“छ: लेश्‍याएं: चित्त के प्रकार” – ओशो

कृष्‍ण, नील, कापोत—ये तीन अधर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव दुर्गति में उत्‍पन्‍न होता है।

तेज ,पद्म और शुक्‍ल—ये तीन धर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव सदगति में उत्‍पन्‍न होता है।

1) पहली लेश्‍या – कृष्‍ण लेश्‍या

      तो पहले समझें कि लेश्‍या क्‍या है? ऐसा समझें कि सागर शांत है। कोई लहर नहीं है,फिर हवा का एक झोंका आजा है, लहरें उठनी शुरू हो जाती है, तरंगें उठती है। सागर डांवांडोल हो जाता है, छाती अस्‍त वस्‍त हो जाती है। सब अराजक हो जाता है। उन लहरों का नाम लेश्‍या है। तो लेश्‍या का अर्थ हुआ चित की वृतियां। जिसको पतंजलि ने चित-वृति कहा है। उसको महावीर ‘’लेश्‍या’’ कहा हे। चित की वृतियां चित के विचार, वासनायें, कामनायें लोभ, अपेक्षायें, ये सब लेश्‍यायें है।

      कृष्‍ण लेश्‍या का आदमी अपनी आँख फोड़ सकता है,अगर दूसरे की फूटती हों। अपने लाभ का कोई सवाल नहीं है, दूसरे की हानि ही जीवन का लक्ष्‍य है। ऐसे व्‍यक्‍ति के आस-पास काल वर्तुल होगा।

      महावीर कहते है, यह निम्‍नतम दशा है, जहां दूसरे का दुःख ही एकमात्र सुख मालूम पड़ता है। ऐसा आदमी सुखी हो नहीं सकता। सिर्फ वहम में जीता है। क्‍योंकि हमें मिलता वही है जो हम दूसरों को देते है—वही लौट कर आता है। जगत एक प्रतिध्‍वनि है।

      इसलिए हमने यम को , मृत्‍यु को काले रंग में चित्रित किया है; क्‍योंकि उसका कुल रस इतना है कि कब आप मरे, कब आपको ले जाया जाये। आपकी मृत्‍यु ही उसके जीवन का आधार है, इसलिए काले रंग में हमने यम को पोता है। आपकी मृत्‍यु उसके जीवन का आधार है—कुल काम इतना है कि आप कब मरे, प्रतीक्षा इतनी सी है।

      यह जो काला रंग है, इसकी कुछ ख़ूबियाँ, वैज्ञानिक ख़ूबियाँ समझ लेनी जरूरी है। काला रंग गहन भोग का प्रतीक है। काले रंग को वैज्ञानिक अर्थ होता है जब सूर्य की किरण आप तक आती है, तो उसमें सभी रंग होते है। इसलिए सूर्य की किरण सफेद है, शुभ्र है। सफेद सभी रंगों का जोड़ है, एक अर्थ में अगर आपकी आँख पर सभी रंग एक साथ पड़ें तो सफेद बन जायेंगे। छोटे बच्‍चों को स्‍कूल में एक रंगों का वर्तुल दे दिया जाता है। जब उस वर्तुल को जोर से घुमाया जाता है, तो सभी रंग गड्ड-मड्ड हो जाते है। और सफेद बन जाता है।

      सफेद सभी रंग का जोड़ है। जीवन समग्र स्‍वीकार सफेद में है, कुछ अस्‍वीकार नहीं है, कुछ निषध नहीं है, काला सभी रंगों का आभाव है, वहां कोई रंग नहीं है। जीवन में रंग होते है, मौत में कोई रंग नहीं….वहां कोई रंग नहीं है। मौत रंग विहीन है।

      काले रंग का अर्थ है…दूःख का रंग, ध्‍यान रहे, रंग आपको दिखाई पड़ते है उन किरणों से जो आपकी आंखों तक आती है। अगर आपको लाल साड़ी दिखाई पड़ रही है, तो उसका मतलब है कि उस कपड़े से लाल किरण वापस आ रही है। एक अर्थ में काला रंग सभी रंगों का अभाव है। इसी लिए महावीर ने सफेद को त्‍याग का प्रतीक कहा है और काले को भोग का प्रतीक कहा है। उसने सभी पी लिया,कूद भी छोड़ा नहीं—सभी किरणों को पी  गया। तो जितना भोगी आदमी होगा, उतनी कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा हुआ होगा। जितना त्‍यागी व्‍यक्‍ति होगा, उतना ही कृष्‍ण लेश्‍या से दूर उठने लगेगा।

      दान और त्‍याग की इतनी महिमा लेश्‍याओं को बदलने का एक प्रयोग है। जब आप कुछ देते है किसी को, आपकी लेश्‍या तत्क्षण बदलती है, लेकिन जैसा मैंने कहा कि अगर आप व्‍यर्थ चीज देते है तो लेश्‍या नहीं बदल सकती। कुछ सार्थक,जो प्रतिकर हे, जो आपके हित का था और काम का था। और दूसरे के भी काम पड़ेगा—जब भी आप ऐसा कुछ देते है। आपकी लेश्‍या तत्‍क्षण परिवर्तित होती है। क्‍योंकि आप शुभ्र की तरफ बढ़ रहे है, कुछ छोड़ रहे है।

      महावीर ने अंत में वस्‍त्र भी छोड़ दिये,सब छोड़ दिया। उस सब छोड़ने का केवल इतना अर्थ है कि कोई पकड़ न रही। और जब कोई पकड़ नहीं रहती तो स्‍वेत, शुक्‍ल लेश्‍या का जन्‍म होता है।

