सिद्धार्थ उपनिषद्

उपनिषद् शब्द का अर्थ है – “ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु चरणों में बैठना”, सभी उपनिषद जीवित सदगुरु और शिष्यों के सन्वाद से जन्में  हैं।

सदगुरु ओशो सिद्धार्थ जी ओशो नानक धाम में दर्शन दरबार में साधको से मिलते है |  इस मिलन में सदगुरु एवं शिष्यों के बीच एक अद्भुत जीवंत उपनिषद् रचा जाता है -” सिद्धार्थ उपनिषद “। ” सिद्धार्थ उपनिषद ” के ये अनमोल सूत्र साधकों -खोजियो के लिये आकाशदीप की तरह उनका सतत दिशानिर्देश करतें रहेंगे।, इस उपनिषद् के कुछ सूत्र – 

  1. ब्रह्रा सर्वव्यापी है। उसी से जड़ और चेतन दोनों पैदा होते हैं। जड़, चेतन को धारण करता है। परम चैतन्य, चेतन का पोषण करता है। तीनों के इस समीकरण से ही सृषिट की लीला चलती है।
  2. ब्रह्रा मुख्यत: परम चैतन्य निराकार है। कुछ हिस्सा जड़ आकार है। बहुत ही कम हिस्सा चेतन या जीव है। लेकिन तीनों महत्वपूर्ण है , क्योंकि इन तीनों से ही सृषिट का खेल चल रहा है।
  3. आत्मा का बहिर्मुखी विस्तार जो मसितष्क के माध्यम से कार्य करता है, चेतना है, मन है, बुद्धि है। चेतना का अंतर्मुखी विस्तार जो बिना मसितष्क के कार्य करता है, आत्मा है। निर्मल, निस्तरंग चेतना या मन ही आत्मा है। तरंगित आत्मा ही चेतना या मन है। आत्मा का विराट रूप परमात्मा है।
  4. आत्मा परमात्मा से कभी भी अलग नहीं होती और उसी से निरंतर अनुप्राणित होती रहती है। आत्मा के तल पर जाकर ही परमात्मा को जाना जा सकता है।
  5. जीव में पांच तत्व एवं आत्मा होती है। मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर से बाहर निकलता है। सूक्ष्म शरीर में आकाश तत्व, सूक्ष्म मसितष्क, सूक्ष्म चेतना और आत्मा होती है। आत्मा तब भी परमात्मा से निरंतर जुड़ी रहती है और निरंतर ऊर्जायित होती रहती है। किसी बल्ब के उदाहरण से समझना चाहें, तो कह सकते हैं कि परमात्मा विधुत की तरह है, आत्मा प्रकाश की तरह है, और शरीर बल्ब के फिलामेंट एवं कांच की तरह है। किसी वृक्ष के उदाहरण से समझना चाहें, तो कह सकते हैं कि धड़ शरीर एवं चेतना की तरह, जड़ आत्मा की तरह और पृथ्वी परमात्मा की तरह है।
  6. “ध्यान शांति में ले जाता है. प्रेम आनंद में ले जाता है. समाधि विश्राम में ले जाती है.”
  7. “स्वयं के होने का मजा लेना ध्यान है. दूसरे के होने का मजा लेना प्रेम है. स्वयं के मिटने का मजा लेना समाधि है.  “
  8. “निद्रा शरीर का विश्राम है. सुमिरन मन का विश्राम है. समाधि आत्मा का विश्राम है.”
  9. “साधना का आरम्भ ध्यान से है, समाधि मध्य में है और सुमिरन शिखर है. ध्यान अर्थात निराकार के प्रति जागना. समाधि अर्थात अंतराकाश के प्रति जागना. सुमिरन अर्थात ओंकार के प्रति जागना.”
