“गौतम बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग में प्रेम क्यों नहीं आता?” – ओशो शैलेन्द्र

सात बातें प्रेम की ! – सद्गुरु ओशो शैलेन्द्र जी

प्रश्न – गौतम बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग में प्रेम क्यों नहीं आता? ओशो तो प्रेम को बहुत ज्यादा एम्फेसाईज़ करते हैं, बहुत ज्यादा जोर देते हैं।

मेरे प्रिय आत्मन्,

सच पूछो तो आष्टांगिक मार्ग में ध्यान की तो एक ही बात है। आठ में से बस एक ही बात है, सम्यक समाधि।

समाधि या साक्षी जीवन, ध्यान का सूत्र है, बाकी की सात बातें तो प्रेम की ही हैं। हम दूसरों से कैसे रिलेट हों, दूसरों से कैसे संबंधित हों? कैसे हम शीलवान हों? सम्यक वाणी हो, सम्यक आजीविका हो। इस सबका तो दूसरों से संबंध है, तथाता का भी दूसरों से ही अधिक संबंध है। एक्सेप्टैन्स, सम्यक दृष्टि अगर हमारी होगी तो हम कथामुक्त होंगे। हम दूसरों के साथ, ठीक सत्य के साथ हो सकेंगे, संबंधित हो सकेंगे। यदि हम स्वयं दुःखी हैं तो हम दूसरों को भी दुःख ही देंगे। सम्यक्स्मृति में हम जिएंगे तो भीतर का हिस्सा तो उसका ध्यान का हुआ लेकिन सच पूछो तो फिर हम पर वे छः भूत सवार नहीं हो सकेंगे और दूसरों के साथ हम प्रेमपूर्ण व्यवहार कर सकेंगे, क्रोध से बच सकेंगे।

तो सच में देखें तो इन आठ बातों में से एक ही मूल बात है, सम्यक समाधि, साक्षी जीवन, जो ध्यान से संबंधित है। शेष सात बातें, सच पूछो तो दूसरों से संबंधित हैं, जगत से संबंधित हैं। तो गौतम बुद्ध का ज़ोर भी प्रेम पर ही है। इन सात बातों को संक्षेप में ओशो ने एक शब्द में कह दिया, प्रेम। उसमें सब समाहित है, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक आजीविका, तथाता भाव, स्वीकार भाव, कृतज्ञता, ये सब उसमें समाहित हैं, प्रेम में, एक शब्द में।

क्योंकि हमारे जीवन में, हम दो हिस्से कर सकते हैं। एक हम स्वयं के साथ संबंधित कैसे हों, वह हुआ ध्यान। दूसरा, हम दूसरों के साथ, जगत के साथ कैसे संबंधित हों, वह हुआ प्रेम। और ध्यान से कोई कितना करेगा, दिन भर में कोई एक घण्टा, दो घण्टा, कितना करेंगे, तीन घण्टा करेंगे। तो अगर अनुपात निकालें तो प्रेम और ध्यान में तो हमारे जीवन का अधिक हिस्सा तो दूसरों से संबंधित होने में जाता है। आठ घण्टे आप अपनी दुकान में बैठते हैं, व्यापार करते हंै या नौकरी करते हैं फिर घर आकर आप सात-आठ घण्टे अपने परिवार वालों के साथ संबंधित होते हैं। अपनी पत्नी से, पड़ोसी से, बच्चों से, मित्र से, माता-पिता से। आठ घण्टे आपके नींद में जाते हैं, तो जीवन का बड़ा हिस्सा तो दूसरों के साथ संबंधित होने में ही जाता है। यदि उसमें कोई उलझाव है, उसमें कोई परेशानी खड़ी कर रहे हैं, दूसरों के लिए प्रेमपूर्ण नहीं हैं, क्रोध कर रहे हैं, ईष्र्या से भरे हुए हैं, दूसरों का स्वीकार नहीं कर रहे हैं, तो फिर हम ध्यान में भी न डूब सकेंगे।

