“गुरु और सदगुरु” – ओशो

“गुरु और सदगुरु में क्या फर्क है?”

गुरु का अर्थ होता है, जो एक प्रकार की बुद्धि के लिए सूत्र दे जाए। उसकी सीमा है। वह एक तरह की बात कह जाता है, उतनी बात जिनकी समझ में पड़ती है उतने थोड़े से लोग उसके पीछे चल पड़ते हैं। सदगुरु कभी-कभी होता है। सदगुरु का अर्थ होता है, जो मनुष्य मात्र के लिए बात कह जाए। जो किसी को छोड़े ही नही। जिसकी बांहें इतनी बड़ी हों कि सभी समा जाएं–स्त्री और पुरुष, सक्रिय और निषिक्रय, कर्मठ और निषिक्रय, बुद्धिमान और भाविक, तर्कयुक्त और प्रेम से भरे, सब समा जाएं, जिसकी बांहों में सब आ जाएं; जिसकी बांहों में किसी के लिए इनकार ही न हो।


बुद्ध ने वर्षो तक स्त्रियों को दीक्षा नही दी। इनकार करते रहे। वह मार्ग पुरुषों के लिए था। उसमें स्त्रियों की जगह नही है। स्त्रियों का थोड़ा भय भी है। और जब मजबूरी में, बहुत आग्रह करने पर बुद्ध ने दीक्षा भी दी स्त्रियों को, तो यह कहकर दी कि मेरा धर्म पाँच हजार साल चलता, अब केवल पाँच सौ साल चलेगा, क्योंकि स्त्रियों की मौजूदगी मेरे धर्म को भ्रष्ट कर देगी।

बुद्ध के सूत्र मौलिक रूप से पुरुष के लिए काम के हैं, क्योंकि प्रेम की वहाँ कोई जगह नही है। प्रीति का वहाँ कोई उपाय नही है। और स्त्रेन्न-चित्त तो प्रीति के बिना परमात्मा की तरफ जा ही नही सकता। तो खतरा है, बुद्ध गलत नही कह रहे हैं, बुद्ध ठीक ही कह रहे हैं। बुद्ध का भय साफ है कि मैंने स्त्रियों को ले लिया है। और मार्ग पुरुषों का है, और स्त्रियाँ बिना प्रीति के रह नही सकती, तो आज नही कल स्त्रियाँ अपनी प्रीति को डालना शुरू कर देंगी इस मार्ग पर और यह मार्ग शुद्ध ध्यान का है, प्रेम का और प्रार्थना का नही है। और स्त्रियों ने प्रीति डाल दी, उन्होंने बुद्ध पर ही प्रीति डाल दी, उन्होंने बुद्ध की ही पूजा शुरू कर दी–स्त्री बिना पूजा के नही रह सकती। पुरुष को पूजा करना बड़ा कठिन मालूम पड़ता है, झुकना कठिन मालूम पड़ता है, उसका अहंकार आड़े आता है। विरला है पुरुष जो झुक जाए।

समर्पण अगर कभी पुरुष करता भी है तो बड़े बेमन से करता है। बहुत सोच-विचार करता है, करना कि नही करना। स्त्री के लिए समर्पण सुगम है; संकल्प कठिन है। दोनों का मनोविज्ञान अलग है। पुरुष का मनोविज्ञान है संकल्प का विज्ञान। लड़ना हो, जूझना हो, युद्ध पर जाना हो, सैनिक बनना हो, वह तैयार है। वह बात उससे मेल खाती है, तालमेल है। स्त्री को समर्पण करना हो, कही झुकना हो, तो सुगम है, क्योंकि स्त्री में लोच है। इसलिए स्त्रियों को हमने कहा है- वे लताओं की भांति हैं। पुरुष वृक्षों की भांति हैं। स्त्री में लोच है। लता को कही न कही झुकना ही है, कही न कही सहारा लेना ही है। बुद्ध के मार्ग पर परमात्मा की तो धारणा नही थी, इसलिए परमात्मा का तो सहारा ही नही था, तो स्त्रियों ने बुद्ध को ही परमात्मा में रूपांतरित कर दिया। बुद्ध भगवान हो गये।

एक नया रूप बुद्ध-धर्म का प्रकट हुआ स्त्रियों के प्रवेश से- महायान। वह कभी प्रकट न हुआ होता। हीनयान बुद्ध का मौलिक रूप है। महायान स्त्रियों की अनुकंपा है! लेकिन स्त्रियों के आने से बुद्ध के ध्यान की प्रक्रियाएं तो डांवाडोल हो गई।

कृष्ण के मार्ग पर कोई अड़चन नही है। कृष्ण के मार्ग पर पुरुष को जाने में थोड़ी अड़चन है। पुरुष जाता है तो थोड़ा सा संकोच करता और झिझकता हुआ। स्त्री नाचते चली जाती है। तुम देखते हो न, कृष्ण के रास की इतनी कथाएं हैं, उनके भक्तो में पुरुष भी थे, गोपाल भी थे, मगर तुमने रास में देखा होगा स्त्रियों को ही नाचते। एकाध गोपाल भी दाढ़ी-मूंछधारी वहाँ दिखाई नही पड़ते। सब स्त्रियाँ हैं। ऐसा नही कि कुछ गोपाल न रहे होंगे। लेकिन उनको भी दाढ़ी-मूंछ की तरह चित्रित नही किया है, क्योंकि वे उतने ही स्त्रेण-चित्त रहे होंगे जितनी स्त्रियाँ।

पशिचम बंगाल में एक छोटा-सा संप्रदाय अब भी जीवित है–राधा संप्रदाय। उसमें पुरुष भी अपने को स्त्री मानता है, और जब कृष्ण की पूजा करना है तो स्त्री के वेश में करता है, स्त्री के कपड़े पहनकर करता है। और रात जब सोता है तो कृष्ण की मूर्ति को अपनी छाती से लगाकर सोता है। कृष्ण के साथ तो गोपी बने बिना कोई उपाय नही है। कृष्ण के साथ तो स्त्रेण हुए बिना कोई उपाय नही है। वहाँ तो नाता प्रीति का और प्रार्थना का है।

पुरुष कृष्ण के मार्ग पर जाएगा तो भ्रष्ट कर देगा वैसे ही, जैसे बुद्ध के मार्ग को स्त्रियों ने भ्रष्ट कर दिया।

गुरु का अर्थ होता है, जिसने एक दिशा दी है, एक सुनिशिचत दिशा दी है। उस सुनिशिचत दिशा में जितने लोग जा सकते हैं, वे जा सकते हैं; जो नही जा सकते, वह उनके लिए मार्ग नही है, वे कही और तलाशे । सदगुरु मैं उसे कहता हूँ, जिसकी बांहें इतनी बड़ी हैं कि स्त्री हों कि पुरुष, कि कर्म में रस रखने वाले लोग हों कि अकर्म में, कि बुद्धि में जीने वाले लोग हों कि ह्रदय में; जितने ढंग की जीवन-प्रक्रियाएं हैं, शैलियाँ हैं, सबके लिए उपाय हो, सबका स्वीकार हो। गुरु तो बहुत होते हैं, सदगुरु कभी-कभी होते हैं।

– ओशो

[अथातो भक्ति जिज्ञासा, प्रवचन- 15]

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One thought on ““गुरु और सदगुरु” – ओशो

  • June 16, 2015 at 3:23 AM
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    Hum Dhanyabhagi hai jo hame sadguru mile…

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