  10. “सुरति क्या है ? सांसों के साथ आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति होश को सुरति कहते हैं. सूफी इसे फ़िक्र कहते हैं. इसमें सहज ही निर्विचार अवस्था बनी रहती है. सुरति होश से ज्यादा प्रभावशाली है.”
  11. “सुमिरन क्या है ? जब सुरति में मन्त्र जोड़ दिया जाता है, तो उसे सुमिरन कहते हैं. सूफी इसे जिक्र कहते हैं. यह सर्वाधिक प्रभावशाली है. प्रभाव की दृष्टि से यदि सुमिरन कों 100 प्रतिशत अंक दिया जा सकता है, तो सुरति कों 50 प्रतिशत और होश कों 25 प्रतिशत से ज्यादा नहीं दिया जा सकता.”
  12. “सुमिरन चार प्रकार से किया जाता है – (1) कंठ से, (2) मन से, (3) ह्रदय से एवं (4) साक्षी होकर. कंठ से सुमिरन का अर्थ है बोलकर सुमिरन, बोलकर प्रभु की याद, कीर्तन. मन से सुमिरन का अर्थ है प्रभु के नाम और रूप का मनन करते हुए सुमिरन. ह्रदय से सुमिरन का अर्थ है प्रेम से भरकर प्रभु की याद. ये तीनों प्रकार के सुमिरन संत वाणी में वर्णित हैं. साक्षी सुमिरन ओशो का मौलिक अनुदान है. इसका अर्थ है आत्मस्मरण के साथ हरि का सुमिरन. यह सर्वाधिक प्रभावशाली है.”
  13. “संत कहते हैं–‘सांस सांस सुमिरो गोविन्द.’लेकिन इससे यह ना समझना कि सुमिरन हमारी duity है.ऐसा इसलिए कि सुमिरन गोविन्द के प्रति हमारे प्रेम का इजहार है.सुमिरन साधन है,प्रेम सिद्धि है.सुमिरन मार्ग है,प्रेम मंजिल है.सुमिरन करोगे,तो बुल्लेशाह कि तरह तुम भी एक दिन गाने लगोगे–‘रोम-रोम घा प्रेम के लागे.'”
  14. “आत्मा से जुडना ज्ञान है. परमात्मा अर्थात हुकमी से जुडना भक्ति है. हुकमी और हुकम (ऋत, ताओ, परम नियम) दोनों से जुडकर जीना संतत्व है.”
  15. “ज्ञान तो पूरा गुरु (कामिल मुर्शिद, देहधारी गुरु, जीवित गुरु) के बिना भी अपवाद स्वरुप किसी-किसी को हो जाता है,लेकिन भक्ति का स्वाद बिना पूरा गुरु के नहीं मिलता. भगवान दत्तात्रेय, अष्टावक्र, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, महर्षि पतंजलि, महर्षि रमण, जे.कृष्णमूर्ति इसी कोटि में आते हैं. हमारे परमगुरु ओशो स्वयं कहते हैं कि वे भक्त नहीं हो सकते. वे हमें समझाते हैं -‘ज्ञान का मार्ग रेगिस्तान जैसा है. भक्ति का मार्ग सरस है, हरी-भरी वादियों के बीच से है. तुम भक्ति के मार्ग पर चलना. मुझे कोई कहने वाला नहीं था. लेकिन मैं तुम्हें समझा रहा हूं. तुम यह गलती मत करना.’ मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि ज्ञानमार्ग सम्बोधि तक तो ले जा सकता है, लेकिन उसके आगे परमपद तक नहीं ले जा सकता. इसलिए ओशोधारा में हमने सहज भक्ति योग का मार्ग चुना है. स्वामी रामानंद, कबीर साहब, नानकदेव जी इसे ही शब्द सुरत योग  कहते हैं.”
