“धर्म से धार्मिकता की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

पहले तो यह समझें कि धर्म क्या है और धार्मिकता क्या है? धर्म के दो आयाम हैं- एक कट्टरता और दूसरा धार्मिकता। कट्टरता – जहाँ धर्म रुक जाता है। धार्मिकता – जहाँ धर्म प्रवाहित रहता है। कट्टरता कर्मकाण्ड में ले जाती है। धार्मिकता जीवन्तता में ले जाती है।

धर्म या तो आगे बढ़ेगा या पीछे जायेगा। अगर धर्म जीवन्त नहीं हो तो कट्टरता उसकी नियति है। तो पहली बात कि धर्म अपने आप में, स्वतन्त्र रूप में व्याख्येय नहीं है। धर्म का कौन-सा स्वरूप धार्मिकता का स्वरूप है, और कौन-सा रूप कट्टरता का स्वरूप है? जब भी कोई बुद्ध पुरुष आता है, जब भी कोई सद्गुरु आता है, जब भी कोई पूरा गुरु होता है, उस धर्म में तो धार्मिकता पैदा होती है और जब वह विदा हो जाता है, तो उसके पीछे एक राख रह जाती है और कट्टरता से कर्मकाण्ड का जन्म होता है।

गुरु नानक देव जी से किसी ने पूछा कि आपका धर्म क्या है? गुरु नानक देव जी कहते हैं, ‘न मैं हिन्दू, न मुसलमान’। न तो मैं हिन्दू हूँ और न ही मैं मुसलमान हूँ। और सच कहो तो उस समय का नवाब था दौलत खाँ, उसके यहाँ गुरु नानक देव जी के इस वचन पर मुकदमा चला कि तब तो तुम इन दोनों धर्मो की अवहेलना करते हो। तुम ऐसा क्यों कहते हो कि न मैं हिन्दू न मुसलमान?

दौलत खाँ गुरु नानकदेव जी को प्यार करता था। लेकिन काजी ने कहा कि यह तो काफिराना अन्दाज है, यह तो अधार्मिकता है कि वे कहते हैं कि न मैं हिन्दू न मैं मुसलमान। गुरु नानक देव जी को बुलाया जाता है नवाब के दरबार में। बड़ी प्यारी बात वह कहते हैं। कहते हैं कि परमात्मा तुम्हें प्यार करता है, क्या ये समझकर कि तुम हिन्दू हो कि मुसलमान हो। क्या परमात्मा के पास तुम स्वीकृत होते हो हिन्दू के रूप में या मुसलमान के रूप में? एक संत का क्या धर्म हो सकता है? उसका कोई धर्म नहीं होता।

धर्म है क्या? धर्म है एक सत्य और सत्य हर व्यक्ति का अलग-अलग होता है। धार्मिकता है क्या? परम सत्य है। परम सत्य अलग-अलग नहीं होता। जो तुम्हारा सत्य है, किसी और का सत्य नहीं है। सत्य क्या है? जिससे तुम विकसित होते हो, वही तुम्हारा सत्य है। और परम सत्य क्या है? परम सत्य वही है जिससे ये अस्तित्व निर्देशित है, जिससे अस्तित्व संचालित है। परम सत्य अलग-अलग नहीं होता। लेकिन सत्य अलग-अलग होता है।

जैसे कोई व्यक्ति पहुँचता है गौतम बुद्ध के पास। कहता है – परमात्मा है? गौतम बुद्ध कहते हैं कि अगर है तो क्या करोगे? तो कहता है कि करूँगा क्या, फिर कुछ करने की जरूरत ही क्या है? सब करना-धरना छोड़ करके बैठ जाऊँगा। और जो करना है परमात्मा को करना है। गौतम बुद्ध कहते हैं कि नहीं मित्र, परमात्मा नाम की कोई चीज कहीं नहीं है। चला जाता है। दोपहर को एक दूसरा व्यक्ति आता है। पूछता है – आप क्या कहते हो, परमारत्मा है या नहीं। गौतम बुद्ध कहते हैं कि यदि मैं कहूँ कि नहीं है, तो क्या करोगे? उसने कहा कि तब तो मजा है। चोरी करूँगा, डकैती करूँगा, कोई देखने वाला नहीं। गौतम बुद्ध ने कहा कि नहीं, वह है और सब कुछ देखता है, सबका हिसाब रखता है। वह व्यक्ति चला जाता है। फिर एक तीसरा व्यक्ति शाम को आता है, कहता है कि आप क्या कहते हो परमात्मा है या नहीं? गौतम बुद्ध ने कहा कि यदि मैं कहूँ कि है तो क्या करोगे और मैं कहूँ कि नहीं है तो क्या करोगे? उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे क्या करना, आप है कहोगे तो मैं मान लूँगा और आप नहीं कहोगे तो मैं मान लूँगा कि वह नहीं है, मुझे क्या करना है। गौतम बुद्ध ने कहा कि नहीं, वह है भी और नहीं भी है, तुम खोजो | वह चला जाता है।

