“जाति-स्‍मरण / Past Life Regression” – ओशो

जाति-स्‍मरण / Past Life Regression

पिछले जन्‍म की स्मृतियाँ प्रकृति की और से रोकी गई है। प्रयोजन है उनके रोकने का जीवन की व्‍यवस्‍था में जिसे हम रोज-रोज जानते है, जीते है, उसका भी अधिकतम हिस्‍सा भूल जाए, यह जरूरी है। इसलिए आप इस जीवन की भी जितनी स्मृतियाँ बनाते है। उतनी स्मृतियाँ याद नहीं रखते। जो आपको याद नहीं है, वह भी आपकी स्‍मृति से मिट नहीं जाती। सिर्फ आपकी चेतना और उस स्‍मृति का संबंध छूट जाता है।

जैसे अगर कोई व्‍यक्‍ति पचास साल का है—पचास साल में अरबों-खरबों स्‍मृतियां बनती है। यदि वे सभी याद रखनी पड़ें, तो विक्षिप्‍त हो जाने के सिवाय कोई और रास्‍ता न रहे—जो बहुत सारभूत है, वह याद रह जाता है। जो असार, वह धीरे-धीरे विस्‍मरण हो जाता है।  लेकिन विस्‍मरण से आप यह मत अर्थ लेना कि वह आपके भीतर से मिट जाता है। सिर्फ आपकी चेतना के बिंदु से सरक कर आपके मन के लिए कोने में संग्रहीत हो जाता है।

बुद्ध ने उस संग्रहीत स्‍थान के लिए बहुत कीमती नाम दिया है। ‘’आलय-विज्ञान’’ द स्‍टोर हाउस आफ कांशसनेस। जैसे हमारे घर में सब घरों में, कबाड़ खाने के लिए फिजूल की चीजों को इक्ट्ठा करने का कमरा होता है। जहां जो बेकार हो जाता है। हम इक्ट्ठा करते जाते है। वह हमारी नजर से हट जाता है। लेकिन घर में मौजूद रहता है। ऐसे ही हमारी स्‍मृतियां, हमारी नजर से हट जाती है। और हमारे मन के कोने में इकट्ठी रह जाती है। अगर इस जीवन की सारी स्‍मृतियां याद रहें, तो आपका जीना कठिन हो जाएगा। आग के लिए चेतना मुक्‍त होनी चाहिए। इसके लिए पीछे को भूलना पड़ता है।

आप कल को भूल जाते है। इस लिए आने वाले कल में जीने के लिए समर्थ हो जाते है। फिर मन खाली हो जाता है। और आगे देखने लगता है। आगे देखने के लिए जरूरी है कि पीछे का भूल जाए। अगर पीछे का न भूले तो आगे देखने की क्षमता न बचेगी। और रोज आपके मन का एक हिस्‍सा खाली हो जाना चाहिए। जिसमें नए संस्‍कार, नए इंप्रेसंस ग्रहण किए जा सकें। अन्‍यथा ग्रहण कौन करेगा। तो अतीत रोज मिटता है। भविष्‍य रोज आता है। और जैसे ही भविष्‍य अतीत बना, वह भी मिट जाता है ताकि हम आग के लिए फिर मुक्‍त हो जाएं। ऐसी मन की व्यवस्था है।

एक जन्‍म की भी पूरी स्‍मृति हमें नहीं होती। अगर मैं आपसे पुछूं कि उन्‍नीस सौ साठ में एक जनवरी को आपने क्‍या किया, तो आप कुछ भी न बता सकेंगे। यद्यपि एक जनवरी उन्‍नीस सौ साठ में आप थे और एक जनवरी उन्‍नीस सौ साठ को सुबह से ले कर रात तक कुछ न कुछ तो किया ही होगा। लेकिन आपको कोई स्‍मरण नहीं है। लेकिन सम्‍मोहन की छोटी सी प्रक्रिया उन्‍नीस सो साठ की एक जनवरी को पुनरुज्जीवित कर देगी। अगर आपको सम्‍मोहित किया जाए और आपकी चेतना का जो हिस्‍सा जागा हुआ है। वह सुला दिया जाए; और फिर आपसे कहा जाए कि एक जनवरी उन्‍नीस सौ साठ को आपने क्‍या किया? तो आप सुबह से लेकर सांझ तक सब बता देंगे।

एक युवक पर मैं बहुत दिनों से प्रयोग करता था। लेकिन यह बड़ी मुश्‍किल बात थी कि मैं कैसे पक्‍का करूं कि वह जो कह रहा है, वह सच है। एक जनवरी उन्‍नीस सौ साठ को हुआ होगा। सम्‍मोहित अवस्‍था में वह सब बोल देता था कि मैंने यह-यह किया। जागने पर तो वह सब भूला हुआ होता था। अब मेरे लिए बड़ी कठिनाई थी कि यह कैसे तय किया जाए कि उसने सच में ही एक जनवरी उन्‍नीस सौ साठ में सुबह नौ बजे स्‍नान किया था।