  16. “मैं और तू द्वैत है. मैं का गिर जाना अद्वैत है. अद्वैत में मैं नहीं बचता, तू ही बचता है. आत्मज्ञान में अहंकार तो नहीं ही बचता, अस्मिता भी नहीं बचती, केवल आत्मा बचती है. अद्वैत में आत्मा का भी अलग अस्तित्व नहीं बचता. केवल परमात्मा बचता है.”
  17. “जैसे हमारे चारों तरफ थलमन्डल , जलमन्डल ,वायुमंडल एवं नभमन्डल हैं , वैसे ही नाद से गुन्जित सहजमन्डल के रुप में सर्वत्र सर्वव्यापी गोविन्द विद्यमान है।”
  18. “एक महारास चल रहा है। सबको इस नृत्य में भाग लेने का अधिकार है। खुद नाचो और दूसरों को भी नाचने दो।”
  19. “ज्ञाता( आत्मा ) का स्मरण ध्यान है , ज्ञेय( हरि ) का स्मरण सुमिरन है  , और जानना मात्र (ज्ञान ) समाधि है । सुमिरन आत्मा का भोजन है। साक्षी होकर सुमिरन करें। सुमिरन में जीना स्वर्ग है। सुमिरन से  हट जाना नर्क है।”
  20. “उदासी का मुख्य कारण हरि विस्मरण है। आनन्द का मुख्य उपाय हरि स्मरण है मस्ती में जीए । पूर्णता में जीए । सुमिरन में जीए ।”
  21. “ओशोधारा में हम प्रेम की स्वतंत्रता को सम्मान देते हैं  , लेकिन परिवार  , सम्मान अथवा अध्यात्मिक विकास की कीमत पर नहीं। तुमने सुना होगा यह प्रसिद्ध गीत — ‘ छोड़ दे सारी दुनियां किसी के लिए  , यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए  ; प्यार से भी जरुरी कई काम हैं  , प्यार सबकुछ नहीं आदमी के लिए। ‘”
  22. “गुरुद्रोह से बड़ा पाप कुछ भी नहीं है .गुरु से नहीं जुडो, कोई बात नहीं.पर जुड कर दुर्भावना रखो या द्रोह करो,यहाँ अक्षम्य अपराध है.गुरु भले इसे क्षमा कर दे,परमात्मा क्षमा नहीं करता.वेदव्यास कहते हैं–‘विष्णु स्थाने कृतं पापं गुरु स्थाने प्रमुच्यते.गुरु स्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति..’अर्थात भगवान के यहां पाप करोगे,तो गुरु उससे मुक्त कर देगा.लेकिन गुरुद्रोह करोगे,तो वह अमिट कर्मबंध बन जाता है.”
  23. “साक्षी का अर्थ तटस्थता नहीं,आत्मा की निष्टता है,इन्वोल्वमेंट है,जैसे साक्षी होकर संगीत सुननेका अर्थ है कि अपने निराकार के तल से संगीत सुनो.फिर तो कान,मन,ह्रदय स्वतः ही संगीत सुनने में लग जाएँगे.साक्षी का अर्थ है कि जो भी कर रहे हो,अपने निराकार को भी सम्मिलित करो.कृष्ण के ‘योगस्थ कुरु कर्माणि’का यही तात्पर्य है.”
  24. “वर्तमान समय का हिस्सा नहीं है.वर्तमान अतीत एवं भविष्य का संगम नहीं है.वर्तमान कालातीत है.वर्तमान परमात्मा से भरा आकाश है.वर्तमान परमात्मा है.वर्तमान में होने का मजा लेना तथाता है.”
  25. “जीवन को जानना जिज्ञासा है.महाजीवन को जानना मुमुक्षा है.परमजीवन को जानना भक्ति है.धर्म का आधार जिज्ञासा है.मुमुक्षा उसकी दीवारें हैं.भक्ति उसकी छत है.तीनों के संयोग से धर्म का मंदिर निर्मित होता है.”
7532 Total Views 6 Views Today

