“क्या मस्तिष्क ही मन है?” – ओशो शैलेन्द्र

ब्रेन एंड माइन्ड, मस्तिष्क और मन; दो अलग-अलग बातें हैं। प्रायः हम दोनों को समानार्थी समझने की भूल कर बैठते हैं। वे पर्यायवाची नहीं हैं। इसे कम्प्यूटर के उदाहरण से समझना सरल होगा।

दिमाग हमारे भौतिक शरीर का हिस्सा है। देह को हार्डवेयर तथा दिमाग को साफ्टवेयर जैसा समझें। मस्तिष्क स्थूल देह का अंग है- छोटी सी खोपड़ी में फिट एक बायो-कम्प्यूटर, जिसमें मन रूपी साफ्टवेयर इन्स्टाल हो जाता है। जन्म के करीब तीन महीने पहले, यानि गर्भकाल के छटवें-सातवें महीने में यह घटना घटती है।

भगवान बुद्ध ने मन को स्मृति-आलय कहा है- स्टोरहाउस अॅाफ मेमोरी। पुराने सारे जन्मों के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान का, संस्कारों तथा आदतों का भंडार है मन। इस साफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग के मुताबिक मस्तिष्क एवं फिर उससे संचालित शरीर कार्य करता है। सदगुरु ओशो के अनुसार आत्मा अर्थात् चेतना का जन्म नहीं होता। न ही चेतना की कभी मृत्यु होती। वह तो अविनाशी चैतन्य शक्ति है। उसकी ऊर्जा से ही मन फंक्शन करता है, और मन के संस्कारों से तन क्रिया-कलाप करता है। चित्त के संस्कारों को ही आधुनिक शब्दावली में कंडीशनिंग या प्रोग्रामिंग कहा जा सकता है।

हमारी स्थूल देह माता-पिता के जीव-कोष्ठों से मिलकर निर्मित होती है। किंतु हमारा सूक्ष्म मन अपने ही विगत जन्मों के अनुभवों से बनता है। इन दोनों के संयोग से जीवन चलता है। चार्ल्स डार्विन ने शरीर के बारे में विकासवाद का नियम खोजा। वह अधूरा सत्य है कि

करोड़ों वर्षों में वाइरस, बैक्टीरिया, अमीबा जैसे छोटे जीवों से क्रमशः विकसित होते-होते हम आदमी बने हैं। एक और विकास की घटना सूक्ष्म स्तर पर घट रही है। हमारा मन भी धीरे-धीरे अधिकाधिक विकसित होता जा रहा है। इन दोनों तथ्यों को मिलाकर देखने से विकास की पूर्ण प्रक्रिया समझना आसान है।

उदाहरण के लिए किसी दम्पति के पांच बेटे हैं। पांचों बिल्कुल भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति एवं व्यवहार वाले हो सकते हैं। कोई संगीतकार है, कोई राजनीतिज्ञ है। कोई व्यापारी बुद्धि का है तो कोई आध्यात्मिक रुझान वाला है। कोई अपराधी बन गया है। यद्यपि इनके क्रोमोसोम्स व डी.एन.ए. समान हैं। इनका पालन-पोषण, शिक्षा आदि भी समान रही हैं। फिर व्यक्तित्व में इतनी विभिन्नता कहां से आई?

इस पहेली को सुलझाने का एक ही उपाय संभव है कि पिछले जन्मों से ये अपने-अपने मन लेकर आए हैं। शक्ल-सूरत माता-पिता से मिली, इसलिए वह एक जैसी है। ब्रेन की क्षमताएं समान, किंतु माइन्ड की प्रोग्रामिंग असमान हैं। देह रूपी हार्डवेयर, जिसमें दिमाग रूपी हार्ड- डिस्क फिट है, वे पांचों भाइयों में समान हैं। लेकिन साफ्टवेयर सब के अलग-अलग हैं।

ओशो ने बताया है कि कभी-कभार अपवाद स्वरूप ऐसा भी होता है कि मृत्यु के दौरान मन खंडित हो जाता है। दो या अधिक टुकड़े हो जाते हैं। फिर ऐसा भी मुमकिन है कि दो व्यक्तियों के खंड मिलकर नया मन बना लें। ऐसा मन विरोधी और परस्पर विपरीत प्रोग्रामिंग्स का जोड़ होगा। जैसे दो उपन्यासों के कुछ-कुछ पेज मिलाकर नई किताब बनाई जाए। इसमें दो समानांतर अधूरी कथाएं होंगी। दोनों में कोई सामन्जस्य नहीं होगा। ऐसे मन वाले लोग स्कीझोफ्रेनिया से पीड़ित होंगे अर्थात् खंडित मनस्कता की बीमारी से ग्रस्त होंगे। वे कभी एक इंसान जैसा व्यवहार करेंगे, कभी बिल्कुल दूसरे इंसान जैसा। यही वजह है कि स्कीझोफ्रेनिया और बाईपोलर डिस्आर्डर जैसे मनोरोगों का इलाज संभव नहीं हो पाता।

– ओशो शैलेन्द्र

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