“ओंकार है मुक्ति का द्वार” – ओशो सिद्धार्थ

मेरे प्रिय आत्मन,

संत दादू 16 वी सदी के उत्तराद्र्ध में खिले अनूठे फूल हैं। कबीर की परंपरा जब आगे बढ़ती है, तो कई संत भारत के अध्यात्मिक आकाश में अवतरित होते हैं। कबीर के पुत्र कमाल हुए। कमाल साहब के शिष्य जमाल साहब हुए। जमाल साहब के शिष्य विमाल साहब हुए। विमाल साहब के शिष्य बूढ़न साहब हुए। बूढ़न साहब के शिष्य संत दादू हूए। संत दादू अकबर के समकालीन हैं। अबकर संत दादू से बहुत प्रभावित था।
एक बार उसने संत दादू से सवाल किया कि पहले धरती बनी कि आसमान, पहले पानी बना की हवा, पहले पुरुष हुआ कि नारी। संत दादू अकबर के इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं-
‘सब्दै बंध्या सब रहै, सब्दै सब जाए।’

यह ओंकार, यह शब्द, यही सबका मूल है। यही सृष्टि का आधार है। इसी से सब पैदा होता है। धरती, आकाश, ग्रह, नक्षत्र, सूरज, चांद, पुरुष, नारी सब शब्द से पैदा होते हैं। इसी से सब बंधे रहते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि गुरूत्वाकर्षण से आपस में ग्रह बंधे रहते हैं। संत दादू जैसे संतो से पूछो, तो कहेंगे कि यह तो ओंकार का सीमेंट है, जो सबको बांधे रहता है।

‘सब्दै बंध्या सब रहै।’

इसलिए यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा जीवन एक सूत्र में बंधा रहे, बिखर न जाए, तो एक ही उपाय है कि उस शब्द से, जो पूरे असितत्व में गूंज रहा है, उससे बंधे रहो। उससे जुडे़ रहो। ओशो बड़ी प्यारी बात कहते हैं कि ओंकार की ओर, शब्द की ओर, बढ़ते जाना स्वर्ग है। शब्द से दूर चले जाना नर्क है। और शब्द के साथ, ओंकार के साथ, मिलकर एक हो जाना मोक्ष है। दादू ठीक कहते हैं-
‘सब्दै बंध्या सब रहै, सब्दै सब ही जाए।’

ओंकार से अगर कट जाओगे, तो जीवन बिखर जाएगा। मूल से कट जाओगे, तो जीवन की सरिता सूख जाएगी। दादू जिस राजस्थान से आते हैं, उस राजस्थान में कभी सरस्वती विराटतम नदी थी। गंगा से भी बड़ी थी। सिन्धु से भी बड़ी थी। लेकिन सूख गई। कैसे सूख गई? क्योंकि अपने मूल से कट गई। दो बड़ी नदियां थी, चित्रांग और सरहिंद, जो सरस्वती नदी को जल देती थी हिमालय से लाकर। चित्रांग नदी यमुना के मार्ग से गंगा में मिल गई। उसी को सरस्वती कहते हैं। इसलिए प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम कहते हैं। सरस्वती छुपी हुई है। सरहिंद नदी सतलज में चली गई। और सरस्वती नदी सूख गई। ऐसे ही जिसका जीवन ओंकार से कट जाएगा, ओंकार के हिमालय से, उसके जीवन की नदी सूख जाएगी।
‘सब्दै बंध्या सब रहै, सब्दै ही सब जाए।’

शब्द से टूट जाओ, तो जीवन बिखर जाता है। सब विदा हो जाता है। सब कुछ खो जाता है। और शब्द से जुड़े रहो, तो जीवन का परम आनंद, जीवन की परम संपदा तुम्हारे पास आ जाती है।

‘सब्दै ही सब उपजे, सब्दै सबै समाए।

कहते हैं कि अकबर, सारा खेल शब्द से है। कबीर साहब जिसे कहते हैं ‘एक नूर ते सभु जगु उपजिया, कउन भले को मंदे। जो शब्द का आलोक है, जो ओंकार का दिव्य आलोक है, इसी से सब पैदा होता है। और ‘सब्दै सबै समाए। और एक दिन यह सारा खेल सिमट जाता है। जैसे कोई जादूगर अपने जादू का खेल समेट लेता है। ऐसे ही एक दिन यह सारा खेल सिमट जाता है। प्रलय हो जाती है।
‘मेरा जीवन सब का साखी।
कितनी बार सृष्टि जागी है, कितनी बार प्रलय सोया है;
कितनी बार हँसा है जीवन, कितनी बार विवश रोया है।
मेरा जीवन सबका साखी।

