“सृजन:: संन्यास का एक नया आयाम” – ओशो

मेरे देखे, अगर तुम परमात्मा के निकट आना चाहते हो तो सत्यनारायण की कथा तुम्हें उसके निकट नही लाएगी। क्योंकि तुम्हारी सत्यनारायण की कथा में न तो सत्य है और न नारायण है; वह तो पंडित-पुरोहित का व्यवसाय है। यज्ञ-हवन, आग में फेंका गया घी, गेहूं, चावल – पागलपन है, विक्षिप्तता है, अपराध है। देश भूखा मरता हो और हजारों मनों का अनाज, सैकड़ो पीपे घी प्रतिवर्ष बहाया जाता है अगिन में। तुम पागल हो! यह धर्म नही है।

जलानी है अपने भीतर की मशाल। और उसके जलाने का सुगमतम जो उपाय है, वह है सृजनात्मक हो जाओ। जीवन को वैसा ही मत छोड़ो जैसा तुमने पाया था। जीवन को कुछ सुंदर करो। उठाओ तूलिका, जीवन को थोड़े रंग दो! उठाओ वीणा, जीवन को थोड़े स्वर दो! पैरों में बांधो घूंघर, जीवन को थोड़ा नृत्य दो! प्रेम दो! प्रीति दो! तोड़ो उदासी। जीवन को थोड़ा उत्सव से भरो! और तुम जितने सृजनात्मक हो जाओगे उतना ही तुम पाओगे, तुम परमात्मा के करीब आने लगे। क्योंकि परमात्मा अर्थात सृजनात्मकता। उसके करीब आने का एक ही उपाय है: सृजन।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि तुम्हारे पंडित-पुजारी से तो कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता कही ज्यादा करीब होता है परमात्मा के। अभिनेता जब अभिनय में अपने को पूरी तरह डुबा देता है तो वह प्रार्थना का क्षण है। चित्रकार जब चित्र बनाने में बिल्कुल लवलीन हो जाता है, तल्लीन हो जाता है, भूल ही जाता है अपने को-तब वह प्रार्थना का क्षण है। जब भी तुम सृजन की किसी क्रिया में अपने को पूरा गला देते हो, पिघला देते हो – मिट जाते हो। कवि, चित्रकार, अभनिेता, मूर्तिकार कही ज्यादा करीब हैं परमात्मा के – पंडित, पुरोहितों, दार्शनिकों, विचारकों से।

लेकिन कवि हो, चित्रकार हो, मूर्तिकार हो, बस क्षण भर को डूबता है, फिर बाहर निकल आता है; उसकी डुबकी गहरी नही।

तीन छोटे-छोटे बच्चे बात कर रहे थे। एक बच्चे ने कहा कि तैरना तो कोई मेरे पिताजी से सीखे, क्या डुबकी मारते हैं!
दूसरे ने कहा, तुम्हारे पिताजी, डुबकी!

फिर निकलते हैं या नही?
निकल आते हैं।उसने कहा,

डुबकी मेरे पिताजी मारते हैं। आधा-आधा घंटे तक पता ही नही चलता।
तीसरे ने कहा, यह भी कोई डुबकी है! मेरी पिताजी ने डुबकी सात साल पहले मारी थी, अभी तक नही लौटे। और मैं मां से पूछता हूं, कब लौटेंगे? मां कहती है, अब वे आने वाले नही, वे डुबकी मार ही गए। डुबकी इसको कहते हैं!

कवि की डुबकी ऐसी है – गया और आया, गया और आया। छूता है, उछलता है, चरणों तक पहुंच जाता है; मगर गिर जाता है वापस। इसलिए हमारे देश में हमने दो शब्द उपयोग किए हैं, दोनों का अर्थ तो एक ही होता है – कवि और ऋषि। कवि हम उसे कहते हैं, जो डुबकी मारता है और निकल आता है, जो क्षण भर को श्वास को साध लेता है। और ऋषि हम उसे कहते हैं, जो डुबकी मारता है तो फिर निकलता नही – जो डूब ही जाता है; जो परमात्मा से वापस नही लौटता!