तब फिर एक ही रास्‍ता था कि मैंने एक दिन सुबह से सांझ तक उसने जो भी किय,वह सब लिख कर रख लिया। तीन चार महीने बीत जानें के बाद उससे पूछा। उसने कहा, मुझे कुछ याद नहीं। फिर उसे सम्मोहित किया ओर जब वह गहरी सम्‍मोहन की अवस्‍था में चला गया, तब उससे पूछा कि फलां तारीख को तुमने क्‍या किया। तो जो मैंने नोट किया था वह तो उसने बताया ही, बहुत कुछ जो मैंने नोट नहीं किया था वह भी बता दिया। पर जो मैंने नोट किया था उस में से एक भी बात नहीं छूटी थी। और उसने सैंकड़ों बातें बताई। स्‍वभावत: मैं पूरी बातें नोट नहीं कर सकता था। जो मेरे ख्‍याल में थी और दिखाई दि वहीं मैं नोट कर सका था।

सम्‍मोहन की अवस्‍था में कितने ही गहरे में व्‍यक्‍ति को उतारा जा सकता है। सम्‍मोहन की अवस्‍था में लेकिन दूसरा उतारेगा और आप बेहोश होंगे। आपको खुद कुछ पता नहीं चलेगा। सम्‍मोहन की अवस्‍था में पिछले जन्‍मों में भी ले जाया जा सकता है। लेकिन वह आपको मूर्च्‍छा की ही हालत होगी। जाति-स्‍मरण और सम्‍मोहन की प्रक्रिया में इतना ही फर्क है। कि जाति-स्‍मरण में आप होश पूर्वक अपने पिछले जन्‍म में जाते हो। लेकिन इन दोनों प्रकियाओ का अगर प्रयोग किया जाए, तो वैलिडिटी बहुत बढ़ जाती है। एक व्यक्ति को हम बेहोश करके सम्‍मोहन की अवस्‍था में उससे पूँछें उसके पिछले जन्‍मों के संबंध में और उसे लिख डालें। होश पूर्वक उसे ध्‍यान में ले जाएं और अगर वही वह ध्‍यान में भी कह सके,तो हमारे पास ज्‍यादा प्रमाण हो जाता है इक्ट्ठा।

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एक महिला ने मेरे पास प्रयोग करना शुरू किया। उसको मैं मना करता रहा कि इसमें कोई कुतूहल की जरूरत नहीं है। लेकिन कुतूहल था, पर वह नहीं मानती थी। मैंने कहा, इस प्रयोग को करें। और जब प्रयोग हुआ तो भूलने में बड़ी मेहनत लेनी पड़ी। क्‍योंकि उनको स्‍मरण आया कि वह पिछले जन्‍म में वेश्‍या थी। यह उसके आज के नीतिवान, सती-साध्‍वी चित को भारी पडा। उसने कहा, मुझे ऐसा याद ही नहीं करना है। लेकिन अब इसे भुलाना बहुत मुश्‍किल है। किसी चीज को याद करना तो बहुत आसान है। किसी चीज को भुलाना बहुत मुश्‍किल है। क्‍योंकि जो तथ्‍य एक दफा हमारे ज्ञान में हिस्‍सा बन जाए, उसको ज्ञान के बाहर करने में बड़ी कठिन मामला हो जाता है।

तो इसलिए जान कर ही मैंने एक सूत्र उसमें नहीं कहा है। वह यह कि इस जन्‍म से पिछले जन्‍म में कैसे प्रवेश करें। लेकिन अगर इस जन्‍म की स्‍मृतियां आप को आ जाएं, तो जिसको भी इस जन्‍म की पूरी स्‍मृतियां आ जाएं, उसे वह सूत्र बताया जा सकता है। लेकिन वह व्‍यक्‍तिगत बात है। उसकी सामूहिक चर्चा नहीं हो सकती है। और न ही उसकी सामूहिक चर्चा करना उचित ही है। क्‍योंकि हमारा मन कुतूहल से न मालूम कितने काम करता है। अधिकतर हम में से लोग कुतूहल में ही जीते है। एक क्‍यूरिआसिटि होती है कि जरा झांक कर देख लें। क्‍या होता है। लेकिन झांक कर देखना कभी-कभी खतरनाक सिद्ध हो जाता है। क्‍योंकि ऐसी कोई बात उठ जाए जो कि पीछे से दबायी न जा सके। लेकिन इस जन्‍म का जरूर प्रयोग करें। इस जन्‍म का प्रयोग जब आपके लिए आनंदपूर्ण हो जाए ।

जैसे ही आप अपनी पिछली स्‍मृतियों को फिर से री-लीवड कर सकेंगे,वैसे ही आपको पता चलेगा कि यह सब सपने से ज्‍यादा नहीं है। तब आप यह भी जानते है कि जिसको आज आप बहुत गंभीरता से ले रहे है। कि दुकान पर नुकसान है कि लाभ है। कि पत्‍नी आज झगड़ी है, कि पिता आज नाराज हो गया है। कि बेटा घर छोड़कर चला गया है। कि बेटी ने किसी अनचाहे आदमी से शादी कर ली है। जिसको आज आप बहुत गंभीर से ले रहे है। कल यह आपकी स्‍मृति के कबाड़ खाने में पड़ जाने वाला है। जब आपको पिछली स्‍मृतियां याद आएँगी, तो आप हैरान हो जाएंगे कि आपने कितने क्षणों को कितना गंभीर समझा था। आज वह कहीं भी नहीं है। एक क्षण में उन क्षणों ने आपको ऐसा पकड़ लिया थ कि जीने ओर मरने का सवाल हो गया था। आज उनका मूल्य नहीं है। राख की तरह रास्‍ते पर कहीं वे पड़े रह गए हैं, कहीं कचरे के ढेर पर इकट्ठे हो गए है। आज उनका कोई मतलब नहीं है।

अगर पिछली स्‍मृतियों को हम देखें, तो दो बातें होंगी। एक तो यह होगी की जिसको हमने बहुत गंभीरता से लिया था। वह कुछ गंभीर सिद्ध नहीं हुआ। हम उसे भूल गए। गंभीर भी नहीं सिद्ध हुआ कि उसे याद रखें। जिसके लिए हम जीवन दांव पर लगा देते है। आज वह कहीं भी नहीं है। तो आज आपका जीवन भिन्‍न हो जाएगा। क्‍योंकि तब आपको दिखाई पड़ेगा कि जिस चीज पर आज आप मरने-मारने को उतारू है, वह कल ऐसे ही कचरे के ढेर पर पड़ी रह जाने वाली है। और इस जगत में जहां हमारे सारे जीवन का कुल फल स्‍मृति का बनना होता है, तो हमारी आम जिंदगी और एक अभिनेता की जिंदगी में फर्क क्‍या है? आखिर अभिनेता जो जीता है, आखिरी कुल परिणाम में एक फिल्‍म बनती है। जिसको पर्दे पर देखा जा सकता है। और हम जिसको जीते है, कुल अर्थों में एक स्‍मृति की फिल्‍म बनती है। जिसको फिर से देखा जा सकता है।

हम जिसको जिंदगी कह रहे है। वह कैमरे की फोकसिंग से ज्‍यादा कहां है। और जिन क्षणों को हम कहते थे, बड़े महत्‍वपूर्ण है, वे सब एक पर्दे पर टंग गए है। आज उनका मूल्‍य एक फिल्‍म से ज्‍यादा क्‍या है। हां, फर्क इतना है कि एक फिल्‍म आप अपनी पेटी में बंद कर सकते है, इस फिल्‍म को आपको स्‍मृति की पेटी में बंद करना पडा है। इससे ज्‍यादा कुछ फर्क नहीं है।

और यह जो हमारी स्‍मृति की पेटी है। यह उतनी ही फिल्‍म है। आज नहीं कल, बहुत कठिन नहीं है कि विज्ञान ऐसे साधन खोज लेगा कि यह स्‍मृति को निकाल कर पर्दे पर दिखा दे। इसमें कोई बहुत अड़चन नहीं है। क्‍योंकि आखिर हम भी जब आँख बंद करके देखते है तो आँख के पर्दे पर उसी फिल्‍म को वापस प्रोजेक्ट करते है। जब आप सपना देखते है। तब आपकी आँख ऐसे ही चलती रहती है, जैसे फिल्‍म को देखते वक्‍त चलती है। अगर कोई सपना देख रहे हो। तो उसके दोनों पलकों पर उँगली रखकर पता लगाया जा सकता है कि वह सपना देख रहा है कि नहीं देख रहा है। क्‍योंकि उसकी पुतली भीतर अगर चलती है। तो समझो की वह सपना देख रहा है। अगर नहीं चलती, तो समझो की नहीं देख रहा है। पलक के उपर से ही पता चल जाएगा। कि पुतलियाँ अंदर नीचे-ऊपर हो रही है। वह पूरे वक्‍त देख रहा है कुछ। वह जो देख रहा है, क्‍या देख रहा है। एक फिल्‍म देख रहा है।

