“Open Letter to Sw. Chaitanya Keerti” By Osho Shailendra.

“This narcissistic trinity of Osho is working with masses to sell themselves to unconscious people and using the beautiful, graceful Master Osho picture s–.and their modus operandi is utterly disgraceful. And Shailendra does use social platforms to spread Osho’s books and discourses, but he is in the wrong company of other 2 extremely narcissistic phoney gurus masquerading as sadguru. Sooner he leaves them the better. He should come out and become a normal person and spread Osho’s vision in its purity. He is being unintelligent and wasting his life being with the other 2. Shame on Shailendra if he continues supporting such idiotic rituals to discolour Osho’s lifelong work.” – Swami Chitannya Keerti (स्वामी चैतन्य कीर्ति).

 

प्रिय स्वामी चैतन्य कीर्ति जी, नमस्कार।

उपरोक्त वक्तव्य देखकर सहज रूप से भरोसा नहीं आ रहा कि यह वाकई आपने लिखा है, अथवा किसी और ने आपके नाम से प्रचारित किया है? क्योंकि जो वीडियो संलग्न है, उसमें संन्यासियों के द्वारा गुरु पूर्णिमा पर भावभीनी आरती की जा रही है। अनुग्रह से ओतप्रोत इस काव्यात्मक अभिव्यक्ति में किसी को भला क्या आपत्तिजनक लग सकता है?–

आरती कीजै ओशो की, प्यारे सद्गुरु ओशो की।।
आरती कीजै ओशो की, प्यारे सद्गुरु ओशो की।।
ज्ञान का दीप जलाने वाले, भक्ति रस बरसाने वाले;
ओंकार का भेद बताकर, प्रेम की अलख जगाने वाले।।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव के दुलारे, कृष्ण, बुद्ध, नानक के प्यारे
महावीर, मीरा, कबीर के, सूत्र हमें समझाने वाले।।
रवि से प्रखर, चांद से शीतल, कमल नैन मधुबैन में कोयल
मानसरोवर के मराल तुम, गोविंद की आंखों के काजल।।
प्रीति हृदय में, अश्रु नयन में, हम आए हैं तेरे द्वारे
भाव सुमन की थाल सजाकर, हम तेरी आरती उतारे।।

क्या शिष्यगण द्वारा गुरु पूर्णिमा पर अहोभाव से भरकर अपने गुरु की आरती करना कोई अपराध है?

आप भलीभांति जानते हैं कि 1973 तक बंबई के दिनों में, जन्मोत्सव के समय ओशो की आरती की जाती थी। किंतु बाद में धुंए से एलर्जी हो जाने की वजह से बंद कर दी गई। आपको यह भी पता है कि ओशो ने अध्यात्म साधना के दो मुख्य मार्ग बताए–ध्यान और भक्ति। आपको नाम दिया चैतन्य कीर्ति। स्पष्ट है कि आप जैसे बुद्धिजीवी, पुरुष-चित्त वाले व्यक्ति का मार्ग ध्यान का है, चेतना के विकास का है। तो क्या आप भक्ति मार्ग वाले स्त्रैण-चित्त लागों को उनकी भावना की राह पर न चलने देंगे?

ओशो ने केवल ध्यानियों की; बुद्ध, महावीर, पतंजलि, अष्टावक्र की ही दृष्टि उजागर नहीं की है, बल्कि नारद मुनि, ऋषि शांडिल्य, मीराबाई, सहजोबाई, दयाबाई और अन्य दर्जनों भक्त-संतों की वाणी पर प्रकाश डालकर उन्हें भी पुनर्जीवित कर दिया है। बिल्कुल साफ है कि ओशो ने दोनों मार्गों पर बराबर का जोर दिया है। क्योंकि जगत में आधी संख्या पुरुषों की तो आधी महिलाओं की है। एक बार तो उन्होंने यहां तक भी कहा है कि

‘अगर तुम भक्त हो सको तो फिर कुछ और होने की जरूरत नहीं है। भक्त न हो सको तो मजबूरी में कोई और रास्ता चुनना पड़ता है। भक्त हो सको तो धन्यभागी हो! मैं तुम्हें भक्त बना सकूं! और ध्यान रहे कि मैं भक्त नहीं था, इसलिए सारी तकलीफें जान कर तुमसे कह रहा हूं। मुझे रेगिस्तान का अनुभव है, इसलिए तुमसे कह रहा हूं। इसलिए तुमसे कह सकता हूं कि बच सको रेगिस्तान से तो बच जाना। प्रेम के मरूद्यान से उपलब्ध हो सकता हो तो मरुस्थल में क्यों जाना? मुझे कोई कहने को नहीं था, इसलिए भटकना पड़ा। तुम्हें भटकने की कोई जरूरत नहीं है।’