एक बात याद रखना यदि हम प्रेमपूर्ण नहीं हो पा रहें, जगत के साथ हमारे मधुर संबंध नहीं हैं, तो हम स्वयं से भी संबंधित नहीं हो सकेंगे। ये असंभव बात है, इसलिए दोनों बातें एक साथ साधनी होंगी। और दोनों परस्पर अन्युनायाश्रित हैं, एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं जितना आप ध्यान में डूब सकेंगे, साक्षी भाव में, उतने ही सुन्दर ढंग से मधुर संबंध आप बाहर बना सकेंगे, अपने। इसके विपरीत भी सत्य है, जितने मधुर संबंध आप बाहर बना सकेंगे, स्वयं से भी संबंधितो आप उतने ही सरलता से हो सकेंगे। इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है।

सच पूछो तो प्रेम यानि दूसरे के साथ होशपूर्ण होना। बड़ी छोटी सी परिभाषा हम कर सकते हैं, प्रेम अर्थात् दूसरों के साथ सजगतापूर्ण संबंध और ध्यान यानि स्वयं के साथ प्रेमपूर्ण संबंध। दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। जब आप स्वयं को प्रेम कर रहे हैं तो वह ध्यान है, जब आप दूसरों के साथ ध्यानपूर्ण हंै तो वह प्रेम है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

एक उदाहरण से समझें। इसमें एक सम्यक वाणी आया है, आष्टांगिक मार्ग में। अब सम्यक वाणी के दो हिस्से और हम कर सकते हैं। भीतर है हमारा मन, बीच में है वाणी और बाहर हैं हमारे कर्म। सम्यक वाणी, सम्यक कर्म और भीतर साक्षी, इन तीनों में एक गहरा संबंध है। पहले कोई भी बात आपके भीतर उठती है, वह विचार के रूप में आती है, मन के तल पर आती है। फिर वाणी में आती है, आप उसे वाणी में प्रकट कर सकते हैं, बोलते हैं और फिर कर्म का रूप लेती है, वह।

गौतम बुद्ध जो कि मध्य मार्ग के प्रवक्ता हैं, मज्झम निकाय की बात करते हैं, इसलिए सम्यक वाणी पर इतना ज़ोर है। क्योंकि जो व्यक्ति अपनी वाणी के प्रति जागरूक हो गया, वह अपने विचारों के प्रति भी जागरूक हो जाएगा, मन के प्रति भी सजग हो जाएगा। सच पूछो तो वाणी हमारे व्यक्त विचार हैं और विचार हमारी अव्यक्त वाणी है। विचार अगर व्यक्त होंगे तो वाणी बन जाएंगे और ठोस रूप में जब आएंगे तो कर्म बन जाएंगे। सब चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं। जो आप कर्म कर रहे हैं, वह भीतर आपके मन से जुड़ा हुआ है। यदि आप वहाँ साक्षी हो सकते हैं तो आपकी वाणी मधुर हो जाएगी, आप शीलवान ढंग से जीवन जी सकेंगे और आपके कर्म सम्यक हो जाएंगे। इन सबमें आपसी गहरा तालमेल है, तो सच पूछो तो गौतम बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग में ध्यान का एक बिंदु है, शेष सात बिंदु तो प्रेम के ही बिंदु हैं।

तो आपको विदाई देते समय, मैं इसी उम्मीद और आशा से आपको विदाई देता हूँ कि जीवन में ध्यान और प्रेम, इन आठों हिस्सों को आप सम्भाल कर चल सकेंगे। जैसे तलवार की धार पर चलते हैं, वैसा ही यह जीवन है। जरा बाएं गिरने का डर हो तो दाएं झुक जाना और दाएं गिरने का डर हो तो बाएं झुक जाना। सर्कस में रस्सी पर चलते हुए नट को देखा है न, कैसे सम्भल-सम्भल कर चलता है। जीवन भी ऐसी ही डोर पर चलना है, जरा भी असम्यक हुए कि गिरे। सम्यक होना होगा, हर चीज में सम्यक होना होगा।

