“प्रेम ही परमात्मा है” – ओशो

प्रेम ही परमात्मा है |

प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था वह प्रेम ही नहीं था। उससे ही तुम जले बैठे हो। और यह भी मैं जानता हूँ कि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीने लगता है।
तो तुम्हें प्रेम शब्द सुनकर पीड़ा उठ आती होगी, चोट लग जाती होगी। तुम्हारे घाव हरे हो जाते होंगे। फिर से तुम्हें अपनी पुरानी यादें उभर आती होंगी। लेकिन मैं उस प्रेम की बात नहीं कर रहा हूँ।
मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उस प्रेम का तो तुम्हें अभी पता ही नहीं है। और मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ वह तो कभी असफल होता ही नहीं। और मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उसमें अगर कोई जल जाए तो निखरकर कुंदन बन जाता है, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उसमें जलकर कोई जलता नहीं और जीवंत हो जाता है। व्यर्थ जल जाता है, सार्थक निखर आता है।
लेकिन मैं तुम्हारी तकलीफ भी समझता हूँ। बहुतों की तकलीफ यही है। इसलिए तो प्रेम जैसे प्यारे शब्द, बहुमूल्य शब्द ने अपना अर्थ खो दिया है.

जैसे हीरा कीचड़ में गिर गया हो।
लोग कहते हैं मुहब्बत में असर होता है।
कौन-से शहर में होता है, कहाँ होता है।

स्वभावतः तुमने तो जिसको प्रेम करके जाना था उसमें सिवा दुख के और कुछ भी नहीं पाया, पीड़ा के सिवा कुछ हाथ न लगा। तुमने तो सोचा था कि प्रेम करेंगे तो जीवन में वसंत आएगा। प्रेम ही पतझड़ लाया। प्रेम न करते तो ही भले थे। प्रेम ने सिर्फ नए-नए नर्क बनाए।
और ऐसा ही नहीं है कि जो प्रेम में हारते हैं उनके लिए ही नर्क और दुख होता है; जो जीतते हैं उनके लिए भी नर्क और दुख होता है।
जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है- दुनिया में दो ही दुख हैं, एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए। और दूसरा दुख मैं कहता हूँ कि पहले से बड़ा है। क्योंकि मजनू को लैला न मिले तो भी विचार में तो सोचता ही रहता है कि काश, मिल जाती! काश मिल जाती, तो कैसा सुख होता! तो उड़ता आकाश में, कि करता सवारी बादलों की, चाँद-तारों से बातें, खिलता कमल के फूलों की भाँति। नहीं मिल पाया इसलिए दुखी हूँ।
मजनू को मैं कहूँगा, जरा उनसे पूछो जिनको लैला मिल गई है। वे छाती पीट रहे हैं। वे सोच रहे है कि मजनू धन्यभागी था; बड़ा सौभाग्यशाली था। कम से कम बेचारा भ्रम में तो रहा। हमारा भ्रम भी टूट गया।
जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल हो ही नहीं सकती। बाहर की सभी यात्राएँ असफल होने को आबद्ध हैं। क्यों ? क्योंकि जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुँचते हो, खो जाता है। मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता है।
रेगिस्तान में प्यासा आदमी देख लेता है कि वह रहा जल का झरना। फिर दौड़ता है, दौड़ता है और पहुँचता है, पाता है झरना नहीं है, सिर्फ भ्रांति हो गई थी। प्यास ने साथ दिया भ्रांति में। खूब गहरी प्यास थी इसलिए भ्रांति हो गई। प्यास ने ही सपना पैदा कर लिया। प्यास इतनी सघन थी कि प्यास ने एक भ्रम पैदा कर लिया।
बाहर जिसे हम तलाशने चलते हैं वह भीतर है। और जब तक हम बाहर से बिलकुल न हार जाएँ, समग्ररूपेण न हार जाएँ तब तक हम भीतर लौट भी नहीं सकते। तुम्हारी बात मैं समझा।

“किस-दर्जा दिलशिकन थे
मुहब्बत के हादिसे
हम जिंदगी में फिर कोई
अरमाँ न कर सके।”