अथातो भक्ति जिज्ञासा-31

 

अगर किसी को उलझन प्रतीत हो कि मेरा रास्ता कौन सा है? तो ओशो के ये वचन स्मरणीय हैं-

“जब तक तुम समग्र रूप से मिट न जाओ, तुम्हारे भीतर कहीं भी ‘मैं’ का कोई स्वर न रह जाए, तब तक सत्संग भी चलने दो, ध्यान भी चलने दो, प्रार्थना भी चलने दो। पराभक्ति का जन्म न हो जाए, तब तक चलने दो गौणी-भक्ति। और इसमें कृपणता की कोई जरूरत नहीं है।”

अथातो भक्ति जिज्ञासा-30

 

गौणी भक्ति के साधनों में आरती भी एक है-

“सार्थक करना हो तो अभी करना! अभी या कभी नहीं! टालना ही हो तो व्यर्थ को टालो। क्रोध आता है, तत्क्षण करते हो। प्रेम उठता है, कल पर छोड़ देते हो। कहते हो अभी तो धन कमाना है, अभी तो प्रतिष्ठा बनानी है। प्रेम प्रतीक्षा करे। होगा धन जब पास तो प्रेम भी करेंगे। होगा धन जब पास, मित्रों से भी मिलेंगे; अभी समय नहीं। लेकिन क्रोध उठता है तो तुम टालते नहीं। घृणा उठती है तो तुम छूरे पर धार अभी रखने लगते हो। हां, पूजा का भाव उठे तो आरती का थाल अभी नहीं सजाते, दीए अभी नहीं जलाते, टाले ही चले जाते हो…..।” 

“…..सुंदरदास के वचन आरती पर पूरे हो रहे हैं। जीवन में ही आरती पूरी हो, तभी वचनों में भी आरती पूरी हो सकती है, अन्यथा वचन झूठे होंगे, पाखंड होंगे।

–ज्योति से ज्योति जले, प्रवचन-21

 

पूजा का अर्थ होता हैः परमात्मा को प्रतिस्थापित करना; एक पत्थर की मूर्ति है या मिट्टी की मूर्ति है, परमात्मा को उसमें आमंत्रित करना; परमात्मा को कहना कि ‘इसमें आओ और विराजो–क्योंकि तुम हो निराकारः कहां तुम्हारी आरती उतारुं? हाथ मेरे छोटे हैं, तुम छोटे बनो! तुम हो विराटः कहां धूप-दीप जलाऊं? मैं छोटा हूं, सीमित हूं, तुम मेरी सीमा के भीतर आओ! तुम्हारा ओर-छोर नहींः कहां नाचूं? किसके सामने गीत गाऊं? तुम इस मूर्ति में बैठो!’ 

पूजा का अर्थ हैः परमात्मा की प्रतिस्थापना सीमा में, आमंत्रण–इसलिए पूजा का प्रारंभ उसके बुलाने से है।  

अंग्रेजी में शब्द है ‘गॉड’ भगवान के लिए। वह शब्द बड़ा अनूठा है। उसका मूल अर्थ है–जिस मूल धातू से वह पैदा हुआ है, भाषाशास्त्री कहते हैं, उस मूल धातु का अर्थ है–जिसको बुलाया जाता है। बस इतना ही अर्थ है जिसको बुलाया जाता है, जिसको पुकारा जाता है–वही भगवान।  

दूसरा, जिसने कभी पूजा का रहस्य नहीं जाना, देखेगा तुम्हें बैठे पत्थर की मूर्ति के सामने, समझेगाः नासमझ हो! क्या कर रहे हो? उसे पता नहीं कि पत्थर की मूर्ति अब पत्थर की नहीं–मृण्मय चिन्मय हो गया है! क्योंकि भक्त ने पुकारा है! भक्त ने अपनी विशिता जाहिर कर दी है। उसने कह दिया है कि मैं मजबूर हूं। तुम जैसा विराट मैं न हो सकूंगा, तुम कृपा करो, तुम तो हो सकते हो मेरे जैसे छोटे! मेरी अड़चनें हैं। मेरी शक्ति नहीं इतनी बड़ी के तुम जैसा विराट हो सकूं। दया करो! तुम ही मुझ जैसे छोटे हो जाओ ताकि थोड़ा संवाद हो सके, थोड़ी गुफ्तगू हो सके, दो बातें हो सकें। मैं फूल चढ़ा सकूं, आरती उतार सकूं, नाच लूंः तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा। सभी रूप तुम्हारे हैं, यह एक और रूप तुम्हारा सही! मुझे बहुत कुछ मिल जाएगा, तुम्हारा कुछ खोएगा नहीं।