पलटू ने कहा न, जैसे नमक की पुतली डूब जाए सागर में, फिर क्या लौटेगी? गल जाएगी, एक हो जाएगी, एकरूप हो जाएगी! लेकिन कवि एक महत्वपूर्ण कदम है ऋषि होने के लिए।

मैं अपने संन्यासी को निरंतर कहता हूं: सृजनात्मक बनो।

पुराने दिनों का संन्यास असृजनात्मक हो गया था, इसलिए मुर्दा हो गया था। उसका परमात्मा से संबंध टूट गया था। तुम्हारे पुराने महात्मा क्या सृजन किए हैं? तुम धीरे-धीरे असृजनात्मक क्रियाओं को बड़ा सम्मान देने लगे थे, क्योंकि तुम्हें सृजनात्मकता का बोध ही भूल गया। लोग प्रशंसा करते हैं कि फलां महात्मा बहुत बड़ा है। क्या करता है? क्या किया उसने? क्योंकि वह नग्न है। क्योंकि वह जब सर्दी पड़ती है तो कपड़े नही पहनता। क्योंकि वह धूप में खड़ा होता है। जब लोग छाया तलाशते हैं तब वह धूप में खड़ा होता है। और जब लोग धूप तलाशते हैं तब वह सर्दी में खड़ा होता है। ये विक्षिप्तता के लक्षण हैं। यह आदमी दुखवादी है। यह आदमी रुग्ण है, इसको मानसिक चिकित्सा की जरूरत है।

कोई इसलिए महात्मा है कि कांटों पर सोता है। अब कांटों पर सोना, यह कोई सहज वृत्ति नही है। यह तो बहुत असहज है, अस्वाभाविक है। कोई पशु-पक्षी को तुमने देखा कि पहले कांटों की सेज बनाए और फिर उस पर लेटे? सिवाय आदमियों में, इस तरह के पागल और कही नही पाए जाते। पशु-पक्षी हंसते होंगे देख कर तुम्हारे महात्माओं को जब वे कांटे बिछा कर लेटते होंगे। इस आदमी के भीतर कही कुछ गलत हो गया। यह आत्मघाती है। यह शनै:-शनै: आत्मघात कर रहा है। तुम आदर देते हो इन बातों को। तुम आदर देते हो क्योंकि कोई आदमी लंबे उपवास करता है, भूखा मरता है। इसके भूखे मरने से क्या सृजन होता है? इसके भूखे मरने से इसके चारों तरफ विक्षिप्तता की तरंगें पैदा होती हैं, और कुछ पैदा नही होता। यह अपने चारों तरफ रुग्ण कीटाणु फैलाता है। मनोवैज्ञानिक इस तरह के रोग को मैसोचिज्म कहते हैं, स्वदुखवाद।

दुनिया में दो तरह के दुष्ट हैं। एक तो वे हैं जो दूसरों को सताते हैं। और एक वे हैं जो स्वयं को सताते हैं। इन दोनों तरह के दुष्टों में कोई भी धार्मिक नही है। ये दोनों ही हिंसक हैं। दूसरे को सताओ कि स्वयं को सताओ, सताने में हिंसा है। और हिंसा विध्वंस है, सृजन नही।