काली लेश्‍या। ये सधनतम लेश्‍या है। काली निम्नतम स्‍थिति है।

      महावीर ने रंग के आधार पर विश्लेष ण किया है, शायद वहीं एकमात्र रास्‍ता हो सकता है। जब भी चित में कोई वृति होती है तो उसके चेहरे के आस पास उसके रंग की आभा आ जाती है। आपको दिखाई नहीं पड़ती। छोटे बच्‍चों को ज्‍यादा प्रतीत होती है। आपको भी दिखाई पड़ सकती है। अगर आप थोड़े सरल हो जायें। जब कोई व्‍यक्‍ति सच में साधु चित हो जाता है, तो वह आपकी आभा से ही आपको नापता है; आप क्‍या कहते है, उससे नहीं, वह आपको नहीं देखता, आपकी आभा को देखता है।

      अब एक आदमी आ रहा है। उसके आस-पास कृष्‍ण लेश्‍या की आभा है, काला रूप है चारों तरफ; उसके चेहरे के आस-पास एक पर्त है काली तो वह कितनी ही शुभ्रता की बातें करे, वे व्‍यर्थ है, क्‍योंकि वह काली पर्त असली खबर दे रही है। अब तो सूक्ष्‍म कैमरे विकसित हो गये है। जिनसे उसका चित्र भी लिया जा सकता है। वह चित्र बातयेगा कि आपकी क्‍या भीतरी अवस्‍था चल रही है। और यह आभा प्रतिपल बदलती रहती है।

      महावीर, बुद्ध, कृष्‍ण और राम, क्राइस्‍ट के आस-पास सारी दूनिया के संतों के आस-पास हमने उनके चेहरे के प्रभा मंडल बनाया है। हमारे कितने ही भेद हो—ईसाई में,मुसलमान में, हिन्दू में,जैन में बौद्ध में—एक मामले में हमारा भेद नहीं है कि इन सभी ने जाग्रत महापुरुषों के चेहरों के आस पास प्रभा मंडल बनाया है। वह प्रभा-मंडल शुभ्र आभा प्रगट करता है।

      हमारे चेहरे के आस पास सामान्‍यतया काली आभा होती है। और या फिर बीच की आभायें होती है। प्रत्‍येक आभा भीतर की अवस्‍था की खबर देती है। अगर आपके आस पास काली आभा मंडल है, आरा है, तो आपके भीतर भंयकर हिंसा, क्रोध,भंयकर कामवासना होगी। आप उस अवस्‍था में होंगे, जहां आपको खुद भी नुकसान हो तो कोई हर्ज नहीं दूसरे को नुकसान हो तो आपको आनंद मिलेगा।

      आप जैसे कपड़े पहनते हे, वे भी आपके चित की लेश्‍या की खबर देते है। ढीले कपड़—कामुक आदमी एक तरह के कपड़े पहनेगा। कामवासना से हटा हुआ आदमी दूसरी तरह के कपड़े पहने गा। रंग बदल जायेंगे,कपड़े के ढंग बदल जायेंगे। कामुक आदमी चुस्‍त कपड़े पहनेगा। गैर-कामुक आदमी ढीले कपडे पहनने शुरू कर देगा। क्‍योंकि चुस्‍त कपड़ा शरीर को वासना देता है,हिंसा देता है।

      सैनिक को हम ढीले कपड़े नहीं पहना सकते। ढीले कपडे पहनकर सैनिक लड़ने जायेगा तो हारकर वापस लौटेगा। साधु को चुस्‍त कपड़े पहनाना बिलकुल नासमझी की बात है। क्‍योंकि चुस्‍त कपड़े का काम नहीं साधु के लिए। इसलिए साधु निरंतर ढीले कपड़े चूनेगा। जो शरीर को छूते भर रहे, बाँधते नहीं रहे।

      आपको पता है छोटी-छोटी बातें आपके जीवन को संचालित करती है; क्‍योंकि चित क्षुद्र चीजों से ही बना हुआ है। अगर आप चुस्‍त कपड़े पहने हुए हे तो आप दो-दो सीढ़ियां चढ़ने लगते है। एक साथ। अगर आप ढीले कपड़े पहने हुए है तो आपकी चाल शारी होती है। एक सीढ़ी भी आप मुश्‍किल से चढ़ते है। चुस्‍त कपड़े पहन कर आप में गति आ जाती है।

      जब आप रंग चुनते है, वह भी खबर देता है आपके चित की। क्‍योंकि चुनाव अकारण नहीं है। चित चुन रहा है। रंग चुनने का कारण यह है कि जब आपके चित में एक वृति होती है तो आपके चेहरे के आसपास एक आरा एक प्रभा मंडल निर्मित होता है। इस प्रभा मंडल के चित्रों से ये भी पता लगाया जा सकता है, आपके भीतर अब क्‍या चल रहा है। कारण क्‍या है, क्‍योंकि आपका पूरा शरीर विद्युत का एक प्रवाह है। आपको शायद ख्‍याल न हो कि पूरा शरीर वैद्युतिक यंत्र है। तो ध्‍यान रहे, जो अपराधी इतने अदालत-कानून के बाद भी अपराध करते है, उनके पास निश्‍चित ही कृष्‍ण लेश्‍या पाई जायेगी। और आप अगर डरते है अपराध करने से कि नुकसान न पहुंच जाए। और आप देख लेते है कि पुलिसवाला रास्‍ते पर खड़ा है,तो रूक जाते है लाल लाइट देखकर। कोई पुलिसवाला नहीं है—नीली लेश्‍या—कोई डर नहीं है, कोई नुकसान हो नहीं सकता है। कृष्ण लेश्या का आदमी है उसको कोई दंड नहीं रोक सकता, पाप से क्‍योंकि होगा इसकी उसे जरा भी फिक्र नहीं होती। वह खोया है अंधेरी घाटियों में। दूसरों को क्‍या होता है, उसको इससे कुछ लेना देना नहीं है, उसे रस है तो दूसरों को केवल नुकसान पहुंचाने मात्र से है।