भक्त की आंख से देखना मूर्ति को, नहीं तो तुम मूर्ति को न देख पाओगे; तुम्हें पत्थर दिखाई पड़ेगा; मिट्टी दिखाई पड़ेगी। भक्त ने वहां भगवान को आरोपित कर लिया है। और जब परिपूर्ण हृदय से पुकारा जाता है, तो मिट्टी भी उसी की है। मिट्टी उससे खाली तो नहीं। पत्थर उसके बाहर तो नहीं। वह वहां छिपा ही पड़ा है। जब कोई हृदय से पुकारता है तो उसका आविर्भाव हो जाता है।  

इसलिए भक्त जो देखता है मूर्ति में, तुम जल्दी मत करना, तुम नहीं देख सकते। देखने के लिए भक्त की आंखें चाहिए।  

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।
इजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
पत्थर रोते हैं हजारों साल, तब कहीं कोई पत्थर में परमात्मा को देखने वाला पैदा होता है। आंख चाहिए।
पूजा का प्रारंभ है आमंत्रण में कि आओ, विराजो, प्रतिस्थापना में!
मूर्ति तो झरोखा है, वहां से हम विराट में झांकते हैं।

तुम अपने घर में खड़े हो, झरोखे से आकाश में झांकते हो। तुम चांद-तारों की बात करो, दूर फैले नील-गगन की बात करो, और कोई दूसरा हो जिसको सिर्फ चौखटा ही दिखाई पड़ता हो खिड़की का, वह कहे, कहां की बातें कर रहे हो? पागल हो गए हो? लकड़ी का चौखटा लगा है, और तो कुछ भी नहीं। कहां के चांद-तारे?

तो जब तुम्हें मूर्ति में कुछ भी न दिखाई पड़े तो जल्दी मत करना; तुम्हें चौखटा ही दिखाई पड़ रहा है। भक्त जब हृदयपूर्वक बुलाता है तो मूर्ति खुल जाती है, उसके पट बंद नहीं रहते। भक्त को उस मूर्ति के माध्यम से कुछ दिखाई पड़ने लगता है। उसके देखने के लिए भक्त की ही आंखें चाहिए।  

कहते हैं कि मजनू जब बिल्कुल पागल हो गया लैला के लिए, तो उस देश के सम्राट ने उसे बुलवाया। उसे भी दया आने लगी; द्वार-द्वार, गली-गली, कूचे-कूचे वह पागल ‘लैला-लैला’ चिल्लाता फिरता है! गांव भर के हृदय पसीज गए। लोग उसके आसुओं के साथ रोने लगे। सम्राट ने उसे बुलाया और कहाः तू मत रो। उसने अपने महल से बारह सुदरियां बुलवाईं और उसने कहाः इस पूरे देश में भी तू खोजेगा, तो ऐसी सुंदर स्त्रियां तुझे न मिलेंगी। कोई भी तू चुन ले।  

मजनू ने आंख खोली। आंसू थमे। एक-एक स्त्री को गौर से देखा, फिर आंसू बहने लगे और उसने कहा कि लैला तो नहीं है। सम्राट ने कहाः पागल! तेरी लैला मैंने देखी है, साधारण सी स्त्री है। तू नाहक ही बावला हुआ जा रहा है।  

कहते हैं, मजनू हंसने लगा। उसने कहाः आप ठीक कहते होंगे; लेकिन लैला को देखना हो तो मजनू की आंख चाहिए। आपने देखी नहीं। आप देख ही नहीं सकते, क्योंकि देखने का एक ही ढंग है लैला को–वह मजनू की आंख है। वह आपके पास नहीं है।  

भगवान को देखने का एक ही ढंग है, वह भक्त की आंख है। तो कोई अगर मंदिर में पूजा करता हो तो नाहक हंसना मत। मूर्तिभंजक होना बहुत आसान है, क्योंकि उसके लिए कोई संवेदनशील तो नहीं चाहिए। मूर्तियों को तोड़ देना बहुत आसान है। क्योंकि उसके लिए कोई हृदय की गहराई तो नहीं चाहिए। मूर्ति में अमूर्त को देखना बड़ा कठिन है! वह इस जगत की सबसे बड़ी कला है। आकार में निराकार को झांक लेना, शब्द में शून्य को सुन लेना, दृश्य में अदृश्य की पढ़ लेनाउससे बड़ी और कोई कला नहीं है।” 