गौतम बुद्ध ने तो हद कर दी, समाधि के साथ भी सम्यक शब्द जोड़ दिया, सम्यक समाधि क्योंकि समाधि भी असम्यक हो सकती हैं। अति कहीं नही होना है, बीच में सम्भल के चलना हैं। इन आठों बिन्दुओं में से एक शब्द भी आपको याद रह जाए, सम्यक, तो पर्याप्त है। उसमें फिर सब पीछे से चला आयेगा। बस सम्यक को याद रखें, हमेशा मध्य में हों। न इस अति पर, न उस अति पर।

एक छोटी सी कहानी मुझे याद आती है, एक किसान था, एक साधु का प्रवचन सुनने गया। साधु उसे समझा रहा था, प्रवचन दे रहा था, कुछ। उस किसान को कुछ मिसअन्डरस्टेंडिंग हुई, कुछ गलतफहमी उसे हुई। उसे लगा कि जो हम बोएंगे वैसी ही फसल काटेंगे, ऐसा साधु कह रहा था, कर्मों के संबंध में समझा रहा था। किसान नासमझ था, उसने सोचा कि अरे मैं भी कैसा नासमझ, जैसा बोएंगे, वैसी ही फसल काटेंगे, तो मुझे तो अपने जानवरों के लिए, गाय, बैल के लिए भूसे की जरूरत है, तो जा के भूसा बोता हूँ क्योंकि जैसी फसल बोउंगा वैसी ही फसल काटूंगा। उसने अपने खेत में जाकर भूसा बो दिया। इन्तजार करता रहा, पानी दिया, खाद दिया। बदबू आने लगी, वह भूसा भी सड़ गया, ऊगा तो कुछ भी नहीं, फसल तो कुछ भी नहीं आई।

वह तो बहुत नाराज हुआ, वह साधु के पास गया। कि जैसा आपने कहा था, मैंने वैसा ही किया, लेकिन भूसा की खेती मैंने करनी चाही थी, भूसा तो पैदा नहीं हुआ। वह साधु उसकी नासमझी पर, उसकी मूढ़ता पर, हँसने लगा। ऐसी ही मूढ़ता हम सब करते हैं, करीब-करीब। नहीं, गेहूँ बोते हैं तो भूसा आता है, भूसा बाइप्रोडक्ट है, गेहूँ बोना होता है। ध्यान और प्रेम बीज हैं, इनको बोना होगा। और अगर एक शब्द याद रखना हो तो, मैं कहूंगा कि सम्यकत्व। बस इतना ही याद रखना सम्यकत्व। इसके बीज बोना, और सारी फसल आती रहेगी, उसके बाइप्रोडक्ट सब आते रहेंगे; सम्यक स्मृति, सम्यक दृष्टि और सम्यक कर्म, सम्यक वाणी, सम्यक समाधि, सम्यक व्यायाम। सब आते रहेंगे। एक बीज को याद रखना सम्यकत्व।

‘एक साधै सब सधे,

सब साधे, सब जाए।’

सब साधने की कोशिश करने के लिए एक सूत्र को पकड़ लेना। इस एक को साध लेना और सब अपने आप सध जाएगा। इन शब्दों के साथ आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ। आप आए, यह कार्यक्रम आपने अटेण्ड किया और यहाँ से कुछ बीज आप लेकर जा रहे हैं। जो आपके जीवन में आगे चलकर अंकुरित होंगे, उत्पल्लिवत होंगे और इन फूलों से आपका जीवन सुवासित हो उठेगा, सुगंध से भर उठेगा। बहुत-बहुत प्रेम, आशीष और धन्यवाद।

– सद्गुरु ओशो शैलेन्द्र जी 

More about Sadguru Osho Shailendra Ji – http://oshodhara.org.in/osho_shailendra.php

691 Total Views 11 Views Today

Leave a Reply

%d bloggers like this: