“भक्ति सर्वोपरि है” – ओशो

भक्ति भाव की बात है

मनुष्य का असितत्व तीन तलों में विभाजित है – शरीर, बुद्धि और ह्रदय । या दूसरी तरह से कहें तो कर्म, विचार और भाव। इन तीनों तलों से स्वयं की यात्रा हो सकती है। स्थूलतम यात्रा होगी कर्मवाद की। इसलिए धर्म के जगत में कर्मकांड स्थूलतम प्रक्रिया है। दूसरा द्वार होगा ज्ञान का, विचार का, चिंतन-मनन। दूसरा द्वार पहले से ज्यादा सूक्ष्म है। दूसरे द्वार का नाम है – ज्ञानयोग। तीसरा द्वार सूक्ष्मातिसूक्ष्म है – भाव का, प्रीति का, प्रार्थना का। उस तीसरे द्वार का नाम भक्तियोग है।

कर्म से भी लोग पहुंचते हैं। लेकिन बड़ी लंबी यात्रा है। ज्ञान से भी लोग पहुंचते हैं। पर यात्रा संक्षिप्त नहीं है। बहुत सीढि़यां पार करनी पड़ती हैं। पहले से कम, लेकिन तीसरे की दृष्टी में बहुत ज्यादा। भक्ति छलांग है। सीढि़यां भी नहीं हैं, दूरी भी नहीं है। भक्ति एक क्षण में घट सकती है! भक्ति तत्क्षण घट सकती है। भक्ति केवल भाव की बात है। इधर भाव, उधर रूपांतरण। कर्म में तो कुछ करना होगा, विचार में कुछ सोचना होगा, भक्ति में न सोचना है, न करना है, होना है। इसलिए भक्ति को सर्वश्रेष्ठ कहा है। आज के सूत्रों में इसी की चर्चा है। शांडिल्य कहते हैं –

ब्रह्राकांडं तु भक्तौ तस्य
अनुज्ञनाया सामान्यात।

‘भक्ति के प्रतिपादन के लिए ब्रह्म विषय के उत्तरकांड से ज्ञानकांड की सामान्यता दिखायी गयी है।’ शांडिल्य कहते हैं – वेदों में पहले क्रियाकांड है, कर्मवाद है फिर दूसरे चरण में ब्रह्मज्ञान की बात है, ज्ञानवाद है और फिर अंतिम चरण में ईश्वर की चर्चा है, भक्ति और भाव की बात है। जैसे वृक्ष है, तो कर्म फिर फूल लगे, तो ज्ञान; और फिर सुवास उड़ी तो भक्ति। सुवास अंत में है।

जो व्यकित वृक्ष को ही पूजता रह गया, वह अटक गया। जिसने फूल को ही सब कुछ मान लिया, उसे अभी परम की प्राप्ति नहीं हुर्इ। जो सुवास के साथ एक हो गया, वही स्वतंत्रा है। वृक्ष की तो देह है, जड़ देह है। फूल की देह है – उतनी जड़ नहीं, ज्यादा सूक्ष्म तरंगों से निर्मित है, ज्यादा रंगीन है, ज्यादा माधुर्य से भरी है, फिर भी देह तो देह है। वृक्ष की छाल जैसी खुरदुरी नहीं, रेशम जैसी चिकनी है, पर देह तो देह है, रूप तो रूप है, आकार आकार है। आकार से बंधन तो पड़ता ही है। फिर चाहे पत्थर की लकीर खींचो, चाहे फूलों की एक लकीर बनाओ, रेखा बनती है तो विभाजन हो जाता है। फूल भी अभी दूर है। सुवास एक हो गयी। सुवास ने देह छोड़ दी। सुवास से मेरा प्रयोजन है – स्थूलता समग्र रूप से विनष्ट हो गयी। इसलिए सुवास को तुम देख नहीं सकते, अनुभव कर सकते हो। पकड़ नहीं सकते, मुट्ठी नहीं बांध सकते, अनुभव कर सकते हो। सुवास आकाश के साथ एक हो गयी। ऐसी भक्ति है। भक्ति आत्यंतिक क्रांति है।

शांडिल्य कहते हैं – इसलिए वेदों में भक्ति की चर्चा अंत में आयी है। अंत में ही आ सकती है। लेकिन इधर कोर्इ दो-तीन सौ वर्षो से इस देश में कुछ लोगों ने बड़ी मूढ़तापूर्ण बात फैला रखी है। उन्होंने यह फैला रखा है कि कलियुग में तो भक्ति ही काम की है! जैसे कि भक्ति निकृष्टतम है। उन्होंने यह बात चला रखी है कि कलियुग में और सब मार्ग तो संभव नहीं हैं, वे तो सतयुग में संभव थे, जब लोग महान थे, जब लोग शुद्ध और सातिवक थे, जब लोगों के जीवन में प्रामाणिकता थी, सचार्इ थी; जब पृथ्वी पर मनुष्य मनुष्य जैसा नहीं, देवता जैसा चलता था, तब संभव था ज्ञान। अब तो कलियुग है, काले दिन आ गये, अमावस की रात है, पापियों का फैलाव है, सब तरफ पाप है, पुण्य की कहीं कोर्इ खबर नहीं, इस अंधेरे युग में इस काली रात्रि में तो जो निकृष्टतम है वही संभव हो सकता है, वह है भक्ति। यह तो बात उल्टी हो गयी। जितना सातिवक व्यकित हो, उतनी भक्ति संभव होती है। जितना असातिवक व्यकित हो, उतना कर्मकांड संभव होता है। भक्ति तो सुगंध् है। भक्ति तो परा है। इसलिए यह कहना कि इस निकृष्ट युग में भक्ति ही एकमात्रा उपाय है – इस कारण कहना क्योंकि आदमी पतित हो गया है और पतित आदमी और कुछ कर नहीं सकता-बुनियादी रूप से गलत बात है, सौ प्रतिशत गलत बात है।

ख्याल रहे, आदमी पतित नहीं हुआ है, आदमी रोज विकासमान है। इसलिए भक्ति संभव है। मैं भी तुम से कहता हूं कि आज भक्ति संभव है, लेकिन कारण यह नहीं है कि आज अमावस की रात है, कारण यह है कि आज पूर्णिमा है। मैं भी यही कहता हूं कि आज भक्ति के सिवाय और कुछ काम नहीं आएगा, क्योंकि आदमी प्रौढ़ हुआ है उठ चुका क्रिया-कांडों से। आज क्रियाकांड पर किसका भरोसा है? आज अगर कहीं यज्ञ होता हो तो सिवाय मूढ़ों के और कौन इकट्ठा होता है? जो आज के नहीं हैं, वे इकट्ठे होते हैं। जिन्हें कब्रों में होना चाहिए था, वे इकट्ठे होते हैं। जो दो हजार-तीन हजार साल पुरानी खोपड़ी लिये बैठे हैं, वे इकट्ठे होते हैं। आज की दुनिया में कौन सोचता है कि यज्ञ करने से और पानी गिरेगा! कहां हैं इंद्र? कहां हैं तुम्हारे देवता? गये सब! जो तुमने बचपन में सोची थीं परियों की कथाएं, उनका अब कोर्इ मूल्य नहीं रहा। वे बचपन के किस्से थे, बच्चों की कहानियां थीं।

बच्चों को कहानियां बतानी हों तो भूत-प्रेत, और परी, और अप्सराएं, और स्वर्ग, और देवी-देवता, इनकी बात करनी पड़ती है। तो ही बच्चे उत्सुक होते हैं। बच्चे यथार्थ में उत्सुक नहीं होते, बच्चे सपनों में उत्सुक होते हैं। बच्चे सपनों में जीते हैं। अभी बच्चों के जीवन में सपने और यथार्थ का कोर्इ भेद पैदा नहीं होता। तुमने अक्सर देखा होगा, छोटा बच्चा सुबह नींद से उठता है और रोने लगता है। और मां परेशान होती है कि किसलिए, अभी तो कुछ हुआ भी नहीं! एकदम नींद खुलते से ही रोने लगता है, वह कहता है – मेरा खिलौना कहां है? उसने सपने में एक खिलौना देखा था, वह अपना खिलौना मांग रहा है। अभी सपने में और सत्य में फर्क नहीं है। अभी धुंधली है चेतना। अभी बुद्धि जाग्रत नहीं है।

मैं तुम से यह कहना चाहता हूं कि आज भक्ति ही काम आएगी, क्योंकि आदमी प्रौढ़ हुआ है आदमी की चेतना ज्यादा सजग हुर्इ है। दुनिया में जो अधर्म दिखायी पड़ता है वह इसलिए नहीं कि आदमी पतित हो गया है, बलिक इसलिए कि धर्म के पुराने ढंग आदमी के काम के नहीं रह गये हैं, और तुम उन्हीं ढंगों को थोपे चले जाते हो। जैसे कि कोर्इ जवान हो गया है और तुम उसे बचपन का पाजामा पहना रहे हो, वह फेंकता है पाजामा, वह भागता है कि यह तुम क्या कर रहे हो? पाजामे के खिलाफ नहीं है वह, लेकिन जरा उसकी तरफ भी तो देखो। अब वह छोटा बच्चा नहीं रहा। अब तुम यह जो छोटा पाजामा उसे पहना रहे हो, तुम उसकी मखौल उड़वाओगे। तुम बाजार में उसकी हंसी करवाओगे। उसके योग्य पाजामा चाहिए।

आज का मनुष्य अधार्मिक नहीं है। सच तो यह है कि आज का मनुष्य जितना धार्मिक हो सकता है उतना कभी और किसी समय का मनुष्य नहीं हो सकता था। लेकिन पुराना धर्म काम न आएगा। बचकानी बातें काम न आएंगी। अब धर्म को भी प्रौढ़ होना पड़ेगा। कसूर उनका है जो धर्म को प्रौढ़ नहीं होने दे रहे हैं। आदमी तो धार्मिक होने को उत्सुक है, लेकिन उसके योग्य धर्म चाहिए। आदमी ने समझो कि कार बना ली और तुम बैलगाड़ी लिए उसके द्वार पर खड़े हो, और तुम कहते हो-बैलगाड़ी में बैठो क्या तुम्हारी यात्रा में उत्सुकता नहीं रही? क्या तीर्थयात्रा को न चलोगे? और अगर वह आदमी तुम्हारी बैलगाड़ी में नहीं बैठता है तो तुम कहते हो- अब कोर्इ तीर्थयात्रा पर जाने को उत्सुक नहीं है। तीर्थयात्रा पर लोग अब भी जाना चाहते हैं – कौन नहीं जाना चाहता? सारा जीवन तीर्थयात्रा है। परमात्मा को लोग आज भी खोज रहे हैं। ऐसा कोर्इ मनुष्य ही नहीं जो परमात्मा को न खोज रहा हो। लेकिन अब रास्ते, ढंग बदले हैं। बैलगाड़ी पर कोर्इ सवार नहीं होना चाहता। और तीर्थयात्रा का मतलब अब कुंभ जाना नहीं हो सकता। अब तो कुंभ का गहरा अर्थ खोजना होगा।

कुंभ शब्द जानते हैं कहां से बना? घड़े से बना। कुंभ कहते हैं घड़े को। पूरे भरे घड़े को कुंभ कहते हैं। अब कोर्इ कुंभ के मेले पर नहीं जाना चाहता है, अब तो अपने भीतर के सूने घड़े को भरना चाहता है, कुंभ बनाना चाहता है। अब तो लबालब भीतर भरना चाहता है। अब बाहर की गंगा-यमुना और सरस्वतियों में उलझने का कोर्इ रस नहीं है किसी को, अब तो चाहता है कि भीतर। और ये तीन ही भीतर की नदियां हैं – कर्म, ज्ञान, भक्ति।

तुमने देखा, प्रयाग में जाते हो, दो नदियां दिखायी पड़ती हैं – यमुना और गंगा-सरस्वती अदृश्य है। ऐसी ही भक्ति है। कर्मकांड दिखायी पड़ता है। कोर्इ आदमी बैठा है हवन बनाये, अग्नि में आहुति डालता हुआ, शोरगुल मचा रहा है, दिखता है। कोर्इ आदमी बड़े सोच-विचार में पड़ा है, माथे पर पड़े बल तो कम से कम दिखायी पड़ते हैं।

तुम ने रोदिन का प्रसिद्ध मूर्ति का चित्रा देखा होगा-विचारक अपनी ठुद्दी से हाथ लगाए, आंख बंद किये, सिर पर बल डाले, रोदिन का विचारक बैठा है। सोच-विचार सिर पर बल ले आता है, चिंता ले आता है। चिंता और चिंतन में बहुत फर्क थोड़े ही है, एक ही शब्द से बने हैं। जहां चिंतन है, वहां चिंता है। लेकिन भक्त को कहां पहचानोगे? भक्त की दशा बड़ी गहन है। भक्त तो भाव है। इसलिए भक्ति को सरस्वती कहा है। वह दिखायी नहीं पड़ती-सुवास। फूल तक दिखायी पड़ती है बात, सुवास में अदृश्य हो जाती है। ऐसी भक्ति है।

आज भी आदमी परमात्मा को खोजना चाहता है, ज्यादा खोजना चाहता है जितना पहले खोजना चाहता था- और ठीक कारणों से खोजना चाहता है, पुराने लोगों ने गलत कारणों से खोजा था। पुराने आदमी के कारण गलत ही हो सकते थे। बीमारी थी, इसलिए खोज था, क्योंकि औषधि नहीं मिलती थी। आज हमने औषधियां बहुत खोज ली हैं, अब हम परमात्मा को चिकित्सक की तरह नहीं खोजते। जरूरत नहीं है, चिकित्सक हम ने पैदा कर लिये हैं। आदमी परमात्मा को खोजता था- वर्षा करो, धुप पड़ रही है, खेत सूखे जा रहे हैं। अब वैज्ञानिक देशों में वर्षा आदमी के हाथ में हो गयी है, हम जहां चाहेंगे वहां करवा लेंगे, जब चाहेंगे तब करवा लेंगे। अब इंद्र को कष्ट देने की कोर्इ जरूरत नहीं। आदमी प्रार्थना करता था- मेरी उम्र बड़ी करो, मैं खूब जीऊं। आज उम्र आदमी के हाथ में है। जो बातें आदमी परमात्मा से मांगता था, वे आदमी के हाथ में आ गयीं। लेकिन परमात्मा से उम्र मांगनी, वैभव मांगना, संपदा मांगनी, स्वास्थ्य मांगना गलत कारण से परमात्मा की तरफ जाना है। परमात्मा की तरफ तो वही जाता है जो सिर्फ परमात्मा को मांगता है। परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी मांगा, तो उसका मतलब है तुम परमात्मा का उपयोग कर रहे हो। परमात्मा में तुम्हारा रस नहीं है परमात्मा के द्वारा तुम्हें धन मिल सकता है तो चलो, परमात्मा की पूजा-प्रार्थना कर लेते हो यह खुशामद से ज्यादा नहीं, यह स्तुति है।

यह आकसिमक नहीं है कि इस देश में इतने खुशामदी हैं। यह देश सदियों से खुशामद करता रहा है। भगवान की खुशामद करता रहा है, राजा-महाराजाओं की खुशामद करता रहा, अब वह दो कौड़ी के राजनीतिज्ञों की खुशामद कर रहा है। खुशामद की आदत पड़ गयी है। वह कहीं भी थाल सजाये तैयार है स्वागत करने को! वह किसी के भी चरणों में गिरने को राजी है, नाक रगड़ने को राजी है! रिश्वत देने को राजी है, क्योंकि वह सदा से रिश्वत देता रहा है। यह भारतीय चरित्र हो गया।

लोग कहते हैं – भारत में इतनी रिश्वत क्यों है? यह कोर्इ नयी बात नहीं है। तुम जब जाते हो हनुमान जी के मंदिर में और कह आते हो-लड़के को पास करवा देना तो नारियल चढ़ाऊंगा, तुम क्या समझते हो क्या दे रहे हो? पांच आने का नारियल-वह भी तुम सड़ा-गला बाजार से खरीदकर लाओगे, सस्ते से सस्ता-तुम हनुमान जी को रिश्वत दे रहे हो। ये सारी की सारी गलत वृत्तियां धर्म के नाम से प्रचलित थीं। ये समाप्त हो गयीं, यह अच्छा हुआ। जाल छूटा इन बीमारियों से। अब आदमी अगर खोजेगा तो परमात्मा के लिए ही खोजेगा। इसलिए मैं कहता हूं, जब समाज समृद्ध होता है तो परमात्मा की सच्ची तलाश शुरू होती है। क्योंकि समृद्ध आदमी के पास वह सब है जिसको लोग अतीत में परमात्मा से मांगते रहे थे। सब है उसके पास और फिर भी वह नहीं है। सब है और सब खाली है। धन की राशि लग गयी है और भीतर गहरी निर्धनता है। हाथ में बड़ी शक्ति है और भीतर प्राण कंप रहे हैं भीतर बड़ी कमजोरी है। यह सदी परमात्मा को ठीक कारणों से खोजना चाहती है। कोर्इ अधार्मिक नहीं हो गया है, धर्म काम के नहीं रह गये हैं। धर्म के ढंग ओछे पड़ गये, पुराने पड़ गये। धर्म के ढंग आज के विकसित आदमी के अनुकूल नहीं हैं।

मैं भी तुमसे कहता हूं: भक्ति आज के अनुकूल है, लेकिन मेरा हेतु, मेरा कारण अलग। दूसरों ने तुमसे कहा भक्ति आज के लायक है, क्योंकि तुम इतने पतित हो और कुछ तुम्हारे लायक हो भी नहीं सकता। मैं तुमसे कहना चाहता हूं, भक्ति तुम्हारे लायक है, क्योंकि तुम पहली दफे प्रौढ़ हुए हो। मनुष्य जाति पहली दफा जवान हुर्इ है। बचपन के धुंधले दिन गये, प्रौढ़ मसितष्क पैदा हुआ है। इसलिए भक्ति काम की है। शांडिल्य से मैं राजी हूं, क्योंकि शांडिल्य कहते हैं – भक्ति सर्वोपरि है।

-ओशो

[भक्ति परम क्रांति]

3521 Total Views 7 Views Today

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!