कृष्‍ण लेश्‍या ये पहली लेश्‍या है,

2) दूसरी लेश्‍या – नील लेश्‍या

नील लेश्‍या दूसरी लेश्‍या है। जो व्‍यक्‍ति अपने को भी हानि पहुँचाकर दूसरे को हानि पहुंचने में रस लेता है। वह कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा है। जो व्‍यक्‍ति अपने को हानि न पहुँचाए, खुद को हानि पहुंचाने लगे तो रूक जाये। लेकिन दूसरे को हानि पहुंचाने की चेष्‍टा करे, वैसा व्‍यक्‍ति नील लेश्‍या में है।

      नील लेश्‍या कृष्‍ण लेश्‍या में बेहतर हे। थोड़ा हल्‍का हुआ कालापन,थोड़ा नील हुआ। जो निहित स्‍वार्थ में जीते है…यह जो पहला आदमी है—जिसके बारे में मैंने कहा कि मेरी एक आँख फूट जाये—यह तो स्‍वार्थी नहीं है। यह तो स्‍वार्थी से नीचे गिर गया है। इसको अपनी आँख की फिकर ही नहीं है। इसको दूसरे की दो फोड़नें का रस है। यह तो स्‍वार्थ से भी नीचे खड़ा है।

      नील लेश्‍या वाल आदमी वह है। जिसको हम सेल्‍फिस कहते है, जो सदा अपनी चिंता करता है। अगर उसको लाभ होता है तो आपको हानि पहुंचा सकता है। लेकिन खुद हानि होती हो तो वह आपको हानि पहुंचायेंगा। ऐसे ही आदमी को नील लेश्‍या के आदमी को हम दंड से रोक पाते है। पहले आदमी को दंड देकर नहीं रोका जा सकता। जो कृष्‍ण लेश्‍या वाला आदमी है, उसको कोई दंड नहीं रोक सकते पाप से क्‍योंकि उसे फिकर ही नहीं कि मुझे क्‍या होता है। दूसरे को क्‍या होता है उसका रस….उसको नुकसान पहुंचाना। लेकिन नील लेश्‍या वाले आदमी को पनिशमेंट से रोका जा सकता है। अदालत, पुलिस, भय….कि पकड़ा जाऊं, सज़ा हो जाये तो वह दूसरे को हानि करने से रूक सकता है।

      तो ध्‍यान रहे,जो अपराधी इतने अदालत कानून के बाद भी अपराध करते है उनके पास निश्‍चित ही कृष्‍ण लेश्‍या पाई जायेगी। और आप अगर डरते है अपराध करने से कि नुकसान न पहुंच जाए। और आप देख लेते है कि पुलिसवाला रास्‍ते पर खड़ा है तो रूक जाते हे लाल लाइट देखकर। कोई पुलिसवाला नहीं है—नील लेश्‍या—कोई डर नहीं है, कोई नुकसान हो नहीं सकता। निकल जाओ, एक सेकेंड की बात है।

            एक दिन मुल्‍ला नसरूदीन अपने मित्र के साथ कार से जा रहा था। मित्र कार को भगाये लिये जा रहा है। आखिर मोटर-साईकिल पर चढ़ा हुआ एक पुलिस का आदमी पीछा कर रहा है। जोर से साइरन बजा रहा है। लेकिन वह आदमी सुनता ही नहीं है। दस मिनट के बाद मुश्‍किल से वह पुलिस का आदमी जाकर पकड़ पाया और उसने कहा कि मैं गिरफ्तार करता हूं चार कारणों से। बीच बस्‍ती में पचास-साठ मील की रफ्तार से तुम गाड़ी चला रहे हो। तुम्‍हें प्रकाश(लाल बत्‍ती) कोई फ्रिक नहीं है। रेड लाईट है तो भी तुम चलाए जा रहे हो। जिस रास्‍ते से तुम जा रहे हो, यह वन-वे है और इसमें जाना निषिद्ध है। और मैं दस मिनट से साइरन बजा रहा हूं,लेकिन तुम सुनने को राज़ी नहीं हो।

      नसरूदीन जो बगल में बैठा था मित्र के, खिड़की से झुका और उसने कहा, ‘यू मास्ट नाट माइंड हिम आफिसर,ही इज़ डैड ड्रिंक।‘ वह पाँचवाँ कारण बता रहा है। इस पर ख्‍याल मत करिए, यह बिलकुल बेहोश है, शराब में धुत हे। माफ करने योग्‍य है।

      जब भी आप गलत करते है तो आप शराब में धुत होते ही है। क्‍योंकि गलत हो ही नहीं सकता मूर्छा के बिना। लेकिन मूर्छा भी इतना ख्‍याल रखती है कि खुद को नुकसान न पहुंचे, इतनी सुरक्षा रखती है। हममें से अधिक लोग कृष्‍ण लेश्‍या में उतर जाते है। कभी-कभी कृष्‍ण लेश्‍या में उतरते है। वह हमारे जीवन को रोजमर्रा का ढंग नहीं है। लेकिन कभी-कभी हम कृष्‍ण लेश्‍या में उतर जाते है।