मैं अपने संन्यासी को एक नया आयाम दे रहा हूं – एक स्वस्थ आयाम। न तो दूसरे को सताओ, न स्वयं को सताओ – सताना पाप है। चाहे तुम दूसरे की देह को सताओ, तो भी तुम परमात्मा को सता रहे हो। और चाहे तुम अपनी देह को सताओ, तो भी तुम परमात्मा को सता रहे हो। क्योंकि सभी देहों में वही व्याप्त है। क्या तुम सोचते हो…
बड़े आश्चर्य की बात है! ये तुम्हारे महात्मागण कहते हैं, सब जगह परमात्मा व्याप्त है – सिर्फ इनको छोड़ कर! तो जब ये भूखे मरते हैं, किसको भूखा मार रहे हैं? और जब ये रात भर जागते हैं तो किसको जगाए रखे हैं? और जब ये कांटों की सेज पर सोते हैं तो किसको कांटों की सेज पर सुलाते हैं? परमात्मा को ही! क्या इनके भीतर छोड़ कर और सब जगह परमात्मा है? और इस तरह की प्रक्रियाओं का क्या प्रयोजन है? दुनिया में वैसे ही दुख बहुत है, और दुख न बढ़ाओ। ऐसे ही दुनिया कांटों की सेज है, और क्या कांटे तलाशते हो! ऐसे ही दुनिया में चिता पर चढ़े हो, और क्या चिता खोजते हो!

लेकिन अतीत का संन्यास दुखवादी था, हालांकि तुम उसे त्यागवादी कहते थे। त्याग अच्छा शब्द है दुखवाद के लिए, बस और कुछ भी नही। भोगी दूसरे को सताता है, त्यागी खुद को सताता है। मगर सताने का गणित एक है। दोनों से सावधान! न तो दूसरे को सताना, न अपने को सताना। सताना ही नही! सब जगह परमात्मा है। बन सके तो सुख की तरंगें फैलाना! बन सके तो मधुर कोई गीत गाना! बन सके तो रसपूर्ण कोई नृत्य पैदा करना!

संन्यासी सृजनात्मक होना चाहिए – कवि हो, चित्रकार हो, मूर्तिकार हो, नर्तक हो। या जो भी करे, उसे इस ढंग से करे, ऐसी तल्लीनता से करे कि उसका छोटा-छोटा कृत्य भी ध्यान हो जाए। इस महत प्रयोग को करने के लिए ही यहां सारा आयोजन चल रहा है। तुम यहां संन्यासियों को जूते बनाते देखोगे; स्नानगृहों, पाखानों को साफ करते देखोगे; बढ़ई का काम करते देखोगे। लेकिन एक अदभुत प्रफुल्लता से! क्योंकि यह कृत्य नही है – यह प्रभु का अर्चन है, यह उसका पूजन है! जब कृत्य पूजन बन जाएं तभी जानना कि तुम संन्यासी हुए हो।

उन्होंने ठीक कहा: ‘सब हो रहा है।जीवन में कुछ चीजें हैं जो करने से होती हैं। वे ही चीजें व्यर्थ चीजें हैं। तुम एक झाड़ के नीचे बैठ जाओ तो धन अपने आप तुम्हारी तरफ नही आएगा, तुम्हें तलाशता हुआ नही आएगा। तुम एक झाड़ के नीचे बैठे रहो…कहानियों की बात छोड़ दो कि जब वह देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। किसी को छप्पर फाड़ कर नही देता। छप्पर भला फाड़ दे, और कुछ नही आता। फिर छप्पर अपना बनाओ। छप्पर कई के फाड़ देता है, लेकिन छप्पर फाड़ कर किसी को देता नही। तुम इस भ्रांति में मत रहना कि पुरानी बच्चों की कहानियां पढ़ते रहो और भ्रांतियां खाते रहो कि एक आदमी एक नगर में प्रवेश करता है सुबह-सुबह, उसको पकड़ कर ले जाया जाता है और सम्राट बना दिया जाता है। तुम दिल्ली में जितनी बार चाहे जाओ-आओ…नेतागण दिल्ली आते-जाते रहते हैं, दिन-रात चक्कर ही मारते रहते हैं दिल्ली का – इसी आशा में शायद कि किसी दिन कोई कहानी सच हो जाए, कि गए दिल्ली और एकदम लोगों ने पकड़ा और कहा कि नही, आप राष्ट्रपति हो जाएं! कि प्रधानमंत्री हो जाएं!

