“धर्म को मारता कौन है?” – ओशो

पहले समझें कि धर्म को जिलाता कौन है? क्योंकि अगर हम जिलाने वाले को पहचान लें, तो मारनेवाले को भी पहचान जायेंगे।

धर्म को जिलाते हैं, इस जगत में जीवंत करते हैं वे लोग जो धर्म के अनुभव से गुजरते हैं। बुद्ध, जीसस, कृष्ण, मोहम्मद, जलालुद्दीन, नानक, कबीर—ये धर्म के मृत प्राणों में पुनरुज्जीवन फूंक देनेवाले लोग हैं। फिर बांसुरी बज उठती है, जो सदियों से न बजी हो। ठूंठ फिर हरे पत्तों से भर जाते हैं, और फूलों से लद जाते हैं—जिन पर सदियों से पत्ते न आये हों।

बुद्ध के जीवन में कहानी आती है -‘कहानी’ ही कहूंगा, क्योंकि मैं नहीं मानता कि यह कोई तथ्य है; मगर प्रतीकात्मक है। बहुमूल्य है। सत्य है- तथ्य नहीं।

कहानी कहती है कि बुद्ध जब निकलते हैं – अगर किसी ठूंठ के पास से निकल जायें, तो ठूंठ हरा हो जाता है। और किसी बांझ वृक्ष के पास से निकल जायें, जिसमें फल न लगते हों, तो फल लग जाते हैं। असमय में भी फूल खिल जाते हैं। ऐसा होता हो, न होता हो !! हो नहीं सकता ऐतिहासिक अर्थों में। क्योंकि समय कोई नियम नहीं बदलता। होना चाहिए, मगर होता नहीं है। प्रकृति तो निरपवाद रूप से चलती है; कुछ भेद नहीं करती। लेकिन प्रतीकात्मक हैं ये बातें। बुद्धों की मौजूदगी में सदियों से निष्प्राण पड़े धर्म में पुन: प्राण की प्रतिष्ठा होती है।

जिस व्यक्ति ने स्वयं सत्य को जाना है वह धर्म को जीवित करता है—सिर्फ वही, केवल वही। उसके छूने से ही धर्म जीवित हो उठता है और उस धर्म को मारनेवाले वे लोग हैं, जिन्होंने स्वयं तो अनुभव नहीं किया है, लेकिन जो दूसरों के उधार वचनों को दोहराने में कुशल होते हैं।

पण्डित और पुरोहित का व्यवसाय क्या है! उनका व्यवसाय है कि बुद्धों के वचनों को दोहराते रहें; बुद्धों की साख का मजा लूटते रहें। बुद्धों को लगे सूली, बुद्धों को मिले जहर, बुद्धों पर पड़े पत्थर—और पण्डितों पर, पुजारियों पर, पोपों पर फूलों की वर्षा!

अभी तुम देखते हो—पोप किसी देश में जाते है, तो इतने लोग देखने को इकट्ठे होते हैं कि अभी ब्राजील में सात आदमी भीड में दबकर मर गये; और जीसस को सूली लगी, तब सात आदमी भी जीसस को प्रेम करनेवाले भीड़ में इकट्ठे नहीं थे। सात यहां दबकर मर गये—साधारण आदमी को देखने के लिए जिसमें कुछ भी नहीं है! जिसके पोप होने के पहले कोई एक आदमी देखने न आता। अभी सालभर पहले जब यह आदमी पोप नहीं हुआ था, किसी को नाम का भी पता नहीं था! किसी को प्रयोजन भी नहीं था। और ऐसा इस आदमी में कुछ भी नहीं है। लेकिन लाखों लोग इकट्ठे होंगे।

मारता कौन है धर्म को !?

मगर धर्म को कौन मारता है? नास्तिक तो नहीं मार सकते। नास्तिक की क्या बिसात! लेकिन झूठे आस्तिक मार डालते हैं। और झूठे आस्तिकों से पृथ्वी भरी है। झूठे धार्मिक मार डालते हैं। और झूठे धार्मिकों का बड़ा बोल—बाला है। मंदिर उनके, मस्जिद उनके, गिरजे उनके, गुरुद्वारे उनके। झूठे धार्मिक की बडी सत्ता है! राजनीति पर बल उसका; पद उसका, प्रतिष्ठा उसकी; सम्मान और सत्कार उसका!

