“साक्षी है ध्यान की आत्मा ! ” – ओशो

ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो कुछ भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किन्तु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम जाग्रत और साक्षी रह सको।

सारी बात यह है कि तुम सोये-सोये मत रहो। फिर जो भी हो, ध्यान होगा।

होश का पहला चरण-
होश के लिए पहला चरण है अपने शरीर के प्रति पूर्ण होश रखना। धीरे-धीरे व्यक्ति प्रित्येक भाव-भंगिमाओ के प्रति, हर गति के प्रति होशपूर्ण हो जाता है। और जैसे ही तुम होशपूर्ण होने लगते हो, एक चमत्कार घटित होने लगता है: अनेक बातें जो तुम पहले करते थे, सहज ही गिर जाती हैं। तुम्हारा शरीर ज्यादा विश्रामपूर्ण, ज्यादा लयबद्ध हो जाता है। शरीर तक में एक गहन शांति फैल जाती है, एक सूक्ष्म संगीत फैल जाता है शरीर में।

होश का दूसरा चरण-
फिर अपने विचारों के प्रति होशपूर्ण होना शुरू करो। जैसे शरीर के प्रति होश को साधा, वैसे ही अब विचारों के प्रति करो। विचार शरीर से ज्यादा सूक्ष्म हैं, और फलत: ज्यादा कठिन भी हैं। और जब तुम विचारों के प्रति जागोगे, तब तुम आश्चर्यचकित होओगे कि भीतर क्या-क्या चलता है। यदि तुम किसी भी समय भीतर क्या चलता है उसे लिख डालो, तो तुम चकित होओगे। तुम भरोसा ही न कर पाओगे कि भीतर यह सब क्या चलता है। फिर दस मिनट के बाद इसे पढ़ो-तुम पाओगे कि भीतर एक पागल मन बैठा हुआ है! चूंकि हम होशपूर्ण नही होते, इसलिए यह सब पागलपन अंतर्धारा की तरह चलता रहता है। यह प्रभावित करता है-जो कुछ तुम करते हो उसे या जो कुछ तुम नही करते उसे । सब कुछ प्रभावित होता है। और इन सब का जोड़ ही तुम्हारा जीवन बनने वाला है। इसलिए इस भीतर के पागल व्यक्ति को बदलना होगा। और होश का चमत्कार यह है कि तुम्हें और कुछ भी नही करना है सिवाय होशपूर्ण होने के। इसे देखने की घटना मात्र ही इसका रूपांतरण है। धीरे-धीरे यह पागलपन विसर्जित हो जाता है। धीरे-धीरे विचार एक लयबद्धता ग्रहण करने लगते हैं; उनकी अराजकता हट जाती है और उनकी एक सुसंगतता प्रकट होने लगती है। और फिर एक ज्यादा गहन शांति उतरती है। फिर जब तुम्हारा शरीर और मन शांतिपूर्ण हैं तब तुम देखोगे कि वे परस्पर भी लयबद्ध हैं, उनके बीच एक सेतु है। अब वे विभिन्न दिशाओं में नही दौड़ते; अब वे दो घोड़ों पर सवार नही होते। पहली बार भीतर एक सुख-चैन आया है और यह सुख-चैन बहुत सहायक होता है-तीसरे तल पर ध्यान साधने में और वह है – अपनी अनुभुतियों और भावदशाओं के प्रति होशपूर्ण होना।

होश का तीसरा चरण-
यह सूक्ष्मतम तल है और सबसे कठिन भी। लेकिन यदि तुम विचारों के प्रति होशपूर्ण हुए हो, तब यह केवल एक कदम आगे है। कुछ ज्यादा गहन होश और तुम अपने भावों और अनुभूतियों के प्रति सजग हो जाओगे। एक बार तुम इन तीन आयामों में होशपूर्ण हो जाते हो, फिर ये तीनों जुड़कर एक ही घटना बन जाते हैं। जब ये तीन एक साथ हो जाते हैं – एक साथ क्रियाशील और निनादित हो उठते हैं, तब तुम इनका संगीत अनुभव कर सकते हो, वे तीनों एक सुरताल बन जाते हैं-तब चौथा चरण तुरीय घटता है – उसे तुम कर नही सकते। चौथा अपने से होता है। यह समग्र असितत्व से आया उपहार है; जो प्रथम तीन चरणों को साध चुके हैं, उनके लिए यह एक पुरस्कार है।

होश का चरम शिखर
चौथा चरण होश का चरम शिखर है, जो व्यक्ति को जाग्रत बना देता है। व्यक्ति होश के प्रति जागरूक हो जाता है-यह है चौथा। व्यक्ति बुद्ध हो जाता है – जाग जाता है। और इस जागरण में ही अनुभूति होती है कि परम आनंद क्या है। शरीर जानता है देह-सुख; मन जानता है प्रसन्नता; ह्रदय जानता है हर्षोल्लास और चौथा, तुरीय जानता है आनंद। आनंद लक्ष्य है संन्यास का, सत्य के खोजी का-और जागरूकता है उसके लिए मार्ग।
महत्व की बात है कि तुम जागरूक हो, कि तुम होशपूर्ण होना भूले नहीं हो, कि तुम साक्षी हो, द्रष्टा हो, सचेत हो । और जैसे-जैसे देखने वाला, द्रष्टा ज्यादा सघन, ज्यादा थिर, ज्यादा अकंप होने लगता है-एक रूपांतरण घटित होता है: दृश्य विसर्जित होने लगते हैं। पहली बार द्रष्टा स्वयं दृश्य बन जाता है। देखने वाला स्वयं दृश्य हो जाता है। तुम घर वापस आ गए।

– ओशो

[ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति ]

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