“गंगा स्नान से पाप मुक्ति !! ” – ओशो

गंगा स्नान से पाप मुक्ति !!

एक बात जो तीर्थ के बाबत ख्याल ले लेना चाहिए, वह यह कि सिंबालिक ऐक्ट का, प्रतीकात्मक कृत्य का भारी मूल्य है। जैसे जीसस के पास कोई आता है और कहता है। मैंने यह पाप किए। वह जीसस के सामने कन्फेस कर देता है, सब बता देता है मैंने यह पाप किए। जीसस उसके सिर पर हाथ रख कर कह देते है कि जा तुझे माफ किया। अब इस आदमी न पाप किए है। जीसस के कहने से माफ कैसे हो जाएंगे? जीसस कौन है,और हाथ रखने से माफ हो जाएंगे, जिस आदमी ने खून किया, उसका क्या होगा, या हमने कहा, आदमी पाप करे और गंगा में स्नान कर ले, मुक्त हो जाएगा। बिलकुल पागलपन मालूम हो रहा है।

जिसने हत्या की है, चोरी की है, बेईमानी की हे, गंगा में स्नान करके मुक्त कैसे हो जाएगा। यह दो बातें समझ लेनी जरूरी है। एक तो यह, कि पाप असली घटना नहीं है। स्मृति असली घटना है— मैमोरी । पाप नहीं, ऐक्ट नहीं, असली घटना जो आप में चिपकी रह जाती है। वह स्मृति है। आपने हत्या की है। यह उतना बड़ा सवाल नहीं है। आखिर में। आपने हत्या की है, यह स्मृति कांटे की तरह पीछा करेगी। जो जानते है…वे जो जानते है कि हत्या की है या नहीं। वह नाटक का हिस्सा है, उसका कोई मूल्य नहीं है। न कभी मरता है कोई, न कभी मार सकता है कोई। मगर यह स्मृति आपका पीछा करेगी कि मैंने हत्या की, मैंने चोरी की। यह पीछा करेगी और यह पत्थर की तरह आपकी छाती पर पड़ी रहेगी। वह कृत्य तो गया, अनंत में खो गया, वह कृत्य तो अनंत ने संभाल लिया। सच तो यह है सब कृत्य तो अनंत के है; आप नाहक उसके लिए परेशान है। और चोरी भी हुई है आपसे, तो अनंत के ही द्वारा आपसे हुई है। हत्या भी हुई है तो भी अनंत के द्वारा आपसे हुई है, आप नाहक बीच में अपनी स्मृति लेकर खड़े है। मैंने किया।

अब यह “मैंने किया” यह स्मृति आपकी छाती पर बोझ है। क्राइस्ट कहते हैं, तुम कन्फेस कर दो, मैं तुम्हें माफ किए देता हूं। और जो क्राइस्ट पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लोटेगा । असल में क्राइस्ट पाप से तो मुक्त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्त कर सकते हे। स्मृति ही असली सवाल हे। गंगा पाप से मुक्त नहीं कर सकती, लेकिन स्मृति से मुक्त कर सकती हे। अगर कोई भरोसा लेकर गया है। कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप से बाहर हो जाऊँगा और ऐसा अगर उसके चित में है। उसकी कलेक्टव अनकांशेस में है, उसके समाज की करोड़ों वर्ष से छुटकारा नहीं होगा वैसे, क्योंकि चोरी को अब कुछ और नहीं किया जा सकता। हत्या जो हो गई, हो गयी लेकिन यह व्यक्ति पानी के बाहर जब निकला तो सिंबालिक एक्ट हो गया।

क्राइस्ट कितने दिन दुनिया में रहेंगे, कितने पापी यों से मिलेंगे,कितने पापी कन्फेस कर पाएंगे। इसके लिए हिंदुओं ने ज्यादा स्थायी व्यवस्था खोजी है। व्यक्ति से नहीं बांधा। यह नदी कन्फेशन लेती रहेगी। वह नदी माफ करती रहेगी, यह अनंत तक रहेगी, और ये धाराएं स्थायी हो जाएंगी। क्राइस्ट कितने दिन रहेंगे। मुश्किल से क्राइस्ट तीन साल काम कर पाए, कुल तीन साल। तीस से लेकर तैंतीस साल की अम्र तक, तीन साल में कितने पापी कन्फेस करेंगे। कितने पापी उनके पास आएंगे। कितने लोगों के सिर पर हाथ रखेंगे। यहां के मनीषी यों ने व्यक्ति से नहीं बांधा, धारा से बाँध दिया। तीर्थ है, वहां जाएगा कोई, वह मुक्त होकर लौटे गा। तो स्मृति से मुक्त होगा। स्मृति ही तो बंधन है।

वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है। असली सवाल वही है, और निश्चित ही उससे छुटकारा हो सकता है। लेकिन उस छुटकारे में दो बातें जरूरी है। बड़ी बात तो यह जरूरी है कि आपकी ऐसी निष्ठा हो कि मुक्ति हो जाएगी। और आपकी निष्ठा कैसे होगी। आपकी निष्ठा तभी होगी जब आपको ऐसा ख्याल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है। और कोई उपाय नहीं है।

–ओशो

[मैं कहाता आंखन देखी]

3984 Total Views 1 Views Today

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!