“विक्रम-बेताल” – ओशो

बेताल पच्चीसी से एक कहानी है , पहली कहानी ,

“पहले विक्रम बेताल का थोडा परिचय दे दू , विक्रमादित्य राजा एक तांत्रिक फ़कीर के कहने पर एक प्रेतात्मा बेताल को मरघट से पकड़ने के लिए रात को जाता है , लेकिन उस प्रेतात्मा को लाने की एक शर्त थी ध्यान रखना , सजग रहना , और शांत रहना , जरा सा भी बोले तो प्रेतात्मा उड़कर दोबारा पेड़ पर लटक जायेगी |

विक्रमादित्य साहस से पेड़ पर चढ़कर उस मुर्दे को काटकर गिराता है और कंधे पर रखता है , मुर्दे ने कहा कि सुनो राह लम्बी है , रात अँधेरी है , और तुम्हारा बोझ हल्का करने के लिए एक कहानी सुनाता हूँ ऐसी पहली कहानी |

उसने कहा कि तीन युवक थे ब्राह्मण

यह विक्रमादित्य सुनना भी नहीं चाहता था , पड़ना भी नहीं चाहता था चक्कर में | लेकिन नहीं भी नहीं कह सकता था क्योंकि नहीं कहते ही लाश उड़ जायेगी और फिर वृक्ष पर चढना पड़ेगा |
फिर मुरदा कहानी कहने लगा
उसने कहा , एक गुरु के आश्रम में तीन युवक थे | तीनो ही लड़की के प्रेम में पड गए ..|

कहानी में रस आने लगा | प्रेम की कहानी में किसे रस नहीं आता ? विक्रमादित्य थोडा बेहोश होने लगा | सम्हाल रहा है , लेकिन उत्सुकता जग गयी , जिज्ञासा कि फिर क्या हुआ ?

तीनो एक से थे , योग्य थे , अप्रतिम थे , प्रतिभाशाली थे | गुरु मुश्किल में था कि किसको चुने | युवती भी मुश्किल में थी कि किस को चुने | कोई उपाय न देखकर युवती ने आत्महत्या कर ली | कोई रास्ता ही न मिला | और इन तीन के बीच में वह बहुत द्वंद्व में घिर गयी | और तीनो चुनने योग्य थे और मुश्किल था किसको छोड़े | और जानती थी जिसको छोड़ेगी , वही जीवन भर पछतावे का कारण रहेगा | दो को छोड़ना ही पड़ेगा | तीन से तो विवाह हो नहीं सकता |

बड़ी अड़चन थी हल कोई न था | हल न देखकर आत्महत्या कर ली | लाश जलाई गयी |

एक युवक उन तीनो में से मरघट पर ही उसी राख के पास रहने लगा | उसी राख की धूनी रमा लेता और वहीँ बैठा रहता |

दूसरा युवक इतने दुःख से भर गया कि यात्रा पर निकल गया , अपना दुःख भुलाने को | घूमता रहेगा संसार में | अब बसना नहीं है ; क्योंकि जिसके साथ बसना था वही न रही | अब घर नहीं बसाना है | वह परिव्राजक हो गया , एक फ़कीर , भटकता हुआ आवारा |

और तीसरा युवक किसी आशा से भरा हुआ , क्योंकि उसने सुन रखा था ऐसे मन्त्र है कि अस्थिपंजर को भी पुनर्जीवित कर दे , तो उसने सारी अस्थिय इकठी कर ली | रोज उनको गंगा ले जाता , धोकर साफ़ करता | फिर ले आकर रख लेता | उनकी रक्षा करता कि कभी कोई मन्त्र का जान्ने वाला मिल जाए |

वर्षो बीत गए | जो घूमने निकल गया था यात्रा पर , उसे एक आदमी मिल गया था , जो मन्त्र जानता था | उसने मन्त्र सीख लिया | मन्त्र का शास्त्र ले लिया | भागा | अब डरा वह घबडाया , कि पता नहीं अस्थि[पंजर बचे भी होगे कि नहीं | क्योंकि वे कभी के फेंक दिए गए होगे | लेकिन आकर आश्वस्त हुआ | अस्थिपंजर बचाए गए थे | उनको संजोकर रखा था उसके साथी ने |

उसने मन्त्र पढ़ा युवती पुन्रुजीवित हो गयी | पहले से भी ज्यादा सुन्दर , मन्त्र सिक्त | उसकी देह स्वर्ण जैसी ताज़ी , जैसे कमल का फूल अभी अभी खिला हो | फिर कलह शुरू हो गयी कि अब वह किसकी ?