9 thoughts on “सिद्धार्थ उपनिषद्

  • May 30, 2015 at 12:03 PM
    Permalink

    Sadguru k ek ek vakya adbhut hain.
    Bar bar padhkar bhi dil nahi bharta……..

    Lakh Lakh Dhanyavad………

    Reply
    • June 21, 2015 at 5:33 PM
      Permalink

      gratitude bade baba…naman…./\….

      Reply
  • May 30, 2015 at 2:08 PM
    Permalink

    गज़ब की प्रज्ञा ! सूत्रों में सारे ज्ञान को ढालना विस्मित कर देने वाला है । जय हो सद्गुरु बड़े बाबा की । प्रणाम बारम्बार तुम्हें ! जय ओशो …..

    Reply
  • May 30, 2015 at 4:50 PM
    Permalink

    Pyare Bade Baba ke charano me pranam..

    I came to Murthal for Samdhi prgrams mainly to attend Darshan Darbar which is most important part of Samadhi program.

    Ye naye yug ka Upanishad hain.

    Pyare Baba ko Dhanyawad..

    Reply
  • September 23, 2015 at 5:20 AM
    Permalink

    Happy birthday to you .

    Reply
  • October 10, 2015 at 12:56 AM
    Permalink

    Will appreciate in materials in English as I am comfortable reading in English.

    Reply
      • December 29, 2015 at 11:01 AM
        Permalink

        परमगुरु ओशो की देशना !
        सद्गुरु त्रिविर की खोज एवं अनुकम्पा !!
        ओशोधार की कुशल ब्यवस्थापन !!!
        गुरुबर्ग की प्रयोग, सत्प्रयास एवं कृपा !!!!
        अस्तित्व की चाह, बुंद की संकल्प और समर्पण से परमात्मा की बहुत सी आयामो से परिचित होना,उसको जानना और उसमे जीना,और वही होना की और यात्रा बढ़रही है !!!!!
        तृप्ति और प्यास दोनों बढ़रही है !
        जय ओशो ! जय ओशो त्रिबिर !!

        Reply
  • October 17, 2015 at 12:50 PM
    Permalink

    हैरान हू कि अपने नाम से नामकरण करके ‘सिद्धार्थ उपनिषद्’ में इधर उधर से चुराई उन्ही पक्तियों को रख दिया गया है जिन्हें सुनते सुनते हम बूढ़े हो गये हैं. क्या कोई सर्वग्य अपने अनुभव को अपने शब्दों में नहीं कह सकता?
    कहा है “ब्रह्रा सर्वव्यापी है”. अब यह बात भारत का बच्चा बच्चा कह देगा. आपने अपने उपनिषद् में यह लिख कर कौन बड़ा काम कर दिया है?
    लिखा है: “गुरुद्रोह से बड़ा पाप कुछ भी नहीं है”. अरे आप लोगों को मुक्त करने आए हैं या अपनी जंजीरों से बांधने?
    जब तक ओशोधारा ज्ञान मार्ग पर थी परमज्ञान को उपलब्ध साधकों कि झड़ी लगी रहती थी. लेकिन मुक्त होते ही ये ‘साधक’ स्वतंत्र हो जाते थे. जब से ओशोधारा ने भक्ति मार्ग पकड़ा है गुरु-शिष्यों कि बाढ़ आ गयी है पर ‘परम-अनुभव’ किसी को भी नहीं हुआ है. अब शिष्यों को उलझाए रखने के लिए ध्यान कार्यक्रमों को आगे से आगे के तलों में बढ़ाया जा रहा है.
    इस पूरे so called उपनिषद् में केवल para17 काम का है – “नाद से गुन्जित सहजमन्डल”. जिस साधक का ‘नाद’ से परिचय हो जाए उसके लिए फिर ओशोधारा में कुछ भी नहीं रखा. उसे स्वयं ही आगे कि यात्रा करनी होती है. जीवन भर ‘नाद’ को साधना होता है और फिर किसी दिन जैसे किसी चमत्कार से परम-चैतन्य में डुबकी लग जाती है. इस चमत्कार के घटने में न तो ओशोधारा मदद कर सकती है न स्वयं ओशो ही. लेकिन यहां सवाल यह है कि साधक का ‘नाद’ से ठीक से परिचय करवा कर यदि ओशोधारा साधक को स्वतंत्र कर दे तो गुरुओं कि अपनी रोजी रोटी और प्रतिष्ठा कैसे चलेगी/बढ़ेगी?

    Reply

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!