हिंदू धर्म ने हिंदुओं को मार डाला है। मुसलमान धर्म ने मुसलमानों को मार डाला है। जैन धर्म ने जैनों को’ मार डाला है। बौद्ध धर्म ने बौद्धों को मार डाला है। ईसाई धर्म ने ईसाईयों को मार डाला है। यह पृथ्वी मरे हुए लोगों से भरी है। इसमें मुरदों के अलग— अलग मरघट हैं! कोई हिंदुओं का, कोई मुसलमानों का, कोई जैनों का—वह बात और—मगर सब मरघट हैं!

तुम ‘सोचते हो अधार्मिक लोग धर्म को मारते हैं, तो गलत। अधार्मिक की क्या हैसियत है कि धर्म को मारे। तुमने कभी देखा : अंधेरे ने आकर और दीये ‘को बुझा दिया हो! अंधेरे की क्या हैसियत कि दीये को बुझाये! अंधेरा दीये को नहीं बुझा सकता। अंधेरा धोखा भी नहीं दे सकता आलोक होने का। इसलिए इस बात को बहुत गांठ में बांध लेना, भूलना ही मत कभी। इस दुनिया में धर्म को खतरा अधर्म से नहीं होता; झूठे धर्म से होता है। असली सिक्कों को खतरा कंकड़—पत्थरों से नहीं होता; नकली सिक्कों से होता है। नकली सिक्के चूकि असली सिक्कों जैसे मालूम पड़ते हैं, इसलिए असली सिक्कों को चलन के बाहर कर देते हैं।

यही नियम धर्म के जगत में भी लागू होता है। बुद्धों को चलन के बाहर कर देते हैं—पण्डित —पुरोहित। ये नकली सिक्के हैं। ईसा को चलन के बाहर कर दिया ईसाई पादरियों ने, लेकिन महावीर को चलन के बाहर कर दिया जैन मुनियों ने। कृष्ण को चलन के बाहर कर दिया तथाकथित कृष्ण के उपासक, पुजारी, पण्डित—इन्होंने चलन के बाहर कर दिया।

नकली सिक्के सस्ते भी मिलते हैं। असली सिक्कों के लिए कीमत चुकानी पड़ती है! और बड़े मजे की बातें हैं कि नकली सिक्के के लिए कोई श्रम ही नहीं उठाना पड़ता। असली सिक्के के लिए बहुत श्रम से गुजरना पड़ता है।

किसी जैन मुनि के कानों में तुमने खीले ठोंके जाते देखे! महावीर के कानों में खीले ठोंके गये! और जैन मुनि आते हैं, तो उनके पावों में तुम आंखें बिछा देते हो! कि आओ महाराज! पधारी। धन्यभाग कि पधारे! और महावीर को तुमने ठीक उलटा व्यवहार किया था। तुमने पागल कुत्ते महावीर के पीछे छोड़े, कि नोंच डालो, चीथ डालो इस आदमी को!

तुमने बुद्ध को मारने की हर तरह कोशिश की। पहाड से पत्थर की शिलाएं सरकाई कि दबकर मर जाये। पागल ह ;थी छोड़ा। जहर पिलाया। तुमने मीरा को जहर पिलाया! और अब भजन गाते फिरते हो! कि ऐ री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरी दरद न जाने कोय! और दरद तुमने दिया मीरा ‘को; तुम क्या खाक दरद जानोगे! दरद जाने मीरा। और मीरा जाने कि प्रेम का दीवानापन क्या है!

क्या तुमने व्यवहार किया मीरा के साथ! तुमने सब तरह से दुर्व्यवहार किया। आज तो तुम मीरा के गुणगान गाते हो, लेकिन वृन्दावन में कृष्ण के बड़े मंदिर में मीरा को घुसने नहीं दिया गया। रुकावट डाली गयी। क्योंकि उस कृष्ण मंदिर का जो बड़ा पुजारी था; रहा होगा उन्हीं विक्षिप्तों की जमात में से एक जो स्त्रियों को नहीं देखते, जो स्त्रियों को देखने में डरते हैं। जिनके प्राण स्त्रियों को देखने से निकल जाते हैं! जिनका धर्म ही मर जाता है—स्त्री देखी कि धर्म गया उनका! स्त्री को देखने से इनकी साधना भ्रष्ट हो गयी! इनकी पूजा का थाल गिर गया; कृष्ण ने भी अपना माथा ठोंक लिया होगा—यह मेरा भक्त है! और कृष्ण की साधना भ्रष्ट न हुई! और सोलह हजार सखियां नाचती रहीं चारों तरफ। और ये उनके भक्त हैं!