भक्तिसूत्र, प्रवचन-5

 

बंबई के दिनों में हर प्रवचन के अंत में ओशो कहते थे कि पांच मिनिट रुकें…

कृष्ण कहते हैं, मैं तुझे मास्टर-की दूंगा। मैं तुझे वह कुंजी दूंगा, जिसे पा लेने के बाद किसी कुंजी की कोई जरूरत नहीं। मैं तुझे वह कुंजी दूंगा कि ताले खोलने नहीं पड़ते, कुंजी को देखते हैं कि खुल जाते हैं। मैं तुझे वह बता दूंगा, जिसे जान लेने से सब जान लिया जाता है। वह एक तत्व मैं तुझे कह दूंगा। वह अनिर्वचनीय, वह एक परम, अल्टिमेट, वह आखिरी सत्य, वह बुनियाद का सत्य, वह अनादि, अनंत मैं तुझे कह दूंगा। उसे जान लेने पर फिर कुछ और जानने को शेष नहीं रह जाता। शेष हम कल बात करेंगे।

लेकिन अभी उठेंगे नहीं। उस मास्टर-की का थोड़ा यहां प्रयोग करना है, इसलिए थोड़ा बैठेंगे। पांच मिनट कोई भी नहीं जाएगा। इतनी देर आप अपने मन से बैठे थे, पांच मिनट मेरे मन से। कोई उठेगा नहीं। पांच मिनट हमारे संन्यासी कीर्तन करेंगे। वह भी एक मास्टर-की है। और कोई अगर उसमें भीतर पूरा प्रवेश कर जाए, तो ताले बिना चाबी लगाए खुलते हैं। आप भी बैठे-बैठे थोड़ा खोलने की कोशिश करें। ताली भी बजाएं। गाएं भी। मस्त भी हों। आनंदित भी हों। पड़ोसी की फिक्र छोड़ दें। जिसको पड़ोसी की फिक्र है, उसको परमात्मा की फिक्र कभी नहीं होती। पड़ोसी की फिक्र छोड़ दें। परमात्मा की थोड़ी फिक्र करें। संन्यासी आनंदमग्न होंगे। आप भी पांच मिनट उनका प्रसाद लें। और फिर हम विदा होंगे।

–गीता दर्शन, अध्याय 7 प्रवचन-1

निश्चित ही ओशो ने गौणी-भक्ति को साध्य नहीं बताया, किंतु परा-भक्ति के साधन की तरह उसकी महत्ता को अंगीकार किया है। यदि आप प्रथम कदम के विरोधी हो जाओगे तो अंतिम कदम तक कैसे पहुंचोगे? मार्ग ही अंततः मंजिल तक ले जाता है। अथातो भक्ति जिज्ञासा के तेईसवें प्रवचन का शीर्षक हैः गौणी-भक्ति में लगो, पराभक्ति की प्रतीक्षा करो।

 

आज के सूत्र इस दिशा में तुम्हारे लिए सहयोगी होंगे। 

भक्त्या भजनोपसंहारात् गौण्या पराय एतद्धेतुत्वात्। 

‘भक्ति शब्द यहां गौणी-भक्ति का प्रतिपादक है; भजन और सेवा ही गौणी-भक्ति है, और यह गौणी-भक्ति पराभक्ति की भित्तिरूप है।’

शांडिल्य इन दो अंगों को दो नाम देते हैंः एक को गौणी-भक्ति, एक को पराभक्ति। गौणी-भक्ति नाममात्र को ही भक्ति है। अभी भगवान ही नहीं मिला तो भक्ति क्या? मगर जरूरी अंग है। गौणी-भक्ति में उपचार है, विधि-विधान है, पूजा-प्रार्थना, आराधना है। गौणी-भक्ति में द्वैत है। भक्त और भगवान दूर हैं, बीच में बड़ा फासला है। अभी सेतु भी नहीं बना। लेकिन भक्त ने इस किनारे से उस किनारे को पुकारना शुरू किया है। आवाज उसकी पहुंचती भी है या नहीं, यह भी कुछ पता नहीं। पहुंचेगी भी या नहीं, यह भी कुछ पता नहीं। वहां कोई है भी दूसरे किनारे पर सुनने को, यह भी पता नहीं। दूसरा किनारा होता भी है, यह भी पता नहीं। जिसमें इतना साहस हो, इतनी श्रद्धा हो–.हजार संदेह खड़े होंगेः क्यों समय व्यर्थ करते हो? किसे पुकार रहे हो? आकाश चुप मालूम होता है, उत्तर तो आता नहीं। उस किनारे से कोई इशारा तो मिलता नहीं। हजार संदेह उठेंगे, स्वाभाविक है। इतनी श्रद्धा चाहिए कि तुम उन संदेहों को पार कर जाओ। इतनी श्रद्धा चाहिए कि उन संदेहों के बावजूद तुम आगे बढ़ जाओ। 