अब तक सम्राट विक्रम भी भूल चूका था कि वह क्या कर रहा है यह सुनने में लग गया , जैसा तुम सुनने में लग गए हो |

उस मुरदे ने पूछा कि सम्राट गौर से सुनो | क्योंकि फिर झगडा खड़ा हो गया | अब सवाल यह है कि इन तीन में से युवती किसकी ? तुम्हारा क्या ख्याल है ? और अगर तुम्हारे भीतर उत्तर आ जाए और तुमने उत्तर न दिया , तो तुम इसी क्षण मर जाओगे | हाँ उत्तर न आये तो कोई हर्जा नहीं |

बड़ा मुश्किल है उत्तर का न आना | आदमी का इतना वश थोड़े ही है अपने मन पर | कोई बुद्ध पुरुष हो , तो न आये | ठीक है प्रशन सुन लिया ; उत्तर न आया कोई हर्जा नहीं |

विक्रमादित्य बड़ी मुश्किल में पड़ा | उत्तर तो आ रहा है | बुद्धिमान आदमी था , तर्कनिष्ठ था , समझदार था , शास्त्र पढ़े थे , तर्क साफ़ था | अब वह बड़ी मुश्किल में पड गया | मुरदे ने कहा कि बोल अगर उत्तर आ रहा है , तो बोल अन्यथा इसी वक्त मर जाएगा |

तो उसने कहा उत्तर तो आ रहा है , इसीलिए बोलना ही पड़ेगा | उत्तर मुझे यह आ रहा है कि जिसने मन्त्र पढ़कर युवती को जगाया वह पिता तुल्य है उसने जन्म दिया | इसलिए वह विवाह नहीं कर सकता | वह तो कट गया |

जिसने अस्थिया सम्हाली और रोज गंगा में स्नान कराया , वह पुत्रतुल्य है , कर्तव्य , सेवा , उससे भी शादी नहीं हो सकती |
प्रेमी तो वही है , जो धूनी रमाये , राख लपेटे , भूखा प्यासा मरघट पर ही बैठा रहा , न कहीं गया , न कहीं आया | विवाह तो उसी से ….|
बेताल उड़ गया क्योंकि विक्रम बोल गया |

ऐसे ही पच्चीस कहनिया चलती है |”

जीवन में तुम चूकते हो , जब भी मूर्छा पकड़ लेती है | जब भी तुम होश खो बैठते हो , जब भी तुम जागे हुए नहीं होते जीवन का सूत्र हाथ से छूट जाता है | विचार की तरंग आयी और तुम वर्तमान से च्युत |

वह विक्रमादित्य हार गया ऐसे ही पच्चीस कहानी चलती है पूरी रात | और हर बार वह चूकता जाता है | पच्चीसवी कहानी पर सम्हाल पाटा है | हर कहानी में ज्यादा हिम्मत बढती है , साहस बढ़ता है ; ज्यादा देर तक रोकता है ; ज्यादा देर तक विचार की तरंगे अनुकंपित नहीं करती | पच्चीसवी कहानी बार बात रूकती है और उसमे विक्रम बिना विचार की तरंगो के गुजर जाता है |

जीवन एक तैयारी है | यहाँ बहुत कुछ तुम्हे उलझा देने को | बाजार है पूरा , मीना बाजार ! वहां सब तरफ बुलावा है – उत्सुकता को जिज्ञासा को , मनोरंजन को , | प्रशन है , विचार की सुविधा है , सोच विचार का उपाय है , चिंता का कारण है सब तरह के उलझाव है |

अगर तुम सारे संसार से ऐसे गुजर जाओ , जैसे विक्रमादित्य उस मरघट से बिना बोले , चुप और जागा हुआ पच्चीसवी कहानी पर गुजर सका , तो ही तुम वर्तमान क्षण की अनुभूति को उपलब्ध होओगे | अन्यथा तुमने वर्तमान जाना ही नहीं है |

– ओशो

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