“मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई क्या है?” – ओशो

प्रश्न: भगवान! आधुनिक मनुष्य की सब से बड़ी कठिनाई क्या है?

पुरानी सारी कठिनाइयां तो मौजूद हैं ही, कुछ नई कठिनाइयां भी मौजूद हो गई हैं। पुरानी कठिनाइयां कटी नहीं हैं। बुद्ध के समय में या कृष्ण के समय में आदमी के लिए जो समस्याएं थीं वे आज भी हैं। उतनी ही हैं। उनमें से एक भी समस्या विदा नहीं हुई। क्योंकि हमने समस्याओं के जो समाधान किए वे समाधान नहीं सिद्ध हुए। हमारे समाधान थोथे थे, ऊपरी थे। समस्याओं की जड़ को उन्होंने नहीं काटा। हम केवल ऊपर ही लीपापोती करते रहे।

क्रोध था किसी के भीतर, तो हमने क्रोध का दमन सिखाया। लेकिन दमित क्रोध नष्ट नहीं होता। दमित क्रोध और भी प्रज्वलित होकर भीतर जलने लगता है। साधारण आदमी जो कभी—कभी क्रोध कर लेता है, बेहतर है उस आदमी से जो क्रोध को दबाकर बैठ रहता है क्योंकि साधारण आदमी का क्रोध रोज—रोज बह जाता है, संगृहीत नहीं होता। जिसने दमन किया हो उसके भीतर बहुत संग्रह हो जाता है। और तब उसका विस्फोट होगा तो भयंकर होगा।

हमने दमन सिखाया सदियों तक; इससे आदमी रूपांतरित नहीं हुआ, सड़ गया। इससे आदमी आत्मवान नहीं हुआ, विकृत हुआ, विक्षिप्त हुआ। विमुक्ति के ना पर हमने जो बातें लोगों को सिखायी उन्होंने केवल पंखड़ी बनाया। बाहर कुछ भीतर कुछ। दिखाने के दांत और, खाने के दांत और। ऐसे हमने आदमी के जीवन में द्वैत पैदा कर दिया।

वे सारी समस्याएं वैसी की वैसी खड़ी हैं। और वे सारी समस्याएं समाधान मांगती हैं। नई समस्याएं भी खड़ी हो गई हैं; जिनका अतीत के मनुष्य को कुछ भी पता न था। जैसे एक नई समस्या खड़ी हो गई है कि मनुष्य का संबंध निसर्ग से विपन्न हो गया है। जैसे किसी वृक्ष की कोई जड़ें उखाड़ ले, फिर वृक्ष कुम्हलाने लगे, फूल झड़ने लगें, पत्ते हरे न रह जाए – ऐसे मनुष्य को हमने प्रकृति से तोड़ लिया है।

और जो मनुष्य प्रकृति से टूट गया उसका परमात्मा से जुड़ने का उपाय ही नहीं रह जाता है। क्योंकि प्रकृति में ही परमात्मा की पहली झलक मिलती है। आदमी की बनाई हुई चीजों के बीच आधुनिक आदमी रहा है। सीमेंट के विशाल रास्ते हैं। इन्हें देखकर परमात्मा की याद नहीं आ सकती। कैसे आएगी! घास का एक तिनका भी उसकी याद दिलाता है और सीमेंट के विशाल राजपथ भी उसकी याद नहीं दिलाते। ये तो आदमी के बनाए हैं, उसकी याद दिलाएं तो दिलाएं कैसे?

एक छोटा—सा फूल भी राह के किनारे खिल जाता है, तो अज्ञात की खबर लाता है, संदेश लाता है। परमात्मा के प्रेम पाती है वह। और तुम मकान बनाओ, जो आकाश को छूने लगें, गगन चुंबी हों, तो भी उसकी याद नहीं दिलाते; सिर्फ आदमी की कारीगरी, आदमी की तकनीक, आदमी की होशियारी, इन सबका स्मरण दिलाते हैं। और इनके स्मरण से अहंकार मजबूत होता है। आदमी की बनाई हुई कोई भी चीज बढ़ती नहीं; ठहरी रहती है क्योंकि मुर्दा है। परमात्मा की बनाई सारी चीजें बढ़ती हैं, क्योंकि जीवंत हैं। पौधा बड़ा होगा, वृक्ष होगा। नदी सागर होगी। सब गतिमान है। आदमी की बनाई चीजें सब ठहरी हुई हैं; उनमें कोई विकास नहीं होता। वे जैसी हैं वैसी हैं। वस्तुएं हैं। उनमें प्राण नहीं हैं। जिनमें प्राण नहीं हैं उनसे महाप्राण की कैसे स्मृति आएगी?

