“इंद्रधनुष जैसा है प्रेम !” – ओशो शैलेन्द्र

प्रेम और घृणा के बीच वही नाता है जो जन्म और मृत्यु के बीच में है, जो धूप-छाया के बीच में है। जो दिन और रात के बीच में; अमृत और जहर, ठंडक और गर्मी के बीच में है।
प्रेम एक इंद्रधुनष है, एक पूरी रेंज है। इसको केवल दो टुकड़ों में तोड़ कर ही मत समझो। छोटे-छोटे विभाजन करो तो बात और स्पष्ट हो सकेगी। यदि इंद्रधुनष में हम चुन लें बैंगनी और लाल रंग तो लगता है एक दूसरे के विपरीत हैं। लेकिन जब हम पूरी रेंज को देखें तो सात रंग उसमें छाए हुए हैं, तब हमें पता चलता है कि ये तो एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं। वह बैंगनी ही नीला हो जाता है। बैंगनी और नीले में उतना भेद नहीं है। नीला और पीला के बीच में हरा है। अब बात समझ में आती है कि नीला और पीला रंग जहाँ ओवरलैप कर रहा है वह हरा बन गया। इसी प्रकार और दूसरे भी रंग हैं। पूरी रेंज को समझो तो फिर जो अल्ट्रा-वॅायलेट और इन्फ्रा-रेड है, इन्द्रधनुष के पार के रंग भी एक सीक्वेंस में, एक क्रम में दिखाई देते हैं; और एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं, यह बात भी समझ में आती है। फिर इनके भीतर की विपरीतता खो जाती है, और तारतम्यता प्रगट होती है।

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“क्या मस्तिष्क ही मन है?” – ओशो शैलेन्द्र

ब्रेन एंड माइन्ड, मस्तिष्क और मन; दो अलग-अलग बातें हैं। प्रायः हम दोनों को समानार्थी समझने की भूल कर बैठते हैं। वे पर्यायवाची नहीं हैं। इसे कम्प्यूटर के उदाहरण से समझना सरल होगा। दिमाग हमारे भौतिक शरीर का हिस्सा है। देह को हार्डवेयर तथा दिमाग को साफ्टवेयर जैसा समझें। मस्तिष्क स्थूल देह का अंग है- छोटी सी खोपड़ी में फिट एक बायो-कम्प्यूटर, जिसमें मन रूपी साफ्टवेयर इन्स्टाल हो जाता है।

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“आतंकवाद की जड़ कहां?” – ओशो शैलेन्द्र

स्वयं को परिवार, संस्था, समाज अथवा देश के ठेकेदार समझने वाले व्यक्ति को बारंबार सचेत कराने की जरूरत है कि अगर आपकी बात में दम है तो लोग स्वयं ही मानेंगे। यदि लोग नहीं मान रहे हैं तो मामला स्पष्ट है कि आपके विचार में प्राण नहीं हैं। सदा स्मरण रखें कि गणतंत्र में केवल बहुमत को ही नहीं, अल्पमत को भी जीने का बराबर हक है। बाहरी जगत से साम्राज्यवाद तो लगभग ‘आउट ऑफ डेट’ हो चुका है परंतु मनुष्य जाति के अवचेतन मन में ‘जंगल का कानून’ अभी तक गहरी जड़ें जमाए हुए है- ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’!

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“ओशो की मुख्य देशना” – ओशो शैलेन्द्र

ओशो से एक बार पूछा गया कि आप रोज सुबह-शाम डेढ़-डेढ़ घंटा प्रवचन देते हैं, हमें समझाते हैं, और पिछले कई सालों से बोल रहे हैं। क्या वह बात अभी तक पूरी नहीं हुई जो आप कहना चाहते हैं?
सदगुरु ने जवाब दिया कि वह बात ही अकथनीय है, वह भाषा में अभिव्यक्त नहीं होती। वह अवर्णनीय है, शब्दों में नहीं समाती। इसलिए मैं कितना ही बोलूं; वह बात कभी पूरी नहीं होगी। वह तो मौन में सुनी जाती है, बोली नहीं जाती। और एक दिन ऐसा आएगा कि जब मेरे शिष्य श्रवण में सक्षम हो जाएंगे, तब वे मेरे संग मौन सत्संग में बैठेंगे। मैं कुछ भी नहीं कहूंगा और तुम सुनोगे। वही असली बात होगी, उसके लिए मैं तुम्हें तैयार कर रहा हूं। थोड़ी रिहर्सल हो जाए चुप रहने की। शांत बैठने की तुम्हारी आदत हो जाए, तब असली बात होगी।
फिर एक दिन आया 25 मार्च 1981, जब ओशो ने घोषणा की, कि…