      कोई क्रोध आ जाये, तो हम उतर जाते है और इसलिए क्रोध के बाद हम पछताते है। और हम कहते है,जो मुझे नहीं करना था वह मैंने किया। जो मैं नहीं करना चाहता था। वह मैंने किया। बहुत बार हम कहते है, मेरे बावजूद यह हो गया। यह आप कैसे कह पाते है? क्‍योंकि यह आपने ही किया। आप एक सीढ़ी नीचे उतर गए। जो आपके जीवन का ढांचा था; जिस सीढ़ी पर आप सदा जीते है—नील लेश्‍या–उससे जब आप एक सीढ़ी नीचे उतरते है तो ऐसा लगता है। कि किसी और ने आप से करवा लिया। क्‍योंकि उस लेश्‍या से आप अपरिचित है। नील लेश्‍या शुद्ध स्‍वार्थ है, लेकिन कृष्‍ण लेश्‍या से बेहतर।

3) तीसरी लेश्‍या – कापोत लेश्‍या

तीसरी लेश्‍या को महावीर ने ‘’कापोत’’ कहा है—कबूतर के कंठ के रंग की। नीला रंग और भी फीका हो गया। आकाशी रंग हो गया। ऐसा व्‍यक्‍ति खुद को थोड़ी हानि भी पहुंच जाए, तो भी दूसरे को हानि नहीं पहुँचाता। खुद को थोड़ा नुकसान भी होता हो तो सह लेगा। लेकिन इस कारण दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। ऐसा व्‍यक्‍ति प्रार्थी होने लगेगा। उसके जीवन में दूसरे की चिंतना और दूसरे का ध्‍यान आना शुरू हो जायेगा।

      ध्‍यान रहे पहली दो लेश्‍याओं के व्‍यक्‍ति प्रेम नहीं कर सकते। कृष्‍ण लेश्‍या वाला तो सिर्फ घृणा कर सकता है। नील लेश्‍या वाला व्‍यक्‍ति सिर्फ स्‍वार्थ के संबंध बना सकता है। कापोत लेश्‍या वाला व्‍यक्‍ति प्रेम कर सकता है। प्रेम का पहला चरण उठा सकता है; क्‍योंकि प्रेम का अर्थ ही है कि दूसरा मुझसे ज्‍यादा मुल्‍य वान है। जब तक आप ही मूल्य वान है और दूसरा कम मूल्यवान है, तब तक प्रेम नहीं है। तब तक आप शोषण कर रहे है। तब तक दूसरे का उपयोग कर रहे है। तब तक दूसरा एक वस्‍तु है, व्‍यक्‍ति नहीं। जिस दिन दूसरा भी मूल्‍यवान है, और कभी आपसे भी ज्‍यादा मूल्‍यवान है कि वक्त आ जाये तो आप हानि सह लेंगे लेकिन उसे हानि न सहने देंगे। तो  आपके जीवन में एक नई दिशा का उद्भव हुआ।

      यह तीसरी लेश्‍या अधर्म की धर्म-लेश्‍या के बिलकुल करीब है, यही से द्वार खुलेगा। परार्थ प्रेम करूणा की छोटी सी झलक इस लेश्‍या में प्रवेश होगी। लेकिन बस छोटी सी झलक।

      आप दूसरे पर ध्‍यान देते है, लेकिन यह भी   अपने ही लिए। आपकी  पत्‍नी है, अगर कोई हमला कर दे तो आप बचायेंगे उसको—यह कापोत लेश्‍या हे। आप बचायेंगे उसको—लेकिन आप बचा इसलिए रहे है कि वह आपकी पत्‍नी हे। किसी और की पत्‍नी पर हमला कर रहा हो तो आप खड़े देखते रहेगें।

      ‘मेरे’ का विस्‍तार हुआ, लेकिन ‘मेरे’ मौजूद है। और अगर आपको यह भी पता चल जाए कि यह पत्‍नी धोखे बाज है, तो आप हट जायेंगे। आपको पता चल जाये कि इस पत्‍नी का लगाव किसी और से भी है, तो सारी करूणा, सारा प्रेम, सारी दया खो जायेगी। इस प्रेम में भी एक गहरा स्‍वार्थ है कि पत्‍नी के बिना मेरा जीवन कष्‍ट पूर्ण होगा,पत्‍नी जरूरी हे, आवश्‍यक है। उस पर ध्‍यान गया है, उस को मूल्‍य दिया है; लेकिन मूल्‍य मेरे लिए ही है।

      कापोत लेश्‍या अधर्म की पतली से पतली कम-से-कम भारी लेश्‍या है। लेकिन अधर्म वहां है। हममें से मुश्‍किल से कुछ लौग ही इस लेश्‍या तक उठ पाते है। दूसरा मूल्‍यवान हो जाये। लेकिन इतना भी जो कर पाते है, वह भी काफी बड़ी घटना है। अधर्म के द्वार पर आप आ गये, जहां से दूसरे जगत में प्रवेश हो सकता हे। लेकिन आम तौर से हमारे संबंध इतने भी ऊंचे नहीं होते। नील-लेश्‍या पर ही होते है। और कुछ के तो प्रेम के संबंध भी कृष्‍ण लेश्‍या पर होते है।