–अथातो भक्ति जिज्ञासा-23

 

सबसे बड़ा पुण्य कहा शांडिल्य ने–भजन, कीर्तन, नर्तन। लेकिन ध्यान रखना, ये सब गौण हैं। ये सब यात्रा के उपाय हैं। मंजिल पर पहुंच कर ये सब चले जाने चाहिए। इनको पकड़ मत लेना। इनका अभ्यास मत कर लेना। इनसे गुजर जाना, इनसे अटक मत जाना। 

अथातो भक्ति जिज्ञासा-29

 

गौणी-भक्ति, भजन-कीर्तन आदि से मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति तो पराभक्ति से मिलती है। फिर गौणी-भक्ति से क्या मिलता है? गौणी-भक्ति से पराभक्ति मिलती है। भजन-कीर्तन इत्यादि से पराभक्ति का रस धीरे-धीरे बढ़ता है। जिस दिन पराभक्ति मिल जाती है, उस दिन गौणी-भक्ति विदा हो गई। और पराभक्ति से मोक्ष का आविर्भाव होता है।

अथातो भक्ति जिज्ञासा-33

 

अंत में यही निवेदन है–माना कि सफर की शुरुआत, मंजिल नहीं है। लेकिन जो शुरु ही नहीं करेगा, वह समापन भी कैसे कर पाएगा? हां, इतना अवश्य स्मरण दिलाना होगा कि कोई बच्चा प्ले स्कूल को ही शिक्षा की पूर्णता न समझ ले। निश्चित ही विश्वविद्यालय तक जाना है। के.जी. और प्रायमरी स्कूल उच्च शिक्षा के विरोधी नहीं, शत्रु नहीं; वरन उसके लिए सोपान हैं, सहयोगी हैं।

मित्र, मैं स्वयं भी पूजा-प्रार्थना नापसंद करता हूं। किंतु ध्यान का, शून्यता का मार्ग बहुत कम लोगों के काम का है। इसलिए मजबूरी में गौणी भक्ति वाले क्रिया-कलापों को ‘स्वधर्म’ के खिलाफ समझौता करके चलना पड़ता है। छोटे बच्चों के जन्मदिन पर हम उन्हें खिलौने की कार गिफ्ट देते हैं, भलीभांति जानते हुए कि निरर्थक है। सचमुच की कार देना खतरनाक साबित होगा। इंतजार करना होगा कि बच्चा बड़ा हो जाए, फिर वह खुद ही खिलौना फेंक देगा।

अगर ओशो की केवल ध्यान वाली देशना को ही शुद्ध समझकर, शुद्ध देशना को बचाने का प्रयास किया गया तो शीघ्र ही कुछ भी नहीं बचेगा। थोड़ी सी अशुद्धि जरूरी है। क्योंकि 24 कैरेट गोल्ड के आभूषण नहीं बनते। तथाता– तथ्य ऐसा है!

धन्यवाद।

-शैलेन्द्र

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One thought on ““Open Letter to Sw. Chaitanya Keerti” By Osho Shailendra.

  • July 29, 2019 at 10:45 AM
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    Interesting to see Sw. Chaitanya Keerti and Osho Shailendra exchange words, Sw. Chaitanya Keerti attempting to draw Osho Shailendra out of the ‘narcissistic trinity’, perhaps back into the business of selling Osho books and Osho Shailendra responding with extensive quotes from Osho books. Sw. Chaitanya Keerti did not realize that two of the three in the trinity were Osho Shailendra and his wife Osho Priya themselves, how could Osho Shailendra come out of the trinity, alone? Osho Shailendra did not realize that Sw. Chaitanya Keerti was gesturing him to ‘Come Out’ of the falsehood he had entered into and foolishly gave Sw. Chaitanya Keerti a sermon on ‘Bhakti’.
    I wish at least one of them was ‘enlightened’ and this childish spar could have been averted???

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