धन और पद ऐसे नही आते। धन और पद तो छीनने होते हैं, झपटने होते हैं; लड़ना होगा, झगड़ना होगा, प्रतिस्पर्धा करनी होगी, ईष्र्या में जलना होगा और औरों को जलाना होगा। लेकिन कुछ चीजें हैं जो अपने आप आती हैं। जैसे आनंद, जैसे प्रेम, जैसे ध्यान, जैसे प्रार्थना, जैसे परमात्मा, जैसे स्वर्ग – ये अपने आप आते हैं। इनके आने का ढंग और है। ये कृत्य से नही आते। ये कर्ता-भाव से नही आते। जब तुम अकर्ता-भाव में होते हो। जब तुम इतने शांत होते हो कि न कोई कृत्य होता है, न कुछ करने की आकांक्षा होती है; जब तुम परिपूर्ण शून्य होते हो; जब तुम्हारे भीतर सब थिर होता है, कोई हलन-चलन नही, कोई वासना नही, कोई भविष्य नही, कुछ पाने की आकांक्षा नही, कुछ होने की आकांक्षा नही; तब तुम्हारे भीतर कुछ उतरना शुरू होता है – जो अलौकिक है! उस अलौकिक को तुम जो नाम देना चाहो…महावीर ने उसे कहा कैवल्य; बुद्ध ने उसे कहा निर्वाण। तुम परमात्मा कहना चाहो, परमात्मा प्यारा शब्द है, परमात्मा कहो। मगर ध्यान रखना, व्यक्ति मत बना लेना परमात्मा को। परमात्मा व्यक्ति नही है। व्यक्ति में तो सीमित हो जाएगा। परमात्मा समषिट है। उसे असीम रखो।

परमात्मा सागर है, जिसके कोई ओर-छोर नही हैं। और परमात्मा को पाने का एक ही ढंग है कि तुमने पाने के जितने ढंग सीख रखे हैं वे छोड़ दो। तुम एक ऐसी अवस्था में आ जाओ जहां पाने की कोई आकांक्षा नही, अभीप्सा नही। होना काफी हो जहां। बस तब तुम समझ पाओगे कि सब हो रहा है। जब तुम अपने भीतर परमात्मा को उतरते देखोगे, आनंद को – और तुमने कुछ किया नही, तुम चुपचाप बैठे थे – तो तुम कैसे कह सकोगे मेरा कृत्य है? तुम यही कह सकोगे – प्रसाद है!

इसलिए जानने वालों ने परमात्मा को प्रसाद कहा है। प्रसाद का अर्थ होता है – जो मिला; जो उतरा अनंत से; जो आकाश से आया है और तुममें समा गया है। उस दिन तुम यह भी जान पाओगे कि सब अपने से हो रहा है।

वृक्षों को कोई खींच-खींच कर बड़ा थोड़े ही कर रहा है! बादलों में कोई पानी भर-भर कर थोड़े ही भेज रहा है! सब अपने से हो रहा है। और सब अपने से हो रहा है, यह जीवन के रहस्य को बढ़ाता है, कम नही करता। तुम जब कहते हो ईश्वर कर रहा है, तो तुम जीवन के रहस्य को मार डालते हो।

असल में, मनुष्य का मन हमेशा रहस्य की हत्या करने में संलग्न रहता है। वह उत्तर चाहता है। वह कहता है, कोई उत्तर मिल जाए ताकि रहस्य खतम हो। किसने बनाया संसार? कोई उत्तर नही है, क्योंकि संसार कभी बना नही – सदा से है और सदा रहेगा, शाश्वत है, आदि-अंतहीन है। मगर इससे जिज्ञासा हल नही होती। लेकिन कोई कह देता है कि ब्रह्रााजी ने बनाया; थोड़ा हलका हुआ मन कि चलो किसी ने बनाया। अब ब्रह्रााजी की तलाश करें! अब जिसने जगत बनाया है उसकी ही पूजा करें, उसका ही पाठ करें, उसकी ही खुशामद करें, स्तुति करें। जिसने जगत बनाया है वही सम्हालेगा।

– ओशो

[काहे होत अधीर, प्रवचन 12]

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