था कि क्या हम ईश्वर चिंतन करते समय सिगरेट पी सकते हैं, उन्होंने कहा नहीं बिल्कुल नहीं।

लीयनमेन ने अपने मित्र से कहा, तुमने क्या पूछा था? उसने कहा मैंने पूछा था क्या हम सिगरेट पीते समय ईश्वर चिंतन कर सकते हैं। उन्होंने कहा हां। बिल्कुल कर सकते हो। ये दोनों बातें बिल्कुल एक थीं। ईश्वर चिंतन करते समय सिगरेट पीएं या सिगरेट पीते समय ईश्वर चिंतन करें। लेकिन दोनों बातें बिल्कुल अलग हो गईं। एक बात के उत्तर में उसी आदमी ने इनकार कर दिया। दूसरी बात के उत्तर में उसी आदमी ने हां भर दिया। निश्चित ही कौन वीकार करेगा कि ईश्वर चिंतन करते समय सिगरेट पीओ। कौन अवीकार करेगा कि सिगरेट पीते समय ईश्वर चिंतन करें या न करें। कोई भी कहेगा अच्छा ही है। अगर सिगरेट पीते समय भी ईश्वर चिंतन करते हो तो बुरा क्या है, ठीक है।

उस दूसरे युवक ने कहा कि पहले मेरे मन में भी वही पूछने का ख्याल आया था क्योंकि सीधी बात वही थी। लेकिन फिर तत्क्षण मुझे ख्याल आया कि भूल हो जाएगी। अगर मैं पूछता हूं कि ईश्वर चिंतन करते समय सिगरेट पी सकता हूं तो मैंने पहले ही जान लिया था कि उत्तर नहीं में मिलने वाला है। लीयनमेन ने लिखा है कि फिर मैंने जिंदगी में बहुत बार इसका प्रयोग किया और तब तो धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि दूसरे आदमी से हां या न निकलवा लेना उस आदमी के हाथ में नहीं, तुम्हारे हाथ में है

वह दूसरे आदमी को पता भी नहीं चलता कि तुमने कब उससे हां निकलवा ली या कब तुमने न निकलवा ली। और अगर दूसरा आदमी न करता है तो सोच लेना कि हमसे कहीं कोई भूल हो गई। हो सकता है हमारे भाव बिल्कुल सही हों, हमारा ख्याल सही हो, सिर्फ हमारा मौजूद करने का ढंग गलत हो गया होगा। अन्यथा इस दुनिया में कोई भी आदमी न करने को तैयार नहीं है। हर आदमी हां करना चाहता है। लेकिन हां कहवाने वाले लोग, उनकी तैयारी, उनकी समझ, उनकी सूझ उस सब पर निर्भर करता है कि हम कैसे मौजूद करते हैं

– ओशो 

[जीवन क्रांति के सूत्र: प्रवचन-1]

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