एक बार जो मोहब्बत में जल गया, प्रेम में जल गया, घाव खा गया, फिर वह डर जाता है। फिर दुबारा प्रेम का अरमान भी नहीं कर सकता। फिर प्रेम की अभीप्सा भी नहीं कर सकता।

“दिल की वीरानी का क्या मजकूर है,
यह नगर सौ मरतबा लूटा गया।”

और इतनी दफे लुट चुका है यह दिल! इतनी बार तुमने प्रेम किया और इतनी बार तुम लुटे हो कि अब डरने लगे हो, अब घबड़ाने लगे हो।
मैं तुमसे कहता हूँ, लेकिन तुम गलत जगह लुटे। लुटने की भी कला होती है। लुटने के भी ढंग होते हैं, शैली होती है। लुटने का भी शास्त्र होता है। तुम गलत जगह लुटे। तुम गलत लुटेरों से लुटे।

तुम देखते हो, हिंदू बड़ी अद्भुीत कौम है। उसने परमात्मा को एक नाम दिया हरि। हरि का अर्थ होता है. लुटेरा, जो लूट ले, जो हर ले, छीन ले, चुरा ले। दुनिया में किसी जाति ने ऐसा प्यारा नाम परमात्मा को नहीं दिया है। जो हरण कर ले।
लुटना हो तो परमात्मा के हाथों लुटो। छोटी-छोटी बातों में लुट गए! चुल्लू-चुल्लू पानी में डूबकर मरने की कोशिश की, मरे भी नहीं, पानी भी खराब हुआ,कीचड़ भी मच गई, अब बैठे हो। अब मैं तुमसे कहता हूँ, डूबो सागर में। तुम कहते हो, हमें डूबने की बात ही नहीं जँचती क्योंकि हम डूबे कई दफा। डूबना तो होता ही नहीं, और कीचड़ मच जाती है। वैसे ही अच्छे थे। चुल्लू भर पानी में डूबोगे तो कीचड़ मचेगी ही। सागरों में डूबो। सागर भी है।

“मेरी मायूस मुहब्बत की
हकीकत मत पूछ
दर्द की लहर है
अहसास के पैमाने में।”

तुम्हारा प्रेम सिर्फ एक दर्द की प्रतीति रही। रोना ही रोना हाथ लगा, हँसना न आया। आँसू ही आँसू हाथ लगे। आनंद, उत्सव की कोई घड़ी न आई।

“इश्क का कोई नतीजा नहीं
जुज दर्दो-आलम
लाख तदबीर किया कीजे
हासिल है वही।”

लेकिन संसार के दुख का हासिल यही है कि दर्द के सिवा कुछ भी नतीजा नहीं है।

इश्क का कोई नतीजा नहीं
जुज दर्दो-आलम।

दुख और दर्द के सिवा कुछ भी नतीजा नहीं है।

“लाख तदबीर किया कीजे
हासिल है वही।”

यहाँ से कोशिश करो, वहाँ से कोशिश करो, इसके प्रेम में पड़ो, उसके प्रेम में पड़े, सब तरफ से हासिल यही होगा। अंततः तुम पाओगे कि हाथ में दुख के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। राख के सिवा कुछ हाथ में नहीं रह गया है। धुआँ ही धुआँ!
लेकिन मैं तुमसे उस लपट की बात कर रहा हूँ जहाँ धुआँ होता ही नहीं। मैं तुमसे उस जगत की बात कर रहा हूँ जहाँ आग जलाती नहीं, जिलाती है। मैं भीतर के प्रेम की बात कर रहा हूँ। मेरी भी मजबूरी है। शब्द तो मुझे वे ही उपयोग करने पड़ते हैं,जो तुम भी उपयोग करते हो तो मुश्किल खड़ी होती है। क्योंकि तुमने अपने अर्थ दे रखे हैं।
जैसे ही तुमने सुना ‘प्रेम’,कि तुमने जितनी फिल्में देखी हैं,उनका सबका सार आ गया। सबका निचोड़ – इत्र। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ वह कुछ और है । मीरा ने किया, कबीर ने किया, नानक ने किया, जगजीवन ने किया। तुम्हारी फिल्मोंवाला प्रेम नहीं, नाटक नहीं। और जिन्होंने यह प्रेम किया उन सबने यहीं कहा कि वहाँ हार नहीं है, वहाँ जीत ही जीत है। वहाँ दुख नहीं है,वहाँ आनंद की पर्त पर पर्त खुलती चली जाती है। और अगर तुम इस प्रेम को न जान पाए तो जानना,जिंदगी व्यर्थ गई।