ये कृष्ण – जीवंत धर्म। जिसके पास सोलह हजार स्त्रियां नाचे, तो कुछ नहीं बिगड़ता। और यह मुरदों का धर्म – कि एक स्त्री आ जाये; वह भी मीरा जैसी स्त्री, जिसको देखकर भी इस अंधे को आंखें खुल सकती थीं, इस मुरदे में प्राण पड़ सकते थे, उसके हाथ की थाली गिर गयी!

इस दुनिया में सबसे बड़ी दुश्मनी बुद्धों और पण्डितों के बीच है। मगर मजा यह है कि जब तक बुद्ध जिंदा होते हैं, पण्डित उनका विरोध करते हैं। और जैसे ही बुद्ध विदा होते हैं, पण्डित बुद्धों की जो छाप छूट जाती है, उसका शोषण करने लगते हैं। तत्‍क्षण चींटों की तरह इकट्ठे हो जाते हैं! क्योंकि बुद्धों का जीवन ऐसी मिठास छोड़ जाता है कि सब तरफ से चींटे भागे चले आते हैं! जैसे शक्कर के ढेर पर चींटे इकट्ठे हो जायें।

बुद्धों की मौजूदगी में तो उन्हें विरोध करना पड़ता है। क्योंकि बुद्ध का एक-एक वचन, जाग्रत व्यक्ति का एक-एक वचन उनके लिए प्राणघाती तीर जैसा लगता है। लेकिन जैसे ही बुद्ध विदा हुए, वैसे ही वे कब्जा कर लेते हैं। बुद्ध जो अपने आसपास हजारों लोगों को प्रभावित छोड जाते हैं, अपनी आभा से मण्डित छोड़ जाते है, ये पण्डित जल्दी से उनकी उस विराट प्रतिभा का शोषण करने में तल्लीन हो जाते हैं। ऐसे धर्म निर्मित होते हैं – तथाकथित धर्म।

ईसा के पीछे ईसाइयत; इसका ईसा से कुछ लेना-देना नहीं है। और बुद्ध के पीछे बौद्ध धर्म, इसका बुद्ध से कुछ लेना-देना नहीं है। और महावीर के पीछे जैन धर्म; इसका महावीर से कुछ लेना-देना नहीं है। मगर इनकी घबडाहटें बडी अजीब हैं! एक से एक हैरानी की घबडाहटें! इनकी बेचैनी!

पण्डितों की हमेशा एक बेचैनी रहती है : कहीं फिर कोई बुद्ध न पैदा हो जाये! नहीं तो इनका जमाया हुआ अखाड़ा फिर उखड़ जाये! मगर सौभाग्य से बुद्ध आते रहते हैं। कभी कहीं न कहीं कोई दीया जल जाता है। और बुझे दीयों की छाती कंप जाती है।

‘धर्म एव हतो हन्ति—मारा हुआ धर्म मार डालता है।’ धर्म को पण्डित मारते हैं, पुजारी मारते हैं। फिर मारा हुआ धर्म, तुम जो उस मुरदा धर्म के पीछे चलते हो, तुम्हें मार डालता है। मुरदे को ढोओगे, तो मरोगे नहीं तो क्या होगा और!

‘रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है।’ लेकिन रक्षा धर्म की कौन करेगा? धर्म की रक्षा तो वही करे, जिसे धर्म का अनुभव हुआ हो। जिसने धर्म को जिया हो, पिया हो, पचाया हो; जिसके लिए धर्म उसका रोआ-रोआ हो गया हो; जिसकी धड़कन-धड़कन में धर्म समाया हो; वह व्यक्ति धर्म की रक्षा करेगा। और धर्म की अगर रक्षा की जाये, तो धर्म तुम्हारी रक्षा करता है स्वभावत।

‘तस्माद् धर्मो न हन्तव्यो—इसलिए धर्म को मत मारो।’