तो मनुष्य के जीवन का जो सब से बड़ा अभिशाप है आज: पुरानी सारी बीमारियां मौजूद हैं, और एक नई बीमारी खड़ी हो गई है, कि हमने एक कृत्रिम वातावरण बना लिया है। और कृत्रिम वातावरण बड़ा—बड़ा होता जा रहा है।

लंदन में एक सर्वे किया गया, दस लाख बच्चों ने गाय नहीं देखी और लाखों बच्चों ने खेत नहीं देखे। जिन बच्चों ने खेत नहीं देखे और पवन के झकोरों में डोलती हुई गेहूं की बालें और बाजरे और ज्वार को नहीं देखा, उन बच्चों के जीवन में कुछ चीज की कमी रह जाएगी। कुछ बड़ी मौलिक कमी रह जाएगी। उन्होंने कारें देखी हैं, बस देखी हैं, रेलगाड़ी देखी हैं।

मैंने सुना है, एक चर्च में एक पादरी बच्चों को समझा रहा था। रविवार का धार्मिक स्कूल लगा था। बाइबिल में एक वचन आता है कि सब सरकती हुई चीजें उसी ने बनायीं—अर्थात सांप इत्यादि। एक छोटे बच्चे ने खड़े होकर कहा कि उदाहरण दीजिए। पादरी भी थोड़ा चौंका, क्योंकि सांप उस बच्चे ने देखा नहीं; और कोई सरकती चीज देखी नहीं, तो उसने कहा कि रेलगाड़ी। जैसे रेलगाड़ी। तो बच्चा निश्चित हो गया।

पादरी भी करे तो क्या करे? सरकती हुई चीज के लिए रेलगाड़ी का उदाहरण! यह भी परमात्मा ने बनायी है!

हमारे पास उदाहरण भी खोते जाते हैं। जितना आधुनिक मनुष्य है उतना ही ज्यादा कम प्राकृतिक, उतना ही ज्यादा कृत्रिम, उतना ही ज्यादा प्लास्टिक; असली नहीं, नकली। उसकी गंध नकली, उसका रंग नकली, उसका सब नकली! ओंठ रंग लिए हैं लिपस्टिक से, वह उसका रंग है ओठों का; असली ओठों का को पता ही चलना मुश्किल हो गया है। कपड़े पहन लिए हैं इस ढंग से कि असली शरीर का पता चलना मुश्किल हो गया है। जिनकी छातियां नहीं हैं, उन्होंने कोटों में रुई भरवा ली है।

हम सब तरफ से कृत्रिम में जी रहे हैं। और यंत्रों बढ़ते जा रहे हैं। और मनुष्य की सब से बड़ी कठिनाई सदा से यह रही कि मनुष्य मूर्च्छित है। यंत्रों के बीच और भी मूर्च्छित हो गया, और भी यांत्रिक हो गया है।

तुम मुझसे पूछते हो: आधुनिक मनुष्य की सब से बड़ी कठिनाई क्या है? यांत्रिकता !

यंत्रों के साथ रहोगे तो यांत्रिक हो ही जाना पड़ेगा। यदि बहुत जागरूक न रहे, तो सुबह सात बजे की गाड़ी पकड़नी है तो उसी ढंग से भागना होगा। कोई गाड़ी तुम्हारे लिए रुक नहीं रहेगी। तुम अपनी निश्चितता की चला नहीं चल सकते। तुम पक्षियों के गीत सुनते हुए नहीं जा सकते। आपाधापी है, भाग—भाग है।

विद्यासागर ने लिखा है, एक सांझ वह घूमकर लौट रहे थे और उनके सामने ही एक मुसलमान सज्जन अपनी सुंदर छड़ी लिए हुए, टहलते हुए वे भी आ रहे थे। मुसलमान सज्जन का नौकर भागा हुआ आया और उसने कहा: मीर साहब, जल्दी चलिए, घर में आग लग गई है। लेकिन मीर साहब वैसे ही चलते रहे। नौकर ने कहा: आप समझे या नहीं समझे? आपने सुना या नहीं सुना? घर जल रहा है, धू—धू कर जल रहा है! तेजी से चलिए! यह समय टहलने का नहीं है। दौड़ कर चलिए।

लेकिन, मीर साहब ने कहा: घर तो जल ही रहा है, मेरे दौड़ने से कुछ आग बुझ न जाएगी। और यहां तो सभी कुछ जल रहा है। और सभी को जल जाना है। जीवन भर की अपनी मस्ती की चाल इतने सस्ते में नहीं छोड़ सकता।

विद्यासागर तो बहुत हैरान हुए। मीर साहब उसी चाल से चलते रहे! वही छड़ी की टेक। वही मस्त चाल। वही लखनवी ढंग और शैली। विद्यासागर के जीवन में इससे क्रांति घटित हो गई, क्योंकि विद्यासागर को दूसरे दिन वाइसराय की कौंसिल में, महापंडित होने का सम्मान मिलने वाला था। और मित्रों ने कहा कि इन्हीं अपने साधारण सीधे—सादे, फटे—पुराने वस्त्रों में जाओगे, अच्छा नहीं लगेगा। तो हम ढंग के कपड़े बनवाए देते हैं, जैसे दरबार में चाहिए।