“दूर से आए थे साकीए
सुनकर मैखाने को हम।
पर तरसते ही चलेए
अफसोस पैमाने को हम।

मरते वक्त ऐसा न कहना पड़े तुम्हें कि कितनी दूर से आए थे। दूर से आए थे साकी सुनकर मैखाने को हम. मधुशाला की खबर सुनकर कहाँ से तुम्हारा आना हुआ जारा सोचो तो! कितनी दूर की यात्रा से तुम आए हो। पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम. यहाँ एक घूँट भी न मिला।
मरते वक्त अधिक लोगों की आँखों में यही भाव होता है। तरसते हुए जाते हैं। हाँ, कभी-कभी ऐसा घटता है कि कोई भक्त, कोई प्रेमी परमात्मा का; तरसता हुआ नहीं जाता, लबालब जाता है।
मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूँ। आँख खोलकर एक प्रेम होता है,वह रूप से है। आँख बंद करके एक प्रेम होता है,व अरूप से है। कुछ पा लेने की इच्छा से एक प्रेम होता है वह लोभ है, लिप्सा है। अपने को समर्पित कर देने का एक प्रेम होता है, वही भक्ति है।
तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है,स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-पत्नी लड़ते रहते हैं। उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है।
मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूँ, जहाँ तुम परमात्मा से कुछ माँगते नहीं, कुछ भी नहीं। सिर्फ कहते हो, मुझे अंगीकार कर लो। मुझे स्वीकार कर लो। मुझे चरणों में पड़ा रहने दो। यह मेरा हृदय किसी कीमत का नहीं है, किसी काम का नहीं है, मगर चढ़ाता हूँ तुम्हारे चरणों में। और कुछ मेरे पास है भी नहीं। और चढ़ा रहा हूँ तो भी इसी भाव से चढ़ा रहा हूँ “श्त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पयेत्।” तेरी ही चीज है। तुझी को वापस लौटा रहा हूँ। मेरा इसमें कुछ है भी नहीं। देने का सवाल भी नहीं है,देने की अकड़ भी नहीं है। मगर तुझे और तेरे चरणों में रखते ही इस हृदय को शांति मिलती है, आनंद मिलता है,रस मिलता है। जो खंड टूट गया था अपने मूल से, फिर जुड़ जाता है। जो वृक्ष उखड़ गया था जमीन से, उसको फिर जड़ें मिल जाती हैं, फिर हरा हो जाता है, फिर रसधार बहती है, फिर फूल खिलते हैं, फिर पक्षी गीत गाते है, फिर चाँद-तारों से मिलन होता हैं।
परमात्मा से प्रेम का अर्थ है कि इस समग्र अस्तित्व के साथ मैं अपने को जोड़ता हूँ। मैं इससे अलग-अलग नहीं जिऊँगा, अपने को भिन्न नहीं मानूँगा। अपने को पृथक मानकर नहीं अपनी जीवन-व्यवस्था बनाऊँगा। मैं इसके साथ एक हूँ। इसकी जो नियति है वही मेरी नियति है। मैं इस धारा के साथ बहूँगा, तैरूँगा नहीं। यह जहाँ ले जाए! यह डुबा दे तो डूब जाऊँगा। ऐसा समर्पण परमात्म प्रेम का सूत्र है। खाली मत जाना।

“मैकशों ने पीके तोड़े जाम-ए-मै
हाये वो सागर जो रक्खे रह गए।”

ऐसे ही रक्खे मत रह जाना। पी लो जीवन का रस। तोड़ चलो ये प्यालियाँ। और उसकी नजर एक बार तुम पर पड़ जाए और तुम्हारा जीवन रूपांतरित हो जाएगा।

– ओशो

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One thought on ““प्रेम ही परमात्मा है” – ओशो

  • December 29, 2015 at 5:52 PM
    Permalink

    Sadguru ko parnam

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