शब्द से सब पैदा होता है। और एक दिन शब्द में सब विलीन हो जाता है।
‘सब्दै ही सच पाइए, सब्दै ही संतोष।

‘सब्दै ही सच पाइए।’  सत्य को हम तलाशते हैं शास्त्रों में। लेकिन शास्त्रों से सत्य मिलता नहीं। लाओत्से चीन का संत हुआ। कहता है कि परम सत्य को कहा नहीं जा सकता और जो कहा जा सकता है, वह सत्य तो हो सकता है, परम सत्य नहीं हो सकता। क्या भेद है? परम सत्य शाश्वत होता है। सत्य तात्कालिक होता है। सत्य तो देशकालिक होता है। महाभारत का बड़ा सुंदर प्रसंग है। युधिष्ठिर से यक्ष पूछता है कि उस परमसत्य को कैसे पाएं? युधिष्ठिर कहते हैं कि यक्ष, वह परम सत्य श्रुतियों में नहीं है, स्मृतियों में नहीं है।

‘श्रृति: विभिन्ना, स्मृति: च भिन्ना, न एको मुनि: यस्य बचनं प्रमाणम!’

मुनि प्रामाणिक है, लेकिन मुनि का वचन प्रामाणिक नहीं है। वचन मात्र प्रामाणिक नहीं है। क्योंकि ‘धर्मस्य तत्वम निहितम गुहायाम। क्योंकि समाधि में जाकर, भीतर की अंतगुफा में जाकर, कोई संत उस परम सत्य को जानता है। इसलिए उसको कहा नहीं जा सकता। क्योंकि समाधि में जो जाता है, वह मिट जाता है। और जो लौटकर आता है समाधि से, वह वही नहीं होता, जो समाधि की अंतर्गुहा में बैठा होता है। कहने का कोई उपाय नहीं है।

‘श्रृति: विभिन्नं, स्मृति: च भिन्ना, न एको मुनि: यश्य बचनं प्रमाणम!
तो फिर क्या किया जाए परमसत्य को पाने के लिए?
‘धर्मस्य तत्वम निहितम गुहायाम, महाजनो ये न गत: स पंथा।’

धर्म का तत्व तो भीतर की अंतर्गुफा में है, जहां समाधि में हम जाते हैं। और इसलिए श्रेष्ठ, जो हमारे संतजन हैं, गुरुनानक देव हैं, कबीर साहब हैं, बुद्ध हैं, महावीर हैं, इन्होंने जिस रास्ते को अपनाया, उस रास्ते को अगर हम भी अपनाएं, तो हम भी उस परम सत्य को पा सकते हैं। और वह मार्ग है ‘सहज योग। वह मार्ग है उस शब्द को जानो।
‘सब्दै ही सच पाइए, सब्दै ही संतोष।
संतोष की बात बहुत है। लेकिन संतोष आयेगा कैसे? और संतोष का धन मिल जाए, तो समझना, परम धन मिला।
‘गोधन, गजधन, बाजधन और रतन धन खान।
जब आये संतोष धन, सब धन धुरी समान।।
लेकिन दादू कहते हैं कि यह संतोष धन भी तभी आयेगा, जब तुम ओंकार का परमधन पा लो। शब्द का परमधन पा लो। ओशो बड़ी प्यारी बात कहते हैं कि धर्म दिव्य असंतोष है। अच्छा है तुम्हे संतुष्ट होकर बैठने नहीं देता। तब तक नहीं बैठने देता, जब तक तुम परमसत्य न पा लो, और संतोष तो परमसत्य की छाया है।
‘सब्दै ही सिथर भया सब्दै भागा शोक।’

और शब्द से जुड़ आओ, ओंकार से जुड़ जाओ, तभी सही मायने में सिथत- प्रज्ञा आती है। जिसकी ओर कृष्ण इशारा कर रहे हैं। तुम थिर हो जाते हो, तुम सिथर प्रज्ञा हो जाते हो। जिसकी ओर गुरुनानक देव जी इशारा करते हैं- ‘हुकुमी हुकुम चलाए राह, नानक बिगसे बेपरवाह। क्यों हम चिंता करें? क्यों हम फिक्र करें? मेरी फिक्रर तो वह लेता है। मेरी फिक्र तो गोविंद करता है।