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“Right Action (सम्यक कर्म)” – Osho Shailendra

Everybody is unique and extraordinary. Everybody is gifted with some creative talents. Flowering these talents is self-actualization and all actions guided in this direction strengthens our Buddha Nature and is known as Right Action or Samyak Karma which is one of the constituents of the Eight Fold Path of Lord Buddha.
We can start living our ordinary life in an extraordinary way. The simplest and most effective way of living an extraordinary life is living in awareness. Whatsoever we do, we should do it with self-remembrance. Our actions should be rooted in our consciousness and freedom, not in reaction of what others are doing. Reaction is not right action, it is governed by unconscious mind, and it is controlled by others. Reaction is never free. It has strong bondages with the person or principle we are reacting against.

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“10 Sutras of Self Revolution” – Osho Shailendra

The guidelines of the revolution are the same. The way in which the revolution took place in my life; similarly it can take place in your life. It can take place in everyone’s life. In short I would like to speak on 10 sutras.
In my life as I was Osho’s younger brother, second, third and fourth step took place by itself. I began directly from the fifth step. Therefore my journey was very simple.

The vision of Master Osho has evolved my heart and beautified my life. It brought joy and bliss to my life. The fiction of the self has broken like a dream. The dust on the mirror of consciousness has been cleaned by His cooling breeze. My dark life has been illuminated by light. A fire of life has ignited a candle in the temple of my heart. Just giving the control of my life in His hands, I didn’t swim nor run in the river of the world but with His grace the boat of my life reached the other shore.

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“ओशो की उपस्थिति का अनुभव ! ” – ओशो शैलेन्द्र

मैं इतने हजारों संन्यासी मित्राों से मिलता हूँ, और उनसे पूछता हूं कि आप ओशो की उपस्थिति किस रूप में अनुभव करने की कोशिश करते हैं? उन्हें कुछ भी पता नहीं है, इस मामले में बिल्कुल ही अन्धेरा छाया हुआ है। जबकि स्वयं ओशो ने खूब विस्तार से वर्णन किया है कि आप जिस सदगुरु से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, अब वह कहां हैं, किस रूप में है , उनसे जुड़ने का अर्थ क्या है और उनसे जुड़ने की विधि क्या है? पंतजलि ने खूब अच्छे से समझाया है कि ओम को जपो, ओम पर ध्यान दो और ओम में डूबो। क्योंकि सदगुरु देह त्यागने के बाद अनहद-नाद हो जाते हैं। वे ओम का प्रकाश हो जाते हैं। यह नाम आपने सुना होगा? हमारे मुल्क में बहुत कामन नाम है ओमप्रकाश। कभी आपने ख्याल नहीं किया होगा ओमप्रकाश का अभिप्राय क्या है- ओंकार की रोशनी। ओंकार के दो रूप मुख्य हैं- एक ध्वनिमय रूप, एक प्रकाशमय रूप। गोरखनाथ पर प्रवचन देते हुए ‘मरौ हे जोगी मरौ में ओशो समझाते हैं गोरखनाथ का यह प्यारा वचन- ‘शब्द भया उजियाला।’

वह जो भीतर शब्द गूंज रहा हैं ओंकार का, जैसे वह प्रकाशित हो जाए, ऐसी अदभुत घटना घटती है। शब्द भया उजियाला। भीतर का अनाहत शब्द दो रूपों में प्रगट होता है- स्वर व उजाले की तरह। अशरीरी सदगुरु भी उसी आलोकित शब्द में समा जाते हैं।

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“Generation Gap/पीढ़ी अंतराल कैसे दूर हो?” – ओशो शैलेन्द्र

प्रश्न: पीढ़ी अंतराल कैसे दूर होगा? मेरा बेटा मेरी बात मानने को जरा भी राजी नहीं होता, मैं क्या करूं?

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“अंतर्यात्रा में गुरु की जरूरत” – ओशो शैलेन्द्र

प्रभु सर्वशक्तिमान नही है, ओमनीपोटेंट नही है, एक काम वह नही कर सकता, परमात्मा स्वयं परमात्मा का ज्ञान हमें नही दे सकता, गुरु ही वह कार्य कर सकता है।इसलिए इस भ्रम में नही रहना कि तुम्हें सीधा ज्ञान मिल जाएगा, बिना गुरु के हरि का ज्ञान नही हो सकता। यह कहावत ठीक ही है कि गुरु बिन होय न ज्ञान।

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