      ये जो कृष्‍ण लेश्‍या है इसमें प्रेम भी जन्‍म हो तो वह भी हिंसा के ही माध्‍यम से होगा। ऐसे प्रेमियों की अदालतों में कथायें है, जिन्‍होंने अपनी प्रेयसी को मार डाल। और बेड़ प्रेम से विवाह किया था। थोड़ी बहुत तो आप में भी, सब में यह वृति होती है—दबाने की, नाखून चुभाने की। वात्‍सायन ने अपने काम-सूत्रों में इसको भी प्रेम का हिस्‍सा कहा है; दाँत से काटो, इसको उसने जो प्रेम की जो प्रक्रिया बताई है; कैसे प्रेम करें। उसने दाँत से काटना भी कहा है, नाखुन चुभाओं, शरीर पर निशान छूट जायें—इनको लव माक्‍र्स, प्रेम के चिन्ह कहा है।

      छोटे बच्‍चे में भी जग जाता है, कोई बड़ों में ही जगता है, ऐसा नहीं। छोटा बच्‍चा भी कीड़ा दिख जाये, फौरन मसल देगा,उसको पैर से। तितली दिख जाए—पंख तोड़कर देखेगा। क्‍या हो रहा है। मेंढक को पत्‍थर मार मर कर देखेगा। क्‍या हो रहा है। कुत्‍ते को मारेगा,उसे सतायेगा। ये आप प्रवर्ती बच्‍चे में बचपन से ही देख सकते है।

      छोटा बच्चा भी आपका ही छोटा रूप है…बड़ा हो रहा है। आप कुत्‍ते की पूछ में डिब्‍बा नहीं बाँधते, आप आदमियों की पूछ में डिब्‍बा बाँधते है—रस लेते है, फिर क्‍या है, कुछ लोग उस को राजनीति कहते है। कुछ लोग उसको व्‍यवसाय कहते है,कुछ लोग जीवन के प्रतिस्‍पर्धा कहते है; लेकिन दूसरे को सतानें में बड़ा रस आता है। जब दूसरे को बिलकुल चारों खाने चित कर देते है तब आपको बड़ी प्रसन्‍नता होती है। जीवन में कोई परम गुहा की उपलब्‍धि हो गई।

      नील लेश्या वाला व्‍यक्‍ति आमतौर से, जिसको हम विवाह कहते है वह नील लेश्या वाले व्‍यक्‍ति का लक्षण है—दूसरे से कोई मतलब नहीं है, प्रेम की कोई घटना नहीं है। इसलिए भारतीयों ने अगर विवाह पर इतना जोर दिया और प्रेम विवाह पर बिलकुल जोर नहीं दिया तो उसका बड़ा कारण यही ह। कि सौ में से निन्‍यानवे लोग नील लेश्‍या में जीते है। प्रेम उनके जीवन में है ही नहीं,इसलिए प्रेम को कोई जगह देने का कारण नहीं। उनको जीवन में केवल एक स्‍त्री चाहिए। जिसका वे उपयोग कर सकें—एक उपकरण की तरह।

      कापोत….आकाश के रंग की जो लेश्‍या है, उसमें प्रेम की पहली किरण उतरती है। इसलिए अधर्म के जगत में प्रेम सबसे ऊंची घटना है। ज्‍यादा से ज्‍यादा धर्म की घटना। और अगर आपके जीवन में प्रेम मूल्‍यवान है, तो उसका अर्थ है कि दूसरा व्‍यक्‍ति मूल्‍यवान हुआ। यद्यपि यह भी अभी आपके लिए ही है। इतना मूल्‍यवान नहीं है कि आप कह सकें कि मेरा न हो तो भी मूल्यवान है। अगर मेरी पत्‍नी किसी और के भी प्रेम में पड़ जाये तो भी मैं  खुश होऊंगा—खुश होऊंगा,क्‍योंकि वह खुश है। वह इतनी मूल्‍यवान नहीं है; उसके व्यिक्तत्व का कोई मूल्‍य नहीं है। कि मेरे सुख के अलावा किसी और का सुख उससे निर्मित होता हो, तो भी मैं सुखी रहूँ।

      फिर तीन लेश्‍याएं है: तेज, पद्म और शुक्‍ल, तेज का अर्थ हे। अग्नि की तरह सुर्ख लाल। जैसे ही व्‍यक्‍ति तेज लेश्‍या में प्रवेश करता है, वैसे ही प्रेम गहन प्रगाढ़ हो जाता है। अब यह प्रेम दूसरे व्‍यक्‍ति का उपयोग करने के लिए नहीं है। अब यह प्रेम लेना नहीं है। अब यह प्रेम देना है, यह सिर्फ दान है। और इस व्‍यक्‍ति का जीवन प्रेम के इर्द-गिर्द निर्मित होता है।

4) चौथी लेश्‍या – तेज(लाल) लेश्‍या

यह जो लाल लेश्‍या है, इसके संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। क्‍योंकि धर्म की यात्रा पर यह पहला रंग हुआ। आकाशी, अधर्म की यात्रा पर संन्‍यासी रंग था। लाल, धर्म की यात्रा पर पहला रंग हुआ। इसलिए हिन्‍दुओं ने लाल को, गैरिक को संन्‍यासी का रंग चुना; क्‍योंकि धर्म के पथ पर यह पहला रंग है। हिंदुओं ने साधु के लिए गैरिक रंग चुना है, क्‍योंकि उसके शरीर की पूरी आभा लाल से भर जाए। उसका आभा मंडल लाल होगा। उसके वस्‍त्र भी उसमे ताल मेल बन जाएं, एक हो जायें। तो शरीर और उसकी आत्‍मा में उसके वस्‍त्रों और आभा में किसी तरह का विरोध न रहे; एक तारतम्‍य,एक संगीत पैदा हो जाये।