जब ध्‍यान में आप पिछले जन्‍मों का भी स्‍मरण कर सकें…..ओर जाति-स्‍मरण का प्रयोग इसीलिए था। असल में महावीर और बुद्ध तो किसी को दीक्षा ही नहीं देते थे जब तक उसको जाति-स्‍मरण न करवा लें। और इसलिए आज का जो दीक्षित साधु है, न तो वह दीक्षित हे, न साधु है। वह दोनों ही बातें नहीं है। उसको कुछ पता नहीं है।

अब एक जैन मुनि मेरे पास आए कुछ दिन हुए और उन्‍होंने मुझे आकर कहा कि मुझे ध्‍यान सिखाए। मैं आचार्य तुलसी का साधु हूं। उनसे मैंने दीक्षा ली है। तो मैंने उनसे पूछा कि जब आचार्य तुलसी से दीक्षा ली है, तो उनसे ध्‍यान क्‍यों नहीं सीखा। तब आपने उनसे और क्‍या सीखा है। दीक्षा का क्‍या मतलब होता है, किसी लिए ली आपने। और दीक्षा उनसे ले रहे हो और ध्‍यान मुझसे पूछने आ रहे हो। वहां तुम्‍हें ध्‍यान की तो करना सिखाया जाता है। अगर नहीं तो आचार्य तुलसी कौन सा व्‍यवसाय करते है। दीक्षा का ही मतलब होता है ध्‍यान में प्रवेश करवाना। तभी तो दीक्षा मानी जायेगी। तो क्‍या घर छोड़ना, और बाल मुड़वाना मात्र दीक्षा का महत्‍व हो गया। ये तो आडम्बर हुआ। ये कैसा साधु और ये कैसा सन्‍यास।

महावीर और बुद्ध तो दीक्षा तब देते जब जाति-स्‍मरण हो जाए। जाति-स्‍मरण अर्थात पिछले जन्‍म का स्‍मरण हो जाए। क्‍योंकि महावीर का कहना यह था कि जब तक तुम्‍हें पिछले जन्‍मों का स्‍मरण न आ जाए। तब तक तुम जिंदगी के प्रति गंभीरता का भाव छोड़ ही नहीं सकते।

एक दफा एक आदमी को याद आ जाए कि मैंने पिछले जन्‍म के वक्‍त भी एक स्‍त्री को प्रेम किया था और उससे भी कहा था कि तेरे बिना एक क्षण भी जी नहीं सकता। उसके पहले भी एक स्‍त्री को प्रेम किया था। उसको भी यही कहा था। उसके पहले भी एक स्‍त्री को प्रेम किया था और उसको भी यही कहा था। आदमी होने के पहले जानवर था, तब मादाओं से कहा था कि तेरे बिना किसी दिन जी नहीं सकता। पक्षी था, तब किसी और से यही कहा था। यही कहता रहा हूं। यह कोई आज नहीं कह रहा हूं। तो जब आज ऐसा आदमी किसी स्‍त्री से कहने जाएगा कि तेरे बिना नहीं जी सकता हूं। तब उसे हंसी आ जाएगी। क्‍योंकि वह मजे से जी सकता है। वह बहुत जन्‍मों से जी रहा है।

एक आदमी ने पिछले जन्‍म में भी पद पाना चाहा था। और सम्राट हो गया था। और सोचा था कि पद पा लुंगा,तो सब हो जाएगा। उसके पहले भी पद पा लिया था। आज वह आदमी फिर पद की दौड़ में दिल्‍ली जा रहा था। अगर उसको दिल्‍ली के बीच के स्‍टेशन में पिछले जन्‍म का स्‍मरण आ जाए तो वह वापस लौट आएगा। और कहेगा, ये तो बेकार है। अब हम फिर दिल्‍ली चले। हम कई दफे दिल्‍ली जा चुके है। और आखिर मरने के सिवाय कुछ भी नहीं होता।

एक आदमी ने जन्‍मों–जन्‍मों में जो किया है,वहीं वह फिर करना चाह रहा है। लेकिन उसे स्‍मरण नहीं है। उसे स्‍मरण आ जाए,तो फिर उसी को कहना असंभव है। तब तक कोई आदमी संन्‍यासी नहीं हो सकता, जब तक यह जगत उसको स्‍वप्‍न न हो जाए। और यह जगत स्‍वप्‍न कैसे होगा? यह जगत स्‍वप्‍न हो सके, इस लिए जाति स्‍मरण है।

–ओशो

[ मैं मृत्‍यु सिखाता हूं ]

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