इसलिए पण्डित-पुजारियों से बचो; धर्म को मत मारो। मंदिर-मसजिद कब्रें हैं धर्म की। इनसे बचो। कभी किसी सद्गुरु के मयखाने में बैठो, मयकदे में बैठो; जहां अभी जीवंत शराब ढाली जाती हो, पी जाती हो, पिलायी जाती हो,जहां दीवाने जुड़ते हों, जहां परवाने इकट्ठे होते हों। जहां दीया जलता है, वहां परवाने इकट्ठे होते हैं। मंदिर-मसजिदों में क्या है अब! हा, दीये की तस्वीरें हैं। मगर दीये की तस्वीरों को तुम सोचते हो परवाने आयेंगे!

जरा एक दीये की तस्वीर तो लगाकर बैठो घर में और राह देखो कि कोई परवाना आ जाये! परवाने इतने मूरख नहीं; जितना मूरख आदमी होता है! परवाने पर भी न मारेंगे वहां। कितनी ही सुंदर तस्वीर हो दीये की, कितनी ही चमचमाती तस्वीर हो दीये की, सोने की बना लो, तो भी परवानों को धोखा न दे पाओगे।

परवानों को धोखा नहीं दिया जा सकता। लेकिन मंदिरों में, गिरजों में, गुरुद्वारों में, जो लोग इकट्ठे हो रहे हैं, ये परवाने नहीं हैं; नहीं तो इनको धोखा नहीं हो सकता था। परवाने तो मयकदों में इकट्ठे होते हैं। और मयकदा वहां होता है, जहां कोई जीवित सद्गुरु होता है।

मगर भीड़ सदा जीवित सद्गुरु के खिलाफ होगी। क्योंकि भीड़ तो पण्डित-पुरोहितों से ही चलती है। और भीड़ के पास तो झूठा और सस्ता धर्म है। और भीड़ अपने सस्ते धर्म को, और झूठे धर्म को झूठ मानने को राजी नहीं होना चाहती। क्योंकि उसे झूठ मान ले, तो छोड़ना पड़ेगा। और उसे छोड़ना अर्थात सच को खोजना भी पड़ेगा। और फिर सच्चे को खोजना कठिन भी हो सकता है, दुरूह हो सकता है। साधना करनी होगी; ध्यान करना होगा।

यह झूठा धर्म तो सत्यनारायण की कथा करवाने से मिल जाता है! खुद करनी भी नहीं पडती! कोई और कर जाता है! एक दस-पांच रुपये का खर्चा हो जाता है। एक उधार नौकर को ले आते हैं, वह कर देता है! तुम एक पुजारी से कहते हो कि आकर रोज हमारे घर में मंदिर की घंटी बजा जाया कर। पूजा चढ़ा जाया कर। दो फूल चढ़ा जाया कर। तीस रुपये महीने लगा दिये। वह भी दस-पच्चीस घरों में जाकर घंटी बजा आता है। उसको भी घंटी बजाने में कोई मतलब नहीं है। इससे मतलब नहीं है कि भगवान ने घंटी सुनी कि नहीं। वह जो तीस रुपये महीने देता है, उसको सुनाई पड़ जानी चाहिए, बस! जल्दी से सिर पटकता है। कुछ भी बक-बकाकर भागता है, क्योंकि उसको और दस-पच्चीस जगह जाना है। कोई एक ही भगवान है! कई मंदिरों में पूजा करनी है! जगह-जगह जाकर किसी तरह क्रियाकर्म करके भागता है।

लेकिन न तुमने पूजा की; न तुम्हारे पुजारी ने पूजा की। पुजारी को पैसे से मतलब था; तुम्हें कुछ आगे के लोभ का इंतजाम कर रहे हो। तुम आगे के लिए बीमा कर रहे हो! तुम कुशल व्यवसायी हो।

धर्म को मार डाला है, इस तरह के लोगों ने।

‘मारा हुआ धर्म मार डालता है।’ और पण्डित धर्म को मारते हैं। फिर मारा हुआ धर्म तुम्हें मारता है।

‘रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है।’ बुद्धपुरुष धर्म की रक्षा करते हैं। बुद्धों के साथ होना, स्वयं की रक्षा पा लेना है। बुद्ध में ही शरण है।

– ओशो  

[जो बोलैं तो हरिकथा]

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