      ये तीन रंग है धर्म के—तेज, पद्म, शुक्‍ल। तेज हिंदुओं ने चुना है, शुक्‍ल जैनों ने चुना हे। पद्म दोनों के बीच। बुद्ध हमेशा मध्‍य मार्ग के पक्षपाती थे, हर चीज में। क्‍योंकि बुद्ध कहते थे कि जो है वह मूल्‍यवान नहीं है, क्‍योंकि उसे छोड़ना है। और जो अभी हुआ नहीं वह भी बहुत मूल्‍यवान नहीं, क्‍योंकि उसे अभी होना है—दोनों के बीच में साधक है।

      लाल यात्रा का प्रथम चरण है, शुभ्र यात्रा का अंतिम चरण है। पूरी यात्रा तो पीत की है। इसलिए बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए पीला रंग चुना है। तीनों चुनाव अपने आप में मुल्‍य वान है; कीमती है। कीमती है, बहुमूल्‍य है।

      यह जो लाल रंग है, यह आपके आस पास तभी प्रगट होना शुरू होता है। जब आपके जीवन में स्‍वार्थ बिलकुल शुन्‍य हो जाता है। अहंकार बिलकुल टूट जाता है। यह लाल आपके अहंकार को जला देता है। यह अग्‍नि आपके अहंकार को बिलकुल जला देती है। जिस दिन आप ऐसे जीने लगते है जैसे ‘’मैं नहीं हूं’’ उस दिन धर्म की तरंग उठनी शुरू होती है। जितना आपको लेंगे में हूं उतनी ही अधर्म की तरंग उठनी शुरू होती है। क्‍योंकि मैं का भी ही दूसरे को हानि पहुंचाने का भाव हे। मैं हो ही तभी सकता हूं, जब मैं आपको दबाऊ। जितना आपको दबाऊ, उतना ज्‍यादा मेरा ‘’मैं’’ मजबूत होता है। सारी दूनिया को दबा दूँ पैरों के नीचे, तभी मुझे लगेगा कि ‘’मैं हूं’’।

      अहंकार दूसरे का विनाश है। धर्म शुरू होता है वहां से जहां से हम अहंकार को छोड़ते है। जहां से मैं कहता हूं कि अब मेरे अहंकार की अभीप्‍सा वह जो अहंकार की महत्वाकांक्षा थी, वह मैं छोड़ता हूं। संघर्ष छोड़ता हूं,दूसरे को हराना दूसरे को मिटाना दूसरे को दबाने का भाव छोड़ता हूं। अब मेरे प्रथम होने की दौड़ बंद होती है। अब मैं अंतिम भी खड़ा हूं, तो भी प्रसन्‍न हूं। सन्‍यासी का अर्थ ही यही है कि जो अंतिम खड़े होने को राज़ी हो गया। जीसस ने कहा है मेरे प्रभु के राज्‍य में वे प्रथम होंगे, जो पृथ्‍वी के राज्‍य में अंतिम खड़े होने को राज़ी है।

      लाल रंग की अवस्‍था में व्‍यक्‍ति पूरी तरह प्रेम से भरा होगा,खुद मिट जायेगा। दूसरे महत्‍वपूर्ण हो जायेंगे। पश्‍चिम के धर्म है—ईसाइयत, वह लाल रंग को अभी भी पार नहीं कर पाई। क्‍योंकि अभी भी दूसरे को कनवर्ट करने की आकांशा है। इस्‍लाम लाल रंग को पान नहीं कर पाय। गहन दूसरे का ध्‍यान है, कि दूसरों को बदल देना है, किसी भी तरह बदल देना है उसकी वजह है एक मतांधता है।

      आप जान कर हैरान होंगे की दुनिया के दो पुराने धर्म—हिंदू और यहूदी, दोनों पीत अवस्‍था में हे। हिंदुओं और यहूदियों ने कभी किसी को बदलने की कोशिश नहीं की। बल्‍कि कोई आ भी जाये तो बड़ा मुश्‍किल है उसको भीतर लेना। द्वार जैसे बंद है, सब शांत है। दूसरे में कोई उत्सुकता नहीं है। संख्‍या कितनी है इसकी कोई फिक्र नहीं है।

      संन्‍यासी अर्थ है, जिसने महत्व आकांशा छोड़ दि है। जिसने संघर्ष छोड़ दिया है। जिसने दूसरे अहंकारों से लड़ने की वृति छोड़ दी। इस घड़ी में चेहरे के आस-पास लाल, गैरिक रंग का उदय होता है। जैसे सुबह का सूरज जब उगता है। जैसा रंग उस पर होता है, वैसा रंग पैदा होता है। इसलिए संन्‍यासी अगर सच में सन्‍यासी हो तो उसके चेहरे पर रक्त आभा, जो लाली होगी। जो सूर्य के उदय के क्षण की ताजगी होगी। वही खबर दे देगी।

5) पांचवी – पद्म लेश्‍या

पद्म..महावीर कहते है, दूसरी धर्म लेश्‍या है पीत। इस लाली के बाद जब जल जायेगा अहंकार…..स्‍वभावत: अग्नि की तभी तक जरूरत है जब तक अहंकार जल न जाये। जैसे ही अहंकार जल जायेगा, तो लाली पीत होने लगेगी। जैसे, सुबह का सूरज जैसे-जैसे ऊपर उठने लगता है। वैसा लाल नहीं रह जायेगा,पीला हो जाये। स्‍वर्ण का पीत रंग प्रगट होने लगेगा। जब स्पर्धा छूट जाती है, संघर्ष छूट जाता है, दूसरों से तुलना छूट जाती है और व्‍यक्‍ति अपने साथ राज़ी हो जाता है—अपने में ही जाने लगता है—जैसे संसार हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता—यह ध्‍यान की अवस्‍था है।