आनन्द तो परेशान है रात को। सोना चाहता है पर सो नहीं पाता है। करवटें बदलता है। गौतम बुद्ध ने कहा कि आनन्द, आज तुम कुछ परेशान लगते हो। आनन्द ने कहा कि तीन व्यक्ति आए, तीनों को आपने अलग-अलग उत्तर दिया। गौतम बुद्ध ने कहा कि तुम क्यों परेशान हो? जिनको उत्तर दिया गया, उत्तर तो उनके लिए थे। आनन्द ने कहा कि लेकिन मैं सुन तो रहा था। तीनों उत्तर अलग-अलग थे। गौतम बुद्ध ने बड़ी प्यारी बात कही। कहा कि संत हमेशा सत्य कहता है। और सत्य वही है जो सामने वाले को विकसित करे। पहले व्यक्ति को मैंने वही कहा जो उसको विकसित कर सकता था। दूसरे व्यक्ति को भी वही कहा जो उसे विकसित कर सकता था और तीसरे को भी वही कहा जो उसे विकसित कर सकता था। तो सत्य अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है।

धर्म अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग -अलग हो सकता है। लेकिन परम धर्म एक ही होता है और परम धर्म का नाम है धार्मिकता ‘नूत्नम् नूत्नम् पदे-पदे’ हर कदम पर नया हो जाए। इसलिए संतों के विषय में तुम भविष्यवाणी नहीं कर सकते। वे क्या करेंगे? बिल्कुल भविष्यवाणी नहीं कर सकते। एक पण्डित के विषय में भविष्यवाणी कर सकते हो, साफ बात है कि वह एक नियम से चलेगा। लेकिन संत तो आत्मस्फूर्ति से चलता है।

रमण महर्षि के पास कोई पण्डित जाता है, कहता है कि मैं आपसे शाश्त्रार्थ करने आया हूँ। रमण महर्षि के पीछे एक लाठी थी। उन्होंने लाठी उठाई और कहा कि आओं शाश्त्रार्थ करता हूँ। वह भागा अरुणाचल पर्वत पर और पीछे-पीछे लाठी लेकर रमण महर्षि। वह आगे-आगे भागा जा रहा है और कह रहा है कि ये कोई संत का आचरण है लाठी लेकर पीछे पछ़ना। बिल्कुल भविष्यवाणी नहीं कर सकते, क्योंकि वह आत्मस्फूर्ति से चल रहा है, भीतर की प्रेरणा से चल रहा है। भीतर की प्रेरणा से बोल रहा है।

‘नूत्नम् नूत्नम् पदे-पदे’। हर कदम पर उसमें नवीनता है।

धर्म अतीत की स्मृति है, धार्मिकता वर्तमान का गीत है। धर्म जीवन की एक शैली है, धार्मिकता जीवन का प्रवाह है। धर्म और धार्मिकता में बहुत अन्तर है। तुम पूछते हो आपका धर्म क्या है? गुरु नानक देव जी ने जो कहा वही मैं भी तुम्हें कहना चाहूँगा। न मैं हिन्दू, न मुसलमान। क्योंकि संत का कोई धर्म नहीं होता। संत का परम धर्म होता है। संत का कोई धर्म नहीं होता। संत को तुम सीमाओ में नहीं बाँध सकते। संत किसी धर्म का नहीं होता। जैसे हवाओं का कोई देश नहीं होता और किरणों का कोई गाँव नहीं होता, ऐसे ही सन्तों का कोई धर्म नहीं होता।

संत तो पूरे अस्तित्व के होते हैं। तुम बुद्ध को बौद्धों तक बाँध नहीं सकते। तुम महावीर को जैनों तक सीमित नहीं कर सकते। तुम कृष्ण को हिन्दुओं तक सीमाओ में नहीं बाँध सकते। तुम गुरु नानक, गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर या दसों सिख गुरुओं को सिख धर्म तक सीमित नहीं कर सकते। ये सारी मनुष्यता की सम्पत्ति हैं। कोई भी संत धर्म की सीमाओ के अन्दर नहीं आता, वह धर्म की सीमाओ के पार चला जाता है। तो वही उत्तर मैं तुम्हें देना चाहूँगा कि धार्मिकता तो मेरी है, धर्म मेरा कोई नहीं है। धार्मिकता का अर्थ है एक सतत् प्रवाह। इसीलिए तो हमने अपने पूरे अभियान का नाम दिया है  – ओशोधारा। यह बहती हुई धारा है।

ओशो ने कहा कि मैं कुछ चित्र बना रहा था। खूब रंग-ढंग भरे हमने इसमें, विविध रंग भरे इसमें हमने, लेकिन यह चित्र अधूरा छोड़कर जा रहा हूँ। ताकि मेरी धारा में जो लोग आएँ, इसमें कुछ नया रंग भरें। और बड़ी प्यारी बात कही कि तुम भी इस चित्र को अधूरा छोड़ कर जाना ताकि तुम्हारे बाद जो लोग आएँ, वे भी कुछ नए रंग भरें। इसका नाम है धार्मिकता, इसका नाम है एक सतत् प्रवाह। अनन्त-अनन्त काल तक बहता हुआ प्रवाह, उसका नाम है धार्मिकता। और धार्मिकता-धार्मिकता में कोई भेद नहीं है। गुरु नानक की धार्मिकता, बुद्ध की धार्मिकता और ओशो की धार्मिकता में कोई भेद नहीं है। संतों की धार्मिकता में कोई भेद नहीं है।

मेरा भी कोई धर्म से नाता नहीं है, लेकिन धार्मिकता से मेरा पूरा नाता है। और तुम भी याद रखना कि धर्म की सीमाओ में तुम्हें नहीं बंधना है, तुम्हें भी धार्मिकता की गंगा में बहते चले जाना है। और इसी धार्मिकता का नया नाम है ओशोधारा।

ओशो सिद्धार्थ

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One thought on ““धर्म से धार्मिकता की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

  • September 22, 2015 at 2:37 PM
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    Very very nice proverb.

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