तो वे राजी हो गए थे, तो चूड़ीदार पाजामा, और अचकन और सब ढंग की टोपी और जुते और छड़ी, सब तैयार करवा दिया था मित्रों ने। लेकिन इस मुसलमान, अजनबी आदमी की चाल, घर में लगी आग, और यह कहता है कि क्या जिंदगी भर की अपनी चाल को, अपनी मस्ती को एक दिन घर में आग लग गई तो बदल दूं? दूसरे दिन उन्होंने फिर वे बनाए गए कपड़े नहीं पहने। वाइसराय की दुनिया में पहुंच गए वैसे ही अपने सीधे—सादे कपड़े पहने। मित्र बहुत चकित हुए। उन्होंने कहा: कपड़े बनवाए, उनका क्या हुआ? उन्होंने कहा: वह एक मुसलमान ने गड़बड़ कर दिया। अगर वह मकान में आग लग जाने पर अपनी जिंदगी भर की चाल नहीं छोड़ता, तो मैं भी क्यों अपनी जीवन के ढंग और शैली छोडू, जरा सी बात के लिए कि दरबार जाना है? देना हो पदवी दे दें, न देना हो न दें। लेकिन जाऊंगा अब अपनी ही शैली से।

मगर आज सब तरफ यंत्र कसे हुए हैं। यहां शैली नहीं बच सकती, व्यक्तित्व नहीं बच सकता, निजता नहीं बच सकती। यदि तुम अत्यधिक होश से न जियो, तो यंत्र तुम पर हावी हो जाएगा, तुम पर छा जाएगा। तुम घड़ी के कांटे की तरह चलने लगोगे और मशीन के पहियों की तरह घूमने लगोगे। और धीरे—धीरे तुम्हें भूल ही जाएगा कि तुम्हारे भीतर कोई आत्मा भी है! एक तो प्रकृति से संबंध टूट जाना और दूसरा यंत्र से संबंध जुड़ जाना, दोनों बातें महंगी पड़ी जा रही हैं।

मुकुर के लोचन खुले हैं।
बंद है आधार के दृग;
जड़ हुआ आधार का अस्तित्व,
छाया चल रही है!
मात्र दर्पण है, न दर्शन;
पूजता पाषाण चेतन!
चेतना खो चुका जीवन;
आंजते दृगहीन अंजन,
तिमिर माया छल रही है।
मान धन मन के निधन को;
खोजता जीवन मरण को—
अन्न—कण, क्षण—ग्रस्त क्षण को!
दिया तज रवि ने गगन को,
आय दिन की ढल रही है!
मंत्र का दीपक बुझा कर,
तंत्र—बल को बाहु में भर,
प्रौढ़ कर मोहित धरा पर,
यंत्र की माया निरंतर फूलती है,
फल रही है!
और सब तो गया—मंत्र गया तंत्र गया—यंत्र सिंहासन पर आरूढ़ हो गया है।
यंत्र की माया निरंतर फूलती है,
फल रही है।

और मनुष्य भी धीरे—धीरे यांत्रिक होता जा रहा है। वैज्ञानिक तो मानते भी नहीं कि मनुष्य यंत्र से कुछ ज्यादा है। और विज्ञान की छाप लागों के हृदय पर बैठती जा रही है, क्योंकि विज्ञान का शिक्षण दिया जा रहा है। हृदय का तो कहीं कोई शिक्षण नहीं है। प्रेम गीत तो कहीं सिखाए नहीं जा रहे हैं। हृदय की वीणा तो कहीं कोई बजाई नहीं जा रही है। तर्क सिखाया जा रहा है, गणित सिखाया जा रहा है। यंत्र को कैसे कुशलता से काम में लाया जाए, यह सिखाया जा रहा है। और धीरे—धीरे इस सब से घिरा हुआ आधुनिक मनुष्य, प्रकृति से टूट गया, परमात्मा से टूट गया, अपने से टूट रहा है। सारे संबंध जीवन के विराट से, उखड़े जा रहे हैं।

यह आज की सब से बड़ी कठिनाई है। और इसलिए आज के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और जरूरी हो गई है एक बात कि ध्यान का, जितनी दूर—दूर तक प्रचार हो सके, जितने लोगों तक—करना जरूरी है। क्योंकि ध्यान ही अब एक मात्र उपाय है कि तुम्हें फिर याद दिला सके अपनी आत्मा की। और ध्यान ही एकमात्र उपाय है कि फिर तुम्हें वृक्षों में, चांदत्तारों में परमात्मा की झलक मिल सके। ध्यान ही एकमात्र उपाय है, जो तुम्हें वापिस प्रकृति की तरफ ले चले। और ध्यान ही एकमात्र उपाय है, कि यंत्रों के बीच रहते हुए भी, तुम्हें यंत्रों का मालिक बनाए रखे, यंत्रों का गुलाम न हो जाने दो।

यंत्र तुम्हारे हिसाब से चलने चाहिए। यंत्र तुम्हें गुलाम न बना लें। तुम्हारी मालकियत बनी रहे। यह अब केवल ध्यान से ही संभव हो सकता है।

– ओशो

[अमी झरत बि‍‍गसत कंवल – 14]

3 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!