      लाल रंग की अवस्‍था में व्‍यक्‍ति पूरी तरह प्रेम से भरा होगा, खुद मिट जायेगा,दूसरे महत्‍वपूर्ण हो जायेंगे। पीत की अवस्‍था में न खुद रहेगा, न दूसरे  रहेगें। सब शांत हो जायेगा। पीत ध्‍यान का अवस्‍था है—जब व्‍यक्‍ति अपने में होता है, दूसरे का पता ही नहीं चलता कि दूसरा है भी। जिस क्षण मुझे  भूल जाता है कि ‘’मैं हूं’’ उसी क्षण यह भी भूल जायेगा कि दूसरा भी है।

      पीत बड़ा शांत, बड़ा मौन, अनुद्विग्न रंग है। स्‍वर्ण की तरह शुद्ध,लेकिन कोई उत्तेजना नहीं। लाल रंग में उत्‍तेजना है,वह धर्म का पहला चरण है।

      इसलिए ध्‍यान रहे, जो लोग धर्म के पहले चरण में होते है, वे उत्‍तेजित होते है। धर्म उनके लिए खींचता है—जोर से धर्म के प्रति बड़े आब्‍सेज्‍ड होते है। धर्म भी उनके लिए एक ज्‍वर की तरह होता है। लेकिन,जैसे-जैसे धर्म में गति होती जाती है,वैसे-वैसे सब शांत हो जाता है।

      पश्‍चिम के धर्म है—ईसाइयत,लाल रंग को अभी पार नहीं कर पाया है। क्‍योंकि अभी भी दूसरे को कनवर्ट करने की आकांशा है। इसलाम लाल रंग को पार नहीं कर पाया है। गहन दूसरे पर ध्‍यान है। कि दूसरों को बदल देना है। किसी भी तरह बदल देना है उसकी वजह से एक मतांधता है।

      व्यक्ति जब पहली दफा धार्मिक होना शुरू होता है, तो बड़ा धार्मिक जोश खरोश होता है। यही लोग उपद्रव का कारण हे जो जाते है, क्‍योंकि उनमें इतना जोश खरोश होता है कि वे फेनेटिक हो जाते है; वे अपने को ठीक मानते है, सबको गलत मानते है। और सबको ठीक करने की चेष्‍टा में लग जाते है….दया वश। लेकिन वह दया भी कठोर हो सकती है।

      जैसे ही ध्‍यान पैदा होता है, प्रेम शांत होता है। क्‍योंकि प्रेम में दूसरे पर नजर होती है, ध्‍यान में अपने पर नजर आ जाती है। पीत लेश्‍या—पद्म लेश्‍या ध्यानी की अवस्‍था होती है। बारह वर्ष महावीर उसी अवस्‍था में रहे। और पीला भी जब और बिखरता जाता है, विलीन होता जाता है तो शुभ्र का जन्‍म होता है। जैसे सांझ जब सूरज डूबता है और रात अभी नहीं आई,और सूरज डूब गया है। और संध्‍या फैल जाती है। शुभ्र, कोई उत्‍तेजना नहीं, वह समाधि की अवस्‍था है। उस क्षण में सभी लेश्‍याएं शांत हो जाती है। सभी लेश्‍या शुभ्र बन गई। शुभ्र अंतिम अवस्‍था है चित की।

6) छठी लेश्‍या – शुभ्र लेश्‍या

शुभ्र चित की आखरी अवस्‍था है। झीने से झीना पर्दा बचा है, वह भी खो जायेगा। तो सातवीं को महावीर ने नहीं गिनाया; क्‍योंकि सांतवीं फिर चित की अवस्‍था नही, आत्‍मा का स्‍वभाव है। वहां सफेद भी नहीं बचता। उतनी उतैजना भी नहीं रहती।

मृत्‍यु में जैसे खोते है, जैसे काल में खोते है। वैसे नहीं—मुक्‍ति में जैसे खोते है। काले में तो सारे रंग इसलिए खो जाते है कि काला सभी रंगों को हजम कर जाता है। पी जाता है, भोग लेता है। मुक्‍ति में सभी रंग इसलिए खो जाते है, कि किसी रंग पर पकड़ नहीं रह जाती। जीवन की कोई वासना, जीवन की कोई आकांशा जीवेषणा नहीं रह जाती। सभी रंग खो जाते है। इसलिए सफेद के बाद जो अंतिम छलांग है, वह भी रंग विहीन है।

और ध्‍यान रहे, मृत्‍यु और मोक्ष बड़े एक जैसे है, और बड़े विपरीत भी; दोनों में इसलिए रंग खो जाते है। एक में रंग खो जाते है कि जीवन खो जाता है। दूसरे में इसलिए रंग खो जाते है कि जीवन पूर्ण हो जाता है, और अब रंगों की कोई इच्‍छा नहीं रह जाती।

मोक्ष मृत्‍यु जैसा है, इसलिए मुक्‍त होने से हम डरते है। जो जीवन को पकड़ता है, वहीं मुक्‍त हो सकता है। जो जीवन को पकड़ता है, वह बंधन में बना रहता है। जीवेषणा,जिसको बुद्ध ने कहा है,लास्‍ट फार लाइफ। वही इन रंगों को फैलाव है। और अगर जीवेषणा बहुत ज्‍यादा हो तो दूसरे की मृत्‍यु बन जाती है। वह कृष्‍ण लेश्‍या है। अगर जीवेषणा तरल होती जाये, कम होती जाये। फीकी होती जाये, तो दूसरे का जीवन बन जाती है—वह प्रेम है।