ओशो ने एक बड़ी सुंदर कहानी कही है। एक समुराई है। अपनी पत्नी को गौना कराकर ले जा रहा है अपने गांव। रास्ते में तूफान आता है। सब लोग चिल्ला रहे हैं, रो रहे हैं। उसकी पत्नी देखती है कि उसका दूल्हा समुराई तो शांत है, थिर है। कौलर पकड़कर हिलाती है। कहती है-‘तुम कैसे व्यक्ति हिो? तूफान आया है। कौन-सी सांस आखिरी सांस हो जाए। कौन-सी धड़कन आखिरी धड़कन हो जाए। फिर भी तुम शांत हो, थिर हो। समुराई तलवार निकाल लेता है अपनी म्यान से। उसकी गर्दन पर रख देता है। थोड़ी देर तो वह विचलित होती है, फिर हंसने लगती है। समुराई कहता है कि तुझे मालूम है कि तलवार की धार कितनी तेज है। फिर भी तू हंसती है। जरा सी मैंने दबाई और तेरी गर्दन गई। तब भी तू हंसती है। उसकी दुल्हन कहती है-‘हँसूं नहीं, तो क्या करूं? माना कि तलवार की धार बड़ी तेज है। लेकिन जब तक यह तलवार मेरे दूल्हे के हाथों में है, तब तक इससे मुझे डरने की क्या जरूरत है।

जब शब्द से जुड़ जाते हो, जब ओंकार से जुड़ जाते हो, तो गोविंद से जुड़ जाते हो। तब तुम सही मायने में थिर हो जाते हो ‘सब्दै भागा शोक। फिर काहे की चिंता? फिर काहे का शोक? कहते है अष्टावक्र जनक से-
‘ आपद: संपद: काले दैवादैवेति निश्चयी।
तृप्त: स्वस्थेन्द्रियों नित्यम न शोचति न कांक्षति।’

यह मुझे पता है। आपदा हो, संपदा हो, दैवयोग से अपने समय पर आती है। सब उस गोविंद का खेल है। यह जानकर मैं थिर हो गया हूं। अब शोक नहीं करता, अब चिंता नहीं करता।
‘सब्दै ही मुक्ता भया, सब्दै समझै प्राण।’
इस शब्द से जुड़कर, इस ओंकार से जुड़कर ही मुक्ति मिलती है। तब तक मुक्ति की केवल बाते हैं। रज्जब साहब दादू साहब के शिष्य हैं । कहते हैं-
‘नाम बिना नाहीं निसतारा कबहूं न पहुंचे पार।’
बिना नाम के मुक्ति सिंभव नहीं है। ओंकार मुक्ति कि द्वार है।
‘सब्दै ही मुक्तिा भया, सब्दै समझै प्राण।’
शब्द से ही जीवन के रहस्य समझ में आते हैं।
‘सब्दै ही सूझे सबै, सब्दै सुरझै जाण।।’
शब्द को जान लो, तो जीवन का सारा रहस्य समझ में आ जाता है। शब्द को जान लो, तो जीवन की सारी समस्यायें सुलझ जाती हैं। शब्द ही सारी समस्याओं का समाधान है। यही सहज योग है।

हरि ओम तत्सत।

– ओशो सिद्धार्थ

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4 thoughts on ““ओंकार है मुक्ति का द्वार” – ओशो सिद्धार्थ

  • December 28, 2015 at 8:24 AM
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    Superb ! Bade baba ko Naman ..

    Reply
  • December 24, 2016 at 4:50 PM
    Permalink

    I have one important question for Sadguru Trivir or any Acharya. I took Dhyana Samadhi course this year. My question is – I hear Omkar very distinctly on some days and vaguely on other days during daily meditation/Sumiran. Is this to be expected? Should I just hear whatever version (distinct or vague) of Omkar is there within? Thanks!

    Reply
    • December 26, 2016 at 2:33 PM
      Permalink

      Accept with joy and gratitude, what is happening to you.
      When mind is full of noise due to overcrowded thoughts, Omkar becomes vague.
      When mind is silent, divine sound becomes very melodious.
      By becoming SAKSHI, More Aware, thoughts become less and less.
      – Answer by Osho Shailendra Ji.

      Reply

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