महावीर ने छह लेश्‍याएं कही है—अभी पश्‍चिम में इस पर खोज चलती है तो अनुभव में आता है कि ये छह रंग करीब-करीब वैज्ञानिक सिद्ध होंगे। और मनुष्‍य के चित को नापने की इससे कुशल कुंजी नहीं हो सकती। क्‍योंकि यह बाहर से नापा जा सकता है। भीतर जाने की कोई जरूरत नहीं। जैसे एक्‍सरे लेकर कहा जा सकता है कि भीतर कौन सी बीमारी है वैसे आपके चेहरे का ऑरा पकड़ा जाये तो उस ऑरा से पता चल सकता है। चित किस तरह से रूग्‍ण है, कहां अटका हे। और तब मार्ग खोज जा सकते है। कि क्‍या किया जा सकता है। जो इस चित की लेश्‍या से ऊपर उठा जा सके।

अंतिम घड़ी में लक्ष्‍य तो वहीं है। जहां कोई लेश्‍या न रह जाये। लेश्‍या का अर्थ: जो बाँधती है। जिससे हम बंधन में होते है। जो रस्‍सी की तरह हमें चारों तरफ से घेरे रहती है। जब सारी लेश्‍याएं गिर जाती है तो जीवन की परम ऊर्जा मुक्‍त हो जाती है। उस मुक्‍ति के क्षण को हिंदुओं ने ब्रह्मा कहा है—बुद्ध ने निर्वाण, कहा है, महावीर ने कैवल्‍य कहा है।

कृष्‍ण, नील, कापोत—ये तीन अधर्म लेश्याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव दुर्गीत में उत्‍पन्‍न होता है।

तेज,पद्म, और शुक्‍ल। ये तीन धर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव सदगति में उत्‍पन्‍न होता है। ध्‍यान रहे,शुभ्र लेश्‍या के पैदा हो जाने पर भी जन्‍म होगा। अच्‍छी गति होगी, सदगति होगी, साधु का जीवन होगा। लेकिन जन्‍म होगा, क्‍योंकि लेश्‍या अभी भी बाकी है। थोड़ा सा बंधन शुभ्र का बाकी है। इसलिए पूरा विज्ञान विकसित हुआ था प्राचीन समय में—मरते हुए आदमी के पास ध्‍यान रखा जाता था कि उसकी कौन सी लेश्‍या मरते क्षण मैं है, क्‍योंकि जो उसकी लेश्‍या मरते क्षण में है, उससे अंदाज लगाया जो सकता है कि वह कहां जायेगा। उसकी क्‍या गति होगी।

सभी लोगों के मरने पर लोग रोते नहीं थे, लेश्‍या देखकर….अगर कृष्‍ण लेश्‍या हो तो ही रोने का अर्थ है। अगर कोई अधर्म लेश्‍या हो तो रोने का अर्थ है, क्‍योंकि वह व्‍यक्‍ति फिर दुर्गति में जा रहा है, दुःख में जा रहा है। नरक में भटकने जा रहा है। तिब्‍बत में बारदो पूरा विज्ञान है, और पूरी कोशिश की जाती है कि मरते क्षण में भी इसकी लेश्‍या बदल जायें। तो भी काम का हे। मरते क्षण में भी जिस अवस्‍था में—उसी में हम जन्‍मते है। ठीक वैसे जैसे रात आप सोते है तो जो विचार आपका अंतिम होगा; सुबह वही विचार आपका प्रथम होगा।

इसे आप प्रयोग कर के देख ले। बिलकुल आखिरी विचार रात सोते समय जो आपके चित में होगा। जिसके बार आप खो जायेंगे अंधेरे में नींद के—सुबह जैसे ही जागेंगे, वही विचार पहला होगा। क्‍योंकि रात भर सब स्‍थगित रहा, तो जो रात अंतिम था वहीं पहले सुबह प्रथम बनेगा। बीच में तो गैप है, अंधकार है, सब खाली है। इसलिए हमने मृत्‍यु को महानिद्रा कहा है। इधर मृत्‍यु के आखिरी क्षण में जा लेश्‍या होगी। जन्‍म के समय में वही पहली लेश्‍या होगी।

बुद्ध पैदा हुए….। जब भी कोई व्‍यक्‍ति श्वेत लेश्‍या के साथ मरता है, तो जो लोग भी धर्म लेश्‍याओं में जीते है, पीत या लाल में, उन लोगों को अनुभव होता है; क्‍योंकि यह घटना जागतिक है। और जब भी कोई व्‍यक्‍ति शुभ्र लेश्‍या में जन्‍म लेता है, तो जो लोग भी लाल और पीत लेश्‍या के करीब होते है, या शुभ्र लेश्‍या में होते है। उनको अनुभव होता है कौन पैदाहोना गया है। जिसे हम गुरु या भगवान कहते है उसे सब क्‍यों नहीं पहचान पाते, जितनी लेश्‍या निम्‍न होगी, वह उतना ही सत गुरु से दूर भागेगा या विरोध करेगा। आपने देखा पूरे इतिहास में जीसस, कृष्‍ण,मीरा,कबीर, नानक,मोहम्‍मद,रवि दास, बुद्ध, महावीर….किसी भी सत गुरु को ले ली जिए। सम कालीन कुछ गिने चुने लोग ही इनके आस पास आ पाते हे। इसे आप प्रकृति का शाश्वत नियम मान ले।

– ओशो

[महावीर वाणी – 2; प्रवचन – 14 ]

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